भारत का राष्ट्रपति The President of India

संघीय कार्यपालिका

केंद्र की कार्यपालिका, जिसे संघीय कार्यपालिका भी कहते हैं, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित मंत्रिपरिषद को मिलाकर बनती है|

भारत का राष्ट्रपति The President of India

भारत के संविधान के अनुच्छेद 52 के अनुसार, भारत में एक राष्ट्रपति होगा, एवं अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जिसका उपयोग वह प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित मंत्रिपरिषद की सहायता से करता है| कार्यपालिका द्वारा सभी कार्य राष्ट्रपति के नाम पर किये जाते हैं| राष्ट्रपति देश का प्रधान होता है और भारतीय गणतंत्र का प्रतिनिधित्व करता है| राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक भी कहलाता है|

राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं Qualifications for Election as President

भारत के संविधान के अनुच्छेद 58 के अंतर्गत राष्ट्रपति की निम्न योग्यताएं निहित की गयीं हैं-

  1. वह भारत का नागरिक हो,
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो,
  3. लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए अर्हित है,

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार लोकसभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए कुछ और अर्हताएं भी हैं-

राष्ट्रपति पद के लिए अभ्यर्थी को भारत सरकार या किसी राज्य या अन्य प्राधिकारी के अधीन जो इनमे से किसी सरकार के नियंत्रण में हों, कोई लाभ का पद नहीं धारण करना चाहिए|

संविधान में यह स्पष्ट किया गया हैकी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या संघ या किसी राज्य के मंत्री का पद लाभ का पद नहीं समझा जाएगा|

राष्ट्रपति पद के लिए मन का प्रस्ताव तथा अनुमोदन कम से कम 50-50 निर्वाचकों द्वारा प्रस्तावित तथा अनुमोदित होना चाहिए| 1998 से पूर्व यह संख्या 10-10 थी| राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए जमानत राशि ₹15,000 है, किसी उम्मीदवार द्वारा कुल वैध मतों का 1/6 भाग मत न प्राप्त करने परउसकी जमानत की राशि जब्त कर ली जाती है|

राष्ट्रपति का चुनाव 5 वर्ष की अवधि के लिए होता है, पदावधि समाप्त होने पर वह पुनः चुनाव लड़ सकता है| निर्वाचन के पश्चात राष्ट्रपति संविधान की मर्यादा (परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण) बनाए रखने की शपथ लेता है|

राष्ट्रपति का निर्वाचन Election of President

भारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जाता है| भारत के संविधान के अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाएगा, जिसमे संसद (लोकसभा तथा राज्यसभा) तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होंगे| भारत के राष्ट्रपति का चुनाव आयरलैंड के संविधान से प्रेरित है|

राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद के मनोनीत या नामनिर्दिष्ट सदस्य , राज्य विधान सभाओं के मनोनीत या नामनिर्दिष्ट सदस्य तथा राज्य विधान परिषदों के सदस्य (निर्वाचित एवं मनोनीत दोनों) शामिल नहीं किये जाते हैं|

1 जून 1992 से संविधान के 70वें संशोधन द्वारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा पांडिचेरी संघ शासित राज्य के विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों को भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में शामिल कर किया गया है|

राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति Manner of election of President

भारत के संविधान के अनुच्छेद 53 (3) के अनुसार, भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति (proportional representation system ) के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति (single transferable vote system) द्वारा होगा, और यह मतदान गुप्त होगा|

एकल संक्रमणीय मत पद्धति Single Transferable Vote Systemभारत में राष्ट्रपति का निर्वाचन, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति निर्वाचल अधिनियम-1952 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन एकल संक्रमणीय मत पद्धति के अनुसार होगा| इस पद्धति में  जो व्यक्ति संख्या के अनुसार बहुमत प्राप्त कर लेता है या संख्या में सबसे अधिक मत प्राप्त कर्ता है, उसे निर्वाचित घोषित किया जाता है| यदि राष्ट्रपति के पद के लिए 4 प्रत्याशी हैं और उन्हें क्रमशः इस प्रकार वोट बनते हुए है-

  1. 38%
  2. 26%
  3. 22%
  4. 14%

सामान्य प्रणाली में प्रत्याशी A निर्वाचित हो जाएगा, यद्यपि 62% निर्वाचकों ने उसे अपना मत नहीं दिया है| आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति में ऐसी विसंगति नहीं होती है| इसमें विजयी उम्मीदवार को 50%+1 मत प्राप्त करना आवश्यक होता है| कुल पड़े मतों की संख्या को 2 से विभाजित कर भागफल में 1 जोड़ने से प्राप्त संख्या ही न्यूनतम संख्या है| यह न्यूनतम संख्या, स्थानों की संख्या पर विचार करके तय की जाती है| इसे कोटा कहते है, इसका सूत्र है-

(डाले गए मतों की कुल संख्या) / (स्थानों की संख्या+1)+1 = कोटा

कोटा तय करना इस पद्धति का पहला काम है| इस प्रणाली में सभी मतदाताओं को सभी उम्मीदवारों के नामों के आगे अपनी पसंद का क्रम 1, 2, 3, 4 व्यक्त करना होता है|

