भारत में वन्य जीवन एवं इसका संरक्षण Wildlife and its Conservation in India

वन्य जीवन

भारत की पारिस्थितिक व भौगोलिक दशाओं में विविधता पायी जाती है। इसी विविधता के कारण यहां अनेक प्रकार के जीव-जंतु भी पाये जाते हैं। संपूर्ण विश्व में कुल जीव-जंतुओं के 15,00000 ज्ञात प्रजातियों में से लगभग 81,000 प्रजातियां भारत में मिलती हैं। देश में स्वच्छ और समुद्री जल की मछलियों की 2500 प्रजातियां हैं। भारत में पक्षियों की 1200 प्रजातियां तथा 900 उप-प्रजातियां पायी जाती हैं। अफ्रीकी, यूरोपीय एवं दक्षिण-पूर्वी एशियाई जैव-तंत्रों के संगम पर अवस्थित होने के कारण भारत में इनमें से प्रत्येक जैव-तंत्र के विचित्र प्राणी भी पाये जाते हैं। जहां लकड़बग्घा एवं चिंकारा अफ्रीकी मूल के हैं। वहीं भेड़िया, हंगल व जंगली बकरी यूरोपीय मूल के हैं। इसी तरह दक्षिण-पूर्ण एशियाई जैव-तंत्र के जानवरों में हाथी व हूलक गिबन प्रमुख हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र

वन्य जीवन के समुचित अध्ययन हेतु भारत को पांच पारिस्थितिकीय उप-क्षेत्रों में विभक्त किया गया है-

1. हिमालय पर्वत श्रृंखला: इस पुनः तीन उप-क्षेत्रों में विभाजित किया गया है:

  • हिमालय की तलहटी: उत्तरी भारत के स्तनपायी, जैसे-हाथी, सांभर, दलदली हिरण, चीतल तथा जंगली भैंस इस क्षेत्र में पाये जाते हैं।
  • पश्चिमी हिमालय (उच्चतम क्षेत्रों पर): जंगली गधा, जंगली बकरी, भेड़े, जंगली हिरण तथा कस्तूरी हिरण इत्यादि इस क्षेत्र में पाये जाते हैं।
  • पूर्वी हिमालय: इस क्षेत्र में लाल पांडा, सूअर तथा रीछ इत्यादि पाये जाते हैं।

2. प्रायद्वीपीय भारतीय उपक्षेत्र: इस क्षेत्र को निम्नलिखित दो भागों में बांटा गया है:

  • प्रायद्वीपीय भारत: इस क्षेत्र के अंतर्गत हाथी जंगली सुअर, दलदली हिरण, सांभर, बारहसिंगा 4 सींगों वाला हिरण, जंगली कुत्ता तथा जंगली कुत्ता तथा जंगली सैंड पाए जाते हैं।
  • राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र; रेगिस्तानी बिल्ली, जंगली गधा इत्यादि इस क्षेत्र में पाये जाते हैं।

3. उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन क्षेत्र: इस क्षेत्र में भारी वर्षा होती है तथा यहां जानवरों की बहुतायत है। यहां हाथी, लंगूर इत्यादि पाये जाते हैं।

  • अंडमान व निकोबार द्वीप समूह: यहां भारी संख्या में स्तनपायी, रेंगने वाले पशु तथा समुद्री जीव पाये जाते हैं। स्तनपायी जीवों में चमगादड़ व चूहों की प्रधानता है। ये कुल स्तनपायी जीवों का 75 प्रतिशत है। सुअर तथा हिरण इन द्वीप समूहों के अन्य प्रधान पशु हैं। समुद्री जीवों में डॉल्फिन तथा हेल इत्यादि प्रमुख हैं। इस क्षेत्र में विविध प्रकार के दुर्लभ पक्षी भी पाये जाते हैं।
  • सुन्दरवन का ज्वारीय दलदली क्षेत्र: इस क्षेत्र में मछली, नरभक्षी शेर, बुनकर चीटियां, हिरण, सुअर तथा बड़ी छिपकलियां पायी जाती हैं।

