इंगलिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी The English East India Company

1579 ई. में विलियम ड्रेक ने पूर्वी क्षेत्र का भ्रमण किया। 1578 ई. में स्पेनिश आर्मडा की हार हुई और इसी के साथ ब्रिटेन की नौसैनिक श्रेष्ठता स्थापित हो गई। 1599 में ब्रिटिश मर्चेन्ट एडवेंचर कम्पनी की स्थापना हुई। इंग्लैण्ड की महारानी एलिजाबेथ ने 31 दिसम्बर, 1600 ई. को एक चार्टर प्रदान किया जिसके अनुसार इंगलिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का जन्म हुआ। कम्पनी ने भारतवर्ष से व्यापार करने का निश्चय किया और इस हेतु विलियम हॉकिन्स को मुग़ल सम्राट् से बातचीत करने भेजा। हाकिन्स अपने साथ इंग्लैण्ड के सम्राट् जेम्स प्रथम का, मुगल सम्राट् अकबर के नाम एक पत्र भी ले गया जिसमें मुगल-साम्राज्य में व्यापार करने की प्रार्थना थी। हाकिन्स 24 अगस्त, 1608 ई. को मुग़ल-साम्राज्य के प्रमुख बन्दरगाह सूरत पहुँचा। पुर्तगालियों ने अंग्रेजों के मार्ग में हर प्रकार की बाधा डाली और हाकिन्स को सूरत में फैक्टरी स्थापित करने की आज्ञा न मिल सकी। सूरत के गवर्नर ने हाकिन्स को मुग़ल-सम्राट् जहाँगीर से मिलने का परामर्श दिया। जहाँगीर ने हाकिन्स का स्वागत किया, परन्तु पुर्तगालियों के कुचक्रों के कारण अपने कार्य में हाकिन्स को सफलता न मिल सकी। 1611 ई. में निराश होकर हाकिन्स आगरा से चल दिया।

हेनरी मिडिलटन को 1611 ई. में पुर्तगालियों के विरुद्ध विजय प्राप्त हुई। स्थानीय अधिकरियों की दृष्टि में इस विजय ने अंग्रेजों की प्रतिष्ठा बढ़ा दी, परन्तु पुर्तगालियों के विरोध के कारण अंग्रेजी कम्पनी को कोई व्यापारिक सुविधा न प्राप्त हो सकी। सितम्बर 1612 ई. में थॉमस वेस्ट अपने छोटे से जहाजी बेड़े के साथ सूरत के बन्दरगाह पर पहुँचा। यहाँ उसका स्वागत हुआ। यह देखकर पुर्तगाली चौकन्ने हो गये और उन्होंने गोवा से एक शक्तिशाली जहाजी बेड़ा अंग्रेज़ी जहाजों पर आक्रमण करने भेजा। पुर्तगाली जहाजी बेडे ने 22 अक्टूबर 1612 ई. को अंग्रेजी बेड़े पर आक्रमण कर दिया। इस समुद्री युद्ध में, जो सुआली के मुहाने पर लड़ा गया, अंग्रेजों की विजय हुई। अंग्रेजों की प्रतिष्ठा बढ़ गयी और उन्हें सूरत में इंगलिश फैक्ट्री स्थापित करने की आज्ञा मिल गयी। 1612 में प्रथम इंगलिश फैक्ट्री सूरत में स्थापित हुई। इस समझौते की पुष्टि के लिए सम्राट् से प्रार्थना की गई। मुग़ल-सम्राट् जहाँगीर ने एक फरमान दिनांक 11 जनवरी 1613 ई. के द्वारा सूरत के अधिकारियों द्वारा किये गये समझौते की पुष्टि करते हुए कम्पनी को सूरत में अपनी फैक्ट्री स्थापित करने की स्वीकृति प्रदान कर दी तथा 3½ प्रतिशत कस्टम-ड्यूटी निश्चित की।

