वन्य जीव एवं पारिस्थितिकी तन्त्र Wild Life And Ecosystem

वन्य जीव: जलवायु तथा वनस्पति से सहसम्बन्ध Wild Life: Its Corelation With Climate And Vegetation

प्रत्येक पशु का पर्यावरण उसकी विशेषताओं जैसे- गुण, संरचना, आदि पर रचनात्मक प्रभाव डालता है, अतः वन्य जीवों के अधिवास (Habitat) का अध्ययन आवश्यक है। वन्य जीवों के अधिवास दो प्रकार के होते हैं-

स्थलीय बास या अवस्थान Land Habitat- कुछ प्राणी पूर्ण रूप से स्थल पर निवास करते हैं, अतः इन्हें स्थलीय प्राणी कहा जाता है। कुछ पशु अपने सीमित क्षेत्र में ही निवास करते हैं, वास्तव में पशु विश्व में सभी स्थानों पर एक से नहीं पाए जाते हैं, अतः स्थलीय प्राणी को सर्वदेशीय अथवा विश्वव्यायी नहीं कहा जा सकता है। केवल मानव ही अपने साथ अपने उपयोग में आने वाले पशुओं, गाय, घोड़े, भेड़, बकरी तथा कुते को सभी स्थान पर ले गया है। इन पशुओं को विश्वव्यापी (Cosmopolitan) कहा जाता है।

जलीय वास या अवस्थान Aquatic Habitat- अनेक प्रकार के प्राणी जल में निवास करते हैं जिन्हें जलीय प्राणी (Aquatic Animals) कहा जाता है। जलीय प्राणी पुनः दो वर्गों में विभाजित किए जाते हैं-

खारे जल के प्राणी, तथा मीठे अथवा स्वच्छ जल के प्राणी

वन्य जीवों को आवास की दृष्टि से दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है-

स्थलीय प्राणी तथा जलीय प्राणी, परन्तु उनके भोजन के अनुसार जीव अथवा प्राणियों को निम्न तीन भागों में विभाजित किया जाता है-

शाकाहारी जीव Herbivorous- इनमें घास, पते, फलफूल खाने वाले जीव आते हैं, जैसे गाय, हिरण, हाथी, केरीबो, बारहसिंगा, भेड़, खरगोश, बकरियाँ, आदि।

माँसाहारी जीव Carnivorous- जो पशु पूर्णतः शाकाहारी पशुओं पर निर्भर करते हैं, जैसे शेर, चीते, तेंदुआ, भेड़िया, आदि

सर्वहारी जीव Omnivorous- यह वे जीव होते हैं जो भोजन के लिए वनस्पति तथा माँस दोनों ही प्रकार के जैविक पदार्थों का उपयोग करते हैं; इनमें गीदड़, लोमड़ी, रीछ, चील, आदि मुख्य हैं। मनुष्य सबसे प्रधान सर्वहारी जीव है।

वन्य जीवों का जलवायु एवं वनस्पति से सहसम्बन्ध Relations of Wild Animals With Vegetation And Climate

वन्य जीवों का आवास, उत्पति, विकास एवं पोषण सभी कुछ वहाँ की जलवायु एवं वनस्पति पर स्पष्टतः निर्भर रहता है। अतः जलवायु एवं वनस्पति तन्त्र के लक्षण एवं स्वरूप के बदलते ही वन्य जीवों का स्वरूप, आकार, प्रकार, उनके लक्षण एवं आदतें भी बदलती जाती हैं। जैसे विषुवतरेखीय जलवायु का वन्य प्राणी संसार भूमध्यसागर जलवायु, चीन तुल्य, जलवायु तथा मरुस्थलीय जलवायु के जैवजगत से पूर्णतः भिन्न होता है। सभी प्रकार के जैव जगत पर जलवायु की भिन्नता का प्रभाव निर्णायक रहता है। वनस्पति तन्त्र वन्य जीव के लिए विशेष अवस्थान (Habitat) के विकास का आधार होता। अत: इससे विशेष प्रकार का जैव स्वरूप व कुलों (Biome or Family) का विकास एवं बाहुल्य वनस्पति की सुलभता पर भी निर्भर है। क्योंकि विश्व के अधिकांश वन्य प्राणी वनस्पति या वनों में ही आवासित हैं। किन्हीं भी कारणों से होने वाला वन विनाश वन्य जीवों को कम करता है।

वन्य जीवों पर जलवायु एवं वनस्पति का प्रभाव Impact of Climate And Vegetations On Wild Animals

उष्णकटिबन्धीय के जीवों और आर्कटिक प्रदेशों के प्राणियों में जो भिन्नता पायी जाती है, वह स्पष्टतः जलवायु और वनस्पति का प्रभाव दर्शाती है। उष्ण कटिबन्धीय जलवायु में अधिक वर्षा और ताप के कारण विभिन्न प्रकार की घनी वनस्पति पायी जाती है, अत: इन प्रदेशों में वन्य जीवों की अधिकता विविधता पायी जाती है तथा तीनों ही प्रकार के पशुओं की अच्छी संख्या पायी जाती है। घास एवं वनस्पति पर निर्भर रहने वाले वन्यजीव हाथी, हिरण, जैवरा, जिराफ, नीलगाय, हिप्पोपोटामस, आदि मुख्य हैं। इन पर अनेक प्रकार के अन्य वन्यजीव जो माँसाहारी हैं, शेर, चीते, आदि निर्भर रहते हैं। इन प्रदेशों में वनस्पति की अधिकता से शाकाहारी जीवों एवं माँसाहारी पशुओं की भी अधिकता पायी जाती है।

सवाना प्रदेशों में घास अधिक होने से वहाँ शाकाहारी पशुओं की अधिकतां पायी जाती है। मध्य अक्षांशों में वन्य जीवों का पूर्णतः अभाव पाया जाता है। कहीं-कहीं छोटे पशु, भेड़िया, लोमड़ी, आदि पाए जाते हैं। उत्तरी अक्षांशों में वनस्पति की कमी के कारण केवल केरीबो और रेण्डियर जैसे जीव पाए जाते हैं जो बहुत कम वनस्पति पर भी निर्भर रह सकते हैं। मरुस्थलीय प्रदेशों में वनस्पति एवं जल के अभाव में ऊँट विशेष पशु है जो कम भोजन एवं कंटीली झाड़ियों और वृक्षों पर निर्भर रहता है।