मतों की गिनती में यदि प्रथम पसंद की गिनती में ही कोई उम्मीदवार निर्धारित कोटे के मत प्राप्त कर लेता है, तो उसे विजयी माना जाएगा| प्रथम दौर की मतगणना के बाद किसी उम्मीदवार के विजयी न होने की स्थिति में, पसंद में सबसे कम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को मतगणना से अलग कर दिया जाता है| फिर उसको मिले हुए मतपत्रों की द्वितीय पसंद जिन-जिन उम्मीदवारों की जितनी संख्या में अंकित की गई है, उतने मत उसकी प्रथम पसंद की संख्या में जोड़ दिए जाते हैं| इस प्रकार संक्रमण मत पद्धति किसी एक उम्मीदवार के न्यूनतम संख्या को प्राप्त कर लेने तक चलती रहती है|

भारत के संविधान के अनुच्छेद 55 के अनुसार प्रत्येक संसद सदस्य और विधान सभा के सदस्य के मत को एक मूल्य दिया जाता है, जो राष्ट्रपति के पद के परिसंघीय चरित्र को रेखांकित करने का प्रयास है| राज्य की विधान सभा के सदस्य के मत का मूल्य इस प्रकार निकाला जाता है-

(राज्य की जनसँख्या) / (विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या)  1/1000=एक मत का मूल्य

संसद सदस्य के मत का मूल्य

(सभी राज्यों के विधान सभा के सदस्यों के मत का मूल्य) / (संसद के दोनों सदनों की निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या)  = एक मत का मूल्य

प्रत्येक राज्य के विधान सभा के सदस्य के मत का मूल्य अलग अलग होता है| इस पद्धति से राज्यों के बीच एकरूपता एवं संघ और राज्यों के बीच समानता आ जाती है|

राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान  Oath or affirmation by the President

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 60 के अनुसार राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, या उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय में उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष अपने पद की शपथ लेगा|

राष्ट्रपति संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं होगा| यदि संसद या राज्य विधान मंडल का कोई सदस्य राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है, तो यह समझा जाएगा की उसने उस सदन में अपना स्थान राष्ट्रपति के रूप में पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है|

शपथ एवं त्यागपत्र

पद शपथ त्यागपत्र
राष्ट्रपति उच्चतम न्यायलय का मुख्य न्यायधीश उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति राष्ट्रपति
राज्यपाल उच्च न्यायलय का मुख्य न्यायधीश राष्ट्रपति
मुख्य न्यायधीश राष्ट्रपति राष्ट्रपति
प्रधानमंत्री राष्ट्रपति राष्ट्रपति
लोकसभा अध्यक्ष शपथ नहीं लेता लोक सभा उपाध्यक्ष

राष्ट्रपति के वेतन एवं भत्ते  President's Salary And Allowances

राष्ट्रपति के वेतन, भत्ता तथा पेंशन (संशोधन) अधिनियम 2008 के द्वारा प्रदान किया जाता है| राष्ट्रपति का वेतन भारत की संचित निधि (Consolidated Fund Of India) से दिया जाता है, जो आयकर से मुक्त होता है|

वर्तमान में राष्ट्रपति का वेतन ₹ 1,50,000  है|  राष्ट्रपति को दिए जाने वाली वेतन, उपलब्धियां और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किये जा सकते| वह ऐसी उपलब्धियों, भत्तो और विशाधिकारों का हक़दार होता है, जो संसद द्वारा अवधारित किये जायेंगे| पद छोड़ देने के पश्चात् राष्ट्रपति को प्रतिमास अपनी उपलब्धियों की 50% की दर पर पेंशन पाने का अधिकार है|

राष्ट्रपति की पदावधि Term Of Office Of President

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 56 के अनुसार, राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है| राष्ट्रपति पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र है| वह चाहे जितनी बार निर्वाचित हो सकता है| संविधान में पुनर्निर्वाचन के लिए कोई सीमा नहीं उल्लिखित है| अमेरिका में राष्ट्रपति केवल एक बार पुनर्निर्वाचित हो सकता है| हमारे पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद दो अवधि के लिए राष्ट्रपति चुने गए थे| शेष सभी राष्ट्रपति एक अवधि तक ही रहे|

राष्ट्रपति का पद 5 वर्ष की अवधि के पूर्व इस प्रकार समाप्त हो सकता है-

राष्ट्रपति द्वारा, उपराष्ट्रपति को संबोधित लिखित त्यागपत्र देकर,

राष्ट्रपति को अनुच्छेद 61 में उपबंधित रीति से महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया द्वारा पद से हटाये जाने पर,

यदि किसी कारणवश राष्ट्रपति का उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं करता है, तो राष्ट्रपति 5 वर्ष की अवधि की समाप्ति के बाद भी तब तक पद धारण करता रहेगा, जब तक की उसका उत्तराधिकारी पद की सपथ ग्रहण नहीं कर लेता|

राष्ट्रपति पर महाभियोग Impeachment Of The President

संविधान के अनुच्छेद 61 में राष्ट्रपति पर महाभियोग चलने की प्रक्रिया दी गयी है| राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने के लिए अनुच्छेद 61 में 1 ही आधार विनिर्दिष्ट है, और वह है – संविधान का अतिक्रमण|

अमेरिका के संविधान के अधीन महाभियोग राजद्रोह, रिश्वत लेने या अन्य गंभीर अपराधों के लिए चलाया जा सकता है|

