राज्य की कार्यपालिका: राज्यपाल The State Executive: The Governor

साधारण संरचना

भारतीय संविधान में दोहरी सरकार की व्यवस्था है- एक केंद्र में तथा दूसरी विभिन्न राज्यों में। संविधान के भाग-VI में राज्य शासन के लिए एक समान संरचना अधिकथित की गई है। यह जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सभी राज्यों पर लागू होती है। दोनों सरकारें संसदीय प्रणाली की हैं, जिनमें एक ही स्तर पर दो तरह के कार्यपालिका प्रमुखों की व्यवस्था है। इनमें से एक नाममात्र और दूसरा वास्तविक अर्थों में कार्यपालिका प्रमुख होता है। जिस प्रकार केंद्र में नाममात्र का कार्यपालिका प्रमुख राष्ट्रपति होता है और वास्तविक अर्थों में कार्यपालिका अधिकार प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के पास होते हैं जो सामूहिक रूप से संसद के प्रति जिम्मेदार होती है। ठीक इसी तरह, राज्य स्तर पर नाममात्र का कार्यपालिका प्रमुख राज्यपाल होता है, जबकि वास्तविक अधिकार मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के पास होते हैं- जो सामूहिक रूप से राज्य विधायिका के प्रति जिम्मेदार हैं। राज्यपाल के काम करने का ढंग राज्य की राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करता है। सामान्य समय में जब राज्य में बहुमत वाली स्थायी सरकार होती है, तब राज्यपाल नाममात्र का प्रमुख होता है। लेकिन असामान्य परिस्थितियों में जब राज्य में राजनीतिक अस्थिरता रहती है तब राज्यपाल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि राज्यपाल के विशेष विवेकाधिकार होते हैं और असामान्य परिस्थितियों में वह अपने कार्यों को सही ढंग से करने के लिए इनका प्रयोग कर सकता है [अनुच्छेद 163(1)]।

राज्यपाल

संविधान के अनुसार, राज्यपाल राज्य स्तर पर संवैधानिक प्रमुख होता है। कार्यपालिका प्रमुख होने के नाते वह दोहरी भूमिका निभाता है-

  1. राज्य के प्रमुख के रूप में, तथा;
  2. केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में, जो केंद्र एवं राज्य के बीच कड़ी के रूप में काम करता है।

राज्यपाल की नियुक्ति पर संविधान सभा में विचार-विमर्श

राज्यपाल की चयन नीति को लेकर संविधान सभा में व्यापक विचार-विमर्श किया गया था और इस संबंध में अनेक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश किए गये थे। मुख्य रूप से चार विकल्पों पर विचार किया गया था-

  1. वयस्क मताधिकार के जरिए चुनाव: राज्य की जनता द्वारा सीधे राज्यपाल का चुनाव कराने का प्रस्ताव इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया था कि राज्य में सीधे जनता द्वारा चुने हुए दो शासनाध्यक्षों- राज्यपाल और मुख्यमंत्री,के होने से अनेक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। ऐसी आशंका व्यक्त की गई कि जनता द्वारा चुना हुआ राज्यपाल किसी मुद्दे पर जनता द्वारा चुने हुए मुख्यमंत्री से इस आधार पर प्रतिस्पर्द्धा कर सकता है कि उसे भी जनता का विश्वास प्राप्त है।
  2. निचले सदनके सदस्यों द्वारा चुनाव अथवा जन-प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए विधायिका के दोनों सदनों द्वारा चुनाव: राज्य विधायिका द्वारा राज्यपाल का चुनाव करने का प्रस्ताव इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया कि यदि विधायिका ने राज्यपाल का चुनाव किया तो वह बहुमत वाले दल अथवा बहुमत प्राप्त विभिन्न दलों के गठबंधन का खिलौना मात्र बनकर रह जाएगा।
  3. राज्य की विधायिका के निचले सदन द्वारा सुझाये गये एक पैनल के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा चुनाव: इस विकल्प को भी सदस्यों ने इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि यदि राष्ट्रपति को एक पैनल में से ही चुनाव करना पड़ा तो उसके चुनाव का क्षेत्र सीमित ही जायेगा।
  4. राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति: अंत में यह निर्णय लिया गया कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा पांच वर्ष के लिए की जाए। इसके अनुसार, संविधान में अनुच्छेद 155 को जोड़ा गया, जिसमें कहा गया है कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उसके हस्ताक्षर तथा मुहर लगे हस्ताक्षर द्वारा की जाती है। जिस प्रकार कनाडा में राज्यपालों की नियुक्ति गवर्नर जनरल द्वारा होती है, उसी प्रकार भारत में राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह है की भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 में यह प्रावधान है कि भारत के प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा किंतु 1956 में किए गए संशोधन के अनुसार एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है।

भारतीय संविधान के अनुसार राज्यों में राज्यपाल को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत अथवा नियुक्त किया जाता है अर्थात उसका निर्वाचन नहीं होता। संविधान द्वारा नियुक्त राज्यपाल की पद्धति का अंगीकरण करने के पीछे प्रमुखतः निम्नलिखित कारण थे-