परन्तु अनेक महाद्वीपों में पाए जाने वाले एक समान पशुओं में भी स्थानीय रूप से वनस्पति के वितरण व सघनता में अन्तर व अन्य कारणों से भी भिन्नता पायी जाती है। अफ्रीका में पाए जाने वाले वन्य जीवों की तुलना में दक्षिणी अमरीका और आस्ट्रेलिया में भिन्नता पायी जाती है, परन्तु एशिया और यूरोप के जीवों में काफी समानता पायी जाती है।

जलवायु और वनस्पति के प्रभाव से वन्यजीवों में अन्तर पाया जाता है। वन्य जीवों का संहार किए जाने से अनेक जीवों का समूल ह्रास होता जा रहा है। अत: अनेक देशों में अब वन्यजीवों के संरक्षण हेतु कठोर नियम बनाकर उन्हें लागू किया गया है। जिनमें अभयारण्य या राष्ट्रीय पार्क योजना मुख्य है। इस प्रकार के अभयारण्य अब विश्व के सभी देशों में निरन्तर विकसित किए गए हैं एवं बढ़ाए जा रहे हैं। यहाँ भी जलवायु, वनस्पति एवं स्थानीय दशाओं के अनुसार ही वन्य जीवों के विशेष प्रकार या कुल पाए जाते हैं।

प्रमुख वन्य जीवों का वितरण

वन्य प्राणी प्रकृति के दास है। अतः प्राकृतिक पर्यावरण ही उसके स्वरूप का सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

इस प्रकार विभिन्न पर्यावरण प्रदेशों में वन्य प्राणियों का संक्षिप्त परिचय निम्नवत् मिलता है-

उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र प्रदेशों के वन्य जीव Wild Life of Tropical Humid Regions- यहाँ के शाकाहारी पशु हाथी, गैण्डा, गुरिल्ला, चिम्पाजी, बड़ी गिलहरी, बन्दर, आदि मुख्य हैं जो कि अधिकांशतः पेड़ों पर एवं हाथी गैण्डा ही घने वनों में पाए जाते हैं। मांसाहारी में भूमि पर प्यूमा एवं अन्य जाति के सिंह पाए जाते हैं। यहाँ अनेक प्रकार की चिड़ियाँ एवं सी-सी जहरीली मक्खी पाई जाती है। जल में मगर, धड़ियाल, दरियाई घोड़े, आदि मिलते हैं।

मानसूनी प्रदेशों के वन्य जीव Wild Life Monsoonic Regions- इन प्रदेशों में वर्षा के कुछ कम होने पर मानसूनी बन एवं पार्कलैण्ड में खुले वन मिलते हैं वहाँ अनेक प्रकार के शाकाहारी व माँसाहारी पशु मिलते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के हिरण, बारहसिंगा, नील गाय, खच्चर, हाथी, खरगोश, जिर्राफ, शेर, चीता, अधवेसरा, गीदड़, शुतुरमुर्ग, कंगारू, डींगी, भेड़िया, लोमड़ी, तेंदुआ, सांप, अजगर आदि मिलते हैं।

उष्ण मरुस्थलीय प्रदेशों के वन्य जीव Wild Life Hot Deserts- मरुस्थलीय प्रदेशों में उष्ण व शीतोष्ण प्रदेशों में ऊँट (एक व दो कूबड़ वाले) सबसे मुख्य पशु हैं। हिरण, बिच्छू, दीमक, छिपकली, गिरगिट एवं टिड्डियाँ अन्य उल्लेखनीय जीव हैं।

शीतोष्ण प्रदेशों के वन्य जीव Tropical wild Life- उष्ण शीतोष्ण व शीतोष्ण पतझड़ वाले वन खुले होते हैं, वहाँ सर्दी का विशेष प्रभाव रहता है। अतः वहाँ माँसाहारी एवं शाकाहारी दोनों ही पशु मिलते हैं। अधिकांश पशु छोटे आकार के होते हैं। इनमें हिरण, ऊदबिलाव, गिलहरी, वनबिलाव, भालू, लोमड़ी, भेड़िया, खरगोश, सॉभर अनेक प्रकार के पक्षी, नदी में घड़ियाल, मछलियाँ व केकड़े पाए जाते हैं।

कोणधारी वनों के बन्य जीव Wild Life Conical Forests- कोणधारी वनों में भी उपर्युक्त पशु मिलते हैं पर सभी पर कठोर सर्दी से बचाव हेतु चमड़ी पर फर ढके रहते हैं। यहाँ शाकाहारी कम व माँसाहारी पशु अधिक मिलते हैं। शाकाहारी में सिर्फ रेण्डियर या केरीबो मिलता है। अन्य पशु लोमड़ी, भेड़िया, सफेद भालू, वीवर, मिंस्क, गिलहरी, मार्टिन मस्क, आक्स, आदि हैं। अब उन्हें भी फर के लिए पाला जाने लगा है।

मानव ने अपने उपयोग के लिए अनेक वन्य पशुओं को कालान्तर में पालतू बना लिया है जिनमें गाय, वैल, भेड़, बकरी, घोड़ा तथा कुत्ता मुख्य हैं। जहाँजहाँ मानव गया अपने साथ इन पशुओं को साथ ले गया, अतः यह सभी पशु सभी देशों में समान रूप से पाए गए हैं।

मानव ने अपने अधिकतम उपयोग के लिए गाय, मैंस, भेड़, बकरियाँ, सूअर, मुर्गी को पालना आरम्भ किया जिससे कि उसे भोजन के लिए अधिक दूर तक न जाना पड़े, अत: मानव ने अपनी भोजन चेन (Food chain) को छोटा बना लिया है। प्रत्येक देश में मानव को भोजन के लिए पशुओं से माँस, दूध, मक्खन, पनीर, आदि प्राप्त होते हैं। इनसे , खाल, बाल, आदि वस्त्र के लिए मिलते हैं।