भारत के संविधान में राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया अनुच्छेद 61 में दी गयी है| संविधान की अवलेहना का आरोप लगाकर महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति के विरुद्ध चलाया जा सकता है|

आरोप एक नोटिस के रूप में होता है, जिस पर सदन की कुल संख्या के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों की हस्ताक्षर होने आवश्यक है| यह नोटिस राष्ट्रपति को प्रेषित कर दिया जाता है और उसके 14 दिन बाद उस पर विचार किया जाता है|

जब सदन द्वारा इस प्रकार का आरोप लगाया जाता है तो दुसरे सदन द्वारा उसका अन्वेषण किया जाता है| महाभियोग का प्रस्ताव सदन के कुल सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से पारित किया जाना चाहिए| पारित हो जाने के बाद प्रस्ताव दूसरे सदन में भेजा जाता है, जो आरोपों की जाँच करता है| इस प्रक्रिया की अवधि में राष्ट्रपति को स्वयं उपस्थित होकर अथवा प्रतिनिधि भेजकर अपने बचाव में स्पष्टीकरण देने का अधिकार है| सदन अन्वेषण का काम किसी न्यायालय या अधिकरण को भी दे सकता है|  यदि दूसरा सदन भी दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देता है, तो राष्ट्रपति को महाभियोग के आधार पर अपदस्थ कर दिया जाता है|

अमेरिका में राष्ट्रपति पर महाभियोग के विचारण (Trial) का अधिकार सीनेट को है, कांग्रेस को नहीं| विचारण की अध्यक्षता, उच्चतम न्यायालय को मुख्य न्यायाधीश करता है| उसे हटाये जाने का संकल्प विचारण में उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से पारित होता है|

राष्ट्रपति के निर्वाचन के बारे में विवाद Matters Relating To, Or Connected With, The Election Of A President

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 71 के अनुसार, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से सम्बंधित सभी विवादों की जाँच और विनिश्चय उच्चतम न्यायालय करेगा| यदि उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रपति का निर्वाचन शून्य घोषित कर देता है, तब भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पद और शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन में, उच्चतम न्यायालय के निर्णय की तारीख को या उससे पहले, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति द्वारा किये गए कार्य अवैध नहीं होंगे|

यदि राष्ट्रपति के निर्वाचन के निर्वाचकगण में रिक्तियां हैं, तो ऐसी रिक्ति के आधार पर राष्ट्रपति के निर्वाचन को न्यायालय में प्रश्गत नहीं किया जा सकता है| राष्ट्रपति के पद का निर्वाचन इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता हैकी कुछ विधान सभाओं का विघटन हो गया है और उनके लिए निर्वाचन होना है| अनुच्छेद 62 यह निर्दिष्ट है की रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन राष्ट्रपति की अवधि की समाप्ति के पूर्व हो जाना चाहिए|

राष्ट्रपति की शक्तियां Executive Power Of The President

अनुच्छेद 53 संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित करता है| संविधान में कार्यपालिका की शक्ति की कोई परिभाषा नहीं दी गयी है| सामान्य तौर पर इसमें नीति का निर्धारण और निष्पादन दोनों आते हैं| कार्यपालिका की शक्ति में वे सभी शक्तियां मानी जाती हैं, जो विधानमंडल और न्यायपालिका में निहित नहीं हैं| इसके अंतर्गत विधान प्रारंभ करना, विदेश नीति का निर्धारण करना और सामान्यतः राज्य के क्रियाकलाप चलाना है|

राष्ट्रपति को अनेक अधिकार प्राप्त हैं| वह साधारणकाल तथा आपातकाल में अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है| किन्तु इस शक्तियों का वास्तविक प्रयोग प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है|

कार्यपालिका शक्तियां Executive Power

संविधान के अनुच्छेद 53 के अनुसार केंद्र सरकार की सम्पूर्ण कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियां राष्ट्रपति में निहित हैं| वह लोकसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त करता है| प्रधानमंत्री की सलाह से वह मंत्रिपरिषद के मंत्रियों की नियुक्ति करता है तथा उनके विभागों का वितरण करता है|

अमेरिका का राष्ट्रपति सभी विभागों का स्वयं नियंत्रण करता है| भारत का राष्ट्रपति सरकार के विभागों का नियंत्रण और अधीक्षण स्वयं नहीं करता है| अनुच्छेद 77 के अनुसार संघ के सभी कार्यपालिक कार्य राष्ट्रपति के नाम से किये जाते हैं, किन्तु यह अभिव्यक्ति केवल औपचारिक होती है| अनुच्छेद 299 के अनुसार, सभी संविदाएं और संपत्ति सम्बन्धी हस्तांतरण पत्र, पट्टा, विक्रय विलेख आदि दस्तावेज़ जो भारत सरकार की ओर से किये जाते है या लिखे जाते है, राष्ट्रपति के नाम से किये या लिखे जाने चाहिए और विहित रीति से निष्पादित होने चाहिए||

राष्ट्रपति को संघ के क्रियाकलापों के बारे में जानकारी लेने का अधिकार है एवं ब्रिटिश सम्राट के सामान परामर्श और चेतावनी देने का अधिकार भी है| राष्ट्रपति की प्रशासनिक शक्ति में संविधान के अधीन कुछ पदों की नियुक्ति करने का भी अधिकार है, जो इस प्रकार हैं-

