वंदे मातरम् Vande Mataram

“वन्दे मातरम्” 1872 और 1875 के बीच बंगाली लेखक बंकिम चन्द्र चटर्जी (1838-1894) द्वारा लिखित एक कविता थी। “वन्दे मातरम्” जिसका अर्थ होता है ‘हे माँ तुम्हारी जय हो’, जो कि दो पद में बारह लाइनों से मिलकर बनी एक कविता थी। बंकिम चन्द्र चटर्जी ने सर्वप्रथम इस कविता को अपने बंगाली भाषा के उपन्यास आनंदमठ (अभय आनंद) में लिखा था। आनंदमठ देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत एक राजनीतिक उपन्यास है, जिसमें उत्तर बंगाल में 1762 से 1773 तक के सन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है, जिनका आदर्श वाक्य था ‘ओम वन्दे मातरम’। इस उपन्यास में भवानंद नाम का एक सन्यासी यह गीत गाता है।

इस उपन्यास को सबसे पहले बंगाली साहित्यिक पत्रिका बंगदर्शन (Bangadarshan) में 1880 से 1882 के बीच प्रकाशित किया गया था। बंगदर्शन साहित्यिक पत्रिका की स्थापना बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा 1872 में की गयी थी। शुरुआत में इस गीत के केवल दो पद रचे गए थे, जो केवल संस्कृत में थे। बाद में इस गीत का विस्तार किया गया।

चटर्जी एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार से थे। उन्होंने हुगली कॉलेज, प्रेसीडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की। कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून से स्नातक किया। चटर्जी यहाँ से स्तानक होने वाले सबसे पहले विद्यार्थियों में से एक थे। 1858 से 1891 में अपनी सेवानिवृत्ति तक, वह भारतीय सिविल सेवा के सदस्य थे, और डिप्टी मजिस्ट्रेट के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। चटर्जी ने दर्जनों उपन्यास लिखे, पहले वह अंग्रेजी में लिखते थे, बाद में उन्होंने अपनी मातृभाषा बँगला में लिखना शुरू कर दिया। आनंदमठ का 1888 में नाट्य रूपांतरण किया गया और 1905 में इसका हिंदी में अनुवाद किया गया। सन 1906 में श्री अरविन्द ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया, इसके बाद इसका कई भाषाओँ में अनुवाद हुआ। इसके लिए संगीत की रचना जदू भट्ट (Jadu Bhatta) ने की, रवीन्द्र नाथ टैगोर के संगीत के गुरु थे। 1882 में टैगोर ने स्वयं को इसके लिए संगीत रचना का श्रेय दिया। उन्होंने इसे एक ग्रामोफ़ोन (phonograph) पर रिकॉर्ड कराया, जो सबसे पहले 1905 में तैयार हुआ।

चटर्जी के लिए हिंदू धर्म और राष्ट्रवाद एक ही पर्याय थे। उनके उपन्यास और निबंध, विशेष रूप से 1905 में बंगाल के विभाजन के समय, सदी के मोड़ पर राष्ट्रवादियों के लिए एक प्रेरणा बन गए थे। इस गीत को सर बैम्पफ्यल्दे फुलर (Sir Bampfylde Fuller), जो उस समय पूर्वी बंगाल और असम का गवर्नर था, द्वारा 1905 में प्रतिबंधित कर दिया गया। उसका विचार था यह गीत हिंसा को शह दे सकता है। यह प्रतिबंध 1911 तक लगाया गया था और यह 1930 और 1937 के बीच इसे पुनः प्रतिबंधित कर दिया गया था।

यह गीत सर्वप्रथम 1905 में वाराणसी में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 21वें सम्मलेन में गाया गया था। यह गीत हिंदुओं के बीच बेहद लोकप्रिय हो गया और श्री अरविंद ने 1907 में पत्रिका वंदे में मातरम् इसे एक "मंत्र" के रूप में वर्णित किया था कि इस मंत्र ने एक ही दिन में सभी लोगों को देशभक्ति के धर्म में परिवर्तित कर दिया था। इस गीत को 1909 में बाल गंगाधर तिलक की राजद्रोह के मुक़दमे की सुनवाई के दौरान उनके समर्थकों ने अदालत के बाहर गाया था और राष्ट्रवादी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठकों में यह राष्ट्रगान बन गया था। इसके लेखक के रूप में, चटर्जी भारत के राष्ट्रवादी नायक माने जाने लगे।

सन् 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में "वन्दे मातरम्" ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद पं0 राम प्रसाद 'बिस्मिल' की प्रतिबन्धित पुस्तक "क्रान्ति गीतांजलि" में पहला गीत "मातृ-वन्दना" वन्दे मातरम् ही था।