वन्य जीव संरक्षण

भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में अधिसूचित जन्तुओं के शिकार पर दण्डात्मक कार्यवाही का प्रावधान है। इस अधिनियम द्वारा कानूनी मान्यता द्वारा कई राष्ट्रीय पार्को, अभयारण्यों सुरक्षित क्षेत्रों की स्थापना करके उन्हें वैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है। देश में 92 राष्ट्रीय पार्क, 490 अभयारण्य हैं।

पशु पालन Cattle Rearing

पशु मनुष्य के लिए इतने अधिक उपयोगी हैं कि उनसे मनुष्य को भोजन, वस्त्र तथा औद्योगिक कच्चा माल मिलता है। वे खेती और सामान ढोने के काम आते हैं। पृथ्वी पर 3,500 प्रकार के पशुओं में से केवल 20 पशु, 13,000 प्रकार की चिड़ियों में से केवल 6 चिड़ियाँ और 4,47,000 कीड़ों में से अनेक प्रकार के कीड़े पालतू बनाए गए हैं।

अब कृषि व पौध संरक्षण में जैव तकनीक अपनाने के साथ-साथ विशेष प्रकार के कृषि उपयोगी कीड़ों, कीटाणु व माइक्रोव जीवों को भी पालतू बनाया जा रहा है।

पालतू पशुओं के प्रकार Types of Cattle

विश्व के पालतू पशुओं को दो वर्गों में रखा जा सकता है-

1)       चौपाये Cattle- गाय, वैल, भैस, भेड़, बकरी और सूअर जो मनुष्य के भोजन के साधन भी हैं,

2)       लद्दू पशु- घोड़े, खच्चर, गधे, बैल, रेण्डियर, याक, लामा, ऊँट और हाथी जो मनुष्यों की सवारी और बोझा लादने के काम में लाए जाते हैं।

पालतू पशुओं का महत्व Importance of Domestic Animals

भोजन सामग्री, वस्त्र, औद्योगिक कच्चा माल, फैशन व सजावटी सामग्री, आदि की प्राप्ति एवं खेती तथा यातायात के काम के लिए विभिन्न प्रकार के पशुओं को पाला जाता है। ये पशु उस देश विशेष की प्राकृतिक अवस्था, जलवायु और वनस्पति के अनुसार ही मिलते हैं। जिन भागों में अधिकतर वन हैं वहाँ प्रायः जंगली पशु ही मिलते हैं। जिन भागों में वन साफ कर दिए गए हैं, वहाँ कृषि कार्य व मानव बसाव होता है। ऐसे भागों में पालतू पशु मिलते हैं। इन पालतू पशुओं का आर्थिक महत्व अधिक है।

मानव-जीवन के लिए पशुओं का महत्त्व Importance of Animals to Human Life

(1)     पशुओं से प्राप्त होने वाले भोज्य पदार्थों का महत्व वनस्पति से प्राप्त मानव भोजन का एक-तिहाई है।

(2)     प्रतिवर्ष यातायात के लिए जितने पशु काम में लाए जाते हैं, उनका मूल्य दो अरब डालर ऑका गया है। कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड एवं संयुक्त राज्य अमरीका के अतिरिक्त विश्व के अन्य भागों में लगभग दो अरब मनुष्य यातायात एवं भोजन ढोने के लिए घोड़े, खच्चर, बैल, ऊँट, आदि पशुओं पर निर्भर हैं। को मरुस्थल का जहाज कहा गया है।

(3)     पशुओं से प्राप्त होने वाले ऊन और चमड़े का वार्षिक मूल्य करोड़ों डालर माना गया है।

(4)     भोज्य पदार्थ के अन्तर्गत पौष्टिक वस्तुएँ, यथा मॉस, दूध, दही, मक्खन, पनीर, अण्डे, मछलियाँ, आदि के रूप में जो भोजन सामग्री मिलती है वह अपार है।

(5)     पशुओं से प्राप्त गौण वस्तुएँ छोटे-छोटे उद्योगों की आवश्यक वस्तुएँ होती हैं। ये वस्तुएँ हड्डी, सींग, खाल, चर्वी, खुर, समूर, आदि हैं। हड्डियों से बटन, कंधे आदि श्रृंगार की वस्तुएँ बनती हैं। चमड़े एवं खाल से मनुष्य के उपयोग की बहुत सी वस्तुएँ बनती हैं। जूते के अतिरिक्त चमड़े के थैले, सन्दूक, सूटकेस, घोड़ों की जीन, लगाम इत्यादि साज, कुर्सियाँ, मशीनों के पट्टे, मोटर की गद्दियाँ, बन्दूक के केस तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ बनायी जाती हैं, इसलिए चमड़े की माँग बढ़ती जा रही है। इनकी व इससे बनी अन्य सजावट व विलासिता की वस्तुओं की निरन्तर माँग बढ़ती जा रही है

(6)     पशु बोझा ढोते और गाड़ी खींचते हैं। दलदलीभूमि पर हाथी, पहाड़ी भूमि पर घोड़ा और याक तथा मरुस्थलीय भूमि पर ऊँट मनुष्य का बोझा ढोता है और सवारी व सुरक्षा के काम भी आता है। कई प्रदेशों में तो परिवहन के लिए मानव का एकमात्र सहारा पशु ही है। जैसे घुवीय व मरुस्थलीय प्रदेशों में इसी भाँति मानसूनी व कम विकसित देशों में अधिकांश कृषि व यातायात का काम पशुओं द्वारा ही किया जाता है।

पारिस्थितिकी तन्त्र Eco-System

पारिस्थितिकी तन्त्र को समझने से पहले पारिस्थितिकी को जान लेना आवश्यक है। पारिस्थितिकी (Ecology) शब्द मूलतः ग्रीक भाषा के ओइकोस (Oikos) तथा लोगोस(Logos) का संयुक्त रूप है। ओइकोस का अर्थ घर अथवा निवास या परिस्थान तथा लोगोस का अर्थ अध्ययन (Study) है। अतः पारिस्थितिकी पर्यावरण के सम्बन्ध में जीवों का अध्ययन है।

वुडवेल (woodwell) ने 1954 में पारिस्थितिकी की परिभाषा देते हुए लिखा है कि “पारिस्थितिकी एक विज्ञान है जो अपने पर्यावरण के सम्बन्ध में जीवों तथा उस दर्शन की खोज करता है जिसमें जीव जगत के प्राकृतिक स्वरूपों की व्याख्या की जाती है।”

भारतीय वैज्ञानिक आर. मिश्रा (R. Mishra) ने पारिस्थितिकी को परिभाषित करते हुए बताया है,  “पारिस्थितिकी आकार, प्रकायों एवं विभिन्न कारकों के मध्य पारस्परिक सम्वन्ध है।” (Ecology is the study of  interaction of form , function and factors.)