  1. भारत का प्रधानमंत्री और संघ के अन्य मंत्री India's Prime Minister And Other Ministers Of The Union
  2. भारत का महान्यायवादी Attorney-General Of India
  3. भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक Comptroller And Auditor General Of India
  4. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायधीश Supreme Court And The High Court Judge
  5. राज्यपाल और उपराज्यपाल और प्रशासक Governor And Lieutenant Governor And Administrator
  6. वित्त आयोग Finance Commission
  7. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्य Chairman And Members Of The Union Public Service Commission
  8. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयोग के अन्य सदस्य Chief Election Commissioner And Other Members Of The Election Commission
  9. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष अधिकारी Special Officer For Scheduled Castes And Tribes
  10. भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी Special Officer For Linguistic Minorities

ये सभी राष्ट्रपति द्वारा मंत्री परिषद् की सलाह पर या संविधान के अनुसार निर्दिष्ट व्यक्तियों से परामर्श करने के पश्चात् की जाती है| जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करता है| राष्ट्रपति को उपर्युक्त अधिकारीयों को हटाने की शक्ति भी है|

सैन्य शक्तियां Military Powers

अनुच्छेद 53 के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति रक्षा बलों (थलसेना, वायुसेना तथा नौसेना) का प्रधान सेनापति होता है| उसे युद्ध और शांति की घोषणा करने और सैन्य बलों की तैनाती आदि का आदेश देने की शक्ति होती है| हमारे संविधान में रक्षा बालों पर आदेश विधि द्वारा विनियमित होता है| जब तक संसद विनियोग विधेयक पारित नहीं करती, तब तक रक्षा बलों पर कोई वयय नहीं किया जाता है, इस प्रकार संसद बजट पर नियंत्रण से सैन्य बलों पर नियंत्रण रखती है|

राजनयिक शक्तियां Diplomatic Powers

राजनयिक संबंधों के अंतर्गत वे सभी सम्बन्ध आते हैं, जो कोई राष्ट्र विदेशो के साथ रखता है| इसमें सयुंक्त राष्ट्र और उसके अंग तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की सदस्यता शामिल है| इन शक्तियों में अन्य देशों के साथ सम्मलेन, उनके साथ संधियाँ और उनका अनुमोदन करना भी है| द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संधियों के लिए वार्ता करने का काम राष्ट्रपति पर निर्भर होता है| राष्ट्रपति विभिन्न देशों के लिए भारत के प्रतिनिधि (राजदूत, उच्च आयुक्त, कोंसिल आदि) भी नियुक्त कर्ता है एवं अन्य देशों के प्रतिनिधियों का औपचारिक स्वागत करता है|

परन्तु विदेश नीति निश्चित करने में संसद ही सर्वोपरि होती है और इन सभी विषयों में राष्ट्रपति मंत्री-परिषद् की सलाह पर कार्य करता है|

विधायी शक्तियां Legislative Powers

भारत के संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार, राष्ट्रपति संसद का अंग है और संसद राष्ट्रपति और दो सदनों राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनती है| इस कारण राष्ट्रपति के पास बहुत सी विधायी शक्तियां होती हैं जिनका वह प्रयोग करता है इनमे से प्रमुख कुछ इस प्रकार हैं –

  1. संसद को आहूत करने और सत्रावसान करने की शक्ति – राष्ट्रपति को संसद के प्रत्येक सदन के सत्र को आयोजित करने और उसे समाप्त करने की शक्ति होती है| अनुच्छेद 85 के अनुसार वह लोकसभा का विघटन कर सकता है| राष्ट्रपति किसी विधेयक पर दोनों सदनों के बीच अंतिम रूप से असहमति होने की दशा में उस विधेयक पर विचार-विमर्श के लिए दोनों सदनों की सयुंक्त बैठक अनुच्छेद 108 के अनुसार बुला सकता है|
  2. अभिभाषण और संदेश – लोकसभा के निर्वाचन के पश्चात् पहले सत्र के प्रारंभ पर और प्रत्येक वर्ष के आरंभ पर राष्ट्रपति एक साथ समवेत संसद के दोनों सदनों को संबोधित करता है, जिसका प्रयोजन अनुच्छेद 87 के अनुसार, संसद को उसके आह्वान का कारण बताना होता है| राष्ट्रपति केवल एक सदन या दोनों सदनों में एक साथ अभिभाषण दे सकता है, वह किसी भी सदन को किसी विधेयक के सम्बन्ध के या अन्य प्रयोजनों के लिए संदेश भेज सकता है|

हमारी संसदीय प्रणाली में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के सुझाव के अनुसार ही कार्य करता है, इसलिए इस बात की सम्भावना बहुत ही कम होती है, कि राष्ट्रपति किसी सदन में कोई सुझाव दे या संदेश भेजे| आज तक किसी भी राष्ट्रपति ने किसी भी सदन में कोई संदेश नहीं भेजा है, जबकि इसके विपरीत अमेरिका का राष्ट्रपति अपनी संदेश भेजने की शक्तियों का बहुत अधिक प्रयोग करता है|