संकटापन्न जीव-जन्तु प्रजातियां

मानवीय गतिविधियों के कारण पिछले कुछ वर्षों से अनेक जीव-जंतुओं की संख्या तेजी से लुप्त होती जा रही है। ऐसे जीवों के संरक्षण के प्रति विश्व भर में प्रयास किए जा रहे हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर द नेचर एंड नैचुरल रिसोर्सेज (आई.यू.सी.एन.) मान्यता प्राप्त संस्था द्वारा वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त जीवों और पेड़-पौधों का एक सूचीबद्ध आंकड़ा तैयार किया जाता है, जिसे रेड डाटा बुक कहते हैं। रेड डाटा बुक में नामित जीव के संरक्षण की कवायद पूरी दुनिया में शुरू कर दी गई है। इसी प्रयास के तहत् भारत के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी 9 मार्च, 2011 को जारी एक रिपोर्ट में 57 जीवों को क्रांतिक संकटग्रस्त जीव घोषित किया है। इस रिपोर्ट में क्रांतिक संकटग्रस्त जीवों को 7 विभिन्न वर्गों- पक्षी, स्तनधारी, सरीसृप, उभयचर, मछली, मकड़ी तथा कोरल में रखा गया है।

आई.यू.सी.एन. क्रांतिक संकटग्रस्त श्रेणी में किसी जीव को रखने से पहले निम्नांकित पांच शर्तों के आधार पर उस जीव पर मंडरा रहे संकट पर विचार करती है-

  1. पिछले 10 वर्षों में या तीन जेनरेशन में उस जीव की 80 प्रतिशत से भी अधिक आबादी कम हो गई हो।
  2. उस जीव के भौगोलिक परिवेश में बहुत तेजी से बदलाव आया हो।
  3. एक ही जनेरशन में या पिछले तीन वर्षों में उस जीव की आबादी या तो 25 प्रतिशत कम हुई है या उस जीव की आबादी कम होकर 250 रह गई हो।
  4. वयस्क जीवों की आबादी 50 से भी कम रह गई हो।
  5. उस जीव के जंगलों से विलुप्त होने का खतरा हो।

पक्षी वर्ग के क्रांतिक संकटग्रस्त जीवों में जार्डन नुकरी (जार्डन काउसर), जंगली खूसट या जंगली उल्लू, सफेद तोंदल, बगुला, सफेद पीठवाला गिद्ध, स्लैन्डर तोंदल गिद्ध, लंबी तोंदल गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, बंगाल लोरीकेन, हिमालयन बटेर, गुलाबी सिर वाली बतख, सामाजिक टिटहरी, चम्मच तोंदल बाटन, साइबेरियाई सारस शामिल हैं।

स्तनधारी जीवों में पिग्मी हॉग, अंडमान श्वेत दंत छछूदर, जैन्किन अंडमान श्वेत दंत छछूदर, निकोबार श्वेत दंत छछूदर, कोन्डारा चूहा, विशाल चट्टानी चूहा या एलविरा रेट, नामदफा उड़न गिलहरी, मालाबार कस्तूरी, सुमात्राई गेंडा, जावाई गेंडा क्रांतिक संकटग्रस्त जीवों में शामिल हैं।

सरीसृप वर्ग के जीवों में घड़ियाल, बाजठोंठी कछुआ, चर्मपिच्छक कछुआ, छोटा नदी कछुआ (रीवन टेरेपीन), लाल सिर वाला रूफैड कछुआ, सिसपारा डे छिपकली संकटग्रस्त जीवों में शामिल हैं।