“पारिस्थितिकी में जीव अथवा जीव के समूह का उसके पर्यावरण से सम्बन्ध का अध्ययन है”। एक अन्य परिभाषा के अनुसार,” जीवित जीव और उनके पर्यावरण के अन्तःसम्बन्ध का विज्ञान है।”

एक अन्य परिभाषा के अनुसार, “पारिस्थितिकी का सम्बन्ध विशेष रूप से जीव और जैविक समूह तथा स्थल, समुद्र तथा स्वच्छ जल पर क्रियाशील प्रक्रम से है”।

अमरीकी वैज्ञानिक  ओडम (odam) ने पारिस्थितिकी की एक परिभाषा 1971 में अपनी पुस्तक Fundamentals of Ecology प्रस्तुत की है। उसके अनुसार, पारिस्थितिकी मानव बातावरण की समग्रता का विज्ञान है”। (Ecology is science of totality of man and environment)

इससे पूर्व 1963 में पारिस्थितिकी की व्याख्या करते हुए इन्होंने समझाया था कि “पारिस्थितिकी प्रकृति की संरचना एवं कार्यप्रणाली का अध्ययन है”। (It is the study structure and function of nature).

1968 में स्पेनिश विद्वान R. Margalor ने कहा, “पारिस्थितिकी या इकोलॉजी पारिस्थितिकी तन्त्र का ही अध्ययन है (it is the study of Ecology) पारिस्थितिकी जैविक और पर्यावरण के आपसी सम्बन्धों तथा अन्तःप्रभावों का अध्ययन है जबकि पारिस्थितिकी तन्त्र पौधों जन्तुओं का जैव समुदाय होता है।

पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अंग्रेज पारिस्थितिकीविद् टेंसले (Tansley) ने 1935 में अपनी पुस्तक Ecology में किया था। टेन्सले के अनुसार, पर्यावरण के सभी जैविक एवं अजैविक कारकों के एकीकरण के फलस्वरूप निर्मित तन्त्र पारिस्थितिकी तन्त्र कहलाता है”।

पारिस्थितिकी तन्त्र की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है, “जीव समूह या विशेष बायोमी (समुदाय) का आवास तथा उनका पर्यावरण दोनों की सम्मिलित प्रक्रिया पारिस्थितिकी तन्त्र' कहलाता है”।

भूगोल परिभाषा कोश के अनुसार, पारिस्थितिकी तन्त्र पौधों तथा जन्तुओं का जैव समुदाय होता है जिसका एक विशेष पर्यावरण से सम्बन्ध होता है।”

पारिस्थितिकी तंत्र की क्रिया प्रणाली Functions of Ecosystem

जीवित जीव (Living organism) और उनका अजैव पर्यावरण (Abiotic Environment) आपस में पूर्णत: सहसम्बन्धित होते हैं तथा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। कोई इकाई जिसमें एक निश्चित क्षेत्र के सभी जीव एवं वहाँ का भौतिक पर्यावरण एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, जिससे वहाँ शक्ति के संचार स्वरूप से विशेष, जैविक भिन्नता और पार्थिव चक्र तन्त्र निर्मित होते हैं, यह सभी क्रियाएँ मिलकर ही पारिस्थितिकी तन्त्र (Eco-system) कहलाती हैं। इस प्रकार अन्य तन्त्रों की भाँति पारिस्थितिकी तन्त्र या इको तन्त्र में संरचनात्मक घटक होते हैं। यह हैं-  i) जीव एवं उसके आवास का ii) पर्यावरण इन दोनों के मध्य निरन्तर अन्तः क्रियाएँ होती रहती हैं। इन क्रियाओं में ऊर्जा का प्रवाह एवं पदार्थ का चक एवं प्रतिचक्र (Flow of Energy and Cycling and of Material) प्रतिपादित होता है। अतः पारिस्थितिकी तन्त्र के जैविक एवं अजैविक घटक दोनों का ही समान रूप से महत्व है।

अत: पारिस्थितिकी तन्त्र (Eco-system) क्रियाशील इकाई होती है जिसमें जीव और उसके अजैव पर्यावरण पर एक-दूसरे के व्यापक प्रभाव सभी पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। कोई भी जीव विना पर्यावरण के जीवित नहीं रह सकता है यही उसका अपना एक पारिस्थितिकी तन्त्र होता है।

पारिस्थितिकी तंत्र के प्रकार Types of Eco-System

जीवमण्डल में दो प्रकार के पारिस्थितिकी तन्त्र पाए जाते हैं-

प्राकृतिक पारिस्थितिकी तन्त्र Natural Ecosystem - यह स्वयं प्रकृति के नियमों द्वारा सम्पन्न होते हैं, मानव के हस्तक्षेप से रहित सम्पन्न होते हैं। विशेष प्राकृतिक आवास (Habitat) के आधार पर यह दो प्रकार के होते हैं-

स्थलीय- जैसे वन, घास के मैदान, आदि

जलीय- मत्स्य आदि, यह पुनः दो प्रकार के होते हैं। (क) स्वच्छ जल के- इसमें नदी, झील, आदि सम्मिलित किए जाते हैं। (ख) खारे पानी के- सागरीय एवं खारे पानी की झीलें।

अप्राकृतिक अथवा कृत्रिम अथवा मानव निर्मित Artificial or Man Made Ecosystem- यह पारिस्थितिकी तन्त्र मानव द्वारा नियत्रित किए जाते हैं। मानव के हस्त कौशल, तकनीकी शान के द्वारा प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। वनों को काट  कर औद्योगिक क्षेत्रों का निर्माण किया जाता है- यह सांस्कृतिक भूदृश्य अथवा मानव निर्मित भूदृश्य कहा जाता है। इसमें मानव अथवा मानव समूह, भौतिक व रासायनिक पर्यावरण को नियन्त्रित करने का प्रयास करता है, अतः इसे कृत्रिम अथवा आप्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Artificial Eco-System) कहा जाता है।