  1. नाम निर्देशन – लोकसभा का निर्वाचन 5 वर्ष की अवधि के लिए प्रत्यक्ष मतदान पद्धति से होता है| राज्यसभा स्तःयी निकाय है एवं इसका विघटन नहीं होता है, परन्तु इसके एक तिहाई सदस्य 2 वर्ष  के पश्चात् सेवा निवृत्त हो जाते हैं| अनुच्छेद 80 के अनुसार राष्ट्रपति राज्य सभा में साहित्य, विज्ञानं, कला और समाज सेवा के विषयों के संबंध विशेष ज्ञान या व्याहारिक अनुभव रखने वाले 12 व्यक्तियों को  नाम निर्दिष्ट कर सकता है| राष्ट्रपति अनुच्छेद 331 के अनुसार आंग्ल भारतीय समुदाय के अधिकतम 2 सदस्यों को लोकसभा में नामनिर्दिष्ट करता है|
  2. प्रतिवेदन और कथन रखना – संविधान और कुछ अधिनियम के अनुसार राष्ट्रपति का यह कर्तव्य हैकी वह संसद के समक्ष निम्न कागज-पत्र रखवाए-
    1.  वार्षिक वित्तीय विवरण या बजट – अनुच्छेद 112
    2. नियंत्रक महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट या विवरण – अनुच्छेद 151
    3. वित्त योग की सिफारिशें – अनुच्छेद 281
    4. संघ क्लोक सेवा आयोग की रिपोर्ट – अनुच्छेद 323
    5. पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट – अनुच्छेद 340
    6. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग की रिपोर्ट – अनुच्छेद  348
    7. इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति अनुच्छेद 349 (क) के अनुसार संविधान के अंग्रेजी भाषा में किये गए संशोधन का हिंदी भाषा में अनुवाद भी प्रकाशित करवाता है|
  3. पूर्व मंजूरी – भारतीय संविधान में यह अपेक्षा है की कुछ विषयों से सम्बंधित विधान की पूर्व मंजूरी या सिफारिश के बिना प्रस्तावित (Introduced) नहीं किया जाएगा| ये विषय हैं-
    1. किसी राज्य की सीमा में परिवर्तन या नए राज्य की रचना के लिए विधेयक – अनुच्छेद 3
    2. धन विधेयक – अनुच्छेद 117 (1)
    3. ऐसा विधेयक जिसके अधिनियमित (Enacted) किये जाने पर भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़े – अनुच्छेद 117 (3)
    4. करो से सम्बंधित ऐसे विधेयक जिनसे राज्यों का हित जुड़ा हुआ हो, या जिनसे राज्यों को धन वितरित किया जाता हो, या जिनसे कृषि-आय की परिभाषा में परिवर्तन आता हो – अनुच्छेद 274 (1)
    5. राज्यों के विधेयक जो व्यापर और वाणिज्य की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हों – अनुच्छेद 304
  4. विधेयकों पर अनुमति देना या अनुमति रोकना – वीटो (Veto) – संसद के दोनों सदनों के द्वारा किसी विधेयक को पारित करने के पश्चात् भी कोई विधेयक तब तक अधिनियम नहीं बनता है, जब तक कि उसे राष्ट्रपति की अनुमति नहीं मिलती है| दोनों सदनों द्वारा पारित करने के पश्चात् विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, इस समय राष्ट्रपति –
    1. उस विधेयक को अनुमति दे सकता है,
    2. विधेयक पर अनुमति रोक सकता है
    3. वह विधेयक को सदनों को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है

परन्तु राष्ट्रपति धन-विधेयक को पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकता है| यदि राष्ट्रपति द्वारा पुनर्विचार के लिए लौटाए गए विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पुनाह्परित करके राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है तो राष्ट्रपति उस विधेयक पर अपनी अनुमति रोक नहीं सकता है|

मई 2006 में राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने संसद (निरर्हता निवारण) विधेयक – 2006 पुनर्विचार के लिए लौटाया था|  

कार्यपालिका द्वारा किसी विधान को अनुमति देने या अनुमति रोक लेने, की शक्ति को वीटो कहा जाता है| इस शब्द का रयोग उन परिस्थितियों में भी किया जाता है, जहाँ अनुमति तुरंत नहीं दी जाती है| वीटो का प्रयोग सामान्यतः ऐसे विधान को बनने से रोकने के लिए किया जाता है, जिन पर भली-भांति विचार नहीं किया गया हो या जो असंवैधानिक हों|राष्ट्रपति द्वारा प्रयोग किये जाने वाले वीटो को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है-

आत्यंतिक वीटो Absolute Veto – राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक को अनुमति देने से इनकार करने की शक्ति है, और ऐसा करने पर वह विधेयक अधिनियम नहीं बन सकता| संसद इस शक्ति को कम नहीं कर सकती| राष्ट्रपति को सभी विधेयकों के बारे ने यह शक्ति है, परन्तु धन विधेयकों ने बारे में नहीं|

विशेषित वीटो Modified veto इस प्रकार के वीटो को विधान मंडल बहुमत द्वारा रद्द कर सकता है|  अमेरिका में राष्ट्रपति किसी विधेयक को, अपने परामर्श के साथ, 10 दिन के भीतर लौटा देता है| यदि दोनों सदन उस विधेयक को दो तिहाई बहुमत के साथ पुनः पारित कर देते हैं, तो वीटो रद्द हो जाता है|

