राज्य की कार्यपालिका: राज्य विधानमंडल The State Executive: State Legislature

संरचना

संविधान के अनुच्छेद 168 (अध्याय-III) के अंतर्गत प्रत्येक राज्य हेतु एक विधानमण्डल की व्यवस्था की गई है। इसी अनुच्छेद के अनुसार राज्य विधान मंडल में राज्यपाल के अतिरिक्त विधान मंडल के एक या दोनों सदन शामिल हैं। इसी अनुच्छेद के अनुसार बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में द्वि-सदनीय विधान मंडल और शेष राज्यों में एक सदनीय विधान मंडल की व्यवस्था है। जम्मू-कश्मीर राज्य में भी विधान परिषद है परंतु इसकी व्यवस्था भारतीय संविधान द्वारा नहीं, जम्मू-कश्मीर राज्य के अपने संविधान द्वारा की गई है। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जम्मू-कश्मीर का अपना एक पृथक् संविधान है। जिन राज्यों में दो सदन हैं वहां एक की विधान सभा तथा दूसरे को विधान परिषद कहते हैं। जिन राज्यों में एक सदन है उसका नाम विधान सभा है।

विधान परिषद्

संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार, किसी राज्य की विधान परिषद के एक-तिहाई से अधिक और किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं हो सकती। भारतीय संसद कानून द्वारा विधान परिषद की रचना के संबंध में संशोधन कर सकती है।

राज्य विधान परिषद के कुल सदस्यों में से-

  • \frac { 1 }{ 3 } सदस्य, स्थानीय संस्थाओं के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। इन स्थानीय संस्थाओं में नगरपालिका, जिला बोर्ड और राज्य की अन्य संस्थाएं सम्मिलित हैं जो संसद कानून द्वारा निश्चित करती है।
  • \frac { 1 }{ 12 } सदस्य राज्य के ऐसे स्नातक मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं जिनको भारत के किसी विश्वविद्यालय से कम-से-कम तीन वर्ष पहले डिग्री मिल चुकी हो।
  • \frac { 1 }{ 12 } सदस्य राज्य के हायर सैकेण्डरी या इससे उच्च शिक्षा संस्थाओं में काम कर रहे ऐसे अध्यापकों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं, जो गत तीन वर्षों से वहां पढ़ा रहे हों।
  • \frac { 1 }{ 3 } सदस्य संबंधित राज्य विधान सभा के सदस्यों द्वारा उन व्यक्तियों में से निर्वाचित किए जाते हैं जो राज्य विधान सभा के सदस्य नहीं हैं।
  • शेष \frac { 1 }{ 6 } सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाते हैं। राज्यपाल केवल उ व्यक्तियों को मनोनीत करता है, जिनको विज्ञान, कला, साहित्य, सहकारिता आंदोलन या समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव हो।

विधान परिषद का सृजन एवं उत्सादन

बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर राज्यों को छोड़कर शेष राज्यों में विधानमण्डल एक सदनीय है अर्थात् यह केवल विधान सभा से मिलकर बनता है। संवैधानिक उपबंधों के अनुसार जिन राज्यों में विधान परिषद नहीं है वहां उसका सृजन और जिन राज्यों में यह विद्यमान है वहां इसका उत्सादन भी किया जा सकता है। ऐसा संविधान में संशोधन किए बिना एक साधारण प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है। संविधान में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार, विधान परिषद के सृजन अथवा उत्सादन हेतु सम्बन्धित राज्य की विधान सभा द्वारा एक विशेष बहुमत (कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों की संख्या का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत) द्वारा एक संकल्प पारित किया जाएगा, जिसके अनुकरण में संघीय संसद द्वारा एक अधिनियम बनाया जाएगा (अनुच्छेद-169)। इस उपबंध द्वारा यह उपाय किया गया कि प्रत्येक राज्य अपनी इच्छानुसार चाहे तो दूसरा सदन रखे या न रखे। इस उपबंध का लाभ उठाते हुए आंध्र प्रदेश ने 1957 में विधान परिषद का सृजन एवं 1985 में उसका उत्सादन कर दिया। दूसरी ओर, पंजाब, पश्चिम बंगाल एवं तमिलनाडु ने भी इसी प्रक्रिया का अनुसरण करके अपने यहां विधान परिषद का उत्सादन कर दिया। आांध्र प्रदेश विधान परिषद अधिनियम, 2005 पारित कर 1 नवम्बर, 2006 से आांध्र प्रदेश में पुनः विधान परिषद का सृजन कर दिया गया। 90 सदस्यीय परिषद में 8 सदस्य विधान सभा सदस्यों  द्वारा, 31 स्थानीय संवैधानिक निकायों द्वारा, 8 स्नातक संसदीय क्षेत्रों द्वारा एवं 8 अध्यापन संसदीय क्षेत्रों में चुने जाएंगे तथा 12 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाएंगे।