उभयचर जीवों में अनामलाई लायिंग फ्रॉग, गुंडिया इंडियन फ्रॉग, केरला इंडियन फ्रॉग, चार्ल्स डार्विन फ्रॉग, कोटिझर बबल-नेस्ट फ्रॉग, अमबोली बुश फ्रॉग, केलाजोड्स बबल-नेस्ट फ्रॉग, छोटी झाड़ी वाला मेंढक, हरी आंखों वाला बुश मेंढक, ग्रीट झाड़ी मेंढक, कालिकट झाड़ी मेंढक, मार्क्स बुश फ्रॉग, मुनारबुश फ्रॉग, लार्ज पोंगुडी बुश फ्रॉग, सुशीलस बुश फ्रॉग, शिलांग बबल-नेस्ट फ्रॉग, टाइगर बुश टोड संकटग्रस्त जीवों में शामिल हैं।

मछलियों में पांडिचेरी शार्क, गंगोय शार्क, नाइफ टूथ सॉफिश, लार्ज काम्ब सॉफिश या नैरो स्नॉट सॉफिश, रामेश्वरम् आरनामेंटल या रामेश्वरम् पेराशूट स्पाइडर, पीकॉक टैनेन्दुला संकटग्रस्त जीवों में शामिल हैं।

कोरल जीव की फायर कोरल नामक प्रजाति को संकटग्रस्त जीवों में शामिल किया गया है।

संकट्टग्रस्त प्रजातियों की संख्या: अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ (आई.यू.सी. एन) के अनुसार
वर्ष 2006 में16118
वर्ष 2010 में41000

संरक्षण परियोजनाएं

भारत में वन्यजीव का संरक्षण: देश में संकटग्रस्त जीव-जंतु प्रजातियों में लगातार वृद्धि के कारण वन्यजीव व्यवस्था और संरक्षण के लिए काफी उपाय किए गए हैं। वन्य जीव संरक्षण के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने सरकारी और गैर-सरकारी संगठन केन्द्र स्थापित किये हैं। भारत में वन्य जीव प्रबंधन के उद्देश्य हैं-

  1. प्रजातियों के नियंत्रित एवं सीमित उपयोग के लिए प्राकृतिक आवासों का संरक्षण करना।
  2. संरक्षित क्षेत्रों में (राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व, आदि) पर्याप्त संख्या में प्रजातियों का रख-रखाव करना।
  3. वनस्पति और जीव प्रजातियों के लिए बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना करना।
  4. कानून के जरिए संरक्षण।

संरक्षित नेटवर्क क्षेत्र: वन्य जीव का संरक्षण संरक्षित क्षेत्रों का एक संपीडक निकाय है। संरक्षित क्षेत्र की विभिन्न उद्देश्यों हेतु विभिन्न श्रेणियां होती हैं। इसके अंतर्गत- राष्ट्रीय पार्क, अभयारण्य, जैव आरक्षित क्षेत्र, नेचर रिजर्व्स, प्राकृतिक स्मारक, सांस्कृतिक परिदृश्य आदि।

वन्य जीव संरक्षण परियोजनाएं: केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर वन्य जीव की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए कई नियम तथा कानून पारित किए गए हैं। इनमें से महत्वपूर्ण हैं-

  1. मद्रास वाइल्ड एलीफेट प्रिजर्वेशन एक्ट, 1873
  2. ऑल इण्डिया एलीफेंट प्रिजर्वेशन एक्ट, 1879
  3. द वाइल्ड बर्ड एण्ड एनीमल्स प्रोहिबिशन एक्ट, 1912
  4. बंगाल राइनोसेरस प्रिजर्वेशन एक्ट, 1932
  5. असम राइनोसेरस प्रिजर्वेशन एक्ट, 1954
  6. इण्डियन बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (आइबीडब्ल्यूएल), 1952
  7. वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972