  1. संविधान द्वारा संघर्ष एवं राज्यों हेतु स्वीकृत संसदीय शासन व्यवस्था के अंतर्गत निर्वाचित राज्यपाल की व्यवस्था सर्वथा असंगत ही सिद्ध होती। निर्वाचित प्रधान होने पर राज्यपाल और मंत्रिमण्डल में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, क्योंकि मंत्रिमण्डल भी जनता द्वारा निर्वाचित और उसका प्रतिनिधि होता है।
  2. राज्यपाल का प्रत्यक्ष निर्वाचन साधारण निर्वाचन के समय नेतृत्व की कठिन समस्या उत्पन्न कर देगा। चुनाव के समय प्रत्येक राजनीतिक दल का राज्य में एक नेता होना आवश्यक है। यह नेता कौन होगा- राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री? राज्यपाल नेता नहीं हो सकता क्योंकि संविधानतः वास्तविक सत्ताधारी मुख्यमंत्री है। राज्यपाल मुख्यमंत्री का प्रत्याशी हो, यह भी सर्वथा अनुचित ही प्रतीत होता है।
  3. आरम्भ में संविधान निर्माता शक्तिशाली राज्यों एवं निर्बल संघ के पक्ष में थे। साथ ही राज्यपाल के निर्वाचन की शक्ति राज्य की जनता अथवा राज्य विधानमण्डल के हाथों में निहित करने पर भी विचार किया गया था; किंतु देश के विभाजन और उसके कारण उत्पन्न विभिन्न के विचारों में परिवर्तन आया और उन्होंने देश की स्वतंत्रता एवं अखण्डता की रक्षार्थ राज्यों की अपेक्षा संघ की शक्तिशाली बनाने पर विचार किया। प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से राज्य की जनता द्वारा निर्वाचित राज्यपाल राज्य के प्रधान के रूप में कार्य करता, संघीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, जबकि संविधान निर्माता यह चाहते थे कि कुछ परिस्थितियों में राज्यपाल संघ के प्रतिनिधि अथवा एजेण्ट के रूप में कार्य करे। अतः इन समस्त परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल की राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की व्यवस्था की गई।
  4. राज्य की राजनीतिक स्थिति में राज्यपाल की भूमिका एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मध्यस्थ तथा निर्णायक की होती है। यदि राज्यपाल की जनता अथवा विधानमण्डल द्वारा निर्वाचित किए जाने की व्यवस्था की जाती तो सम्भवतः राज्यपाल उसी राज्य का निवासी होता और इस बात की बहुत अधिक आशंका थी कि ऐसा राज्यपाल स्वयं भी दलबंदी और गुटबंदी का शिकार हो जाता। अतः एक निर्वाचित प्रधान की अपेक्षा मनोनीत राज्यपाल की व्यवस्था का अंगीकरण संविधान निर्माताओं द्वारा उठाया गया एक सही और महत्वपूर्ण कदम था क्योंकि इससे राज्यपाल एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मध्यस्थ तथा निर्णायक की भूमिका का निर्वहन् अधिक कुशलतापूर्वक कर सकता है।

कार्यकाल

संविधान के अनुच्छेद 156 में राज्यपाल के कार्यकाल के संदर्भ में जानकारी दी गई है। आमतौर पर राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। अनुच्छेद 156(1) में यह भी व्यवस्था है कि राज्यपाल तब तक अपने पद पर बना रह सकता है, जब तक कि राष्ट्रपति की इच्छा हो। इस तरह राष्ट्रपति राज्यपाल को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित कर सकता है अथवा उसी राज्य में फिर से नियुक्त कर सकता है अथवा राष्ट्रपति उसे किसी भी समय पद से हटा सकता है। अनुच्छेद 156 (2) के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति के पास अपना त्यागपत्र भेजकर पदमुक्त हो सकता है। अनुच्छेद 156(3) के अनुसार उपर्युक्त परिस्थितियों के अतिरिक्त, राज्यपाल अपनी नियुक्ति की तिथि से पांच वर्ष तक अपने पद पर बना रह सकता है।

योग्यताएं

अनुच्छेद 157 और 158 के अनुसार राज्यपाल पद के लिए योग्यता-

  1. भारत का नागरिक हो
  2. उसने 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो
  3. संसद अथवा राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य न हो,
  4. किसी भी लाभ के पद पर न हो।

कुल मिलाकर इतने वर्षों में दो प्रथाएं प्रचलित हुई हैं- पहली, राज्यपाल नियुक्त किया जाने वाला व्यक्ति उसी राज्य से संबंधित न हो, जिसमें उसे राज्यपाल नियुक्त किया जाना है। दूसरी, राज्यपाल पद के लिए व्यक्ति की नियुक्ति के संबंध में निर्णय लेते समय राज्य के मुख्यमंत्री को विश्वास में लेना चाहिए। साधारणतः, किसी भी व्यक्ति की राज्यपाल पद पर नियुक्ति के बारे में अंतिम निर्णय लेने से पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श करता है, लेकिन अनेक उदाहरण हैं जब ऐसा नहीं किया गया। इस प्रथा का पालन विशेष रूप से उन राज्यों के मामले में नहीं किया गया, जिन राज्यों में केंद्र से पृथक् किसी अन्य दल की सरकार है।

वेतन और भत्ते

राज्यपाल को निःशुल्क सरकारी आवास उपलब्ध कराया जाता है। वह वे सभी वेतन, भत्ते तथा ऐसे विशेषाधिकारों का उपभोग करने का अधिकारी है, जो राज्यपाल (परिलब्धियां, भत्ते एवं विशेषाधिकार) अधिनियम, 1982 में विनिर्दिष्ट हैं। 1987 में संशोधन द्वारा प्रावधान किया गया कि राज्यपाल की परिलब्धियां एवं भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किए जाएंगे [अनुच्छेद 158(3)(4)]। राज्यपाल के वेतन और भत्ते राज्य की संचित निधि में से दिए जाते हैं, जिस पर राज्य के विधानमंडल को मतदान का अधिकार नहीं होता है।

न्यायिक सुविधाएं

राज्यपाल को कुछ न्यायिक सुविधाएं प्रदान की गई हैं, जो इस प्रकार हैं-

  1. वह अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के संबंध में किसी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं है;
  2. उसके कार्यकाल में उसके विरुद्ध फौजदारी अभियोग नहीं चलाया जा सकता;
  3. उसके कार्यकाल में उसे बंदी बनाने के लिए न्यायालय द्वारा आदेश जारी नहीं किया जा सकता;
  4. व्यक्ति रूप में राज्यपाल के विरुद्ध दीवानी अभियोग चलाया जा सकता है, परंतु इस उद्देश्य के लिए उसे दो मास की अग्रिम सूचना दी जानी अनिवार्य है।

राज्यपाल की शक्तियां और कार्य राज्यपाल राज्य में लगभग वे समस्त कार्य करता है जो केंद्र में राष्ट्रपति द्वारा किये जाते हैं किंतु राज्यपाल की कोई राजनयिक या सैन्य संबंधी शक्तियां नहीं हैं जैसी की राष्ट्रपति को प्राप्त हैं। राज्यपाल के अधिकारों और कर्तव्यों की चार भागों में बांटा जा सकता है- कार्यपालिका, विधायिका, वित्त तथा न्यायपालिका संबंधी शक्तियां।

कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियां

राज्यपाल राज्य सरकार का कार्यकारी प्रमुख होता है। राज्य के सभी कार्यकारी अधिकार उसके पास होते हैं; जिनका उपयोग वह प्रत्यक्षतः अथवा अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा कर सकता है। राज्य के कार्यपालिका संबंधी सभी कार्य राज्यपाल के नाम पर किए जाते हैं। वह राज्य सरकार का कामकाज सामान्य ढंग से चलाने तथा मंत्रियों में कार्यो का वितरण करने के लिए नियम बनाता है।

राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है तथा मुख्यमंत्री के परामर्श से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। राज्यपाल के पास मंत्रियों की नियुक्ति के अधिकार के साथ ही बर्खास्तगी का भी अधिकार होता है। वह मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों को बर्खास्त कर सकता है।

राज्यपाल महाधिवक्ता और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों जैसे वरिष्ठ पदाधिकारियों की भी नियुक्ति करता है। किंतु वह राज्य लोक सेवा के सदस्यों को नहीं हटा सकता। आयोग के सदस्य उच्चतम न्यायालय के प्रतिवेदन पर कुछ निरहर्ताओं के होने पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाए जा सकते हैं (अनुच्छेद 317)। राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रपति, राज्यपाल से परामर्श लेता है (अनुच्छेद-317) । राष्ट्रपति के समान ही राज्यपाल अपने राज्य की विधान सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय के सदस्यों का नाम निर्दिष्ट करता है यदि उसे यह समाधान हो जाता है कि उनका सभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। राष्ट्रपति, लोक सभा में इस शक्ति के प्रयोग से अधिक से अधिक दो सदस्य नियुक्त कर सकता है किंतु राज्यपाल द्वारा संविधान (23वें संशोधन) अधिनियम, 1969 के पश्चात् एक से अधिक सदस्य नियुक्त नहीं किए जा सकते (अनुच्छेद-388)।

जिन राज्यों में विधानमण्डल द्विसदनीय है, अर्थात् जहां विधानसभा और विधान परिषद दोनों हैं, वहां विधान परिषद के बारे में राज्यपाल को सदस्यों का नाम निर्दिष्ट करने की शक्ति उसी प्रकार है जिस प्रकार राज्यसभा की दशा में राष्ट्रपति को है। इस शक्ति का प्रयोग ऐसे व्यक्तियों के सम्बन्ध में किया जाएगा जिन्हें सहित, विज्ञान, कला, सहकारी आन्दोलन और सामाजिक सेवा के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है [अनुच्छेद 171(5)]। उल्लेखनीय है किराज्यसभा से संबंधित तत्समान सूची में सहकारी आंदोलन शामिल नहीं है। गौरतलब है कि वर्तमान समय में 6 राज्यों बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं जम्मू एवं कश्मीर में विधान परिषद मौजूद है।

विधायिका संबंधी शक्तियां

राज्यपाल ठीक उसी तरह राज्य विधायिका का एक अभिन्न अंग है जैसे कि भारत का राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग है। अनुच्छेद 174 के अनुसार, राज्यपाल को राज्य विधायिका का सत्र बुलाने, सत्रावसान करने तथा विधान सभा भंग करने का अधिकार है तथा उसे विधानमंडल का सत्र इस तरह बुलाना होता है कि दो सत्रों के बीच छह माह से अधिक का अंतर न हो।

अनुच्छेद 175 का प्रावधान है कि राज्यपाल विधायिका के किसी भी एक अथवा दोनों सदनों को संबोधित कर सकता है और दोनों सदनों को किसी लंबित विचाराधीन विधेयक अथवा अन्य विषय पर पुनर्विचार के लिए कह सकता है। चुनाव के बाद नवगठित विधान मंडल का पहला अधिवेशन और प्रत्येक नए वर्ष का पहला सत्र राज्यपाल द्वारा सम्बोधित किया जाता है।

राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने का भी अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह शक्ति उसे तभी प्राप्त होगी जब विधानमंडल या उसके दोनों सदन, सत्र में नहीं हैं। यह विवेकाधीन शक्ति नहीं है। इसका प्रयोग मंत्रियों की सलाह और सहायता से ही किया जाना चाहिए। विधानमण्डल द्वारा पारित अधिनियमों की तरह ही राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश विधान मण्डल के सत्र शुरू होने के 6 सप्ताह तक क्रियाशील रहते हैं। यदि विधानमण्डल द्वारा 5 सप्ताह के पूर्व ही राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश अस्वीकृत कर दिया जाए, तो वह अध्यादेश तत्काल ही समाप्त हो जाएगा।

राज्यपाल की अध्यादेश बनाने की शक्ति की परिधि का विस्तार, राज्यविधानमंडल की विधायी शक्ति के बराबर है और यह 7वीं अनुसूची की सूची 2 और 3 के विषयों तक ही सीमित है। यदि समवर्ती विषय से संबंधित संघ की किसी विधि से राज्यपाल के अध्यादेश का विरोध है तो इस विरोध के होते हुए भी वह अभिभावी होगा, यदि अध्यादेश राज्यपाल के निर्देशों के अनुसरण में बनाया गया है।

राज्यपाल की अध्यादेश बनाने की शक्ति की विशेषता यह है कि वह राष्ट्रपति के अनुदेश के बिना अध्यादेश नहीं बना सकता यदि-

  1. उन्हीं उपबंधों को अंतर्विष्ट करने वाले विधेयक के बिना विधान मंडल में पुरःस्थापन के लिए संविधान के अधीन राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति का विधान है,
  2. यदि उन्हीं उपबंधों को अंतर्विष्ट करने वाले विधेयक को राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना आवश्यक समझता है,
  3. उन्हीं उपबंधों को अंतर्विष्ट करने वाला राज्य विधान मंडल का अधिनियम संविधान के अधीन अविधिमान्य होगा यदि राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित किए जाने के पश्चात् उसे राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त नहीं होती (अनुच्छेद 213)।