खुली मतदान व्यवस्था
संसद द्वारा जनप्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम 2003 पारित कर, 28 अगस्त, 2003 को, विधान परिषदों के लिए विधानसभा से चुने जाने वाले प्रतिनिधियों के लिए खुली मतदान व्यवस्था का प्रावधान किया है। इस संशोधन के माध्यम से राज्य विधान परिषद का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को सम्बंधित राज्य का मतदाता होने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है।

राज्य में द्वितीय सदन की उपयोगिता

यह स्पष्ट है कि विधान परिषद की स्थिति विधान सभा की अपेक्षा कम महत्व की है। इसका महत्व इतना कम है कि इसका अस्तित्व व्यर्थ जान पड़ता है।

  1. विधान परिषद की संरचना ही उसे निर्बल बनाती है। परिषद भागतः निर्वाचित और भागतः नामनिर्दिष्ट होती है तथा विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करती है।
  2. इसकी विद्यमानता विधानसभा की इच्छा पर निर्भर होती है द्वितीय सदन के उत्सादन के लिए संकल्प पारित कर सकती है।
  3. मंत्रिपरिषद केवल विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
  4. विधान परिषद धन विधेयक को न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही उसमें कोई संशोधन कर सकती है। वह उस विधेयक को 14 दिन की अवधि तक के लिए रोक सकती है या उसमें संशोधनों की सिफारिश करती है।
  5. सामान्य विधान के संबंध में (अर्थात् धन विधेयक से भिन्न विधेयकों के संबंध में) भी विधान परिषद की स्थिति विधान सभा के नीचे है। वह विधान सभा में प्रारंभ होने वाले विधेयक के पारित होने में अधिक से अधिक चार मास का विलंब (दो यात्राओं में) कर सकती है और असहमति की दशा में विधान सभा की ही बात मानी जाएगी।

परिषद में प्रारंभ होने वाले विधेयक की दशा में विधान सभा की यह शक्ति है कि वह उस विधेयक को अस्वीकार करके उसे तुरंत समाप्त कर दें।

इस प्रकार यह दिखाई देता है कि राज्य में द्वितीय सदन संघ की संसद के द्वितीय सदन में समान पुनरीक्षण करने वाला निकाय नहीं है जो अपनी विसम्मति द्वारा गतिरोध उत्पन्न करके विधेयक के पारित होने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक करना अनिवार्य क रदे [धन विधेयक से भिन्न विधेयकों की दशा में]। यह सब होते हुए भी अप्रत्यक्ष निर्वाचन और विशेष ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों के नाम-निर्देशन से विधान परिषद की संरचना होने के कारण परिषद में अधिक मेधावी व्यक्ति होते हैं और अपनी विलंबकारी शक्ति से भी वह जल्दी में विधान बनाने की प्रवृति पर रोक लगाती है जिससे बिना विचारे लाए गए विधेयकों की कमियां या दोष सामने आ जाते हैं।

  • वर्तमान में बिहार, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में द्वि-सदनीय विधानमण्डल है, जबकि अन्य राज्यों में एक सदनीय विधानमण्डल है।
  • विधानमण्डल के निचले सदन को विधान सभा तथा उच्च सदन की विधान परिधद कहा जाता है।
  • विधान सभा की अधिकतम सदस्य संख्या 500 और न्यूनतम 60 हो सकती है, जबकि विधान परिषद के सदस्यों की संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक और किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं हो सकती।
  • मध्य प्रदेश में विधान परिषद की व्यवस्था होते हुए भी वहां अभी तक विधान परिषद नहीं बनी है।

 विधान सभा

राज्य विधानमण्डल के निचले सदन की विधानसभा कहा जाता है। यह जनता का सदन है, जहां राज्य की जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि आते हैं। संविधान के अनुच्छेद-170 के अनुसार, अनुच्छेद-333 से अधिक 500 और कम से कम 60 सदस्य हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश में विधान सभा सदस्यों की संख्या 403 है, जबकि सिक्किम में सदस्यों की संख्या केवल 32 है। राज्य विधान सभा की सदस्य संख्या राज्य की जनसंख्या के आधार पर निश्चित की जाती है। अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों की संख्या निश्चित करते समय जनसँख्या के वे आंकड़े लिए जाते हैं जो पिछली जनगणना में प्रकाशित किए गए थे। भारत में जनगणना प्रत्येक दस वर्ष के पश्चात् होती है। प्रत्येक जनगणना के पश्चात् परिसीमन आयोग नियुक्त किया जाता है। यह आयोग जनसंख्या के नये आंकड़ों के अनुसार चुनाव क्षेत्रों का नये रूप में विभाजन करता है [अनुच्छेद 170 (c)] ।

