तैमूर का आक्रमण Timur's Invasion

ऐसे इतिहास के एक अत्याधिक भयानक सैनिक नायक अमीर तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया। दिल्ली राज्य की विघटित एवं अस्तव्यस्त अवस्था थी, अमीर तैमूर बरलास तुर्कों की गुरगन या चगताई शाखा के नायक अमीर तुर्गे का पुत्र था। उसका जन्म 1336 ई. में ट्रांस-औक्सियाना में केश नामक स्थान पर हुआ था। वह 1369 ई. में समरकन्द की गद्दी पर बैठा। तब उसने फारस, अफगानिस्तान तथा मेसोपोटामिया पर आक्रमण कर विजय का कार्य आरम्भ किया। भारत के वैभव ने स्वभावत: इस भूमि पर आक्रमण करने के लिए उसे प्रलोभित किया। दिल्ली राज्य के छिन्न-भिन्न होने से उसे इसके लिए उत्तम अवसर मिल गया। उसने सरदारों एवं योद्धाओं का समर्थन पाने के लिए धर्म के नेतृत्व का ढोंग रचाया, क्योंकि ये इस सुदूर भूमि पर उसके प्रस्तावित आक्रमण के पक्ष में न थे।

1398 ई. के आरम्भ में तैमूर के एक पौत्र पीर मुहम्मद ने मुलतान पर घेरा डाल दिया तथा छः महीनों के बाद इसे जीत लिया। तैमूर एक विशाल सेना लेकर अप्रैल, 1398 ई. में समरकन्द से चला। सितम्बर में सिंधु, झेलम तथा रावी पार कर उसी वर्षं 13 अक्तूबर को मुलतान से लगभग सत्तर मील उत्तर-पूर्व स्थित तलम्बा के समक्ष उपस्थित हुआ। उसने तलम्बा को लूटा तथा इसके निवासियों को कत्ल कर दिया अथवा दास बना लिया। राह में बहुत-से स्थानों को जीतते हुए तथा वहाँ के अनेक निवासियों को कत्ल करते हुए वह दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक दिल्ली के बाहरी इलाके में पहुँच गया और वहाँ उसने लगभग एक लाख वयस्क पुरुष बंदियों को निर्दयता से काट डाला। सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तथा मल्लू इकबाल ने वहाँ 17 दिसम्बर को एक विशाल सेना की सहायता से उसका विरोध करने का प्रयत्न किया। इस सेना में दस हजार घुड़सवार, चालीस हजार पैदल सिपाही और एक सौ बीस हाथी थे, जो अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित थे। पर वे बुरी तरह पराजित हुई तथा भाग निकली-मल्लू बरन तथा महमूद गुजरात भाग गया।

दूसरे दिन तैमुर दिल्ली शहर में घुसा। कई दिनों तक वहां लूट-खसोट चलती रहती। इस भाग्यहीन नगर के बहुत से निवासियों को भयंकर तुर्की सैनिकों ने निर्दयता से कत्ल कर डाला अथवा बन्दी बना लिया। उनमें से जो थे, उनको विख्यात जुमा मस्जिद बनाने के लिए समरकन्द भेज दिया गया, जिसका ढाँचा तैमूर ने स्वयं तैयार किया था। इस प्रकार दिल्ली के सुल्तानों की राजधानी पर दुर्भाग्य छा गया।

तैमूर का भारत में रहने का इरादा नहीं था। दिल्ली में पंद्रह दिनों तक ठहरने के बाद वह फिरोजाबाद (जनवरी 1, 1399) होकर लौटा। राह में उसने मेरठ (9 जनवरी) पर धावा बोलकर उसे जीत लिया तथा और उत्तर में बढ़कर जनवरी में हरिद्वार के पार्श्व में दो हिन्दू सेनाओं को पराजित किया। शिवालिक पहाड़ी होकर बढ़ते हुए कांगड़ा पर अधिकार कर लिया (16 जनवरी), जम्मू को लूटा और इन स्थानों के निवासियों का अत्यधिक संख्या में वध किया। उसने खिजिर खां सैय्यद को मुल्तान, लाहौर एवं दीपालपुर को सरकार सौंप डी तथा 19 मार्च को पुनः सिन्धु के पार चला गया। किसी विजेता द्वारा किसी एक आक्रमण में भारत को अब तक इतना अधिक क्लेश नहीं मिला था।