राज्यपाल की राज्य विधान पर वीटो करने की शक्तियों पर पृथक् रूप से विचार किया गया है (देखिए आगे अध्याय 15 में)।

वित्त सम्बन्धी शक्तियां

राज्यपाल को सुनिश्चित करना पड़ता है कि राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण विधानमंडल में पेश किया जाए (अनुच्छेद-202) तथा धन विधेयक और अनुदान की मांगों को सिफारिश करने की शक्ति भी राज्यपाल को है (अनुच्छेद 207)। विधानमंडल में उसकी पूर्वानुमति के बिना कोई वित्त विधेयक पेश नहीं किया जा सकता है। अनुदान मांग अथवा कर संबंधी प्रस्ताव राज्यपाल के नाम पर मंत्रियों के अतिरिक्त और कोई पेश नहीं कर सकता।

राज्य का आकस्मिक निधि कोष राज्यपाल के अधिकार में होता है और वह इससे अग्रिम निधि निकाल सकता है, विशेषकर अचानक आने वाले ऐसे खचों के लिए जो राज्य विधानमंडल के अधिकार में होते हैं।

राष्ट्रपति एवं राज्यपाल की अध्यादेश निकालने की तुलनात्मक शक्ति

राष्ट्रपति राज्यपाल
संसद के सत्र में न होने की स्थिति में अध्यादेश निकाला जा सकता है। राज्य विधानमण्डल के सत्र में न होने की स्थिति में अध्यादेश निकाला जा सकता है।
यदि राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाए कि ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं कि जिनके निराकरण हेतु संसद के सत्र में आने की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती । यदि राज्यपाल की यह समाधान हो जाए कि ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं, जिनके निराकरण हेतु विधानमण्डल के सत्र में आने की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती।
अध्यादेश निकालने एवं उसे वापस लेने की शक्ति का प्रयोग संघीय मंत्रिपरिषद के परामर्श से किया जाता है। अध्यादेश निकालने एवं उसे वापस लेने की शक्ति का प्रयोग राज्य मंत्रिपरिषद के परामर्श से किया जाता है।
अध्यादेश जारी करने हेतु राष्ट्रपति को किसी अनुदेश की आवश्यकता नहीं होती। निम्नलिखित तीन दशाओं में राज्यपाल राष्ट्रपति से अनुदेश प्राप्त करने के पश्चात् ही अध्यादेश जारी कर सकता है, यदि- (i) उन उपबंधों को अंतर्विष्ट करने वाले विधेयक को विधानमण्डल में पुरःस्थापित किए जाने हेतु राष्ट्रपति की पूर्वानुमति की आवश्यकता होती है।(ii) राज्यपाल उन उपबंधों की अंतर्विष्ट करने वाले विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना आवश्यक समझता है। (iii) उन उपबंधों को अंतर्विष्ट करने वाला विधानमण्डल द्वारा पारित अधिनियम तब तक अविधिमान्य होता है, जब तक राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखे जाने पर उसे राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त न हो गई हो ।
अध्यादेश, संसद द्वारा पारित अधिनियम के समान ही शक्तिशाली होता है। अध्यादेश विधानमण्डल द्वारा पारित अधिनियम जितना ही शक्तिशाली होता है।
संसद के सत्र में आते ही अध्यादेश की दोनों सदनों के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया जाता है। विधानमण्डल के सत्र में आते ही अध्यादेश को उसके विचारार्थ किया जाएगा (यथास्थिति, विधानसभा अथवा दोनों सदन)।
संसद के सत्र में आने के 6 सप्ताह के पश्चात् अध्यादेश स्वयंमेव समाप्त हो जाता है। यदि संसद के दोनों सदन अध्यादेश का निरानुमोदन करते हुए संकल्प पारित कर देते हैं तो अध्यादेश 6 सप्ताह से पूर्व भी समाप्त हो जाता है। इस हेतु तात्विक तिथि निरानुमोदन के द्वितीय संकल्प की तिथि है। विधानमण्डल के सत्र में आने के 6 सप्ताह के पश्चात् अध्यादेश स्वयंमेव समाप्त हो जाता है। यदि विधानसभा अध्यादेश का निरानुमोदन करते हुए संकल्प पारित कर देती है तो अध्यादेश 6 सप्ताह से पूर्व भी समाप्त हो जाता है। विधानमण्डल के द्वि-सदनीय होने की स्थिति में निरानुमोदन सम्बन्धी संकल्प विधानसभा पारित करती है और विधान परिषद् केवल उससे सहमति प्रकट करती है। इस हेतु तात्विक तिथि विधानमण्डल का एक सदन होने पर विधानसभा द्वारा निरानुमोदन सम्बन्धी संकल्प पारित करने की तिथि है और यदि दो सदन हैं तो विधान परिषद की सहमति की तिथि है।

न्यायपालिका संबंधी शक्तियां

राज्यपाल जिला न्यायाधीशों और अन्य न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति, पदोन्नति आदि के मामले में निर्णय लेता है।

अनुच्छेद 161 का प्रावधान है कि राज्यपाल न्यायालय द्वारा दंड दिए गए किसी व्यक्ति की क्षमादान दे सकता है, उसकी सजा कम कर सकता है अथवा सजा को बदल सकता है। ऐसा विशेषतः ऐसे अपराधों के क्षेत्र में होता है, जहां राज्य के कार्यकारी अधिकारों का संबंध हो।

विवेकाधिकार संबंधी शक्तियां

संविधान में राज्यपाल के कुछ विशेष अधिकारों का भी वर्णन है, जिनका उपयोग वह विशेष परिस्थितियों में करता है। राज्यपाल के विवेकाधिकार दो तरह के होते हैं- प्रथम, संविधान में प्रत्यक्ष तौर पर लिखे हुए संवैधानिक विवेकाधिकार। दूसरे, अप्रत्यक्ष विवेकाधिकार, जो कि तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न होते हैं। इन्हें पारिस्थितिकीय विवेकाधिकार कहा जा सकता है। पहले मामले में संविधान में राज्यपाल को अपने विवेक का उपयोग करने की छूट दी गई है, जबकि दूसरे मामले में वह इनका उपयोग राज्य की राजनितिक परिस्थितिय्प्न को देखते हुए करता है।