भारतीय संविधान के 42वें संशोधन द्वारा यह व्यवस्था की गई है कि वर्ष 2000 के पश्चात् होने वाली प्रथम जनगणना तक प्रत्येक राज्य के चुनाव क्षेत्रों के विभाजन के लिए वही आंकड़े प्रामाणिक होंगे जो 1971 की जनगणना के अनुसार निश्चित और प्रमाणित होंगे। इसी प्रकार विधान सभाओं में जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों के लिए स्थान आरक्षित करने के लिए भी 2000 के पश्चात् होने वाली पहली जनगणना तक वही आंकड़े लिए जायेंगे जो 1971 की जनगणना के अनुसार निश्चित और प्रकाशित हो चुके हैं। हाल ही में संसद के पूर्ण बहुमत से पारित एक प्रस्ताव के अनुसार वर्ष 2026 तक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा, उनकी जनसंख्या तथा उनके आरक्षण से संबंधित उपबंध 1971 की जनगणना के अनुसार ही लागू होगे।

यदि किसी राज्य के चुनाव में एंग्लो-इंडियन जाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है तो राज्यपाल स्वेच्छा से उस जाति की प्रतिनिधित्व देने के लिए उस जाति के एक सदस्य को विधान सभा में मनोनीत कर सकता है। लोक सभा में भी एंग्लो-इंडियन जाति के सदस्य मनोनीत करने का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है। लोक सभा में अधिक-से-अधिक एंग्लो-इंडियन के दो सदस्य मनोनीत किए जा सकते हैं, परंतु राज्य के राज्यपाल को केवल एक ही सदस्य मनोनीत करने का अधिकार है।

कार्यकाल

संविधान के अनुच्छेद 172 के अनुसार, राज्य विधान सभा का कार्यकाल पांच वर्ष निश्चित किया गया है। इस निश्चित समय से पहले भी राज्यपाल विधान सभा को भंग कर सकता है। आपातकालीन स्थिति में संघीय संसद कानून बनाकर किसी राज्य विधान सभा की अवधि अधिक-से-अधिक एक समय में एक वर्ष बढ़ा सकती है। आपात् स्थिति की समाप्ति के पश्चात् यह बढ़ाई हुई अवधि केवल 6 मास तक लागू रह सकती है।

विधान परिषद एक स्थायी सदन होता है और राज्यपाल इसकी भंग नहीं कर सकता है। संविधान के अनुच्छेद 172 के अनुसार, विधान परिषद का चुनाव एक ही, समय नहीं होता, बल्कि हर दो वर्ष पश्चात् इसके एक-तिहाई सदस्य (⅓) अवकाश ग्रहण करते हैं और उनके स्थान पर नये सदस्य चुन लिये जाते हैं। अतः विधान परिषद का हर सदस्य छः साल तक अपने पद पर आसीन रहता है।

सदस्यों की योग्यताएं संविधान के अनुच्छेद 173 के अनुसार विधान मंडल के सदस्यों की निम्नलिखित योग्यताएं निश्चित की गई हैं

  1. प्रत्याशी भारत का नागरिक हो,
  2. विधान सभा के लिए उसकी आयु 25 वर्ष या उससे अधिक तथा विधान परिषद के लिए उसकी आयु 30 वर्ष या उससे अधिक हो।
  3. वह संसद द्वारा निश्चित सभी योग्यताएं रखता हो।
  4. वह किसी न्यायालय द्वारा पागल घोषित न किया गया हो।
  5. वह दिवालिया न हो।
  6. वह संसद द्वारा बनाये गये किसी कानून के अनुसार विधान सभा के लिए अयोग्य न हो।

इन योग्यताओं के अतिरिक्त कोई भी व्यक्ति विधान मंडल के दोनों सदनों का सदस्य एक साथ नहीं रह सकता और न ही एक से अधिक राज्यों की विधान मंडलों का सदस्य बन सकता है। चुनाव के पश्चात् कोई भी सदस्य सदन की अनुमति के बिना लगातार 60 दिन सदन के अधिवेशन से अनुपस्थित नहीं रह सकता।