राष्ट्रीय वन्य जीवन कार्य योजना, वन्य जीवन संरक्षण के लिए कार्य नीति और कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। पहली वन्य जीवन कार्य योजना, 1983 को संशोधित करके अब नई वन्य जीवन कार्य योजना (2002-2016) स्वीकृत की गई है। भारतीय वन्य जीवन बोर्ड वन्य जीवन संरक्षण की अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी और निर्देशन करने वाला शीर्ष सलाहकार निकाय है।

वन्य जीवन सुरक्षा अधिनियम, 1972 जम्मू और कश्मीर को छोड़कर (इसका अपना अलग अधिनियम है) शेष सभी राज्यों द्वारा लागू किया जा चुका है, जिसमें वन्य जीवन संरक्षण और विलुप्त होती जा रही प्रजातियों के संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश दिए गए हैं। दुर्लभ और विलुप्त होती जा रही प्रजातियों के व्यापार पर इस अधिनियम ने रोक लगा दी है। वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम, 1972 तथा अन्य कानूनों की समीक्षा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समिति गठित की गई है।

सभी राष्ट्रीय उद्यानों के विकास और उन्नत प्रबंध, वन्य जीवों का संरक्षण और गैर-कानूनी तरीके से जीवों के शिकार और वन्य जीवन के अवैध व्यापार पर प्रतिबंध, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के आस-पास के क्षेत्रों में पारिस्थितिकी विकास, हाथी व उसके पर्यावास का संरक्षण और असम में गेंडों के संरक्षण के लिए केंद्र द्वारा राज्यों को वित्तीय मदद दी जाती है।

वन्य जीवन के संरक्षण के लिए 1952 में केन्द्रीय सलाहकार समिति बनायी गयी थी। इसे इण्डियन बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ की संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है। इस आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं और इसके सदस्य प्रकृति विशेषज्ञ और पर्यावरणविद् होते हैं। इसके अतिरिक्त देश में अन्य अनेक ऐसी संस्थाएं भी हैं जो वन्यजीव के सरंक्षण तथा प्रबंधन में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं। इन संस्थाओं में द बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, मुंबई; द वाइल्ड लाइफ प्रिजर्वेशन सोसायटी ऑफ इण्डिया, द वाइल्ड लाइफ फड ऑफ इंडिया आदि उल्लेखनीय हैं।

भारत में वन्य-जीवन की सुरक्षा के लिए दो प्रकार के निवास स्थानों का निर्माण किया गया है- पशु-विहार और राष्ट्रीय उद्यान। पशु विहारों में पक्षियों और पशुओं की सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है, जबकि राष्ट्रीय उद्यानों में सम्पूर्ण पारिस्थितिकी की। देश में इस समय लगभग 513 पशु विहार या अभयारण्य हैं, जबकि 99 राष्ट्रीय उद्यान हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 15,63,492 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 4.5 प्रतिशत है। वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए एक सेन्ट्रल जू अथॉरिटी का भी गठन किया गया है, जिसका उद्देश्य देश के वन्य-प्राणी उद्यानों के प्रबंधन की देख-रेख करना है। देहरादून में एक वन्य प्राणी संस्थान की भी स्थापना की गयी है।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता तथा वन्य जीव संरक्षण आदि सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय संयाजनों की मुख्य एजेंसी है। भारत की वन्य जीव संरक्षण सम्बन्धी 5 प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशनों में भी महत्वपूर्ण भागीदारी है। भारत विश्व विरासत स्थलों की सूची बनाने के लिए उत्तरदायी वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स का सदस्य है जो की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक दोनों ही प्रकार के स्थलों को शामिल करता है। मंत्रालय का वन्य जीव विभाग विश्व विरासत के प्राकृतिक स्थलों से जुड़ा हुआ है। भारत में विश्व स्तर के प्राकृतिक स्थलों के महत्व को देखते हुए वर्ल्ड हैरिटेज बायोडायवर्सिटी प्रोग्राम फॉर इंडियाः बिल्डिंग पार्टनरशिप टू सपोर्ट यूनेस्कोज वल्र्ड हैरिटेज प्रोग्राम नाम से अंतरराष्ट्रीय सहायता प्राप्त परियोजना आरंभ की गई है। भारत ने विश्व में व्हेलों की संख्या बढ़ाने के संदर्भ में अति सक्रिय भूमिका निभाई है। इसके अतिरिक्त भारत ने कोएलिशन एगेंस्ट वाइल्ड लाइफ ट्रेफिकिंग (सी.डब्ल्यू.ए.टी.) में भाग लेकर वन्य जीवों के अवैध व्यापार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के साथ मिलकर कार्य किया है।