पारिस्थितिकी तंत्र के घटक Composition of Eco system

अजैविक (अकार्बनिक यौगिक) - इसमें अकार्बनिक यौगिक P,S,C,N,H आदि पार्थिव चक्र में सम्मिलित किए जाते हैं। किसी भी पारिस्थितिकी तन्त्र किसी एक समय में इन तत्वों का पाया जाना स्थायी अवस्था कहलाती है।

जैविक (कार्बनिक) यौगिक- प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, आदि जो पर्यावरण में पाए जाते हैं, इनके अन्तर्गत सम्मिलित किए जाते हैं।

जलवायु व्यवस्था- तापक्रम तथा अन्य भौतिक तत्व जो जलवायु के निर्माण में सहायता करते हैं, सम्मिलित होते हैं।

उत्पादनकर्ता- इसके अन्तर्गत घास, आदि को सम्मिलित किया जाता है जिसकी उत्पति और विकास सूर्य के प्रकाश और शक्ति तथा अन्य अजैविक तत्वों से मिलकर होती है।

वृहत् उपभोक्ता- इसके अन्तर्गत प्राथमिक उपभोक्ता जिनमें तृण भक्षी और माँसाहारी सम्मिलित किए जाते हैं। द्वितीय स्तर के उपभोक्ता वे पशु होते हैं जो जीव अथवा जैविक पदार्थों का उपयोग करते हैं।

लघु उपभोक्ता- सामान्यतः इन्हें अपघटक कहा जाता है। इनमें फफूंद जैसे जीवाणु सम्मिलित होते हैं।

वियोजक Decomposers- इनके अन्तर्गत वे सूक्ष्म जीव आते हैं जो जन्तुओं तथा वनस्पतियों के शरीर को सड़ागला कर विघटित कर देते हैं।

जैविक (Biotic) एवं अजैविक (Abiotic) घटक पारिस्थितिकी तन्त्र विकास में विशेष महत्वपूर्ण हैं।

जैविक कारक Biotic Factors- इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है-

स्वजीवी Autotrophs- इसमें इस जैव जगत का वर्णन है जो कि प्राकृतिक पर्यावरण की सहायता से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इसमें सभी प्रकार की वनस्पति पेड़, झाड़ियाँ, घास, प्लेंकटन एवं बैक्टीरिया सम्मिलित हैं। इनके द्वारा उत्पादित पदार्थ शेष जैव जगत के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भोजन उत्पन्न करते हैं। अतः इन्हें उत्पादक या प्राथमिक उत्पादक कहते हैं।

परोपजीवी Hetrotrophs- इसमें वह जीव आते हैं जो कि भोजन पचाकर प्रतिक्रिया कड़ी (Chain of reaction) की श्रृंखला स्थापित करते हैं। इन जीवों को मुख्य उपभोक्ता (consumers) कहते हैं। इसमें शेष सकल, जल वायु जैव जगत आता है। यह जीव तीन प्रकार के हैं, अ) शाकाहारी, व) माँसाहारी, स) सर्वाहारी।

सभी प्रकार के जैव जगत में समुदाय या कुल (Commnity or Family) का विशेष महत्व है। समुदाय संकल्पना का इसी कारण पारिस्थितिकी तन्त्र संकल्पना के विकास में विशेष महत्व रहा है।

अजैविक कारक Abiotic Factors- अजैविक घटक का स्वरूप जैव जगत की भाँति ही जटिल है। इसके अन्तर्गत जैव जगत को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाले प्राकृतिक पर्यावरण के सभी तत्व मुख्यतः आते हैं। अतः अजैविक घटक भी पारिस्थितिकी तन्त्र का विशेष महत्वपूर्ण अंग है। इसमें मुख्यतः निम्नलिखित कारक सम्मिलित हैं-

  1. भूमि एवं मिट्टियाँ Edaphic Factors
  2. जल Water
  3. प्रकाश व उर्जा Light and energy
  4. ताप व नमी Temperature and Moisture
  5. वायुमंडल की गैसें Atmospheric Gases

इसके अतिरिक्त पृथ्वी की गतियाँ, आकर्षण शक्ति, स्थलमण्डल का स्वरूप आदि भी अप्रत्यक्ष रूप से जैव जगत को प्रभावित करते हैं।

अतः सकल प्राकृतिक परिवेश के तत्वों से सम्मिलित रूप से निर्मित सहक्रियाशीलता (Co-activities) का जैव जगत में विशेष महत्व है।

पारिस्थितिकी तन्त्र के घटकों की अन्तःक्रिया Interaction of Ecological Factors

पर्यावरण से तात्पर्य जीव के चारों ओर के परिवेश से होता है। यह पर्यावरण उपर्युक्त अनेक तत्वों से निर्मित जटिल परिवेश होता है जो जीव के चारों ओर पाया जाता है। अत: कोई भी बाहरी शक्ति अथवा अवस्था जो जीव को घेरे रहती है और उसे किसी भी प्रकार से सम्पूर्ण तत्वों शक्तियों की सहक्रियाशीलता द्वारा प्रभावित करती है, वही उस पारिस्थितिकी तन्त्र का वातावरण अथवा पर्यावरण कहलाता है। यह सभी घटकों को पर्यावरण के घटक अथवा पारिस्थितिकी घटक कहा जाता है। यह सभी घटक उपर्युक्त दो प्रकार के होते हैं-

1)       जैविक Biotic

2)       अजैविक Abiotic

यह जीवित और अजैविक घटक मिलकर जीव के वातावरण का निर्माण करते हैं। वह स्थान जहाँ जीव निवास करता है उसे Habitat कहते हैं, जिसमें एक विशेष निश्चित पर्यावरण अवस्थाएँ होती हैं, उसे पर्यावरण समष्टि (Environment Complex) कहा जाता है। यहीं जीवों का सर्वाधिक विकास भी अपने समुदाय में होता रहता है।

पारिस्थितिकी असन्तुलन की समस्या तथा उसका निवारण

पारिस्थितिकी तन्त्र में असन्तुलन मानवीय क्रियाकलापों के परिणामस्वरूप आवास परिवर्तन (Habitat Transformation) के कारण हुआ है। यह परिवर्तन दो क्षेत्रों में मिलता है-