साथ ही विधान सभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए आवश्यक है कि सम्बद्ध व्यक्ति जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की शर्तों को पूरा करता हो। 1988 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया और ऐसी व्यवस्था की गयी है की आतंकवादी गतिविधियों, तस्करी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी, खाद्य-पदार्थों तथा दवाओं में मिलावट करने वाले, विदेशी मुद्रा अधिनियम का उल्लंघन करने वाले और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार करने व्यक्तियों को इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार चुनाव में भाग लेने से वर्जित कर दिया जाएगा।

संविधान के अनुच्छेद 191 में अधिकथित विधान मंडल की सदस्यता के निर्हरताएं उसी प्रकार की हैं, जैसी की संसद के किसी सदन की सदस्यता के संबंध में अनुच्छेद 102 में दी गई हैं।

अनुच्छेद 192 में यह अधिकथित है कि यदि यह प्रश्न उपस्थित होता है कि किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 191 के खंड में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है तो यह प्रश्न राज्यपाल के विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा। राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करेगा। उसका विनिश्चय अंतिम होगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकेगा।

राज्य विधानमंडल के अधिकारी

विधान सभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष

संविधान के अनुच्छेद 178 के अनुसार, विधान सभा के सदस्य अपने में से किसी एक सदस्य को अध्यक्ष तथा एक अन्य को उपाध्यक्ष के पद के लिए चुन लेते हैं। इन दोनों पदों में जब कोई पद रिक्त हो जाता है तो विधान सभा के किसी अन्य सदस्य को उस पद के लिए चुन लेते हैं। विधान सभा अध्यक्ष का पद अत्यंत महत्वपूर्ण एवं प्रतिष्ठित माना गया है। वह सदन की मर्यादा एवं सदस्यों के विशेषाधिकारों का संरक्षक है। विधान सभा अध्यक्ष वही कार्य करता है, जो लोक सभा अध्यक्ष करता है।

कार्यकाल: अध्यक्ष को विधान सभा के कार्यकाल तक अर्थात् 5 वर्षों के लिए निर्वाचित किया जाता है। विधान सभा भंग होने पर उसे अपना पड़ त्यागना नहीं पड़ता, बल्कि वह नव-निर्वाचित विधान सभा के प्रथम अधिवेशन होने तक अपने पद पर बना रहता है (अनुच्छेद 179)। परंतु इस अवधि के समाप्त होने से पूर्व भी उसे निम्नलिखित कारणों के आधार पर अपदस्थ किया जा सकता है-

  1. यदि अध्यक्ष विधान सभा का सदस्य न रहे तो उसे अपना पद त्यागना पड़ेगा,
  2. वह स्वेच्छापूर्वक अपने पद से त्यागपत्र दे सकता है, तथा;
  3. विधान सभा के तत्कालीन सदस्यों के बहुमत के प्रस्तावों प्रस्तुत करने से पूर्व अध्यक्ष को 14 दिन पूर्व सूचना देना अनिवार्य है। जब अध्यक्ष के विरुद्ध प्रस्ताव प्रस्तुत हो तो अध्यक्ष उस बैठक की अध्यक्षता नहीं करता है। किन्तु अध्यक्ष को उस प्रस्ताव के सम्बन्ध में बहस में भाग लेने तथा मत देने का पूर्ण अधिकार होता है। सामान्यतः अध्यक्ष, विधान सभा के अधिवेशनों की अध्यक्षता करता है परंतु जब किसी कारण से अध्यक्ष उपस्थित न हो तब उसके स्थान पर उपाध्यक्ष अधिवेशनों की अध्यक्षता करता है। जब उपाध्यक्ष अध्यक्ष के पद पर होता है, उस समय उसे अध्यक्ष की सभी शक्तियां प्राप्त होती हैं।

विधान परिषद का सभापति एवं उपसभापति

संविधान का अनुच्छेद 182 से 185 तक विधान परिषद के सभापति एवं उपसभापति से सम्बंधित है। इसके अंतर्गत परिषद् वाले प्रत्येक राज्य की विधान परिषद, यथाशीघ्र, अपने दो सदस्यों को अपना सभापति और उपसभापति चुनेगी। जब-जब सभापति या उपसभापति का पद रिक्त होता है, तब-तब परिषद किसी अन्य सदस्य को, यथास्थिति, सभापति या उपसभापति चुनेगी। जब सभापति का पद रिक्त है तब उपसभापति, या यदि उपसभापति का पद भी रिक्त हे तो विधान परिषद का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा।