1982 में भारतीय वन्य जीव संरक्षण संस्थान की स्थापना की गई। यह संस्थान पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन स्वायत्तशासी संसथान है जिसे वन्य जीव संरक्षण के क्षेत्र में प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान के रूप में मान्यता दी गई है।

प्रोजेक्टर टाइगर: भारत सरकार ने 1 अप्रैल, 1973 में, बाघ संरक्षण के लिए कोष वृद्धि एवं जनजागरूकता की दिशा में किए गए ठोस अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के परिणामस्वरूप काबँट राष्ट्रीय उद्यान में प्रोजेक्ट टाइगर प्रारंभ किया। इस अंतरराष्ट्रीय प्रयास को वल्र्ड वाइड फंड फॉर नेचर के गॉय मांटफोर्ट के नेतृत्व में किया गया। इसने भारत में मौजूद टाइगर्स की संख्या को वैज्ञानिक, आर्थिक, सौंदर्यीकारण, सांस्कृतिक एवं पारिस्थितकीय मूल्यों के दृष्टिगत व्यवस्थित एवं सुनिश्चित किया। साथ ही जैविकीय महत्व के क्षेत्रों को सांस्कृतिक विरासत के रूप में लाभ, शिक्षा एवं लोगों के मनोरंजन के परिप्रेक्ष्य में संरक्षित किया। प्रारंभ में, नौ टाइगर वन्यजीव आरक्षित क्षेत्रों, जिसमें कुल 268 टाइगर थे, को प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत संगठित किया गया।

पर्यावरम एवं वन मंत्रालय ने विभिन्न राज्य सरकारों को केंद्र द्वार प्रायोजित वन्यजीव संरक्षण की विभिन्न योजनाओं के सफल संचालन एवं कार्यान्वयन के लिए आवश्यक तकनीकी एवं वित्तीय मदद प्रदान की।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा इस दिशा में निम्नलिखित प्रशासकीय कदम उठाए गए-

  • वन्यजीवों के अवैध शिकार के विरुद्ध गतिविधियों को मजबूत करना, जिसमें मानसून के समय में निरीक्षण की विशेष रणनीति अपनाना शामिल है।
  • 17 टाइगर आरक्षित क्षेत्रों की 100 प्रतिशत केंद्रीय मदद का प्रावधान किया गया। साथ ही टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स का गठन किया गया।
  • वर्ष 2007 से कार्य करने वाले एक बहुउपयोगी टाइगर एवं अन्य संकटापन्न प्रजाति अपराध नियंत्रण ब्यूरो का गठन किया गया जिसमें पुलिस अधिकारी, वन अधिकारी, सीमा प्रशुल्क अधिकारी एवं अन्य प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारी शामिल हैं, ताकि वन्यजीवों के अवैध व्यापार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सके।
  • 8 नए टाइगर रिजर्व के गठन की अनुमति दी गई।
  • टाइगर्स की संख्या की प्रमाणिक जानकारी के लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया को अपनाया गया।
  • 17 राज्यों में लगभग 31,111 वर्ग किलोमीटर विशुद्ध टाइगर आवास की पहचान की गई।
  • प्रोजेक्ट टाइगर निर्देशों को फिर से संशोधित किया गया और इसमें वन्यजीव आरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत गावों को फिर से दूसरी जगह बसाने हेतु राज्यों को वित्त प्रदान करना, परम्परागत रूप से आखेट में शामिल समुदायों को पुनस्र्थापित करने एवं उन्हें आजीविका के नए साधन उपलब्ध कराने तथा टाइगर संरक्षण एवं उनके आवासीय क्षेत्र को भंग होने से रोकने हेतु एक संरक्षण गलियारा बनाने जैसी बातें शामिल की गई।