इस संकटपूर्ण परिस्थिति में प्रकृति भी दिल्ली के लोगों के लिए निष्ठुर सिद्ध हुई तथा रक्तमय युद्धों एवं विनाश के द्वारा हुए उनके क्लेशों को और भी बढ़ा दिया। बदायूंनी लिखता है कि- इस समय दिल्ली में ऐसी कहर एवं महामारी हुई कि नगर पूर्णत: नष्ट हो गया तथा जो निवासी बचे वे भी मर गये और दो महीनों तक तो एक पक्षी ने भी दिल्ली में पंख नहीं फड़फड़ाया।" संक्षेप में, तैमूर ने तुगलक राज्य के विघटन को पूरा कर दिया, जिसके जीवन-रस को आन्तरिक कीड़े पहले ही सोख चुके थे। बंगाल बहुत दिनों से स्वतंत्र था। ख्वाजा जहाँ एक स्वतंत्र राज्य पर शासन कर रहा था, जिसके अधीन कन्नौज, अवध, कडा, डलमऊ, संडीला, बहराइच, बिहार एवं जौनपुर थे। गुजरात में मुजफ्फर शाह किसी के भी अधीन नहीं था। मालवा में दिलावर खाँ राजा का काम कर रहा था। पंजाब और ऊपरी सिंध पर खिजिर खाँ तैमूर के राजप्रतिनिधि के रूप में शासन कर रहा था। गालिब खाँ ने समाना में, शम्स खाँ औहदी ने बयाना में तथा मुहम्मद खाँ ने कालपी एवं महोबा में अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। दिल्ली में राजनैतिक अधिकार के दुर्बल पड़ जाने के कारण सिद्धांतशून्य सरदारों एवं साहसिकों को अधिकाधिक निम्न कोटि के षड्यंत्र रचने में प्रोत्साहन मिलने लगा, जिससे गड़बड़ी और भी बढ़ गयी। उनमें से कुछ ने नसरत शाह को, जो अब तक दोआब में छिपा था, 1399 ई. में दिल्ली पर अधिकार जमाने में सहायता दी। पर वह मल्लू इकबाल द्वारा हराया जाकर उस नगर से भगा दिया गया। 1401 ई. में दिल्ली लौटने पर मल्लू इकबाल ने सुल्तान महमूद को दिल्ली लौट आने के लिए आमंत्रित किया। गुजरात में बहुत से अवसरों पर घोर मानमर्दन का अनुभव करने के बाद महमूद ने धार में शरण ले रखी थी। मल्लू इकबाल ने सोचा कि भगोडे महमूद शाह की प्रतिष्ठा उसके लिए लाभदायक होगी। सुल्तान महमूद दिल्ली लौटा और मल्लू इकबाल के हाथों में उसके जीवन के अंत तक कठपुतली बना रहा। 12 नवम्बर 1405 ई. को मुलतान, दीपालपुर एवं ऊपरी सिंध के शासक खिज़िर खाँ से युद्ध करते समय मल्लू इकबाल की मृत्यु हो गयी। दुर्बल राजा होने के कारण महमूद अपनी पुनः प्राप्त अवस्था का उचित उपयोग नहीं कर सका। लगभग बीस वर्षों तक नाममात्र के लिए शासन करने के बाद फरवरी, 1413 ई. में कैथल में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके साथ ही ग्यासुद्दीन तुगलक द्वारा स्थापित वश का अपमानजनक रूप से अन्त हो गया।

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