फ़्रांसीसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी The French East India Company

फ्रांसीसियों ने पूर्व में व्यापार करने के लिए 1664 ई. में एक फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का निर्माण किया। इसका नाम कम्पनी इन्डेसेओरियंतलेस था। इस कम्पनी के निर्माण में लुई-चौदहवें के मन्त्री कोलबर्ट ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। सम्राट् लुई ने कम्पनी को एक चार्टर प्रदान किया। जिसके अनुसार 50 वर्ष तक कम्पनी को मेडागास्कर से पूर्व भारत तक व्यापार का एकाधिकार प्राप्त हो गया। कम्पनी को मेडागास्कर और समीपवर्ती टापू भी प्रदान किये गये। कम्पनी की स्थापना फ्राँस के मंत्री कोलबर्ट के प्रयास से हुई। प्रबन्धकारिणी के रूप में 21 संचालकों की एक समिति बनायी गई। कम्पनी की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए लुई ने कम्पनी को 30,00,000 लिवर ब्याज रहित प्रदान किये, जिसमें से कम्पनी को 10 वर्ष में जो भी हानि हो, काटी जा सकती थी। राज-परिवार के सदस्यों, मन्त्रियों और व्यापारियों को प्रोत्साहित किया गया था कि वे कम्पनी में धन लगाये।

लुई ने कम्पनी को विस्तृत अधिकार प्रदान किये। कम्पनी पूर्व के देशों में अपने राजदूत भेज सकती थी, युद्ध की घोषणा कर सकती थी और सन्धि कर सकती थी। लुई ने आश्वासन दिया कि कम्पनी के जहाजों की सुरक्षा के लिए अपने जगी जहाज भेजेगा और कम्पनी को अपने जहाजों पर फ्रांस का राजकीय झंडा फहराने की आज्ञा प्रदान की। कम्पनी के अपने भू-प्रदेशों का प्रशासन देखने के लिए एक गवर्नर-जनरल नियुक्त करने की आज्ञा प्रदान की गई और उसे राजा के लेफ्टिनेंट जनरल की उपाधि से विभूषित किया गया। उसकी सहायता के लिए 7 सदस्यों की एक काउन्सिल बनायी गयी। यह काउन्सिल सर्वप्रथम मेडागास्कर में स्थापित की गई। 1671 में इसे सूरत और 1701 में पाण्डिचेरी ले जाया गया। इस प्रकार पाण्डिचेरी में पूर्व फ्रांसीसियों का प्रमुख केन्द्र बन गया।

सूरत में फ्रेंच फैक्टरी की स्थापना

सूरत मुगल-साम्राज्य का प्रसिद्ध बन्दरगाह और संसार का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था। 1612 ई. और 1618 ई. में यहाँ इंगलिश और डच फैक्टरियों की स्थापना हो चुकी थी। इसके अतिरिक्त मिशनरी, यात्री और व्यापारियों के द्वारा फ्रांसीसियों को मुग़ल-साम्राज्य और उसके बन्दरगाह सूरत के विषय में विस्तृत जानकारी मिल चुकी थी। थेबोनीट, बर्नियर और टेवर्नियर फ्रांस के थे जिन्होंने अपने देशवासियों को भारत के बारे में जानकारी दी है। अत: कम्पनी ने सूरत में अपनी फैक्टरी स्थापित करने का निश्चय किया इस हेतु अपने दो प्रतिनिधि भेजे जो मार्च 1666 ई. में सूरत पहुँचे। सूरत गवर्नर ने इन प्रतिनिधियों का स्वागत किया, परन्तु पहले स्थापित इंगलिश और डच फैक्टरी के कर्मचारियों को एक नये प्रतियोगी का आना अच्छा नहीं लगा। ये प्रतिनिधि सूरत से आगरा पहुँचे, उन्होंने लुई-चौदहवें के व्यक्तिगत पत्र को औरंगजेब को दिया और इन्हें सूरत में फैक्टरी स्थापित करने की आज्ञा मिल गयी। कम्पनी ने केरोन को सूरत भेजा और इस प्रकार 1661 ई. में भारत में सूरत के स्थान पर प्रथम फ्रेंच फैक्टरी की स्थापना हुई।

सूरत की फ्रेंच फैक्टरी के कर्मचारियों की विभिन्न श्रेणियाँ थीं। ये श्रेणियाँ डायरेक्टर, मर्चेण्ट सेक्रेटरी, खजान्ची और कलर्क की थीं। केरोन नव-स्थापित फैक्टरी का डायरेक्टर था। उसके नेतृत्व में फ्रेंच व्यापार का तेजी से विकास हुआ। कम्पनी का मुख्यालय भी फोर्ट डोफिन (मेडागास्कर) से बदल कर सूरत कर दिया गया परन्तु इसी समय कम्पनी ने ऐसी त्रुटि की जिससे उसके व्यापार को बड़ा धक्का लगा। कम्पनी ने सूरत फैक्टरी में एक डायरेक्टर के स्थान पर 4 डायरेक्टर नियुक्त किये और उनको समान अधिकार प्रदान किये क्योंकि चारों डायरेक्टरों को समान अधिकार प्राप्त थे, अत: इनमें साधारण-सी बातों पर झगड़े होने लगे। इससे फ्रांसीसियों के व्यापार और उनकी प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा।

