संसद में विधायी प्रक्रिया The Legislative Process In Parliament

भारतीय संविधान ने वैधानिक विधि के लिए कुछ व्यवस्थाएं निश्चित की हुई हैं। इन व्यवस्थाओं के अतिरिक्त वैधानिक प्रक्रिया के विषय में विस्तृत विवरण लोकसभा और राज्यसभा के विधि नियमों में अंकित हैं। संवैधानिक व्यवस्थाओं के अनुसार वितीय विधेयक को छोड़कर कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। दोनों सदनों में से पारित होने के पश्चात् ही कोई विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। दोनों सदनों में विधेयक के संबंध में मतभेदों को दूर करने के लिए राष्ट्रपति द्वारा दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जा सकता है। इन प्रावधानों को छोड़कर वैधानिक विधि संसद की ओर से निर्मित नियमों पर आधारित है। दोनों सदनों में एक जैसी वैधानिक विधि की व्यवस्था की गई है। प्रत्येक विधेयक को संसद में पास होने के लिए तीन वाचनों से गुजरना आवश्यक है।

संसद में पेश किये जाने वाले विधेयक दो तरह के होते हैं-

  1. सरकारी विधेयक,
  2. गैर-सरकारी विधेयक

सरकारी विधेयक मंत्रिमंडल के सदस्यों द्वारा पेश किये जाते हैं, जबकि गैर-सरकारी विधेयक अन्य सदस्यों द्वारा ले जाते हैं, जो मंत्रिपरिषद के सदस्य नहीं होते हैं।

संसद की विधायी प्रक्रिया में साधारण विधेयक को पास करने की वैधानिक विधि इस प्रकार है-

विधेयक की तैयारी

संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले अधिकांश विधेयक सरकारी होते हैं। इसलिए इसकी तैयारी सरकारी स्तर पर ही होती है। जिस विभाग से सम्बंधित कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाना होता है, उस विभाग का मंत्री अपने विभाग के उच्चाधिकारियों की सहायता से विधेयक की रूपरेखा तैयार करता है। यदि विधेयक का प्रभाव अन्य विभागों पर भी पड़ता हो तो संबंधित विभागों में संवैधानिक शंका हो तो कानून मंत्री तथा महान्यायवादी से विचार-विमर्श किया जाता है ताकि वैधानिक त्रुटियों को दूर किया जा सके। इसके पश्चात् विधेयक की रूपरेखा पर मंत्रिपरिषद गंभीर विचार-विमर्श करके सम्बंधित मंत्री को विधेयक को अंतिम रूप देने के लिए कहती है। जब विधेयक की सम्बंधित मंत्री अंतिम रूप में तैयार कर लेता है तब मंत्रिपरिषद उस विधेयक को सदन में प्रस्तुत करने की स्वीकृति दे देती है। विधेयक की तैयारी में यह विधि केवल सरकारी विधेयक पर ही लागू होती है।

विधेयक प्रस्तुत करना तथा प्रथम पठन

संविधान के अनुच्छेद 107(1) के अनुसार धन या वित्तीय विधेयक से भिन्न साधारण विधेयक किसी भी सदस्य द्वारा किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। जो सदस्य विधेयक प्रस्तुत करता है, उसको एक मास की अग्रिम सूचना सदन के अध्यक्ष या सभापति को देनी पड़ती है। ऐसी सूचना के साथ ही विधेयक को पेश करने के कारण तथा उद्देश्य और विधेयक पर आने वाले व्यय का विवरण आदि वर्णित करना आवश्यक है। इसके बाद अध्यक्ष विधेयक को पेश करने की तिथि निश्चित करता है। निश्चित तिथि के अनुसार विधेयक को पेश किया जाता है। यदि इस अवस्था पर विधेयक का विरोध हो तो सदन का अध्यक्ष विधेयक पेश करने वाले तथा विरोधी सदस्यों को अपने-अपने विचार व्यक्त करने के लिए कहता है। इसके पश्चात् उपस्थित सदस्यों के साधारण बहुमत से विधेयक के संबंध में निर्णय किया जाता है। सदन से आज्ञा मिल जाने पर संबंधित सदस्य विधेयक का शीर्षक पढ़ता है तथा विधेयक के आम सिद्धांतों की जानकारी सदन को देता है। इस अवस्था में विधेयक पर विस्तृत वाद-विवाद नहीं होता है। इस प्रकार विधेयक पेश किए जाने के पश्चात् इसे सरकारी गजट में प्रकाशित कर दिया जाता है और छपी हुई प्रति प्रत्येक सदस्य को दी जाती है। अतः इस तरह विधेयक प्रथम पठन के बाद दूसरे पठन में प्रवेश करता है।

