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संगम वंश Sangama Dynasty – Vivace Panorama

संगम वंश Sangama Dynasty

विजयनगर के प्रथम वंश का नाम संगम के नाम पर रखा गया है। हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम के समय में विजयनगर-राज्य अपने प्रभाव के अधीन कई रजवाड़ों एवं प्रमंडलों को ले आया, जिनमें कुछ के मतानुसार, होयशल-राज्य का अधिकांश भाग सम्मिलित था। उसने साम्राज्य को देश, स्थल और नाडुओं में विभाजित किया और कारणामों के रूप में ब्राह्मणों को नियुक्त किया। इसकी राजधानी अनेक गुण्डी थी। पर कुछ लेखकों ने बताया है कि हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम ने सम्राट् के अनुकूल पूरी उपाधियाँ धारण नहीं कीं। 1374 ई. में बुक्का प्रथम ने चीन में एक दूत-मंडल भेजा। उसे राज सिंहासन का आधार कहा गया है। इसकी राजधानी गुट्टी थी। बुक्का प्रथम के पुत्र कुमारमान के संकल्प मदुरा विजय का वर्णन कुमारम्पन की पत्नी गंगादेवी की कृति मदुरम विजयम में है। वह 1378-1379 ई. में मर गया। उसका पुत्र हरिहर द्वितीय उसका उत्तराधिकारी हुआ, जिसने महाराजाधिराज, राजपरमेश्वर आदि सम्राट के अनुकूल उपाधियाँ धारण कीं। कुछ मुसलमान इतिहासकारों के आधार पर सेवेल अपनी पहले की रचना में कहता है कि हरिहर का शासनकाल अटूट शान्ति का काल था। किन्तु कुछ अभिलेखों से सिद्ध होता है कि उसके शासनकाल में विजयनगर-साम्राज्य और मुसलमानों के बीच संघर्ष हुए थे। सच पूछिए तो बहमनी राज्य के समान, विजयनगर साम्राज्य का इतिहास विभिन्न-शक्तियों से रक्तपूर्ण युद्ध करने की एक अनवरत कथा है। 1398 ई. के जाड़े के मौसम में हरिहर द्वितीय के पुत्र बुक्का द्वितीय ने अपने पिता की अनुमति से कृष्णा एवं तुंगभद्रा के बीच स्थित रायचूर दोआब को छीनने के विचार से उत्तर की ओर बहमनी राज्य पर आक्रमण कर दिया। यह दोआब विजयनगर-साम्राज्य एवं बहमनी राज्य के बीच कलह का कारण था। फीरोजशाह बहमनी ने उसका सामना कर उसे पराजित कर दिया। 1399 ई. के मध्य में एक समझौता हुआ और फीरोज ने भारी हर्जाना ऐंठा। किन्तु जैसा कि कई अभिलेखों से पता चलता है, हरिहर द्वितीय के शासनकाल में विजयनगर के अधिकार का विस्तार मैसूर, कनारा, चिंगलपुट, त्रिचनापल्ली तथा काजीवरम् (कांची) सहित समस्त दक्षिणी भारत पर हो गया था।

हरिहर द्वितीय शिव के विरूपाक्ष रूप का उपासक था, किन्तु अन्य धमों के प्रति सहिष्णु था। अगस्त, 1406 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। इसके पश्चात् कुछ समय तक उसके पुत्रों में राजसिंहासन के उत्तराधिकार के लिए झगड़ा चला। देवराय प्रथम ने किसी प्रकार 5 नवम्बर, 1406 ई. को सिंहासन पर अधिकार कर लिया। बहमनी सुल्तानों के साथ युद्ध करने में उसे कई बार पराजय का सामना करना पड़ा। उसके समय निकोलो कोन्टी का आगमन हुआ। देवराय प्रथम विजयनगर का प्रथम शासक था जिसने दस हजार मुस्लिमों को सेना में नियुक्त किया। देवराय प्रथम ने तुंगभद्रा नदी पर हरिद्रा बाँध बनवाया जिससे उसके राज्य में 3 लाख 50 हजार पेरदा की आमदनी बढ़ गई। उसके दरबार में श्रीनाथ रहता था जिसने हरविलासम् की रचना की। 1422 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके पुत्र विजय-बुक्का या वीर-विजय ने कुछ ही महीनों तक शासन किया। तब विजय-बुक्का का पुत्र देवराय द्वितीय सिंहासनारूढ़ हुआ। यद्यपि बहमनियों के साथ देवराय द्वितीय के युद्धों का अन्त पराजय एवं क्षति में हुआ, तथापि उसे राज्यकाल में प्रशासन का पुर्नसंगठन किया गया। बहमनियों की बराबरी करने के लिए उसने सेना में मुसलमानों को भर्ती किया। वाणिज्य को नियंत्रित एवं नियमित करने के लिए उसने लक्कन्ना या लक्ष्मण को, जो उसका दाहिना हाथ था, दक्षिण समुद्र का स्वामी बना दिया, अर्थात् विदेश-व्यापार का भार सौंप दिया। इटली के यात्री निकोलो कॉण्टी तथा फारस के दूत अब्दुर्रज्जाक ने क्रमशः 1420 ई. और 1443 ई. में विजयनगर का भ्रमण किया। उन्होंने उस नगर एवं विजयनगर-साम्राज्य की समृद्धि का विशद वर्णन किया है। वस्तुत: साम्राज्य का विस्तार अब समस्त दक्षिण भारत पर हो गया और वह सीलोन (श्रीलंका) के सामुद्रिक तटों तक पहुँच गया। प्रथम वंश के शासनकाल में यह अपनी समृद्धि की चरम सीमा पर पहुँच गया। देवराय द्वितीय ने इमादी देवराय और प्रोधरा देवराय की उपाधि ली। इसने गजबेटकार (हाथियों का शिकारी) की उपाधि ली। वह विद्वानों का भी संरक्षक था। महानाटक सुधानिधि की रचना एवं ब्रह्मसूत्र पर एक टीका लिखने का श्रेय उसी की है।

देवराय द्वितीय की मृत्यु 1446 ई. में हो गयी। उसका उत्तराधिकारी उसका सबसे बड़ा जीवित पुत्र मल्लिकार्जुन हुआ, जिसने अपनी राजधानी पर बहमनी सुल्तान एवं उड़ीसा के हिन्दू राज्य के राजा द्वारा किये गये संयुक्त आक्रमण को पीछे हटा दिया और अपने शासन-काल में अपने राज्य को अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ हुआ। उसका शासन लगभग 1465 ई. तक चला। इसी शासन-काल की बात है कि चन्द्रगिरि का सालुव नायक नरसिंह, जिसके पूर्वजों ने सामन्तों के रूप में सच्चाई के साथ विजयनगर राज्य की सेवा की थी, ख्याति को प्राप्त हुआ और बहमनी राज्य एवं उड़ीसा के राज्य के आक्रमणों का प्रतिरोध किया। किन्तु मल्लिकार्जुन का उत्तराधिकारी विरूपाक्ष द्वितीय अयोग्य शासक प्रमाणित हुआ। स्वभावतः गडबडी एवं अव्यवस्था फैल गई। इसका लाभ उठाकर कुछ प्रान्त विद्रोह कर बैठे, बहमनी सुल्तान कृष्णा एवं तुंगभद्रा के बीच के दोआब में बढ़ गया और उड़ीसा का राजा पुरुषोत्तम गजपति दक्षिण में तिरुवन्नतमलय तक बढ़ गया।

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