आपसी झगड़ों के अतिरिक्त कम्पनी के कर्मचारियों में व्यापारिक कुशलता का भी अभाव था। इंगलिश और डच व्यापारिक कुशलता में फ्रांसीसियों से आगे थे। फ्रांसीसियों के व्यापार से उन्हें क्या मिल रहा है और इस पर उनका कितना खर्च हो रहा है, इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया। वह अंग्रेजों और डचों की अपेक्षा भारतीय माल को अधिक मूल्य पर खरीदते थे और अपना माल कम मूल्य पर बेचते थे। फ्रेंच शान-शौकत पर अधिक खर्च करते थे। वे मितव्ययी नहीं थे। अपनी समृद्धि का प्रदर्शन करने के लिए वे स्थानीय अधिकारियों को बहुमूल्य उपहार देते थे। इन उपहारों से खर्च की अपेक्षा लाभ कम होता था। इन कारणों से फ्रांसीसियों की आर्थिक स्थिति बिगड़ गयी और उन्होंने सूरत फैक्टरी का त्याग कर दिया।

व्यापारिक शत्रुता

यूरोपीय कम्पनियों में घोर व्यापारिक शत्रुता थी। ये कम्पनियाँ जियो और जीने दो के सिद्धान्त में विश्वास नहीं करती थी। जिस प्रकार ये कम्पनियाँ अपने देश में व्यापारिक एकाधिकार प्राप्त करना चाहती थीं और चार्टर द्वारा उन्हें पूर्व से व्यापार करने का एकाधिकार मिला हुआ था, उसी प्रकार से कम्पनियाँ भारत और सुदूर पूर्व के दूसरे प्रदेशों पर व्यापारिक एकाधिकार प्राप्त करना चाहती थीं। इस कारण इन कम्पनियों में व्यापारिक युद्ध हुए। सत्रहवीं शताब्दी में यह संघर्ष तिकोना था। अंग्रेज़-पुर्तगीज-संघर्ष, डच-पुर्तगीज संघर्ष और अंग्रेज़-डच संघर्ष। अठाहरवीं शताब्दी में यह संघर्ष अंग्रेज़ और फ्रांसीसियों के बीच हुआ।

अंग्रेज़-पुर्तगीज और डच-पुर्तगीज संघर्ष

जैसा कि पहले कहा जा चुका है वास्कोडिगामा ने 1498 ई. में भारत के लिए एक नया समुद्री मार्ग खोजा। इस खोज के आधार पर तथा पोप के पोपल बुल के कारण लगभग एक शताब्दी तक पूर्व के व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार बना रहा। सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेज़ों और डचों ने पुर्तगालियों के इस एकाधिकार को चुनौती दी। अंग्रेजों की अपेक्षा डच पुर्तगालियों के प्रबल शत्रु सिद्ध हुए और डचों ने पुर्तगालियों को मसालों की प्राप्ति के प्रमुख प्रदेश पूर्वी द्वीप समूह, लंका और मालाबार तट से खदेड़ दिया। इसी प्रकार जब ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सूरत में अपनी फैक्टरी स्थापित करने का प्रयत्न किया, पुर्तगालियों के प्रभाव और कुचक्रों के कारण हाकिन्स को अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिली। 1612 ई. में थॉमस वैस्ट के जहाजों पर पुर्तगाली जहाजी बेड़े ने आक्रमण कर दिया। इस समुद्री युद्ध में जो सुआली (सूरत) के मुहाने पर लड़ा गया, पुर्तगालियों की पराजय हुई। इस विजय से अंग्रेजों की प्रतिष्ठा बढ़ गई।

ऐंग्लो-डच युद्ध

अंग्रेज-पुर्तगीज संघर्ष कुछ समय तक चलता रहा। परन्तु एक साझे शत्रु डचों ने दोनों को एक-दूसरे के समीप ला दिया। पुर्तगीज डचों से बहुत तंग थे और उन्होंने अंग्रेजों से मित्रता करने में अपना हित समझा। इसी प्रकार अंग्रेज़ भी पुर्तगालियों की मित्रता के लिए उत्सुक थे क्योंकि इस मित्रता से उन्हें मालाबार-तट पर मसालों के व्यापार की सुविधा प्राप्त होती थी। इस कारण गोवा के पुर्तगीज गवर्नर और सूरत के अंग्रेज प्रैजीडेन्ट में 1635 ई. में एक सन्धि हो गयी। यह मित्रता पुर्तगीज राजकुमारी केथराइन का इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स-द्वितीय से विवाह से और पक्की हो गई। इस विवाह के फलस्वरूप चार्ल्स द्वितीय को बम्बई का द्वीप दहेज में प्राप्त हुआ जिसे उसने 10 पौंड वार्षिक किराये पर कम्पनी को दे दिया।