विधान परिषद की किसी बैठक में, जब सभापति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब सभापति, या जब उपसभापति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उपसभापति, उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा। लेकिन उसे विधान परिषद में बोलने उसकी कार्यवाहियों में भाग लेने एवं अन्य विषय पर प्रथमतः मत देने का अधिकार होगा, किंतु मत बराबर होने की दशा में मत देने का अधिकार नहीं होगा। (अनुच्छेद 185)।

  • विधान सभा के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से ही किया जाता है (अनुच्छेद-178) ।
  • विधान सभा का अध्यक्ष उन्हीं कृत्यों का निर्वहन करता है, जो लोक सभा का अध्यक्ष करता है।

 वेतन और भत्ते

विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को तथा विधान परिषद के सभापति और उपसभापति को ऐसे वेतन और भत्तों का जो राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा नियत करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतन और भत्तों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, संदाय किया जाएगा [अनुच्छेद (186)]।

कार्य संचालन

राज्य की विधान सभा या विधान परिषद का प्रत्येक सदस्य अपना स्थान ग्रहण करने से पहले, राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा (अनुच्छेद-188)।

राज्य के विधान मंडल के किसी सदन की बैठक में सभी प्रश्नों का अवधारण अध्यक्ष या सभापति को अथवा उस रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति को छोड़कर, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा। अध्यक्ष या सभापति अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति प्रथमतः मत नहीं देगा, किंतु मत बराबर होने की दशा में उसका निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा।

विधानमण्डल के किसी सदन का अधिवेशन गठित करने हेतु गणपूर्ति दस सदस्य अथवा सदन की कुल संख्या का दसवां भाग, इनमें से जो भी अधिक हो, होगी।

जब तक राज्य का विधान मंडल विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक राज्य के विधान मंडल के किसी सदन का अधिवेशन गठित करने के लिए गणपूर्ति दस सदस्य या सदन की कुल संख्या का दसवां भाग, इसमें से जो भी अधिक हो, होगी। यदि राज्य की विधान सभा या विधान परिषद के अधिवेशन में किसी समय गणपूर्ति नहीं है तो अध्यक्ष या सभापति अथवा उस रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य होगा कि वह सदन को स्थगित कर दे या अधिवेशन को तब तक के लिए निलंबित कर दे जब तक गणपूर्ति नहीं हो जाती है - (अनुच्छेद 189) ।

विधायी प्रक्रिया

द्विसदनीय विधान मंडल वाले राज्यों की विधायी प्रक्रिया मुख्य रूप से संसद के समान है। कुछ बातों में अंतर है-

धन विधेयक

धन विधेयक केवल विधान सभा में प्रस्तुत किया जाता है, विधान परिषद में नहीं। विधान परिषद को केवल यह शक्ति है कि वह विधान सभा को संशोधनों की सिफारिश करे या विधेयक के प्राप्त होने की तारीख से 14 दिन की अवधि के लिए विधेयक को अपने पास रोक रखे। प्रत्येक दशा में विधान सभा की इच्छा अभिभावी होगी। विधान सभा विधान परिषद की सिफारिशों को स्वीकार करने के लिए आबद्ध नहीं है। कुल मिलाकर धन विधेयकों के विषय में विधानसभा को ही समस्त वास्तविक अधिकार हैं । अतः धन विधेयकों को लेकर विधान सभा तथा विधान परिषद में कोई गतिरोध उत्पन्न नहीं होता है।

राज्यपाल की वीटो शक्ति

जब कोई विधेयक राज्यपाल को विधान मंडल के दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने के पश्चात् प्रस्तुत किया जाता है, तब राज्यपाल निम्नलिखित में से कोई कदम उठा सकता है-

∎ वह विधेयक की अनुमति देने की घोषणा कर सकता है जिसके परिणामस्वरूप वह तुरंत विधि बन जाएगा।

∎ वह यह घोषित कर सकता है कि वह विधेयक की अनुमति देना विधारित करता है। ऐसी दशा में वह विधेयक विधि नहीं बनेगा।

∎ धन विधेयक से भिन्न किसी विधेयक को वह संदेश के साथ लौटा सकता है।

∎ राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रख सकता है। एक दशा में आरक्षण अनिवार्य है अर्थात् जहां प्रश्नगत विधि, संविधान के अधीन उच्च न्यायालय की शक्ति के अल्पीकरण में होगी।