अपने कुचक्रों को पुर्तगालियों ने जारी रखा। अधिकारियों पर दबाव डालने के लिए उन्होंने लाल सागर से लौटते हुए सूरत के एक मूल्यवान जहाज को पकड़ लिया, यद्यपि उसके पास पुर्तगालियों की अनुमति थी। मुगल-सम्राट् जहाँगीर पर भी पुर्तगालियों ने दबाव डाला कि वह अंग्रेजों को दी गयी व्यापारिक सुविधाओं को वापस ले ले। मुग़ल-दरबार में पुर्तगालियों के इन कुचक्रों का मुकाबला करने के लिए अंग्रेज़ों ने भी एक राजदूत भेजने का निश्चय किया। इसके लिए सर टॉमस रो को चुना गया। वह अपने साथ मुगल-सम्राट् जहाँगीर के लिए जेम्स प्रथम का एक पत्र भी लाया, जिसमें प्रार्थना की गई थी कि उन्हें (अंग्रेज़ो की) दूसरों की शत्रुता ईर्ष्या अथवा बहकाने पर किसी प्रकार की असुविधा न हो और उनके व्यापार को हानि न पहुँचे। आपके बन्दरगाह सुआली और सूरत में, उनके (अंग्रेज़ों के) जहाजों पर पुर्तगालियों ने आक्रमण किये हैं, यद्यपि उन्होंने (अंग्रेजों ने) इन आक्रमणों से अपनी रक्षा करते हुए अपनी शक्ति का अच्छा प्रदर्शन किया है, फिर भी आपसे प्रार्थना है कि उन भागों में आप उन्हें (अंग्रेजों को) सहायता प्रदान करें और उनकी रक्षा करें। रो का सम्राट् जहाँगीर ने स्वागत किया। उसके प्रयत्नों से अंग्रेजों की स्थिति सुदृढ़ हो गई, परन्तु वह निश्चित संधि मुग़ल-सम्राट् और इंग्लैण्ड के सम्राट् के बीच कराने में सफल न हो सका। 1619 में रो के इंग्लैण्ड जाने के समय तक सूरत, आगरा, अहमदाबाद और भड़ौच में अंग्रेजों की फैक्टरियाँ स्थापित हो गई थीं।

संगठन-सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक इंगलिश ईस्ट इंडिया कम्पनी की फैक्ट्रियाँ दो प्रैज़ीडेटों के अन्तर्गत संगठित थीं। इसमें से एक सूरत की अंग्रेज़ी फैक्टरी का प्रैज़ीडेंट था। सूरत प्रैजीडेंट के अधीन पश्चिमी भाग में स्थित फैक्ट्रियाँ, दक्षिण भारत में मालाबार तट स्थित राजापुर की फैक्ट्री, फारस और लालसागर स्थित फैक्ट्रियाँ थीं। सूरत के प्रैजीडेंसी के अधीन निम्नलिखित फैक्ट्रियाँ थीं-

(1) सूरत, (2) अहमदाबाद, (3) आगरा, (4) थट्टा (सिंध), (5) गोमरूप (बन्दर अब्बास) तथा (6) इस्पहान (फारस)।

1657 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पूर्व में स्थित अपनी समस्त फैक्टरियों को सूरत प्रैजीडेंसी के अधीन कराने का निश्चय किया। इस प्रैजीडेसी के अन्तर्गत 4 शाखाएँ थीं, जो एजेण्ट और काउन्सिल के अधीन थीं, ये शाखाएँ थीं-

(1) कोरोमण्डल-तट, (2) बंगाल, (3) फारस एवं (4) बांटाम।

अंग्रेजों की फैक्ट्री कोरोमण्डल-तट पर मछलीपट्टम और फोर्टसेण्ट जार्ज में स्थापित थी। पूर्वी भारत में उड़ीसा में बालासोर और हरिहरपुर में बंगाल में हुगली और कासिम बाजार, बिहार में पटना में स्थापित थीं। 1652 ई. में पूर्वी प्रैजीडेंसी का मुख्यालय बाण्टाम को हटाकर फोर्ट सेन्ट जार्ज कर दिया गया। 1658 ई. में पूर्वी बंगाल, बिहार, उड़ीसा और कोरोमण्डल तट पर स्थित फैक्टरियाँ सेन्ट जार्ज (मद्रास) के अधीन कर दी गयीं। बंगाल में कम्पनी अधिक सुविधाएँ प्राप्त करने में सफल हुई। 1651 ई. में बंगाल के सूबेदार शाहशुजा ने 3,000 रुपये वार्षिक के बदले कम्पनी को समस्त सीमा-शुल्कों से मुक्त कर दिया। 1698 ई. में कम्पनी को तीन गाँवों-सतनुती, कालीकत्ता और गोविन्दपुर की जमींदारी प्राप्त हुई, इससे एक नये नगर कलकत्ता का जन्म हुआ। 1700 ई. में बंगाल में स्थित फैक्टरियाँ एक प्रैजीडेट और काउंसिल के अधीन कर दी गयीं, जिसका मुख्यालय फोर्ट विलियम (कलकत्ता) में था। इस प्रकार सत्रहवीं शताब्दी की समाप्ति पर कम्पनी की फैक्टरियाँ तीन महत्त्वपूर्ण स्थानों-पश्चिमी तट पर सूरत और बम्बई, दक्षिणी-पूर्वी तट पर मद्रास और पूर्व में कलकत्ता में स्थापित थीं। 1717 ई. में सम्राट् फर्रुखसियर ने एक फरमान द्वारा अंग्रेजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी को 3,000 रुपये के बदले बिना कोई अन्य कर दिये व्यापार करने की सुविधा को पक्का कर दिया। फरूखसियर के समय ब्रिटिश अधिकारी जॉन सुरमन आया था। सूरत में केवल दस हजार रुपये वार्षिक देकर कम्पनी समस्त सीमा-शुल्कों से मुक्त हो गई और बम्बई की टकसाल में ढाले गये कम्पनी के सिक्कों के समस्त मुगल-साम्राज्य में प्रचलन की अनुमति प्रदान की गयी। यह फरमान कम्पनी के लिए बड़ा लाभप्रद सिद्ध हुआ और कम्पनी की स्थिति सुदृढ़ हो गयी।