संवैधानिक विवेकाधिकार

भारत के राष्ट्रपति के विपरीत राज्यपाल के पास कुछ विशेष विवेकाधिकार होते हैं। ऐसे विशिष्ट मामलों में उसे मंत्रिमंडल के निर्णय के आधार पर काम नहीं करना पड़ता बल्कि उसे अपने व्यक्तिगत निर्णय के आधार पर काम करना पड़ता है।

राष्ट्रपति को राज्य की स्थिति के बारे में , विशेषकर संवैधानिक संकट के बारे में रिपोर्ट भेजते समय राज्यपाल अपने विवेक पर पर कार्य करता है (अनुच्छेद 356)।

राज्य विधायिका द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ रखने का निर्णय भी राज्यपाल स्वयं ही लेता है (अनुच्छेद 200)।

केंद्र और राज्य सरकार के बीच किसी मामले पर विरोध पैदा होने पर भी राज्यपाल अपने विवेक से काम करता है।

कोई अध्यादेश जारी करते समय भी राज्यपाल को राष्ट्रपति की सलाह लेनी पड़ती है। ऐसे समय में भी वह अपने विवेक से काम लेता है।

असम और नागालैण्ड के राज्यपाल आदिवासी क्षेत्र का प्रशासन चलाने और नागा विद्रोहियों की हिंसक गतिविधियों पर नियंत्रण संबंधी मामलों पर अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं।

पारिस्थितिकीय विवेकाधिकार

राज्यपाल किसी विशेष परिस्थिति में अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है। सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल अपने मंत्रिमंडल की सलाह और सहायता से काम करता है। लेकिन असामान्य परिस्थितियों में वह राष्ट्रपति के एजेंट के रूप में काम करता है और राष्ट्रपति को राज्य की परिस्थिति के संबंध में जानकारी देता है। निम्नलिखित परिस्थितियों में राज्यपाल अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है-

  1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति,
  2. मंत्रिमंडल की बर्खास्तगी, तथा;
  3. विधान सभा भंग करना।

अतः राज्यपाल सामान्य स्थिति में संवैधानिक मुखिया तथा कुछ विशेष परिस्थितियों में विवेक शक्तियों का प्रयोग करने वाला राज्य का महत्वपूर्ण अधिकारी है।

अन्य विशिष्ट विवेकाधीन शक्तियां

संविधान में कुछ विशिष्ट उपबंध हैं, जो राज्यपाल को कुछ विशिष्ट विवेकाधीन शक्तियां प्रदान करते हैं-

छठी अनुसूची का अनुच्छेद-9(2) असम के राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वह जिला परिषदों की रॉयल्टी सुनिश्चित करे।

अनुच्छेद-239 (2) राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह किसी राज्य के राज्यपाल की सीमावर्ती केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासक भी नियुक्त कर सकता है एवं जहां ऐसे प्रशासक को नियुक्त किया जायेगा, वहां वह स्वतंत्र प्रशासक के रूप में कार्य कर सकता है तथा अपने अधिकारों का उपयोग कर सकता है।

उक्त कार्यों के अतिरिक्त, राज्यपाल के कुछ विशिष्ट उत्तरदायित्व भी होते हैं। इन जिम्मेदारियों की स्थिति में वह मंत्रिपरिषद से परामर्श कर सकता है किन्तु अंतिम निर्णय उसका स्वयं को होगा। ऐसे कार्य निम्नानुसार हैं-

अनुच्छेद-371(2) के अनुसार, राष्ट्रपति महाराष्ट्र या गुजरात के राज्यपाल को क्रमशः विदर्भ, मराठवाड़ा एवं शेष महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्र, कच्छ एवं शेष गुजरात के विकास के लिए विशिष्ट उत्तरदायित्व सौंप सकता है।

अनुच्छेद-371(क)ख के अनुसार, नागालैंड के राज्यपाल को भी विद्रोही नागाओं द्वारा कानून एवं व्यवस्था के सम्बन्ध में समस्या उत्पन्न किये जाने से संबंधित विशेष उत्तरदायित्व सोंपे गये।

अनुच्छेद-37Iग(1) के अनुसार, मणिपुर के राज्यपाल को भी पहाड़ी क्षेत्रों से निर्वाचित राज्य व्यवस्थापिका की सभाओं की समुचित कार्यवाही सुनिश्चित करने हेतु विशेष उत्तरदायित्व सौंपे गये हैं।

किसी विशिष्ट परिस्थिति या मामले पर जहां राज्यपाल अपने स्वविवेक से कोई कार्य करता है या निर्णय लेता है, उसका निर्णय अंतिम होगा। कुछ ऐसी विशिष्ट परिस्थितियों में जहां राज्यपाल का स्वविवेक से कार्य करना आवश्यक है, संभव है कि वहां राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह के बगैर भी कार्य कर सकता है, भले ही संविधान में राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के अंतर्गत उनका उल्लेख न किया गया हो। ऐसे कायों में सम्मिलित हैं-

  1. यदि किसी राज्य में सत्ताधारी सरकार राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति को बनाये रखने में असफल रही हो या वह संवैधानिक उपबंधों के अनुरूप कार्य नहीं कर रही हो, तो वह उस स्थिति में राष्ट्रपति को राज्य में अनुच्छेद-356 (राष्ट्रपति शासन) लागू करने की सिफारिश कर सकता है।
  2. अनुच्छेद-356 की उद्घोषणा के उपरांत राज्यपाल, राष्ट्रपति के अभिकर्ता (Agent) के रूप में कार्य करेगा तथा राज्य शासन के सभी कायों का नियंत्रण एवं नियमन करेगा।
  3. किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास अनुमोदन हेतु प्रेषित करने के लिये अपने पास रोक सकता है (अनुच्छेद-200)। यह आवश्यक नहीं है कि राज्यपाल हर स्थिति में राज्य मंत्रिपरिषद के निर्णयों से सहमत हो। यह स्थिति विशेषतया तब होती है, जब संबंधित राज्य में ऐसा दल शासन में हो जो केंद्र में शासन कर रहे दल से भिन्न हो।

