अधीनस्थ न्यायालय Subordinate Courts

उच्च न्यायालयों के अधीन कई श्रेणी के न्यायालय होते हैं इन्हें संविधान में अधीनस्थ न्यायालय कहा गया है। इनका गठन राज्य अधिनियम कानून के आधार पर किया गया है। विभिन्न राज्यों में इनके अलग-अलग नाम और अलग-अलग दर्जे हैं लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य में इनके संगठनात्मक ढांचे में समानता है। प्रत्येक राज्य जिलों में बंटा हुआ है और प्रत्येक जिले में एक जिला अदालत होती है। इस जिला अदालत का उस जिले भर में अपील संबंधी क्षेत्राधिकार होता है। इन जिला अदालतों के अधीन कई निचली अदालते होती हैं, जैसे- अतिरिक्त जिला अदालत, सब कोर्ट, मुंसिफ मजिस्ट्रेट अदालत, द्वितीय श्रेणी विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत, रेलवे के लिए विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत, कारखाना कानून और श्रम कानूनों के लिए विशेष मुंसिफ मजिस्ट्रेट अदालत आदि। जिला अदालत का मुख्य कार्य अधीनस्थ न्यायालयों से आई अपीलों को सुनना है लेकिन अदालत विशेष हैसियत के तौर पर मूल मामलों को भी अपने हाथ में ले सकती है। उदाहरण के लिए भारतीय उत्तराधिकार कानून, अभिभावक और आश्रित कानून तथा भूमि अधिग्रहण कानून आदि से संबंधित मामलों की सुनवाई भी कर सकती है।

अधीनस्थ न्यायालयों में एक जिला न्यायाधीश का न्यायालय और दूसरा मुंसिफ न्यायाधीश का न्यायालय होता है। जिला स्तर के अधीनस्थ न्यायालय की जिला न्यायाधीश या सत्र न्यायाधीश के न्यायालय के नाम से जाना जाता है। इस स्तर के न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीश, संयुक्त न्यायाधीश और सहायक न्यायाधीश की अदालतें सम्मिलित होती हैं। जिला न्यायाधीश और सत्र न्यायाधीश का न्यायालय, जिला स्तर पर आरंभिक क्षेत्राधिकार का मुख्य न्यायालय होता है। संविधान के प्रावधानों के अनुसार, एक ही अधिकारी दीवानी और फौजदारी कानूनों के तहत् कार्य करता है और वह जिला एवं सत्र न्यायाधीश के नाम से जाना जाता है। इन न्यायालयों का वित्तीय अधिकार क्षेत्र सीमित नहीं होता है। ये न्यायालय उन मामलों की भी सुनवाई कर सकते हैं जिसमें अधिकतम सजा एक वर्ष से अधिक न हो।

अधीनस्थ न्यायालयों की दूसरी श्रेणी के न्यायालय मुंसिफ न्यायाधीश या दीवानी न्यायाधीश या प्रथम श्रेणी के ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट के न्यायालय के नाम से जाने जाते हैं। सामान्यतया इन न्यायालयों की स्थापना प्रखंड (तहसील) स्तर पर की जाती है, जिसके अधिकार क्षेत्र में अनेक तालुकें या तहसीलें हो सकती हैं।

जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति

संविधान के अनुच्छेद 233(1) के अनुसार किसी राज्य का राज्यपाल जिला न्यायाधीश की नियुक्ति संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से करता है। दूसरा, अनुच्छेद 233(2) के अनुसार जो व्यक्ति केंद्र या राज्य की सेवा में पहले से नहीं है वैसी स्थिति में उस व्यक्ति को कम से कम सात वर्ष का अधिवक्ता का अनुभव हो, साथ ही उच्च न्यायालय ने उसकी नियुक्ति की सिफारिश की हो। संविधान के अनुच्छेद 234 के अनुसार राज्यपाल जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्ति को भी जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कर सकता है किंतु वैसे व्यक्ति, राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा अथवा उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद ही राज्यपाल द्वारा जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किये जा सकते हैं।