बायोस्फीयर रिजर्व

बायोस्फीयर रिजर्व स्थल और तटीय पारिस्थितकीय के क्षेत्र हैं, जिनको यूनेस्को के मानव एवं जीवमण्डल कार्यक्रम के फ्रेमवर्क में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है। इन जीव मंडलों को यूनेस्को द्वारा बायोस्फीयर रिजर्व, की विश्व नेटवर्क की मान्यता प्रदान करने से पूर्व इन्हें अपेक्षित न्यूनतम मानदंडों को पूरा करना और न्यूनतम शतों को पूरा करना अपेक्षित होता है। यह जीवमण्डल जैव-विविधता और सांस्कृतिक परम्परा से समृद्ध हैं और इनमें अद्वितीय पारिस्थितिकी सम्मिलित है जो विश्व के मुख्य जैव-भौगोलिक क्षेत्रों के प्रतिनिधि हैं। इसका उद्देश्य प्रतिनिधित्व भू-दृश्यों और विविध जैव-विविधता, जो सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से स्थायी है, का संरक्षण करना और अनुसंधान, निगरानी, शिक्षा और सूचना आदान-प्रदान के लिए सहायता उपलब्ध करवाना है।

अब तक स्थापित 15 बायोस्फीयर रिजर्वो का उद्देश्य न केवल प्रतिनिधि पारिस्थितिकी की सुरक्षा करना है बल्कि ये विकास के वैकल्पिक मॉडल तैयार करने के लिए प्रयोगशालाओं के रूप में भी कार्य करते हैं। पर्यावरण मंत्रालय बायोस्फीयर रिजर्वो के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए संबंधित राज्य सरकारों की वित्तीय सहायता देने के साथ-साथ अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को भी सहायता प्रदान करता है।

देश का तीसरा सबसे बड़ा जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (बायोस्फीयर रिजर्व) आंध्र प्रदेश में बनाया गया है। केंद्रीय पयांवरण एवं वन मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश के शेषाचलम पहाड़ियों के 8,000 वर्ग किमी. के क्षेत्र को जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया। दक्षिण आध्र प्रदेश के चित्तूर और कडप्पा जिलों में फैले हुए बायोस्फीयर रिजर्व में 3 उपक्षेत्र होंगे जो कोर,बफर और संक्रमण क्षेत्र में बंटे होगे। कोर क्षेत्र में मानवीय बसावट पूरी तरह प्रतिबंधित होगी। कोर क्षेत्र के 1865 वर्ग किमी. का क्षेत्र बफर जोन के रूप में वर्गीकृत किया गया है जो जंगली भूमि के अलावा वेंकटेश्वर वन्य जीव अभ्यारण्य के कुछ भागों पर फैला हुआ है। बफर जोन के बाहर 5 किमी. की त्रिज्या में फैले हुए 2140 वर्ग किमी. का क्षेत्र संक्रमण क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भारत का सर्वाधिक धनाढ्य तिरूपति मंदिर अब इस बायोस्फीयर रिजर्व के अंतर्गत आ गया है।