इस गीत में भारत के साथ "मां" की पहचान और हिंदू धर्म की सुगंध को, मुसलमानों द्वारा आपत्तिजनक और विवादास्पद प्रकृति का पाया गया। मुसलमानों द्वारा की गयी इस आपत्ति पर राष्ट्रीय कांग्रेस को इस बात पर चर्चा करने के लिए मजबूर कर दिया की भारत का राष्ट्रीय गान कौन सा होना चाहिए।  28 अक्तूबर 1937 को कांग्रेस की कार्य समिति (जवाहर लाल नेहरु, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सुभाष चंद्र बोस और आचार्य नरेन्द्र देव की समिति) ने राष्ट्रीय आयोजनों में इस गीत के पहले दो पद ही गाने की स्वीकृति दी, क्योंकि इसके बाद इसमें देवी दुर्गा की स्तुति है। यहाँ इस बात पर भी स्वीकृति बनी कि आयोजक इस गीत के साथ कोई भी निर्विवाद चरित्र का गीत जोड़ सकते हैं। बहरहाल मुस्लिमों ने इस गीत का विरोध जारी रखा, और इस बात को बढ़ावा दिया की यह इस बात का एक और सबूत है कि कांग्रेस के शासन का अर्थ है की “हिन्दू शासन”। इसने पाकिस्तान के लिए हो रहे आन्दोलन को भी बढ़ावा दिया।  इस प्रकार मोहम्मद इकबाल द्वारा लिखा गया “सारे जहाँ से अच्छा” के साथ बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारम्भिक दो पदों का गीत “वन्दे मातरम्” राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृत हुआ।

जब भारत के लिए यह निश्चित करने का समय आया की भारत का राष्ट्रीय गान कौन सा होना चाहिए, तो वन्दे मातरम् को इसकी लोकप्रियता और राष्ट्रीय आंदोलनों में इसके योगदान को देखते हुए भी इसे नहीं चुना गया। बजाय इसके “जन मन गन अधिनायक” जिसे रविन्द्र नाथ टैगोर ने 1911 में लिखा था और जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय के कलकत्ता अधिवेशन में दुसरे दिन गाया गया था, भारत का राष्ट्रीय गान 1950 में बना। वन्दे मातरम् को सुभाष चन्द्र बोस की 1943 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय सेना (Indian National Army) द्वार अपनाया गया। इस बात का दृढ रूप से दावा किया गया कि “जन मन गन अधिनायक” 1911 में भारत में किंग जॉर्ज पंचम की यात्रा की स्मृति में बनाया गया था और यह उस समय आयोजित  उनके दरबार में गाया गया था। इस दावे को टैगोर द्वारा पूर्ण रूप से नकार दिया गया कि इस गीत का दरबार के आयोजन में कोई उल्लेख किया गया है। 1950 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने अपने एक भाषण के दौरान कहा कि वन्दे मातरम् को समान रूप से सम्मानित और बराबर दर्जा दिया जायेगा।  समय समय पर वन्दे मातरम् के समर्थक इस राष्ट्र गान बनाने की मांग करते रहे हैं। 1990 में भारतीय जनता पार्टी ने भी इसे राष्ट्र गान के रूप में अपनाने की मांग की।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 में 'वन्दे मातरम्' को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने सम्बन्धी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया।

जब राष्ट्रगान “जन मन गन अधिनायक” को गाने से सम्बंधित विवाद उच्चतम न्यायलय के समक्ष ‘बिजोय एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य’ नाम के एक वाद में उठाया गया, तो उच्चतम न्यायलय ने यह निर्णय दिया की यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान करता है और उसे गाता नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह इसका अपमान करता है और उसके लिए उसे दण्डित नहीं किया जा सकता| यही नियम राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम्” भी लागू होता है|

वन्दे मातरम् का संस्कृत मूल गीत इस प्रकार है,

वन्दे मातरम्।

सुजलाम् सुफलाम् मलय़जशीतलाम्,

शस्यश्यामलाम् मातरम्। वन्दे मातरम्।। 1।।

शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,

फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,

सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्,

सुखदाम् वरदाम् मातरम्। वन्दे मातरम्।। 2।।

कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,

कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,

के बॉले माँ तुमि अबले,

बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,

रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम्।। 3।।

तुमि विद्या तुमि धर्म,

तुमि हृदि तुमि मर्म,

त्वम् हि प्राणाः शरीरे,

बाहुते तुमि माँ शक्ति,

हृदय़े तुमि माँ भक्ति,

तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे। वन्दे मातरम् ।। 4।।

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,

कमला कमलदलविहारिणी,

वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,

नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्,

सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम्।। 5।।

श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भूषिताम्,

धरणीम् भरणीम् मातरम्। वन्दे मातरम्।। 6।।

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