अधीनस्थ न्यायालयों की स्वतंत्रता

संविधान में अधीनस्थ न्यायालयों की स्वतंत्रता की व्यवस्था की गई है। जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति आदि राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद की जाती है।

त्वरित न्याय हेतु अन्य न्यायिक तंत्र

परिवार न्यायालय

परिवार न्यायालयों की स्थापना परिवार न्यायालय अधिनियम 1984 द्वारा की गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य विवाह तथा अन्य पारिवारिक मुद्दों को निपटाना है। राज्य सरकार उन क्षेत्रों में जहां की आबादी 10 लाख से अधिक हो, अथवा जहां आवश्यक समझे, परिवार न्यायालय की स्थापना कर सकती है। कुल मिलाकर इन न्यायालयों की स्थापना का अर्थ है- पारिवारिक वातावरण में सौहार्दपूर्ण स्थिति उत्पन्न करना। साथ ही यदि कोई पारिवारिक समस्या है तो उसका यथाशीघ्र समाधान करना। गौरतलब है कि इन निर्णयों में कुटुम्ब संघों की मदद ली जा सकती है। परिवार न्यायालय के आदेशों एवं निर्णयों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।

प्रशासनिक अधिकरण

अधिकरण एक निकाय है जो न्यायनिर्णयन का कम जरता है। सभी न्यायालय अधिकरण होते हैं, किंतु सभी अधिकरण न्यायालय नहीं होते। अधिकरण की स्थापना किसी सोसायटी या गैर-सरकारी संस्था द्वारा भी की जा सकती है। ऐसे अधिकरणको घरेलू अधिकरण कहते हैं। आधुनिक राज्य के उदय के साथ अब राज्य अनेक प्रकार के कृत्य कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप अधिकरणों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। यह अधिकरण अधिनियमों द्वारा बनाए जाते हैं और उस अधिनियम के क्षेत्र में आने वाले विवादों और न्यायिक कल्प विषयों पर निर्णय देने का काम उन्हें सौंपा जाता है।

42वां संशोधन संसद द्वारा उस कुख्यात आपात के दौरान पारित किया गया था जिसकी घोषणा श्रीमती इंदिरा गांधी ने की थी। उससे संविधान में इतने परिवर्तन और उपांतरण किए गए कि उसने अपनी पहचान खो दी थी। आपात के तुरंत बाद अधिकांश संशोधन या तो निरसित कर दिए गए या प्रतिस्थापित कर दिए गए जिससे संविधान (लगभग) पूर्ववत् हो गया। किंतु भाग 14क (अधिकरणों से संबंधित) जिसे 42वें संशोधन द्वारा 3-1-1977 से अंतःस्थापित किया था, हटाया नहीं गया-उसे बनाए रखा गया।

इस भाग में दो अनुच्छेद हैं अनुच्छेद 323 क और 323 ख। इन दोनों ही अनुच्छेदों में संसद को यह शक्ति दी गई कि वह विधि अधिनियमित करके अधिकरण बना सकती है। संसद द्वारा बनाई  गई विधि से अनुच्छेद-136 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता को छोड़कर सभी न्यायालयों की अधिकारिता को छोड़कर सभी न्यायालयों की अधिकारिता अपवर्जित की जा सकती है। इस उपबंध का प्रभाव यह हुआ कि उच्च न्यायालय के अनुच्छेद 226 और 227 के अधीन शक्तियां किसी अधिकरण के संबंध में समाप्त की जा सकती थीं। एक प्रकार से इन अधिकारणों को उच्च न्यायालय के समक्ष रखा गया।


चंद्रकुमार मामले में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय की शक्तियों को कम किए जाने पर विचार किया और इस प्रकार अधिकथित किया-