भारत में बहुमत की अपेक्षा नहीं की जाती है और दोनों सदन विधेयक को फिर से पारित कर देते हैं तो राष्ट्रपति उस विधेयक पर अपनी अनुमति रोक नहीं सकता है| इस प्रकार भारत में राष्ट्रपति विशेषित वीटो का प्रयोग नहीं किया जाता है|

निलंबनकारी वीटो Suspension Veto – इस प्रकार के वीटो का प्रयोग,  अनुच्छेद 111 के अनुसार राष्ट्रपति जब किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाते समय करते हैं| इस प्रकार के वीटो को साधारण बहुमत द्वारा रद्द किया जाता है|

जेबी  वीटो Pocket Veto – संविधान के अंतर्गत किसी विधेयक पर राष्ट्रपति द्वारा अनुमति देने या ना देने के लिए समय सीमा  का कोई प्रतिबन्ध नहीं है, अतः जब राष्ट्रपति किसी विधेयक पर अपनी अनुमति नहीं देता है और संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत पुनर्विचार के लिए संसद को वापस भी नहीं करता है, ऐसी स्थिति में वह जेबी वीटो का प्रयोग करता है|

राज्यों के विधान के बारे में राष्ट्रपति की शक्ति

संविधान का अनुच्छेद 200 किसी राज्य के राज्यपाल को, किसी विधेयक पर अनुमति देने या रोकने की शक्ति देता है, अथवा राज्यपाल उस विधेयक को राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेज सकता है| उसके पश्चात् राष्ट्रपति यह घोषणा कर्ता है की की अनुमति दी गयी है या अनुमति रोक ली गयी है| राष्ट्रपति राज्यपाल को यह निर्देश भी दे सकता की विधेयक को विधान सभा को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया जाए| यदि विधान-सभा द्वारा विधेयक पुनः पारित करके राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो यह आवश्यक नहीं है की राष्ट्रपति विधेयक को अनुमति दे- अनुच्छेद 201, परन्तु राष्ट्रपति धन विधेयक पर अनुमति नहीं रोक सकता है| राष्ट्रपति राज्यों के विधेयक के सम्बन्ध में भी जेबी वीटो का प्रयोग कर सकता है| परन्तु संसदीय विधेयक की दशा में यदि राष्ट्रपति किसी विधेयक को सदनों द्वारा पुनर्विचार के लिए लौटता है, और सदन उसे दुबारा पारित कर देते हैं तो, वीटो रद्द हो जाता है और राष्ट्रपति अनुमति देने के बाध्य हो जाता है| राज्यों के विधेयकों की दशा में राष्ट्रपति आत्यंतिक वीटो का प्रयोग करके अनुमति रोक सकता है|

अध्यादेश जारी करने की शक्ति

अनुछेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है| अनुच्छेद 123 में यह उपबंधित है की जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और राष्ट्रपति को इस बात का समाधान हो जाए, कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान है जिनमे तुरंत कार्यवाही करना आवश्यक हो गया है तो राष्ट्रपति ऐसे अध्यादेश जारी कर सकेगा जो उसे उक्त परिस्थितियों में अपेक्षित प्रतीत हों| इस शक्ति का प्रयोग संविधान का संशोधन करने के लिए नहीं किया जा सकता है| राष्ट्रपति उन्ही विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है, जिन पर संसद को विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है| अतः वह कोई ऐसा अध्यादेश उपबंध करता है, जिसे अधिनियमित करने का अधिकार संसद को नहीं है तो वह शून्य होगा| इस प्रकार के अध्यादेश से मूल अधिकारों का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है| राष्ट्रपति द्वार जारी अध्यादेश का वही बल और प्रभाव होगा जो संसद द्वारा पारित अधिनियम का होता है| ऐसा प्रत्येक अध्यादेश संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा और संसद के पुनः समवेत (reassemble) होने की तारीख से 6 सप्ताह की समाप्ति पर स्वतः समाप्त हो जाएगा, जब तक की 6 सप्ताह के पूर्व दोनों सदन उसके आनुमोदन का संकल्प न पारित कर दें| राष्ट्रपति किसी समय अपने द्वारा जारी किये गए अध्यादेशों को वापस ले सकता है|

भारत को छोड़कर किसी भी देश में कार्यपालिका को इस प्रकार की व्यापक विधायी शक्ति नहीं दी गयी है| इस शक्ति को इस आधार पर उची ठहराया जा सकता है कि सरकार को प्रत्येक परिस्थिति से, जो सामने आये निपटने की शक्ति होनी चाहिए| ऐसी परिस्थितियां भी हो सकती हैं, जिसमे संसद के दोनों सदनों का आह्वान करने और उस पर विचार विमर्श करने तक रुकना संभव न हो| भारत शासन अधिनियम – 1935, में गवर्नर जनरल को अध्यादेश निकलने की शक्ति दी गयी थी| हमारे संविधान ने उस उपबंध को अपना लिया है|

क्षमादान की शक्ति Power Of President To Grant Pardons

अनुच्छेद ७२ राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहरा दिए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा (pardons), प्रविलंबन (reprieves), विराम (respites), या परिहार (remissions) करने की अथवा दंडादेश के निलंबन (suspension), परिहार (remit) या लघुकरण (commute) करने की शक्ति प्रदान करता है| राष्ट्रपति को निम्नलिखित मामलों में क्षमादान करने की शक्ति प्राप्त है-