  1. स्थलीय जीव-वास में परिवर्तन Land Habitat Transformation- कृषि, वानिकी, वन्यजीव व वनस्पति का विदोहन एवं मछलियाँ पकड़ना, आदि को मानव द्वारा उसके पारिस्थितिकी तन्त्र में दखलंदाजी एवं शोषण कहते हैं। मानव ने अधिकतम भोजन प्राप्त करने के लिए प्राकृतिक पारिस्थितिकी तन्त्र में कई परिवर्तन किए हैं, उसके स्थान पर उसने सामान्य अथवा एकल वंश (Mono-culture) पारिस्थितिकी तन्त्र का विकास किया है, उसने भोजन-चेन को छोटा बना लिया है। पालतू पशुओं के माध्यम से उसे दूध, माँस तथा अन्य पदार्थ प्राप्त होने लगे जबकि पूर्व में यह सब उसे अधिक कठिनाई और लम्बे प्रयासों से मिलता था, अब वही उसे शीघ्र प्राप्त होने लगा।

कृषि की सफलता फसलों द्वारा अपने पारिस्थितिकी तन्त्र के अनुकूलन पर निर्भर करती है। कृषि उपज स्थानीय पर्यावरण की अवस्थाओं पर निर्भर रहते हैं। कृत्रिम खाद के रूप में पोषक तत्व पारिस्थितिकी तन्त्र में प्रवेश कर उत्पादन में वृद्धि कर देते हैं। शीघ्रता से पकने वाली उपज तथा विभिन्न प्रकार की उपज को मानव ने अपने तकनीकी शान से खोज निकाला है। यद्यपि हरितक्रान्ति से उत्पादन अधिक हो गया है, परन्तु रासायनिक खादों के लिए स्थापित कारखानों से प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गयी है।

कृषि में नए-नए तकनीकी प्रयोगों से नयी उपजों विशेषकर जल्दी पक कर तैयार होने वाली उपजों की खोज की गयी है, जिसके कारण भिन्न पर्यावरण में भी कृषि की जा सकती है। शीघ्र पकने वाली गेहूं की उपज के आविष्कार से अधिकांश सुदूर उत्तरी भाग में भी गेहूं पैदा किया जाता है। इसके कारण प्रेयरी प्रदेश की वनस्पति- घास तथा टैगा प्रदेशों के दक्षिणी भागों को साफ कर अथवा स्टैपी घास के मैदानों से प्राकृतिक वनस्पति का हास हो चुका है और वहाँ बसन्तकालीन गेहूं, राई, सन, आदि उत्पन्न किया जाता है। जिसके परिणामस्वरूप वहाँ का परिस्थितिक तन्त्र पूर्णतः नष्ट हो चुका है।

इसी प्रकार सरल पारिस्थितिकी तन्त्र (Simplified Eco-system) में किसी एक उपज को तथा पौधों को कीड़ों से बचाने के लिए कई नियन्त्रण अपनाए जाते हैं, कीटनाशक दवाएँ छिड़की जाती हैं। इन कीटनाशक दवाओं का अधिक उपयोग मिट्टी, वन्य प्राणियों, जैव जगत व मानव सभी के लिए हानिकारक है। यह कीटनाशक दवाएँ वायु, मिट्टी और नदियों के माध्यम से सागरों में पहुंचती हैं और धाराओं के माध्यम से विश्व के समस्त सागरीय क्षेत्र में फैल जाती हैं। इनसे मछलियों के माध्यम से मानव को भोज्य पदार्थों के रूप में प्रदूषित भोजन प्राप्त होता है। कीटनाशक दवाओं के निर्माण के समय की प्रदूषण की अवस्था से भी विशेष दुर्घटनाएँ भी हो जाती हैं, जैसे भोपाल गैस त्रासदी एवं चेरनोबल जैसी घटनाएँ।

कुछ क्षेत्रों में आज भी आदिवासी लोग स्थानान्तरण कृषि करते हैं, वनों को जलाकर उनको नष्ट करते हैं और मध्ययुग से वर्तमान काल तक वनों को निर्दयता से काटा जाता रहा है, जिससे पर्यावरण में परिवर्तन आया है, पारिस्थितिकी में असन्तुलन बढ़ा है, क्योंकि निचला वायुमण्डल तेजी से जहरीला व प्रदूषित होता जा रहा है। CFC व CO2 जैसी जहरीली गैसों के बढ़ते कुप्रभाव से मानव व जैव जगत की रक्षाकवच ओजोन परत में ही छिद्र पड़ने लगे हैं। आज मानव प्रायः आर्थिक दृष्टि से अधिक उपयोगी वृक्षों को ही बढ़ाकर अन्य वृक्षों को समाप्त या लुप्त कर रहा है। आज के युग में अनेक देशों में वनों का क्षेत्रफल बहुत कम रह गया है। वनों का हास इतना अधिक हुआ है कि इनकी कमी से भूमि का कटाव, अनावृष्टि, बाढ़, आदि की समस्या आज मानव के समक्ष महत्वपूर्ण समस्या है। वनों के अत्यधिक ह्यास से वायु व जल प्रदूषण की समस्या आज के मानव के सामने महत्वपूर्ण समस्या है।

  1. जलीय जीववास में परिवर्तन Aquatic Habitat Transformation- इसमें मछली प्राप्त करने और उसके प्रवन्ध, उसका उत्पादन और मछलियों की संख्या निरन्तर बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि मछलियों की आदतों का अध्ययन किया जाए। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो विभिन्न प्रकार की मछलियों की समाप्ति निश्चित है, जिससे मत्स्य उद्योग के नष्ट हो जाने की सम्भावना है, जिससे मानव के लिए आवश्यक तत्व प्रोटीन की कमी की भी सम्भावना होगी।