बम्बई की प्राप्ति

बम्बई का द्वीप चार्ल्स सेकिण्ड को इनफैण्टा केथराइन से शादी के रूप में पुर्तगाल के सम्राट् से प्राप्त हुआ। वास्तव में बम्बई द्वीप देकर पुर्तगाली डचों के विरुद्ध अंग्रेजों की सहायता प्राप्त करना चाहते थे। एक गुप्त संधि के द्वारा चाल्र्स सेकिण्ड ने पूर्व में पुर्तगालियों की बस्तियों की डचों के आक्रमणों से रक्षा करने तथा पुर्तगाल सम्राट् और नीदरलैण्ड के स्टेट्स जनरल के बीच स्थायी शांति स्थापित करने हेतु प्रयत्न करने का वचन दिया। 1661 ई. में चार्ल्स सेकिण्ड ने मार्लवरो के अधीन एक जहाजी बेड़ा बम्बई द्वीप को प्राप्त करने के लिए भेजा। 18 सितम्बर, 1662 ई. को मार्लवरो बम्बई पहुँचा, परन्तु बम्बई का पुर्तगाली गवर्नर जो इस निर्णय से प्रसन्न नहीं था, किसी-न-किसी बहाने बम्बई के हस्तान्तरण को टालता रहा। मार्लवरो इंग्लैण्ड वापस लौट गया।

पुर्तगाली सम्राट् ने पुनः बम्बई गवर्नर को आदेश भेजा और 1665 ई. में बम्बई के द्वीप को अंग्रेजों को सौंप दिया। साथ-ही-साथ उसने पुर्तगाल के सम्राट् को बम्बई का महत्त्वू बताते हुए लिख दिया- भारत (पुर्तगालियों के लिए) उसी दिन खो जाएगा जिस दिन अंग्रेजों को बम्बई सौंप दिया जाएगा। चार्ल्स सेकिण्ड को 10 पौण्ड वार्षिक के मामूली किराये पर 27 मार्च, 1668 ई. को दे दिया। कम्पनी ने अपने अधिकारियों को बम्बई द्वीप प्राप्त करने के निर्देश भेज दिये। बम्बई द्वीप को सूरत प्रैजीडेंसी के अधीन रखा गया। सूरत फैक्टरी के प्रैज़ीडेंट सर जार्ज आक्सिण्डन को बम्बई द्वीप का गवर्नर और कमाण्डर-इन-चीफ़ नियुक्त किया गया।

अंग्रेजों ने बम्बई का तेजी से विकास किया। बम्बई को वस्त्र-उद्योग का केन्द्र बनाने के लिए कम्पनी के जुलाहों को बम्बई में बसने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्हें हर सुविधा देने का वचन दिया। कम्पनी के प्रोत्साहन पर बहुत से जुलाहे यहाँ आकर बस गये। यहाँ रुई और धागे सूरत और कैम्बे से लाये जाते थे। 1686 ई. में कम्पनी के डायरेक्टरों ने बम्बई को सूरत के स्थान पर अपनी सरकार का मुख्यालय बनाया परन्तु 17वीं शताब्दी के अन्त तक सूरत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापार का प्रमुख केन्द्र बना रहा। अठारहवीं शताब्दी में सूरत के पतन के बाद बम्बई कम्पनी के व्यापार का प्रमुख केन्द्र हो गया।

कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार

कम्पनी के कर्मचारियों के वेतन कम थे। अपनी आय को बढ़ाने के लिए कर्मचारी अपना निजी व्यापार करते थे। निजी व्यापार ही कम्पनी की सेवा में कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण था। अपने कर्मचारियों द्वारा किया गया व्यापार कम्पनी के लिए हानिकारक था। इस निजी व्यापार को रोकने के लिए कम्पनी ने समय-समय पर आदेश जारी किये। कर्मचारियों को निजी व्यापार न करने की शपथ लेनी होती थी। जहाजों के कप्तान को एक बॉण्ड इस आशय का भरना होता था कि वह कम्पनी के माल के अतिरिक्त अन्य माल न इंग्लैंड लायेंगे और न इंग्लैंड से ले जायेंगे। निजी माल पकड़ा जाने पर कम्पनी उसे जब्त कर लेती थी। जब कम्पनी के संचालकों को यह सूचना मिली कि उनके कर्मचारी कम्पनी के जहाजों में भारत के एक बन्दरगाह से दूसरे बन्दरगाह को अपना निजी माल भेजकर खूब कमा रहे हैं, तब उन्होंने सूरत के प्रैजीडेण्ट को कठोर आदेश भेजे कि इस निजी व्यापार को तुरन्त बन्द किया जाये और निजी व्यापार करने वाले कर्मचारियों को कम्पनी से बखास्त करके इंग्लैंड भेज दिया जाय।

कम्पनी के कर्मचारी कभी-कभी भारतीय व्यापारियों से गुप्त साझेदारी करके लाभ कमाते थे। भारतीय व्यापारी कस्टम ड्यूटी और अन्य राहदरी करों में कम्पनी को रियायत होने के कारण इस गोपनीय साझेदारी में जाते थे। कम्पनी को जब पता चला कि इस प्रकार माल फारस को तब उसने इसके विरुद्ध सूरत प्रैज़ीडेन्सी को कठोर चेतावनी भेजी।

कम्पनी के कर्मचारी कभी-कभी कम्पनी के धन को अपने निजी व्यापार में ले आते थे और इस प्रकार कम्पनी को बड़ी हानि पहुँचती थी। कम्पनी के संचालकों ने अपने एक आदेश दिनांक 21 अक्टूबर, 1679 ई. के द्वारा कठोर चेतावनी देते हुए कहा कि- जो कर्मचारी कंपनी के धन का इस प्रकार प्रयोग करेंगे, इन्हें कंपनी की नौकरी से निकल दिया जाएगा और कंपनी से मिलने वाली समस्त सुविधाओं से उन्हें वंचित कर दिया जाएगा।

निजी व्यापार के विरुद्ध कठोर आदेशों के होते हुए भी, कम्पनी निजी व्यापार को पूर्ण रूप से रोकने में सफल न हो सकी। यह देखकर कम्पनी ने कुछ निर्धारित वस्तुओं में निजी व्यापार की अनुमति प्रदान कर दी, परन्तु निजी व्यापार की वस्तुओं को कम्पनी के रजिस्टर में दर्ज कराना अनिवार्य कर दिया गया, जिसकी सूचना कम्पनी के संचालकों को देनी पड़ती थी।

महारानी एलिजाबेथ ने इंगलिश ईस्ट इंडिया कम्पनी को 1600 ई. में चार्टर द्वारा पूर्व से व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया था। जिन व्यापारियों को व्यापार करने का अधिकार नहीं मिला था, वे अनाधिकृत रूप से व्यापार करते थे। जेम्स प्रथम और चार्ल्स प्रथम ने व्यक्तिगत व्यापारियों को पूर्व से स्वतन्त्र रूप से व्यापार करने के लाइसेंस दिये। कॉमनवेल्थ के समय में अनधिकृत व्यापारियों की गतिविधियाँ अधिक बढ़ गयीं। 1660 ई. में राजतंत्र की पुन: स्थापना पर कम्पनी को चार्ल्स द्वितीय ने अधिक सुविधाएँ प्रदान कीं। चाल्र्स द्वितीय ने कम्पनी को यह अधिकार दिया कि वह इन अनाधिकृत व्यापारियों को बन्दी बनाकर इंग्लैंड भेज दे। कम्पनी के संचालकों ने सूरत प्रैजीडेन्सी को आदेश भेज दिये कि इन अनाधिकृत व्यापारियों को बन्दी बनाकर इंग्लैंड भेज दिया जाये।