1967 के आम चुनावों में कईराज्यों के राज्यपालोंको मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति के संबंध में अपनी विवेकाधीन शक्तियों के उपयोग का अवसर प्रदान किया था क्योंकि इन राज्यों में कोई एक राजनीतिक दल बहुमत प्राप्त करने में असफल रहा था। तब से राज्यपालों पर यह आरोप लगाया जाने कागा की राज्य व्यवस्थापिका के चुनावों के उपरांत वे सरकार बनाने के सम्बन्ध में भेदभाव करते हैं तथा किसी दल के स्पष्ट बहुमत में न होने की स्थिति में उस दल की सरकार बनाने के लिये आमंत्रित कर देते हैं, जिसे केंद्र में शासित राजनीतिक दल सत्तासीन करना चाहता है। संविधान के अनुसार, एक मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बना रह सकता है। राज्यपाल की प्रसादपर्यंतता किसी कानूनी या विधिकचुनौती के दायरे में नहीं आती है। यद्यपि किसी राज्य के राज्यपाल को यह सुनिश्चित करने का अधिकार नहीं है की कोई सरकार राज्य व्यवस्थापिका में बहुमत में है या नहीं। इसे राज्य व्यवस्थापिका पर ही छोड़ दिया जाना चाहिये।

राज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्तियों का उपयोग संविधान के संरक्षण एवं बचाव के संबंध में कर सकता है। किंतु व्यवहार में वस्तुस्थिति इससे भिन्न होती है। केंद्र सरकार कई अवसरों पर राज्यपाल के पद का दुरुपयोग करती है। एक अवसर पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करके जगदम्बिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया था। उस समय राज्यपाल की भूमिका पर टिप्पणी करते हुये प. बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कहा था, - इस संबंध में सबसे उचित यह होगा कि राज्यपाल का पद समाप्त कर दिया जाये...।

  • राज्यपाल की नियुक्ति 5 वर्ष की अवधि हेतु राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • उसे कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय एवं न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं।
  • अपनी शक्तियों का प्रयोग राज्यपाल राज्य की मंत्रिपरिषद के परामर्श से ही करता है, जबकि कुछ विषयों में वह अपने विवेक का भी प्रयोग कर सकता है।
  • असम एवं नागालैण्ड के राज्यपाल आदिवासी क्षेत्र का प्रशासन चलाने एवं नागा विद्रोहियों की हिंसक गतिविधियों पर अंकुश लगाने सम्बन्धी मामलों पर अपने विवेक का प्रयोग करते हैं।

राज्यपाल का पद अनेक अवसरों पर आलोचना का शिकार बना है, विशेष रूप से राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के संबंध में। कई लोगों का मानना है की राज्यपाल की नियुक्ति एवं उसे पदच्युत करने में जिस प्रकार की व्यवस्था अपनायी गयी है, वही समस्या की मूल जड़ है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल राज्य का प्रमुख है तथा वह राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक पद का धारक है। उसके महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व और कार्य हैं। इसलिये उसे किसी भी रूप में संविधान की व्यवस्था के विपरीत कार्य नहीं करना चाहिये तथा अपने पद की गरिमा को हानि नहीं पहुंचानी चाहिये। न तो वह भारत सरकार के निर्देशों के प्रति उत्तरदायी है एवं न ही वह अपने कर्तव्यों एवं कार्यो के निर्वहन में किसी प्रकार से बाध्य है (संवैधानिक निर्देशों से छोड़कर)। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक पद है, जिस पर भारत सरकार द्वारा किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं लगाया जा सकता है।

शांतिपूर्ण कार्य संचालन में राज्यपाल की सहायता हेतु अनेक प्रावधान हैं। किंतु राज्यपाल की कार्यप्रणाली से यह परिलक्षित होता है कि उन्हें कई कार्यों के लिये रोका जाता है तथा कई कार्य करने के लिये निर्देश दिए जाए है। इस संबंध में संविधान निर्माताओं पर दोषारोपण करना उचित नहीं होगा क्योंकि इस पद के संबंध में भविष्य में इस तरह की समस्यायें सामने आयेंगी, इसका उन्हें भान नहीं था। किंतु इस संबंध में संविधान की मूल भावना एवं राज्यपाल की स्थिति को अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिये। उचित तो यह होगा कि पार्टी लाइन के आधार पर राज्यपाल को मनोनीत करने की बजाय अनुभवी उत्तम चरित्र वाले व्यक्ति को, जिसमें कुशल प्रशासकीय क्षमता हो, इस पद पर नियुक्त किया जाये ।

राज्यपाल की स्थिति: संवैधानिक एवं वास्तविक

भारत में संसदीय प्रणाली की सरकार है जहां वास्तविक अधिकार मंत्रिमंडल के पास होते हैं। संविधान में राज्यपाल की अनेक अधिकार दिए गए हैं लेकिन वह इन सभी अधिकारों का उपयोग केवल मुख्यमंत्री की सलाह पर ही कर सकता है। इसका अपवाद केवल वे क्षेत्र होते हैं, जहां राज्यपाल अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है। सिद्धांततः अधिकारों की दृष्टि से राज्यपाल का पद बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन यथार्थतः इन सबका उपयोग मंत्रियों द्वारा किया जाता है। राज्यपाल को वास्तव में बहुत अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं लेकिन यह गरिमा तथा सम्मान का पद है। सामान्य परिस्थितियों में यही वस्तुस्थिति होती है, परंतु असामान्य परिस्थितियों में यह स्थिति बदल जाती है।

राज्यपाल की स्थिति के संबंध में यदि संविधान के विभिन्न उपबंधों का अवलोकन करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि संविधान निर्माताओं ने राज्य प्रशासन संबंधी महत्वपूर्ण शक्तियां राज्यपाल को ही सौंपी हैं। राज्य का शासन राज्यपाल के नाम पर ही चलाया जाता है और राज्य के महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा ही की जाती है। वह राज्य विधान मंडल का अधिवेशन बुलाता है और राज्य की विधान सभा को निश्चित अवधि से पूर्व भंग भी कर सकता है। राज्य विधान मंडल द्वारा पारित गया किया कोई भी विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के बिना कानून का रूप धारण नहीं कर सकता।