इस प्रकार आरक्षित धन विधेयक की दशा में राष्ट्रपति अपनी अनुमति देने या विधारित करने की घोषणा कर सकेगा। किंतु धन विधेयक से भिन्न विधेयक की दशा में राष्ट्रपति उस पर अनुमति देने या अस्वीकार करने की घोषणा करने के स्थान पर राज्यपाल की यह निर्देश दे सकता है कि वह विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधान मंडल को वापस कर दे। ऐसे लौटाए जाने पर विधान मंडल छह मास के भीतर उस विधेयक पर पुनर्विचार करेगा और यदि वह पुनः पारित किया जाता है तो विधेयक राष्ट्रपति को पुनः प्रस्तुत किया जाएगा किंतु इस पर भी राष्ट्रपति के लिए उसे अनुमति देना अनिवार्य नहीं है (अनुच्छेद 201)।

यह स्पष्ट है कि कोई विधेयक जो राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित किया जाता है तभी प्रभावी होगा जब राष्ट्रपति उसे अनुमति प्रदान कर दे। किंतु संविधान ने राष्ट्रपति द्वारा अनुमति दिए जाने या विधारित किए जाने की कोई समय-सीमा अधिरोपित नहीं की है। परिणामस्वरूप राष्ट्रपति चाहे तो राज्य विधान मंडल के विधेयक को बिना अपना मत व्यक्त किए अनिश्चितकाल तक लम्बित रख सकता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति के पास एक तीसरा अनुकल्प भी है, जिसका केरल शिक्षा विधेयक के बारे में प्रयोग किया गया था अर्थात् जब आरक्षित विधेयक राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है और राष्ट्रपति के मस्तिष्क में कोई विधेयक की सांविधानिकता के बारे में कोई संदेह उत्पन्न होता है तो वह यह विनिश्चिय करने के लिए कि उस विधेयक की अनुमति दे सकता है या उसे लौटा सकता है अथवा उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 148 के अधीन उसकी राय जानने के लिए भेज सकता है।

साधारण विधेयक

धन विधेयकों से भिन्न विधेयकों को विधान सभा या विधान परिषद दोनों में से किसी एक में प्रस्तुत किया जा सकता है। साधारण विधेयक के बारे में परिषद को एकमात्र यह शक्ति है कि वह कुछ अवधि तक विधेयक के पारित होने की विलम्बित कर दे (तीन मास)। यह अवधि धन विधेयकों के संबंध में अवधि से लम्बी है। यदि वह किसी विधेयक से असहमत है तो विधेयक विधान परिषद से विधान सभा की यात्रा पुनः करेगा, किंतु अंत में विधान सभा का मत ही अभिभावी होगा और दूसरी यात्रा में विधान परिषद को एक मास से अधिक समय के लिए विधेयक को रोके रखने की शक्ति नहीं होगी। स्पष्ट है कि विधान परिषद केवल एक विलम्बकारी सदन है। यह धन विधेयकों की केवल 14 दिन एवं अन्य को तीन मास तक विलम्बित कर सकता है। विधान के मामले में विधानसभा के अधिकार वास्तविक एवं अधिक प्रभावी हैं।

राज्य विधानमण्डल के कार्य एवं शक्तियां

कार्यपालिका नियंत्रण

केंद्र की तरह राज्यों में संसदीय प्रणाली होने के कारण राज्यपाल को परामर्श और सहायता देने के लिए मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गयी है जो सामूहिक रूप से विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है। मंत्रिपरिषद का विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होना विधान सभा के कार्यपालिका पर नियंत्रण का प्रत्यक्ष प्रमाण है। विधान सभा निम्नलिखित साधनों द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण रख सकती है-

  1. प्रश्न पूछना: विधान सभा के अधिवेशन के समय प्रतिदिन एक घंटा प्रश्नों के लिए निर्धारित किया जा सकता है। प्रत्येक सदस्य का अधिकार है कि पूर्व सूचना देकर किसी मंत्री से नियमानुसार उसके विभाग संबंधी प्रश्न पूछे।
  2. वाद-विवाद: विधान सभा के सदस्य कुशल वाद-विवाद द्वारा कार्यपालिका की नीतियों और कार्यों की प्रशंसा तथा आलोचना करते हैं। यह विवाद समाचार-पत्रों द्वारा जनता तक पहुंचता है और जनता सरकार के प्रति विरोध या प्रशंसा की धारणा बनाती है।
  3. स्थगन प्रस्ताव: विधान सभा के सत्र के समय कोई भी सदस्य सार्वजनिक महत्व के किसी प्रश्न पर वाद-विवाद के लिए प्रस्ताव पेश कर सकता है। यदि विधान सभा अध्यक्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार कर ले तो सदन के सदस्य उस प्रस्ताव पर विचार करते हैं।
  4. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव: यदि विधान सभा सत्र के समय कोई सदस्य सदन का ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पेश कर सकता है। ऐसे प्रस्ताव मंत्रियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पेश किए जाते हैं।