राष्ट्रीय पार्क, अभ्यारण्य एवं बायोस्फीयर रिजर्व के मध्य अंतर
राष्ट्रीय पार्कअभ्यारण्यबायोस्फीयर रिजर्व
विशेष वन्य जीव प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है।इसमें सामान्यतः प्रजाति उन्मुख खट्टा, घटपर्णी आादिसमस्त पारिस्थितिक तंत्र से संबद्ध, जिसमें जीवन का समग्र रूप मौजूद होता है तथा जो पारिस्थितिक तंत्र के अनुकूल होता है।
भारत में, आमतौर पर औसत माप 100-500 वर्ग किमी. (लगभग 40 प्रतिशत मामलों में)और 500-1000 वर्ग किमी. (लगभग 15 प्रतिशत मामलों में) है। सामान्य माप विस्तार 0.04 से 3162 वर्ग किमी. तक है।माप विस्तार 0.61 से 7818 वर्ग किमी. है। आमतौर पर (40 प्रतिशत मामलों में) 100-500 वर्ग किमी. है। 25 प्रतिशत में, 500 और 1000 वर्ग किमी. के मध्यअधिकतम भाप विस्तार 5670 वर्ग किमी. है।
कानून द्वारा सीमायें नियत हैं।सीमायें स्पष्ट नहीं होती हैं।कानून द्वारा नियत हैं।
मध्यवर्ती मण्डल के सिवाय, जीवीय हस्तक्षेप नहीं है।जीवीय हस्तक्षेप सीमित है।मध्यवर्ती मण्डल के सिवाय, जीवीय हस्तक्षेप नहीं है।
पर्यटन अनुमति है।पर्यटन अनुमति है।सामान्यतः अनुमति नहीं है।
शोध एवं वैज्ञानिक प्रबंध का अभाव है।अभाव है।शोध एवं वैज्ञानिक प्रबंध व्यवस्था है।
अभी तक जीन एकत्रीकरण और संरक्षण पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।कोई ध्यान नहीं दिया गया है।ध्यान दिया गया है।
 

प्रोजेक्ट एलीफेंट: भारत में हाथी मुख्यतः केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु के वर्षा वनों, प. बंगाल, बिहार, मध्य भारत तथा पश्चिमी क्षेत्र के उशन-कटिबन्धीय जंगलों तथा उत्तर-पूर्वी भारत एवं उत्तर प्रदेश के हिमालयी पर्वतपादों में पाये जाते हैं। विश्व के कुल हाथियों की जनसंख्या 40 हजार है। जिसमें 25000 भारत में हैं।

देश में प्रथम हाथी पुनर्वास केंद्र की स्थापना करने के लिए हरियाणा की सहायता प्रदान की गई। वर्ष 2007 में पूर्वोत्तर राज्यों के अतिरिक्त पूरे भारत में हाथियों का आकलन किया गया जबकि पूर्वोत्तर में यह मौसमी स्थिति के कारण बाद में किया गया। अध्ययन रिपोटों से सिद्ध हुआ है कि 2002 की तुलना में हाथियों की संख्या में वृद्धि हुई है। तीन हाथी अभयारण्यों, दो छत्तीसगढ़ में लेमरू और बादलखोड नाम से और एक अरुणाचल प्रदेश में देवमाली की स्थापना करने की अनुमति दी गई। इसके साथ ही वर्ष 2009 तक देश में हाथी अभयारण्यों की संख्या 27 हो गई है।

परियोजना के अंतर्गत शुरू की गई विभिन्न महत्वपूर्ण गतिविधियां इस प्रकार हैं-

  • अवैध शिकारियों से जंगली हाथियों की सुरक्षा हेतु उपायों को सुदृढ़ बनाना।
  • भारत में एशियाई हाथियों के वासस्थलों और उनकी व्यावहारिक संख्या के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और योजनाबद्ध प्रबन्धन करना।
  • हाथियों के मौजूदा प्राकृतिक वासस्थलों तथा प्रवास रूटों की पारिस्थतिकीय बहाली करना।
  • समस्या वाले क्षेत्रों में मानव-हाथियों के संघर्ष को कम करने तथा हाथियों के वासस्थलों में मानवों और पशुधन के बढ़ते बोझ को कम करना।
  • पारि-विकास और पशु चिकित्सा देखभाल करना।
  • हाथी संरक्षण से संबंधित मामलों पर अनुसंधान करना।
  • जन-शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम तथा फील्ड स्टॉफ, महावतों, पशु चिकित्सकों के लिए क्षमता निर्माण।