विधेयक को पेश करने की उपरोक्त विधि के अतिरिक्त अध्यक्ष किसी विधेयक की सरकारी गजट में प्रकाशित करने की आज्ञा दे सकता है और ऐसी स्थिति में विधेयक की सदन में पेश करने की आवश्यकता नहीं होती तथा विधेयक का दूसरा पठन आरम्भ कर दिया जाता है। प्रायः सरकारी विधायक को गजट में प्रकाशित कर दिया जाता है और इस विधेयक को प्रत्यक्ष रूप में दूसरे पठन से ही आरम्भ किया जाता है। इसका कारण यह है कि सरकारी विधेयकों को सदन द्वारा स्वीकृति प्राप्त होने के प्रति कोई संदेह नहीं होता है।

विधेयकों की विषय वस्तु के आधार पर उनका वर्गीकरण
मूल विधेयक: जिनमें नए प्रस्तावों, विचारों और नीतियों संबंधी उपबंध होते हैं।संशोधी विधेयक: जिनका उद्देश्य वर्तमान अधिनियमों में रूपभेद करना या संशोधन करना होता है।

समेकन विधेयक: जिनका उद्देश्य किसी एक विषय पर वर्तमान विधियों को समेकित करना होता है। ऐसे विधेयक जिनका उद्देश्य व्यपगत होने वाले अधिनियमों को जारी रखना होता है।

द्वितीय पठन

दूसरे पठन की एक निश्चित तिथि को विधेयक को पेश करने वाला निम्न प्रस्तावों में से किसी एक प्रस्ताव को प्रस्तुत कर सकता है-

  • विधेयक पर सदन में तत्काल विचार किया जाए,
  • विधेयक को किसी प्रवर-समिति को सौंपा जाए,
  • विधेयक को दोनों सदनों की संयुक्त प्रवर-समिति को भेजा जाए,
  • विधेयक के प्रति जनमत जानने के लिए विधेयक को प्रकाशित किया जाए।

सदन केवल उन विधेयकों पर तत्काल विचार करने के लिए सहमत होता है जो विधेयक बहुत अधिक महत्वपूर्ण होते हैं या विवाद से परे होते हैं। प्रायः विधेयक को सम्बंधित प्रवर समिति के पास भेजा जाता है। यदि सदन विधेयक को संयुक्त प्रवर-समिति के पास भेजने के लिए सहमत हो तो विधेयक को दूसरे सदन की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। उसकी स्वीकृति के पश्चात् ही विधेयक को दोनों सदनों की संयुक्त प्रवर-समितियों के पास भेजा जाता है। यदि सदन किसी विधेयक के प्रति जनमत जानने के लिए प्रस्ताव पारित कर दे तो सदन का सचिव तत्काल विधेयक को राज्य सरकारों के पास भेज देता है। राज्य सरकारें विधेयक को अपने गजट में प्रकाशित करके स्थानीय संस्थाओं, अन्य प्रमाणित संस्थाओं तथा प्रसिद्द व्यक्तियों के मतों को एकत्रित करके सदन के सचिव को भेज देती हैं।

सदन में जब उपर्युक्त प्रस्तावों में से कोई एक प्रस्ताव पेश होता है तो विधेयक पर एक सामान्य बहस होती है तथा उस विधेयक के सिद्धांत तथा उसके साधारण प्रावधानों की जानकारी सदन को दी जाती है। विधेयक के समर्थक पक्ष में तथा विरोधी विपक्ष में संक्षिप्त भाषण देते हैं। इस स्तर पर विधेयक के विभिन्न अनुच्छेदों पर कोई वाद-विवाद नहीं होता है और न ही संशोधन पेश किए जा सकते हैं। बहस केवल विधेयक के सामान्य सिद्धांत तथा इसके प्रावधानों तक सीमित रहती है। यह जानना आवश्यक है कि यदि विधेयक को पेश करने वाला उपरोक्त वर्णित प्रस्तावों में से कोई एक प्रस्ताव प्रस्तुत करता है परंतु सदन उस प्रस्ताव पर सहमत नहीं होता तो सदन का बहुमत विधेयक के प्रस्तुतकर्ता के प्रस्ताव को रद्द करके किसी दूसरे प्रस्ताव पर विचार करके उसको पारित कर सकता है।

समिति अवस्था: यदि प्रथम पठन के पश्चात् विधेयक को समिति के पास भेजने का प्रस्ताव पास हो जाने पर उसे प्रवर-समिति को भेज दिया जाता है। विधेयक के प्रस्तुतकर्ता को भी समिति में शामिल किया जाता है ताकि समिति को विधेयक की विस्तृत जानकारी मिलती रहे। अध्यक्ष समिति के सदस्यों की नियुक्ति के समय सत्ताधारी तथा विपक्षी दलों को सदन में उनकी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देता है। समिति में विधेयक संबंधी विषय के विशेषज्ञ अवश्य लिये जाते हैं ताकि विधेयक का भली-भांति अवलोकन हो सके।