उपर्युक्त साधनों द्वारा राज्य विधान सभा मंत्रियों के कार्य-कलापों की प्रशंसा अथवा आलोचना करती है। सरकार की नीतियों पर इसका बहुत ही महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। निम्नलिखित साधनों द्वारा विधान सभा मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देने पर विवश कर सकती है-

  1. अविश्वास प्रस्ताव: राज्य विधान सभा सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास पास करके उसे पद से हटा सकती है।
  2. निन्दा प्रस्ताव: यदि विधान सभा किसी विशेष कार्य के लिए किसी मंत्री के विरुद्ध निंदा का प्रस्ताव पारित कर डे तो सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है।
  3. कटौती प्रस्ताव: विधान सभा वित्तीय विधेयक को रद्द करके या मंत्रिपरिषद द्वारा प्रस्तावित महत्वपूर्ण विधेयक को अस्वीकार करके या मंत्रियों के वेतन या भत्तों में कटौती का प्रस्ताव पास करके मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देने पर विवश कर सकती है।

राज्य विधान सभा के सदस्य निम्नलिखित अधिकारियों के चुनाव में भाग ले सकते हैं-

  1. राज्य विधान सभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग ले सकते हैं।
  2. राज्य विधानसभा के सदस्य अपने में से एक सदस्य को अध्यक्ष तथा किसी अन्य सदस्य को उपाध्यक्ष चुनते हैं।
  3. राज्य विधान परिषद के कुल सदस्यों के एक-तिहाई सदस्यों को विधान सभा के सदस्य निर्वाचित करते हैं।
  4. राज्यसभा में भेजे जाने वाले सदस्य संबंधित राज्य विधान सभा सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।

न्यायिक शक्तियां

विधान सभा को कुछ न्यायिक शक्तियां भी प्राप्त हैं। विधान सभा के एक संस्था के रूप में कुछ विशेष अधिकार हैं। इन विशेष अधिकारों अवहेलना करने वाले अथवा सदन का अपमान करने वाले व्यक्ति को विधान सभा दण्ड दे सकती है।

अन्य शक्तियां

  1. राज्य विधानसभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई मत से प्रस्ताव पारित करके विधान परिषद की स्थापना या उसे समाप्त करने के लिए संघीय संसद से प्रार्थना कर सकती है।
  2. राज्य विधान सभा कानून बनाकर राज्य लोक सेवा आयोग की शक्तियों में वृद्धि कर सकती है।
  3. राज्य विधान सभा राज्य का आकस्मिक कोष स्थापित कर सकती है। राज्य के आकस्मिक कोश पर राज्यपाल का अधिकार होता है और वह  आकस्मिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए राज्य सरकार को इस कोष में से धन दे सकता है। ऐसे व्यय की स्वीकृति विधान मंडल से लेनी अनिवार्य है। 
  • विधान सभा को विविध कार्यपालिका, विधायी, न्यायिक एवं प्रकीर्ण शक्तियां प्राप्त हैं।
  • विधानमण्डल के दोनों सदनों के मध्य गतिरोध होने की स्थिति में संयुक्त अधिवेशन आहूत करने का कोई प्रावधान नहीं है।

अतः राज्य प्रशासन में विधान सभा का अति महत्वपूर्ण स्थान है।

गतिरोध को दूर करने के लिए उपबंध

संसद के दोनों सदनों के बीच असहमति का निपटारा संयुक्त बैठक से होता है। किंतु राज्य की विधान मंडल के दोनों सदनों के बीच मतभेद की निपटाने के लिए ऐसा कोई उपबंध नहीं है। राज्य विधान मंडल के दोनों सदनों के मध्य असहमति की दशा में विधान सभा की इच्छा ही अंत में अभिभावी होती है। परिषद की केवल इतनी ही शक्ति है कि वह जिस विधेयक से असहमत है, उसे पारित करने में कुछ विलंब कर दे।

राज्य विधानमण्डलों की शक्तियों पर प्रतिबंध

संविधान के अंतर्गत राज्यों के विधानमण्डलों पर निम्नांकित प्रतिबंध आरोपित किए गए हैं-