  1. यदि दंड अथवा दंडादेश सेना न्यायलय ने दिया हो,
  2. दंड अथवा दंडादेश ऐसे विषय से सम्बंधित विधि के विरुद्ध अपराध है जिस विषय पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है|
  3. उन सभी मामलों में जिनमे दंडादेश मृत्यु दंडादेश है|

राष्ट्रपति अपनी क्षमादान की शक्ति का प्रयोग भी मंत्रिपरिषद के परामर्श से करता है| अमेरिका में राष्ट्रपति केवल अमेरिकी फेडरेशन (केंद्र) के विरुद्ध किये गए अपराध को क्षमा कर सकता है और वह परिक्षण के दौरान और परिक्षण के पश्चात्  तीनो स्थितियों में इस शक्ति का प्रयोग कर सकता है|

क्षमादान एक अनुग्रह है, जिसकी मांग अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती है| क्षमादान केवल दंड को ही समाप्त नहीं करता बल्कि दण्डित व्यक्ति को उस स्थिति में ला देता है, जैसे की उसने अपराध किया ही न हो, अर्थात वह निर्दोष हो जाता है|

लघुकरण (commute) का तात्पर्य है, एक के बदले में दूसरा, अर्थात बड़े दंड को कम करना; जैसे- कठोर कारावास को साधारण कारावास में बदलना

परिहार (remission) का अर्थ है, दंडादेश की मात्रा को उसकी प्रकृति में परिवर्तन किये बिना कम करना है; जैसे एक वर्ष के दंड को घटाकर 6 माह कर देना|

विराम (respite) का अर्थ है किन्ही विशेष कारणों से दंड को कम देना; जैसे गर्भवती स्त्री के मृत्यु-दंडादेश को साधारण कारावास में बदल देना| इसके अंतर्गत दंड को कम भी किया जा सकता है तथाउसकी प्रकृति को बदला जा सकता है|

प्रविलम्ब (reprieve) का अर्थ है मृत्यु दंड का अस्थायी निलंबन करना, जबकि सिद्धदोष व्यक्ति क्षमादान के लिए दंडादेश के लघुकरण के लिए राष्ट्रपति को आवेदन करता है

क्षमादान का प्रयोग परिक्षण के पूर्व, उसके दौरान और उसके पश्चात् सभी स्थितियों में किया जा सकता है|

अनुच्छेद 161 के अधीन राज्य के राज्यपाल को भी किसी सिद्धदोष व्यक्ति के अपराध को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है| किन्तु राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति में निम्नलिखित अंतर है-

  1. राष्ट्रपति को सभी प्रकार के मृत्यु दंडादेश के मामले में क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, जबकि राज्यपाल को मृत्यु दंडादेश के मामले में क्षमादान की शक्ति प्राप्त नहीं है|
  2. राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (कोर्ट-मार्शल) के दंडादेश के मामले में क्षम्दन की शक्ति प्राप्त है, जबकि राज्यपाल को ऐसी शक्ति नहीं प्राप्त है|

अन्य मामलों में, मृत्युदंड के प्रविलंबन, परिहार या लघुकरण के मामले में राज्यपाल की शक्ति राष्ट्रपति के सामान ही है| इस शक्ति का प्रयोग भी, अन्य शक्तियों के समान, मंत्री-परिषद् की सलाह पर किया जा सकता है|

उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति पर विचार करके निम्नलिखित सिद्धांत अधिकथित किए-

  1. जो याची राष्ट्रपति से क्षमा प्रार्थना करता है उसे राष्ट्रपति द्वारा मौखिक सुनवाई किये जाने का अधिकार नहीं है|
  2. इस बात की कोई आवश्यकता नहीं है, की न्यायालय अनुच्छेद 72 के अधीन शक्ति के प्रयोग के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत प्रतिपादित करे|
  3. इस शक्ति का प्रयोग केन्द्रीय सरकार की सलाह पर किया जाएगा|
  4. राष्ट्रपति इस बात के लिए स्वतंत्र है की वह अभिलेख पर जो साक्ष्य है, उसकी समीक्षा करे और न्यायलय द्वारा अपनाए गए मत से भिन्न मत अपनाए|
  5. राष्ट्रपति द्वारा प्रयुक्त शक्ति का न्यायिक पुनर्विलोकन नहीं किया जा सकता|
  6. राष्ट्रपति अपने आदेश का कारण देने के लिए बाध्य नहीं है|

क्षमादान का न्यायिक पुनर्विलोकन 

अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 के अधीन राष्ट्रपति या राज्यपाल के क्षमादान आदेश का पुनर्विलोकन निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है-

  1. आदेश पारित करने में विवेक का प्रयोग नहीं किया गया है,
  2. आदेश असदभावपूर्वक दिया गया है,
  3. आदेश बाहरी और पूर्णतया असंगत बातों पर आधारित है,
  4. सुसंगत सामग्री पर विचार नहीं किया गया है
  5. आदेश मनमाना है