प्राणी जगत भी वनों की भाँति ही पारिस्थितिकी तन्त्र सुधारने में सहायक है। वर्तमान में पालतू पशु जहाँ वनस्पति पर निर्भर रहते हैं वहीं वन्य पशु वनस्पति एवं अन्य पशुओं पर निर्भर रहते हैं। अतः सभी प्रकार का प्राथमिक उत्पादन उनके लिए आवश्यक है। भारत की भाँति अधिकांश आर्द्र-उपोष्ण देशों में घास व वन सरलता से विकसित किए जा सकते हैं, ऐसे प्रदेशों में वन्यजीव अधिक संख्या में पाए जाते हैं, परन्तु जहाँ यह वनस्पति नष्ट हो गयी है, वहाँ वन्य पशुओं का भी हास होता गया है। जिन प्रदेशों में शुष्क व वर्षा का एकान्तर काल होता है, वहाँ शुष्ककाल में वन व घास के मैदान में आग तेजी से फैल जाती है, इसके परिणामस्वरूप भयंकर विनाशलीला देखी गयी है जहरीली गैसों की वर्षा का भी कुछ ऐसा ही प्रभाव रहा है।

जनसंख्या वृद्धि- विश्व की जनसंख्या आज 650 करोड़ हो चुकी है। जनसंख्या का अत्यधिक भार बढ़ने से घास के मैदान या चरागाह भूमि की कमी होती जाती है, वन प्रदेश में कमी होती है, भोजन की अत्यधिक आवश्यकता से कृषि प्रदेशों में विस्तार किया जाता है, अतः घास तथा वनों के क्षेत्रों को साफ किया जाता है जिससे पारिस्थितिकी में अन्तर आता है।

ऐसे सभी कार्य व घटनाएँ इको तन्त्र या पारिस्थितिकी तन्त्र में ऊपर वर्णित कई प्रकार एवं विधियों से असन्तुलन की अवस्था उत्पन्न कर देती हैं। पारिस्थितिकी असन्तुलन से आज अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जनसंख्या की अधिकता से भोजन, आवास तथा वस्त्र का अभाव पाया जाता है। वनों की कमी से प्रदूषण की समस्या पैदा होती जा रही है, वनस्पति की कमी से शाकाहारी व अन्य पशुओं की संख्या कम होती जा रही है और इन पर आश्रित अन्य प्रकार के वन्य पशुओं की भी कमी होती जा रही है। मानव द्वारा ज्ञात या अज्ञात कारणों से या अज्ञानता अथवा जानबूझकर फैलाई गई असन्तुलन की स्थिति से अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना आज स्वयं मानव को ही करना पड़ रहा है।

पारिस्थितिकी असन्तुलन की समस्या का निवारण

  1. जनसंख्या वृद्धि पर रोक- जनसंख्या की वृद्धि के कारण यह असन्तुलन की स्थिति निरन्तर भयानक रूप ले रही है, अतःविकासशील एवं निर्धन देशों में जनसंख्या में वृद्धि को कम किया जाना अत्यन्त आवश्यक है।
  2. वनों के क्षेत्रों में निरन्तर व व्यवस्थित विस्तार- प्रदूषण के प्रभाव से बचने के लिए आवश्यक है कि वनों का विस्तार किया जाए। भारत में चिपको आन्दोलन इसी प्रकार का प्रयास है। विश्व के अन्य देशों में वन क्षेत्रों के विकास के लिए नए वृक्षों के पौधों को लगाया और पाला जाता है जिससे कि वनों के क्षेत्रों में कमी न जाए।
  3. मत्स्यक्षेत्र में भी असन्तुलन की स्थिति है, अनेक प्रकार की मछलियाँ जैसे, खेल, सील व वालरस का अभाव होता जा रहा है। नीली हेल तो लुप्त प्रायः हो चुकी है। अत: कुछ विशेष प्रकार की मछलियों को क्षेत्रवार समयानुसार पकड़ने पर अंकुश लगा दिया जाना चाहिए। मछलियों की कृषि की तकनीकी का विस्तार किया जाना चाहिए। अत: विकसित तकनीक द्वारा एवं विशेष प्रबन्ध द्वारा ही मत्स्य संसाधन का उपयोग किया जाना चाहिए।
  4. बन्यजीवों के लिए अभयारण्यों एवं राष्ट्रीय पाकों का विकास- वन्य जीवों के संरक्षण और विकास के लिए अभयारण्यों व राष्ट्रीय पाकों की स्थापना आवश्यक है। विश्व के देशों में इस प्रकार के नियमों का होना आवश्यक है कि वन्यजीवों का ह्रास न किया जा सके। प्रत्येक देश में अनेक वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए पारिस्थितिकी तन्त्र की स्थापना की जाए। इस प्रकार से देश के प्रत्येक जिले या उप खण्ड में श्रृंखलाबद्ध व्यवस्थित विधि से अन्तनिर्भर अभयारण्यों, पक्षी विहार तथा राष्ट्रीय पार्को में सन्तुलन स्थापित हो सकेगा।

पर्यावरण प्रदूषण तथा प्रदूषण नियंत्रण Environmental Pollution and its Control

प्रदूषण Pollution

यद्यपि मानव अबाध गति से विकास के साथ-साथ अपने विविध प्रकार के उन्माद का प्रदर्शन करते हुए पिछले दो हजार वर्षों से पृथ्वी के पर्यावरण को असन्तुलित करता रहा है, किन्तु यह सब कुछ पृथ्वी पर अल्पकालिक या लघु क्षेत्रीय रहा, अतः इससे पृथ्वी का उस समय का सशक्त एवं बहु विधि से सुस्थापित सन्तुलन प्रायः अप्रभावित सा रहा या शीघ्र पुनः अनुकूल व्यवस्था स्थापित हो गई किन्तु उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से ही जिस विधि से मानव ने महाविनाशकारी युद्ध किए, औद्योगिक विकास एवं खनिज निकालने के नाम पर प्रकृति को लूटा, निर्दयी बनकर वनों को समूल नष्ट करना प्रारम्भ किया तथा नई तकनीक एवं नवीन प्रवाह व्यवस्था के नाम पर भूमि, जल व वायु में जिस विविधता से अनेक प्रकार की धुआँ, उड़ती राख, जहरीली दवा, सड़ीगली वस्तुएँ, कूड़ा, मैले पदार्थ, जहरीली गैस एवं आणविक विस्फोट आदि द्वारा प्रदूषण घोला है, वह न केवल प्रकृति को एवं प्राकृतिक पर्यावरण को ही दूषित कर रहा है बल्कि स्वयं मानव को भी श्वास लेना, शुद्ध जल व शुद्ध खानेपीने की सामग्री मिलना असम्भव बनाता जा रहा है।