  1. कुछ विषयों से सम्बन्धित राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्मित कानून सम्बंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु भेजे जाते हैं। राष्ट्रपति की स्वीकृति के पश्चात् ही वह कानून प्रवृतनीय होगा।
  2. राज्य सूची में उल्लिखित कुछ विषयों पर राज्यों के विधानमण्डल राष्ट्रपति की पूर्वानुमति के बिना कानून नहीं बना सकते।
  3. समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार तो विधानमण्डलों की है किंतु उसके संसद द्वारा निर्मित कानून के विरोधी होने की स्थिति में संसद द्वारा निर्मित कानून ही मान्य होगा।
  4. आपातकालीन परिस्थितियों में संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बनाने के लिए स्वतंत्र है।
  5. राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पारित कर के राज्य सूची के किसी भी विषय को संसद को कानून निर्माण हेतु सौंप सकती है। ऐसे विषय पर संसद एक वर्ष हेतु कानूनों का निर्माण कर सकती है और इस अवधि में वृद्धि भी की जा सकती है।
  6. किन्हीं कारणवश राज्य का संवैधानिक तंत्र विफल होने की स्थिति में राष्ट्रपति उक्त राज्य की विधानसभा को भंग कर सकते हैं ताकि वहां नए चुनाव कराए जा सकें।

संसद एवं राज्य विधानमण्डल की तुलना

धन विधेयक के संबंध में संसद एवं राज्य विधानमण्डल में स्थिति एकसमान है अर्थात् ये विधेयक उच्च सदन (राज्य सभा अथवा विधान परिषद) में सर्वप्रथम नहीं रखा जा सकता। विधेयक के संबंध में उच्च सदन केवल अपनी सिफारिशें दे सकता है, जिन्हें स्वीकार करना या न करना निम्न सदन पर निर्भर करता है। धन विधेयक की उच्च सदन अधिकतम 14 दिन तक की अवधिहेतुकेवल रोक सकता है। इस अवधि में विधेयक पुनः निम्न सदन को न लौटाए जाने की स्थिति में विधेयक की पारित मान लिया जाता है और उसे यथास्थिति राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के समक्ष अनुमोदन हेतु प्रस्तुत कर दिया जाता है।

धन विधेयक से भिन्न अन्य विधेयक संसद अथवा राज्य विधानमण्डल के किसी भी सदन में शुरू किए जा सकते हैं। संसद के किसी एक सदन द्वारा पारित विधेयक को यदि दूसरा सदन अस्वीकृत करता है अथवा 6 माह के भीतर उसे लौटाता नहीं है अथवा दोनों सदन विधेयक में संशोधन के सम्बन्ध में असहमत हैं तो उस विधेयक पर अंतिम रूप से विचार-विमर्श करने एवं मतदान करने हेतु राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों की संयुक्त बैठक आयोजित की जा सकती है। ऐसी संयुक्त बैठक में दोनों सदनों के उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों की बहुसंख्या अभिभावी होगी। विधेयक दोनों सदनों द्वारा ऐसे संशोधन सहित पारित समझा जाएगा, जिस पर बहुमत की सहमति हो और तत्पश्चात् विधेयक राष्ट्रपति को अनुमोदनार्थ प्रस्तुत कर दिया जाएगा (अनुच्छेद-108)।

राज्यों में साधारण विधेयक विधानमण्डल के किसी भी सदन में पुरःस्थापित किए जा सकते हैं। यदि विधेयक विधान सभा द्वारा पारित किया जाता है और विधान परिषद विधेयक को स्वीकार करती है अथवा है अथवा उसे तीन माह के भीतर पारित नहीं किया जाता है तो विधानसभा उस विधेयक को, अन्य संशोधनों के साथ अथवा अन्य संशोधनों के बिना, पुनः पारित कर सकेगी और उसे वह विधान परिषद को पुनः भेज सकती है [अनुच्छेद-197(1)]।

यदि विधान परिषद किसी विधेयक को दूसरी बार पुनः अस्वीकार कर सकती है अथवा संशोधन प्रस्तावित करती है अथवा विधेयक की परिषद में रखे जाने की तिथि से 1 माह के भीतर पारित नहीं करती है तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा परोइत समझा जाएगा और उसे अनुमोदन हेतु राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

संविधान के उपबंध उन्हीं विधेयकों के सम्बन्ध में लागू होते हैं तो विधानसभा में प्रारम्भ होते हैं। परिषद में शुरू होने वाले विधेयकों के सम्बन्ध में इस प्रकार के कोई उपबंध नहीं हैं। अतः यदि कोई विधेयक परिषद द्वारा पारित होकर विधानसभा को भेजा जाता है और सभा उसे अस्वीकार कर देती है तो विधेयक समाप्त हो जाएगा।

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