जब राज्य विधान मण्डल का अधिवेशन न हो रहा हो तब राज्यपाल अध्यादेश भी जारी कर सकता है। वित्त विधेयक राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के बिना राज्य विधान सभा में पेश नहीं किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 163 में मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गई है, वह मंत्रिपरिषद भी संविधान के इस अनुच्छेद द्वारा एक परामर्शदात्री संस्था-सी प्रतीत होती है। कुल मिलाकर, संविधान के उपबंधों के अनुसार राज्यपाल की राज्य के प्रशासन संबंधी कार्यकारी, संवैधानिक, न्यायिक और वित्तीय क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण शक्तियां प्राप्त हैं।

राज्य के प्रशासन में राज्यपाल की वही स्थिति है जो केंद्र में राष्ट्रपति की है। संविधान के अनुसार राज्यपाल की अनन्त शक्तियां प्रदान की गई हैं और उसके परामर्श के लिए एक मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गई है। संविधान में राज्यपाल के लिए मंत्रिपरिषद का परामर्श मानने संबंधी कोई विशेष धारा अंकित नहीं की गई है परंतु केंद्र की भांति संसदीय शासन प्रणाली होने के कारण उन सभी परम्पराओं को कार्यान्वित करना आवश्यक है जो परम्पराएं इंग्लैण्ड में प्रचलित हैं, क्योंकि संसदीय शासन प्रणाली का आदर्श इंग्लैण्ड की शासन प्रणाली के ढांचे से लिया गया है। राज्यपाल सभी शक्तियों कैो प्रयोग मंत्रिमंडल के परामर्श के अनुसार करता है क्योंकि राज्यपाल राज्य का वास्तविक शासक नहीं, बल्कि वह एक संवैधानिक प्रधान है। संविधान निर्माताओं ने संविधान सभा में राज्यपाल की नियुक्ति जनता के चुनाव द्वारा या विधान सभा द्वारा नियुक्त पैनल द्वारा कराने के सुझावों को रद्द कर कनाडा की प्रथा को इसलिए ग्रहण किया था ताकि राज्यपाल संवैधानिक मुखिया के रूप में कार्य कर सके। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने राज्यपाल की स्थिति का वर्णन करते हुए संवैधानिक सभा में कहा था कि, - राज्यपाल की शक्तियां बहुत सीमित और नाममात्र की हैं तथा उसकी स्थिति बहुत दिखावे वाली होगी। वह कोई भी कार्य अपनी इच्छा या व्यक्तिगत निर्णयानुसार नहीं कर सकेगा।

राज्यपाल के संवैधानिक मुखिया होने का अर्थ यह नहीं है कि उसका पद सर्वथा महत्वहीन है। राज्यपाल को कुछ विशेष परिस्थितियों में अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिमंडल के परामर्श के बिना स्वेच्छा से करने का अधिकार भी दिया गया है। ऐसी शक्तियों को विवेकाधिकार कहते हैं। ये शक्तियां राज्यपाल की वास्तविक स्थिति को बहुत अधिक शक्तिशाली बनाती हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में राज्यपाल का पद काफी विवादस्पद हो गया है। संविधान निर्माताओं द्वारा मूल रूप से की गई इस पद की कल्पना और पिछले पचास वर्षों में इसके कार्यान्वयन में भारी अंतर आया है। 1967 के आम चुनावों के बाद जब विभिन्न राज्यों में केंद्र से पृथक् पार्टी की सरकार बनी तब से यह पद चर्चा का विषय बना। उसी समय से एक जैसी राजनीतिक परिस्थितियों में ही राज्यपालों द्वारा भिन्न-भिन्न निर्णय लिये जाने के कारण केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव शुरू हुआ। राज्य सरकारों ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए राज्यपाल पद का दुरुपयोग किया। 1980 के दशक में यह पद इतना विवादित रहा कि कुछ राजनीतिक दलों ने इस पद को पूरी तरह समाप्त करने की ही मांग कर डाली। इन घटनाओं ने इस पद की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचायी।

इसी विवाद को कम करने के और राज्य-केंद्र संबंधों को मधुर बनाने के लिए राज्यपाल के कामकाज में परिवर्तन के कई सुझाव दिए गए। उदाहरण के लिए, राजमन्नार समिति (1970 में तमिलनाडु में द्रमुक मंत्रिमंडल द्वारा गठित) ने सुझाव दिया कि-

  1. राज्यपाल की नियुक्ति, संबंधित राज्य सरकार से विचार-विमर्श के बाद ही की जाए, और;
  2. राष्ट्रपति राज्यपालों को यह दिशा-निर्देश दें कि वे एक जैसी राजनीतिक परिस्थितियों में एक जैसा ही निर्णय लें ताकि उनके विवेकाधिकार का उपयोग कम हो सके।

इसी तरह, केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रशासनिक सुधार आयोग (1969) ने सुझाव दिया कि राष्ट्रपति राज्यपालों को सही दिशा-निर्देश जारी करें। 1988 में श्रीनगर में हुए विपक्षी दलों के सम्मेलन में यह सुझाव दिया गया कि संबंधित राज्य सरकार से विचार-विमर्श के बाद ही राज्यपाल की नियुक्ति के बारे में निर्णय लिया जाए और इस उद्देश्य के लिए राज्य सरकार राष्ट्रपति को विभिन्न व्यक्तियों के नामों की एक सूची दे।

अंततः केंद्र-राज्य संबंधों की गहन समीक्षा के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 1988 में सरकारिया आयोग का गठन किया ताकि आयोग इन संबंधों को अधिक सार्थक एवं रचनात्मक बनाने के लिए सुझाव दे। सरकारिया आयोग ने राज्यपाल पद के लिए सुझाव दिया कि-

  1. राज्यपाल की नियुक्ति संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श के बाद ही की जाए,
  2. केवल ऐसे व्यक्ति राज्यपाल बनाये जाएं जो अपनी निष्ठा के लिए पहचाने जाते हो और जो स्थानीय राजनीति में बहुत सक्रिय न हो, तथा;
  3. यदि किसी मंत्रिमंडल के बहुमत में होने का संदेह हो तो इसे स्पष्ट करने के लिए सही स्थान विधान सभा है लेकिन राज्य का मुख्यमंत्री जन-बुझकर यदि इसे टाल रहा हो, तो राज्यपाल स्वयं पहल कर इस मामले को हल कर सकता है।