यदि विषय को संयुक्त प्रवर-समिति को सौंपने का प्रस्ताव पारित होता है तो समिति के सदस्य दोनों सदनों से लिये जाते हैं तथा लोकसभा तथा राज्यसभा के सदस्यों का अनुपात 2 : 1 होता है। समिति पहले विधेयक के सिद्धांतों पर विचार करती है और फिर एक-एक प्रावधानों पर बहस करती है। समिति के सदस्य संशोधन पेश कर सकते हैं। समिति उन संशोधनों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकती है। समिति साधारण बहुमत से निर्णय लेती है और विरोधी सदस्यों को अपनी असहमति दर्ज कराने की पूर्ण छूट होती है। समिति के अध्यक्ष को निर्णायक मत देने का अधिकार होता है। विधेयक का भली भांति अवलोकन करने के पश्चात् समिति विधेयक को संशोधनों सहित अथवा रहित निश्चित

समय में सदन की वापस भेज सकती है। यदि सदन की ओर से समिति के कार्य करने की अवधि निश्चित न की गई हो तो भी समिति को तीन मास के अंदर अपनी रिपोर्ट देनी पड़ती है।

रिपोर्ट अवस्था: समिति की ओर से रिपोर्ट प्राप्त हो जाने के पश्चात् विधेयक को पेश करने वाला सदन में निम्नलिखित प्रस्तावों में से कोई प्रस्ताव प्रस्तुत करता है-

  • समिति के. रिपोर्ट के आधार पर सदन विधेयक पर विचार करे।
  • विधेयक को पुनः प्रवर समिति के पास भेजा जाए ताकि विधेयक का भलीभांति अवलोकन किया जा सके।
  • जनमत जानने के लिए विधेयक को समिति की रिपोर्ट सहित प्रकाशित किया जाए।

यदि सदन समिति की रिपोर्ट के आधार पर विचार करने का प्रस्ताव स्वीकार कर ले तो सदन विधेयक के एक-एक अनुच्छेद पर बहस करती है और प्रत्येक अनुच्छेद पर सदस्यों का मतदान होता है। सदन के सदस्य प्रत्येक अनुच्छेद संबंधी संशोधन प्रस्ताव पेश कर सकते हैं। परंतु संशोधन प्रस्ताव की सूचना बहस से एक दिन पूर्व देना आवश्यक है। संशोधन प्रस्ताव को स्वीकार अथवा अस्वीकार करना अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि सदन बहस के बाद संशोधन को स्वीकार कर ले तो उसे विधेयक में शामिल कर लिया जाता है। इस प्रकार विधेयक का नया प्रारूप तृतीय पठन के लिए तैयार हो जाता है।

तृतीय पठन

तृतीय पठन में विधेयकको सम्पूर्ण रूप से पारित किया जाता है। इस पठन में विस्तृत बहस नहीं होती और न ही संशोधन पेश किए जाते हैं। यदि विधेयक में भाषा संबंधी कोई त्रुटियां हों तो साधारण संशोधन द्वारा शुद्ध कर दिया जाता है। यदि उपस्थित तथा मत देने वालों का बहुमत विधेयक को सामूहिक रूप में स्वीकार कर ले तो अध्यक्ष सदन की ओर से विधेयक पारित होने की घोषणा कर देता है। लोकसभा में पास होने के पश्चात् अध्यक्ष की ओर से विधेयक को पारित होने का प्रमाण-पत्र प्राप्त हो जाने पर उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है।

दूसरे सदन में पारित किया जाना

एक सदन में से विधेयक को पारित होने के पश्चात् उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है। दूसरे सदन में विधेयक उन सब अवस्थाओं को पार करता है, जिसमें से विधेयक प्रथम सदन में गुजरा था। यदि दूसरा सदन विधेयक को उसी रूप में पारित कर दे तो विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। परंतु यदि दूसरा सदन उसको रद्द कर दे या संशोधन कर दे जो प्रथम सदन को स्वीकार नहीं है या 6 मास तक उस विधेयक पर कोई कार्यवाही न करे तो राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है। संयुक्त अधिवेशन के विधेयक को दोनों सदनों के उपस्थित सदस्य बहुमत से पारित कर दें तो वह विधेयक दोनों सदनों से पारित समझा जायेगा। परंतु संविधान के अनुच्छेद 108 के अनुसार राष्ट्रपति इस अधिकार का प्रयोग मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कर सकता है।

राष्ट्रपति की स्वीकृति

कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना कानून नहीं बन सकता है। इसलिए दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। यदि राष्ट्रपति स्वीकृति दे दे तो उसको भारतीय गजट में प्रकाशित कर दिया जाता है।

इस प्रकार वह विधेयक देश के कानून का रूप धारण करता है। यदि राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकृति देने से इंकार कर दे तथा विधेयक को संसद के पास सुझावों सहित वापस कर दे तो संसद उस विधेयक पर पुनः विचार करती है। यदि संसद विधेयक को पुनः पारित कर दे तो राष्ट्रपति को अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है।

इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि भारतीय वैधानिक विधि इस प्रकार निश्चित की गई है कि जिसके द्वारा विधेयक का पूर्णतः अवलोकन किया जा सके, विरोधी दल जन-विरोधी विधेयकों तथा शासक दल के अत्याचारों का विरोध कर सकें और दृढ़ जनमत स्थापित हो सके।

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