अंग्रेज़-डच संघर्ष

डच पुर्तगालियों की अपेक्षा अंग्रेजों के अधिक प्रतिद्वन्द्वी सिद्ध हुए। अंग्रेजों और डचों दोनों ही की फैक्टरियाँ सूरत में स्थापित थीं। मसालों के व्यापार के एकाधिकार पर अंग्रेजों और डचों का संघर्ष हो गया। डच मसालों के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहते थे जिसे अंग्रेजों ने चुनौती दी। मालाबार-तट के लिए डचों ने राजाओं से समझौते किये जिसके अनुसार काली मिर्च केवल डचों को ही बेची जा सकती थी। इस समझौते के फलस्वरूप डच कम मूल्य पर काली मिर्च प्राप्त करते थे यद्यपि स्वतन्त्र रूप से बेचने पर अधिक मूल्य प्राप्त किया जा सकता था। अंग्रेजी कम्पनी के मालाबार-तट से काली मिर्च खरीदने के मार्ग में डच हर प्रकार से रोडा अटकाते थे। जो जहाज इंगलिश कम्पनी के लिए काली मिर्च ले जाते थे, इन्हें पकड़ लिया जाता था। इन सब रुकावटों के होते हुए भी इंगलिश कम्पनी मालाबार तट से बड़ी मात्रा में काली मिर्च खरीदने और उसे इंग्लैण्ड भेजने में सफल हो जाती थी।

यद्यपि इंग्लैंड और हालैंड दोनों ही प्रोस्टेंट देश थे, परन्तु व्यापारिक शत्रुता के कारण उनमे शत्रुता के कारण उनमें तीन घमासान युद्ध 1652-54 ई., 1665-66 ई. और 1672-74 ई. में हुए। ब्रिटिश पार्लियामेंट ने अपने देश के व्यापारिक हित के लिए 1651 ई. में जहाजरानी कानून (नेवीगेशन्स ला) पास किया। जहाजरानी कानून डचों के व्यापारिक हित में नहीं थे और उन्होंने उन्हें मानने से इंकार कर दिया। जब प्रथम एंग्लो-डच युद्ध की सूचना मार्च, 1635 में सूरत पहुँची तो अंग्रेज़ बड़े चिंतित हुए और उन्होंने सूरत के मुगल सूबेदारों से डचों के आक्रमणों से रक्षा की प्रार्थना की। इससे प्रतीत होता है कि पूर्व में उस समय डच अंग्रेजों से अधिक शक्तिशाली थे। युद्ध की सूचना मिलते ही एक शक्तिशाली जहाजी सुआली (सूरत) पहुँच गया। मुगल अधिकारियों की सतर्कता के कारण डचों ने सूरत की इंगलिश फैक्टरी पर आक्रमण नहीं किया। यद्यपि स्थल पर संघर्ष नहीं हुआ, परन्तु समुद्र पर अंग्रेज और डचों में कई युद्ध हुए। अंग्रेज़ी जहाज डचों द्वारा पकड़े गये और व्यापार को हानि पहुँची। अन्य दो युद्धों (1665-67 ई. और 1672-74 ई.) में भी व्यापार को आघात पहुँचा। पहले की तरह इन युद्धों के समय भी अंग्रेजों ने मुगल-सरकार से सुरक्षा की प्रार्थना की। स्थल पर कोई युद्ध नहीं हुआ, परन्तु समुद्र पर डचों ने अंग्रेज़ी जहाजों को पकड़ लिया। सन् 1688 ई. की गौरवपूर्ण क्रान्ति से जिसमें विलियम इंग्लैण्ड का राजा बन गया, अंग्रेज़-डच सम्बन्ध सुधर गये।

डेनिस कम्पनी

डेनिस कपनी का आगमन 1616 ई. में हुआ। 1620 ई. में तमिलनाडु के टूकोबर नामक क्षेत्र में इसने व्यापारिक केन्द्र खोला। बाद में यह वापस चली गई।

आगे चलकर पुर्तगाली भी गोवा तक सीमित हो गए और ब्रिटिश और फ्रेंच कंपनियाँ ही रह गई। कर्नाटक के युद्धों में फ्रांसीसियों का भाग्य भी तय हो गया।

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