इस प्रकार मानव ने कुटिल एवं निहित स्वार्थों से अभिभूत होकर जिस विधि से हवा, पानी एवं मिट्टी के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में अवांछनीय परिवर्तन कर दिए हैं एवं कर रहा है उससे स्वयं मानव का सांस्कृतिक जगत ही थर्रा उठा है, प्रकृति में भय व्याप्त है। अतः आज की यह प्रथम एवं सर्वोपरि आवश्यकता है कि इस कुटिल व बहुव्यापी एवं जटिल प्रदूषण पर तत्काल नियन्त्रण किया जाए। क्योंकि एक भोपाल गैस काण्ड का ही लाखों लोगों पर कुप्रभाव पड़ चुका है। उदयपुर राजस्थान से निकट कीटनाशक व जहरीली दवा बनाने वाली कम्पनी में व्याप्त प्रदूषण एवं वहाँ से निकले प्रदूषित जल से भूमि, वायुमण्डल, जैव जगत एवं स्वयं मानव स्थानीय रूप से प्रभावित हुए। पवित्र गंगा को प्रदूषण के कारण ही अब राम तेरी गंगा मैली' कहा जाने लगा है। विश्व के सभी देशों में वेहिसाब ध्वनि प्रदूषण भी आदमी को बहरा किए जा रहा है। यही नहीं वायुमण्डल की मानव हितैषी ओजोन मण्डल परत में छेद पड़ने से मानव जीवन ही सीधे घातक और विकिरण व ब्रह्माण्ड किरण (Cosmic rays) एवं पराबैंगनी किरणों के घातक प्रभाव की सीमा में आता जा रहा है।

इस प्रकार पर्यावरण की शुद्धता में परिवर्तन या मिलावट को प्रदूषण कहते हैं। यह मुख्य रूप से निम्न प्रकार का होता है-

1)       वायु प्रदूषण Air Pollution

2)       जल प्रदूषण Water Pollution

3)       थल प्रदूषण Land Pollution

4)       ध्वनि प्रदूषण Noise Pollution

5)       आणविक प्रदूषण Nuclear Pollution

प्रदूषण नियंत्रण के उपाय Measures of PollutionControl

मुख्य रूप से निम्न उपायों द्वारा पर्यावरण प्रदूषण पर नियन्त्रण किया जा सकता है-

  1.  नगरों, महानगरों, आदि से मानव मलमूत्र एवं गन्दगी गन्दे जल तथा ठोस कचरे की निकासी व निपटान (Disposal) हेतु उसे पूरी तरह से उपचारित किया जाए। प्रत्येक नगर में कूड़ाकरकट व मैला उपचारित (waste Treatment Plant) इकाई लगे। इससे खाद बनेगा, सिंचाई हेतु प्रदूषण रहित जल मिलेगा, रसोई गैस ऊर्जा, अन्य उपयोगी व पुनः काम में आने वाली सामग्री मिलेगी।
  2. सभी स्तर पर घर, खेत, राजमार्ग, खुले क्षेत्रों एवं नग्न धरातल पर व्यक्तिगत, सामाजिक एवं शासकीय प्रयास द्वारा वनों के कुंजों, पट्टियों वन क्षेत्रों को विकसित किया जाए। जापान की भाँति उपयोगी पेड़ लगाए जाएँ। प्रत्येक देश का 35-40 प्रतिशत भू-भाग वनों से ढका हो। अभयारण्यों का एवं अन्य सभी क्षेत्रों में हरी-भरी पट्टियों का विस्तार किया जाए।
  3.  उद्योग से निकलने वाले रसायन, कूड़ाकरकट, धुआँ व गैसों को प्रदूषण नियन्त्रण नियम के अन्तर्गत दृढ़ता से फैलने से रोका जाए इसे नहीं मानने वाले मालिकों पर फौजदारी मुकदमा दायर किया जाए।
  4. महानगरों एवं महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्गों पर एवं अन्यत्र चलने वाले सभी वाहनों का धुआँ प्रतिशत एवं मशीनी दशा की स्थिति को प्रामाणिक आधार पर निश्चित किया जाए, जिससे कि जहरीली गैसें (Co, , CFC, SO2, CO2) सीसा, गन्धकीय अम्ल एवं अन्य घातक पदार्थों द्वारा वायु को प्रदूषित करने से रोका जा सके।
  5. कृषि की नवीन तकनीक में अन्धाधुन्ध रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाओं एवं अन्य घातक, रसायन व तरल पदार्थों के उपयोग को तत्काल नियन्त्रित किया जाए। इससे भूमि, जल एवं मानव भोजन तथा वनस्पति सभी प्रदूषित होते हैं। नियन्त्रित सिंचाई पद्धति अपनायी जाए। कीटनाशकों के स्थान पर जैव तकनीक एवं बीजों का उपचार जैसी विधि किसानों तक पहुंचाई जाए।
  6. बस्तियों के आसपास से भट्टे या चूना भट्टे हटा दिए जाएँ एवं धुआँ निकलने वाली चिमनियों की ऊँचाई 80 से 100 मीटर कर दी जाए। 25 लाख से बड़े महानगरों के 60 किलोमीटर के घेरे में बड़े उद्योगों को प्रतिबन्धित कर दिया जाए। इन नियमों को कठोरता से लागू किया जाए।
  7. आणविक अनुसन्धान केन्द्रों, अन्य आणविक इकाइयों एवं जहरीली गैस की दवाइयों की इकाइयों में अनिवार्य रूप से दोहरी प्रदूषण मुक्त प्रणाली (Pollution Proof  Device) अपनायी जाए।
  8. ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में सामान्य पुरुष व महिलाओं को प्रदूषण के घातक प्रभाव एवं उससे बचने के उपाय की शिक्षा प्रत्येक स्तर पर अवश्य दी जाए। इन्हें प्राथमिकशाला के पाठ्यक्रम में भी लागू किया जाए।

अन्त में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मानव के स्वास्थ्य और कल्याण तथा उसके पर्यावरण को सन्तुलित एवं अनुकूल बनाए रखने के लिए पारिस्थितिकी के सिद्धान्तों का अनुपालन आवश्यक है।

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