मानव-हाथी संघर्ष की घटनाओं को कम करने के लिए वासस्थान प्रबंध, जंगली हाथियों द्वारा मानवों और फसलों को पहुचंए गए नुकसान के लिए अनुग्रह राशि की अदायगी, अवैध शिकार रोधी उपायों को सुदृढ करने, फील्ड स्टाफ की क्षमता का निर्माण करने तथा माइक्रोचिप्स का प्रौओग करके पालतू हाथियों के पंजीकरण आदि के लिए विभिन्न राज्यों को वित्तीय सहायता दी जाती है।

गिद्ध परिरक्षण: एक रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में गिद्धों (Vultures) की संख्या में तेजी से गिरावट आई है जो बेहद चौंकाने वाली है। इस कमी के प्रमुख कारणों में से एक डिक्लोफीनेक (Diclofenac) दवा है जो कि बेहद कम मात्रा में भी इन पक्षियों के लिए घातक साबित होती है। चूंकि गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी के रूप में जाने जाते हैं, इसलिए इनकी घटती संख्या पर्यावरण के लिए भी बेहद खतरनाक है। मई 2006 में भारत सरकार ने गिद्धों की संख्या और अधिक कम होने से रोकने के लिए कुछ उपाय किए, जिसके तहत् पशु-पक्षियों की दवाओं में डिक्लोफीनेक पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन ऐसा करने से लंबी चोंच वाले गिद्धों की संख्या में 97 प्रतिशत की कमी आ गई। इसके अलावा हरियाणा के पिंजोर, प. बंगाल के बुक्सा और असोम के रानी फॉरेस्ट में गिद्धों के लिए प्रजनन केंद्र खोले गए हैं तथा भोपाल, भुवनेश्वर, जूनागढ़ और हैदराबाद के चिड़ियाघरों में भी प्रजनन केंद्र बनाए गए हैं।

घड़ियाल संरक्षण: घड़ियालो के संरक्षण तथा उनके विकास के लिए एक नया वन्य जीव अभयारण्य बनाया जाएगा। यह अभयारण्य चम्बल नदी के किनारे मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सीमा में 1600 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल पर फैला होगा। इसके लिए एक त्रिस्तरीय प्राधिकरण का गठन किया जा चुका है। गौरतलब है कि घड़ियाल भारत एवं नेपाल में मुख्य रूप से पाए जाते हैं। आईयूसीएन ने जलीय जीव की इस प्रजाति को संकटापन्न प्रजाति घोषित किया है। दुनिया के कुल भारत में प्रमुख घड़ियाल संरक्षित क्षेत्र घड़ियाल का लगभग 80 प्रतिशत भारत क्षेत्र राज्य में ही पाया जाता है। यहां यह मुख्य रूप चम्बल नदी, गंगा नदी, सोन नदी तथा महानदी के जलीय क्षेत्रों तथा आदर क्षेत्रों में पाया जाता है। सिन्धु तथा ब्रह्मपुत्र नदियों में भी कभी घड़ियाल पाए जाते थे, लेकिन अब वे इन क्षेत्रों से विलुप्त हो चुके हैं। भारत के कुल 1400 घड़ियालों में से लगभग 70% चम्बल में ही पाये जाते हैं।

भारत में प्रमुख घड़ियाल संरक्षित क्षेत्र
नन्दन कानन वन्य जीव अभयारण्यओडीशा
शतकोसिया जार्ज वन्य जीव अभयारण्यओडीशा
भितरकनिका वन्य जीव अभयारण्यओडीशा
चम्बल वन्य जीव अभयारण्यराजस्थान
गुंडी राष्ट्रीय उद्यानतमिलनाडु

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