1688 ई. की गौरवपूर्ण क्रान्ति (गोरियास रिवाल्यूशन) ने विलियम को इंग्लैंड का राजा बनाया और पार्लियामेन्ट की प्रभुता का युग प्रारम्भ हो गया। इस प्रकार राजा द्वारा किया गया व्यापारिक एकाधिकार पार्लियामेन्ट के कानून के द्वारा रद्द किया जा सकता था। एक अनाधिकृत व्यापारी ने हाऊस ऑफ कॉमन्स की एक कमेटी के समक्ष कहा कि वह पूर्व से व्यापार करना कोई अपराध नहीं समझता और तब तक व्यापार करता रहेगा जब तक इसके विरुद्ध पार्लियामेन्ट कानून नहीं बनाती। इंग्लैंड की पार्लियामेन्ट ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसके द्वारा पूर्व से व्यापार करना सब अंग्रेजों का अधिकार है, जब तक इसके विरुद्ध पार्लियामेन्ट कोई कानून नहीं बनाती।

पार्लियामेन्ट के इस प्रस्ताव से अनाधिकृत व्यापारियों को बड़ा प्रोत्साहन मिला। उन्होंने एक विरोधी कम्पनी का निर्माण किया। सरकार को धन की आवश्यकता थी। इस विरोधी कम्पनी ने 20 लाख पौंड 8 प्रतिशत ब्याज पर सरकार को देने का प्रस्ताव किया। साथ ही सरकार से एक चार्टर प्रदान करने की प्रार्थना की। सरकार ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 1698 ई. में पार्लियामेन्ट के एक एक्ट द्वारा नयी कम्पनी का जन्म हुआ। सरकार ने पुरानी कम्पनी को तीन वर्ष तक का नोटिस दे दिया।

दो कम्पनियाँ और परस्पर संघर्ष

इस प्रकार दो कम्पनियाँ भारत से व्यापार करने लगीं, क्योंकि तीन वर्ष की नोटिस मिलने पर पुरानी कम्पनी को भी 29 सितम्बर, 1701 ई. तक पूर्व से व्यापार करने का अधिकार था। इस प्रकार भारत में दोनों कम्पनियों के कर्मचारियों में झगड़ा प्रारम्भ हो गया। नयी कम्पनी के प्रैजीडेंट सर निकोलस वेंट ने मुग़ल-अधिकारियों को सूचित किया कि उनकी कम्पनी को भारत से व्यापार करने का एकाधिकार इंग्लैंड की पार्लियामेन्ट द्वारा प्राप्त है और पुरानी कम्पनी के कर्मचारी किसी भी दिन कम्पनी के कर्जों को बिना चुकाये भारत को छोड़ कर जा सकते हैं। उससे स्थानीय व्यापारियों के मन में सन्देह पैदा हो गया। सम्राट् विलियम ने सर विलियम नोरिस को अपना विशेष दूत बनाकर मुग़ल-दरबार में भेजा। नोरिस का उद्देश्य नयी कम्पनी के लिए व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करना था। विलियम नोरिस को यह निर्देश था कि वह यह स्पष्ट कर दे कि नयी कम्पनी का पुरानी कम्पनी के ऋणों से कोई सम्बन्ध नहीं है। सर विलियम नोरिस ने औरंगजेब को बहुमूल्य उपहार दिये। उसने मुग़ल-सम्राट् को सूचित किया कि नई कम्पनी को चार्टर प्रदान किया गया है और पुरानी कम्पनी समाप्त कर दी गई है। सम्राट् से उसने प्रार्थना की कि पुरानी कम्पनी के कर्मचारियों को मुग़ल-साम्राज्य में व्यापार करने की आज्ञा न दी जाये।

पुरानी कम्पनी के कर्मचारी भी चुप नहीं थे। उन्होंने मुगल-दरबारियों को समझाया कि वह ही वास्तविक कम्पनी है जो राजकीय चार्टर के आधार पर व्यापार कर रही है और नयी कम्पनी के सदस्य भी अंग्रेजू व्यापारी हैं जिनको भारत से व्यापार करने की आज्ञा मिल गई है। मुगल-सम्राट् का उत्तर यह था कि मुग़ल-बन्दरगाह सब व्यापारियों के लिए खुले हुए हैं और वह पुरानी कम्पनी के कर्मचारियों को अपने साम्राज्य से नहीं निकाल सकता। सर विलियम नोरिस अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुआ।

दोनों कम्पनियों का एक होना

दोनों कम्पनियों ने अनुभव किया कि आपसी संघर्ष दोनों को विनाश के कगार पर ले जायेगा। इंग्लैंड का जनमत दोनों कम्पनियों को एक करने के पक्ष में था। दोनों कम्पनियों में समझौते की बातचीत चली। दोनों कम्पनियों ने अपने सात-सात प्रतिनिधि बातचीत के लिए चुने। 1702 ई. में दोनों कम्पनियों में समझौता हो गया और दोनों कम्पनियों की एक संयुक्त कम्पनी बन गई।

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