आपातकालीन शक्तियां

संविधान में 3 प्रकार की परिस्थितियों में आपात की उद्घोषणा का उपबंध है-

  1. युद्ध, वाह्य आक्रमण, या सशस्त्र विद्रोह से उत्पन्न आपात – अनुच्छेद 352
  2. राज्यों में संविधानिक तंत्र की विफलता से उत्पन्न होने वाला आपात -  अनुच्छेद 356
  3. वित्तीय आपात – अनुच्छेद 360

यदि राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाए की भारत की या उसके किसी भाग की सुरक्षा को युद्ध या वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से गंभीर संकट है, या राज्यपाल के प्रतिवेदन पर या अन्यथा उसे समाधान हो जाए की ऐसी स्थित उत्पन्न हो गयी है, जिसमे राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलायी जा सकती, या ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसमे भारत की वित्तीय स्थायित्व को खतरा पैदा हो गया है, तो वह आपात की घोषणा कर सकता है|

जहाँ ऐसी उद्घोषणा प्रवर्तन में है, संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तित कराने के लिए वह किसी न्यायाले के प्रचालन के अधिकार को निलंबित कर सकता है| आपातकाल में अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित हो जाता है| केन्द्र सर्कार राज्यों को यह निर्देश दे सकती है कि, वे अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग किस प्रकार करें| इस समय संसद को राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है|

प्रकीर्ण शक्तियां

राष्ट्रपति कार्यपालिका का अध्यक्ष होता है, इसलिए उसे संविधान और संसद के नियमों द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करना होता है| राष्ट्रपति की कुछ महत्वपूर्ण शक्तियां इस प्रकार हैं-

  1. नियम बनाने की शक्ति – अनुच्छेद 309 का परंतुक के अनुसार राष्ट्रपति को, केन्द्र सरकार के अधीन लोक सेवाओं और पदों के लिए भर्ती, नियुक्त व्यक्ति की सेवा शर्तों आदि के लिए नियम बनाने की शक्ति है राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक के सम्बन्ध में नियम बनाने की शक्ति है| राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के आदेशों को प्रवृत्त करने के लिए भी नियम बनाता है| राष्ट्रपति, नियम बनाकर यह निर्देश दे सकता है कि, कौन से मामलों में भारत सरकार को संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श करना आवश्यक नहीं होगा|
  2. अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति को विधि या तथ्य के किसी प्रश्न पर उच्चतम न्यायलय की रे प्राप्त करने की शक्ति है|
  3. अनुच्छेद २१३ के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने के बारे में राज्यपाल को अनुदेश देने की शक्ति है|
  4. राष्ट्रपति कुछ आयोग जैसे, निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग तथा अंतरराज्य परिषद् नियुक्त करता है|
  5. संघ राज्य –क्षेत्रों का प्रशासन राष्ट्रपति के नाम से चलाया जाता है| राष्ट्रपति को इस राज्यक्षेत्रों के लिए नियम बनाने की शक्ति है| ये राज्य हैं- अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा और नागर हवेली, दमन और दीव (अनुच्छेद 240)
  6. राष्ट्रपति को अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में, पिछड़े वर्ग की दशाओं के अन्वेषण और उनको सुधारने के लिए उपाय के बारे में, रिपोर्ट देने के लिए एक आयोग नियुक्त करने की शक्ति है – अनुच्छेद 339 और अनुच्छेद 342|
  7. राष्ट्रपति ऐसी जातियां और मूलवंश या जनजातियाँ विनिर्दिष्ट कर सकता है, जिन्हें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समझा जाए|

भारत के राष्ट्रपति उनका कार्यकाल एवं विशिष्टताएं   

नाम कार्यकाल विशिष्टताएं   
डॉ. राजेंद्र प्रसाद 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 भारत के प्रथम राष्ट्रपति
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन 13 मई 1962 से 13 मई 1967 प्रथम उपराष्ट्रपति
डॉ. जाकिर हुसैन 13 मई 1967 से 13 मई 1969 कार्यकाल के दौरान मृत्यु, प्रथम मुस्लिम राष्ट्रपति
वी.वी. गिरि 13 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 भारत के प्रथम कार्यवाहक राष्ट्रपति
न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्ला 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969 तत्कालीन मुख्य न्यायधीश, द्वितीय कार्यवाहक राष्ट्रपति
वी.वी. गिरि 24 अगस्त 1969 से 24 अगस्त 1974 द्वितीय चक्र की गणना
फखरुद्दीन अली अहमद 24 अगस्त 1974 से 11 फरवरी 1977 कार्यकाल में ही मृत्यु
बी.डी. जत्ती 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977 तृतीय कार्यवाहक राष्ट्रपति
नीलम संजीव रेड्डी 25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982 निर्विरोध निर्वाचित
ज्ञानी जैल सिंह 25 जुलाई 1982 से 25 जुलाई 1987 जेबी वीटो का प्रयोग किया
आर. वेंकट रमण 25 जुलाई 1987 से 25 जुलाई 1992 सर्वाधिक आयु में राष्ट्रपति
डॉ. शंकर दयाल शर्मा 25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997 चार प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया
डॉ. के. आर. नारायणन 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002 प्रथम दलित राष्ट्रपति
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 वैज्ञानिक राष्ट्रपति
प्रतिभा पाटिल 25 जुलाई 2007 से 25 जुलाई 2012 प्रथम महिला राष्ट्रपति
प्रणब मुख़र्जी 25 जुलाई 2012 से अब तक -

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