अतः यदि सरकारिया आयोग द्वारा दिए गए सुझावों को कार्यान्वित कर लिया जाता है तो राज्यपाल के पद को लेकर पैदा हुआ विवाद काफी हद तक कम किया जा सकता है। संविधान में परिवर्तन की बजाय विशेष परम्पराएं कायम करने से स्थिति ज्यादा बेहतर हो सकेगी। केंद्र और राज्य दोनों की ही राज्यपाल को किसी तरह के दबाव के बिना काम करने का अवसर देना चाहिए।

राज्यपाल पर सरकारिया आयोग

केंद्र-राज्य संबंधों के परिप्रेक्ष्य में गठित सरकारिया आयोग, जिसने अपना प्रतिवेदन 1988 में सरकार को प्रेषित किया था, ने राज्यपाल की भूमिका को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों पर विस्तृत रूप से विचार किया था तथा इस संबंध में अनेक सिफारिशें प्रस्तुत की थीं।

आयोग ने यह सुझाव दिया था कि, यदि किसी व्यक्तिको राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया जाता है, तो उसके संबंध में निम्नलिखित मापदण्ड अपनाये जाने चाहिये-

  1. वह समाज का ख्यातिलब्ध व्यक्ति हो;
  2. वह राज्य से बाहर का व्यक्ति हो;
  3. वह राज्य की स्थानीय राजनीति से घनिष्ठता से न जुड़ा हो, एवं;
  4. पिछले कुछ समय में उसने सक्रिय राजनीति में भाग न लिया हो।

केंद्र में सत्ताधारी दल से संबंधित राजनीतिक व्यक्तियों को उन राज्यों में राज्यपाल नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए, जहां भिन्न राजनीतिक दल सत्ता में हीं। राज्यपाल की नियुक्ति केवल संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श के पश्चात् ही की जानी चाहिये। किसी राज्यपाल का चयन करते समय राष्ट्रपति उप-राष्ट्रपति एवं लोकसभा अध्यक्ष से भी विचार-विमर्श कर सकते हैं।

राज्यपाल के पांच वर्ष के कार्यकाल को बाधित नहीं किया जाना चाहिये। यदि किसी विशेष कारणवश राज्यपाल की उसके पद से हटाया जाता है तो इस सबंध में राष्ट्रपति को स्पष्टीकरण देना चाहिये। अपने पद को छोड़ने के उपरांत राज्यपाल को सक्रिय राजनीति में वापस नहीं लौटना चाहिये।

राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के संबंध में, सरकारिया आयोग ने निम्नलिखित अनुशंसाएं की थीं-

  1. राज्य में एक सरकार की स्थापना के समय राज्यपाल की दो प्रमुख सिद्धांतों का अनुपालन अवश्य करना चाहिये-
  • राज्य में सरकार बनाने के लिये उसी व्यक्ति को आमंत्रित करना चाहिये, जो राज्य विधानसभा में सबसे अधिक सीटें प्राप्त करने वाले दल का नेता हो या गठबंधन की स्थिति में जिसे सर्वाधिक विधायकों का समर्थन प्राप्त हो, एवं;
  • राज्यपाल का कार्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य में प्रशासनिक कार्य निर्बाध गति से लोक कल्याणकारी प्रवृत्ति के साथ संचालित हों तथा वह स्वयं राज्य की राजनीति में लिप्त न हो जाये।
  1. नव-नियुक्त मुख्यमंत्री को विधानसभा में अपना बहुमत सिद्ध करने या विश्वास मत हासिल करने के लिये 30 से 60 दिन का समय अवश्य दिया जाये। राज्यपाल को सरकार द्वारा बहुमत खो देने के संबंध में कोई अनुचित कदम नहीं उठाने चाहिये। बहुमत का परीक्षण विधानसभा में ही किया जाना चाहिये अन्यत्र नहीं।
  2. मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने का निर्णय लेते समय, राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री को यह परामर्श दिया जाना चाहिये कि वह यथासंभव शीघ्रताशीघ्र विधानसभा की बैठक आहूत करे। यदि मुख्यमंत्री ऐसा नहीं करतातो राज्यपाल को स्वयंसभा की बैठक बुलाकर मंत्रिमंडल का बहुमत ज्ञात करना चाहिये।
  3. जब तक सरकार को विधानसभा में बहुमत प्राप्त है। विधानसभा की बैठक बुलाने, उसे संचालित करने एवं उसे भंग करने के सम्बन्ध में सरकारका परामर्श राज्यपाल पर वाध्यकारी होना चाहिये. यदि यह परामर्श असंवैधानिक न हो। विधानसभा को भंग करने के संबंध में, यदि मुख्यमंत्री को सदन का विश्वास मत प्राप्त हैं तो, राज्यपाल को मुख्यमंत्री से अवश्य परामर्श करना चाहिये।
  4. अनुच्छेद-356 का प्रयोग अत्यंत सावधानीपूर्वक एवं अंतिम हथियार के रूप में करना चाहिये। इसका प्रयोग तभी किया जाना चाहिये, जब अन्य सभी विकल्प समाप्त हो गये हो, राज्य में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति अत्यंत चिंताजनक ही, राज्य सरकार संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में बुरी तरह असफल रही हो तथा इस अनुच्छेद का प्रयोग अपरिहार्य हो गया हो। आगे आयोग यह अनुशंसा करता है कि, -यदि राज्य सरकार की मात्र कुशासन के आधार पर बर्खास्त किया जाता है, तो यह पूर्णतया अनुचित है।
  5. अनुच्छेद-200 के तहत अपने कार्यों के निर्वहन में सामान्यतः राज्यपाल मंत्रिमंडल का परामर्श मानने हेतु बाध्य नहीं है। यद्यपि वह अपने स्वविवेक का उपयोग उस स्थिति में कर सकता है, जब विधायिका अपने क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण कर रही हो। राष्ट्रपति हेतु सुरिक्षत रखे गये विधेयक उसे चार माह की समयावधि के भीतर राष्ट्रपति को भेज दिये जाने चाहिये।

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