  1. अनुच्छेद 226 और 227 के अधीन उच्च न्यायालयों को और अनुच्छेद-32 के अधीन उच्चतम न्यायालय को जो अधिकारिता दी गई है वह संविधान की उस आधारिक संरचना का भाग है जिसको नष्ट नहीं किया जा सकता। यह अधिकारिता समाप्त नहीं की जा सकती।
  2. अधिकरणों के विनिश्चय अनुच्छेद-226 और अनुच्छेद-227 के अधीन उच्च न्यायालय की रित अधिकारिता के अधीन होंगे किन्तु उनकी सुनवाई उच्च न्यायालय की खंडपीठ में होगी, एकल पीठ में नहीं।
  3. अनुच्छेद 323 (क) और 323 (ख) के सुसंगत खंड जो उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता को अपवर्जित करते हैं, शून्य हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 323 (क) के तहत् 1 नवंबर, 1985 को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना की गई, जिससे केंद्र सरकार के कर्मचारियों को नौकरी से संबंधित मामलों में शीघ्र तथा कम खर्चे में न्याय मिल सके। इस अधिकरण की केंद्रीय शाखा नई दिल्ली में है तथा अन्य 16 शाखायें विभिन्न उच्च न्यायालयों से सम्बद्ध हैं। इस अधिकरण को संबंधित विषय के सभी अधिकार क्षेत्र, शक्ति तथा अधिकार प्राप्त हैं। यह अधिकरण केंद्रीय सरकार में लोक सेवा आयोग द्वारा नियुक्त कर्मचारियों की नियुक्ति तथा सेवा शर्तों से संबंधित विवादों का निर्णय करता है।

अनुच्छेद 323(ख) के तहत्, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के प्रावधानों के अंतर्गत राज्य सरकार भी राज्य प्रशासनिक अधिकरण की स्थापना कर सकती है। इस अधिकरण में राज्य सरकार के कर्मचारियों की नौकरी एवं सेवा शर्तों की समस्याओं को निपटाया जाता है। इस प्रावधान के अनुसार मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडीशा, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में राज्य प्रशासनिक अधिकरणों की स्थापना की गई है। वर्तमान समय में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की 17 क्षेत्रीय न्यायपीठ हैं।

लोक अदालत

लोक अदालत का अभिप्राय है- जनता का न्यायालय। लोक अदालत की स्थापना के दो महत्वपूर्ण कारण हैं-

  1. शीघ्र न्याय: भारत जैसे देश में लाखों विवादों का पुलिंदा न्यायालयों में वर्षों से पड़ा हुआ है। कई ऐसे भी विवाद हैं जिनके वादी-प्रतिवादी दोनों की मृत्यु हो चुकी है परंतु न्याय नहीं मिल पाया। छोटे विवादों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है, जैसे- पारिवारिक समस्याओं से संबंधित विवाद। अतः लोक अदालत, शीघ्र न्याय की धारणा पर स्थापित न्याय व्यवस्था है, जिसमें आपसी सौहार्द और समझौते को मूल उद्देश्य के रूप में प्रयोग किया जाता है।
  2. मितव्ययी न्याय: यह सत्य है कि यदि न्याय मिलने में जितना अधिक समय लगेगा उतना ही खर्च भी बढ़ता जायेगा। इसमें दो तरफा खर्चे बढ़ते हैं एक ओर सरकारी खर्चे और दूसरी ओर सम्बंधित व्यक्तियों के खर्चे। इसीलिए यदि लोक अदालत शीघ्र निर्णय करती है तो उससे खर्चे में कमी हो जाती है। अतः भारत जैसे देश जिसमें आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े, व्यक्तियों का अंबार है वहां यदि न्याय कम खर्चे में नहीं मिलता है तो न्याय के सिद्धांत का ही अंत हो जायेगा।

इस प्रकार लोक अदालत व्यक्तियों के बीच के विवादों का शीघ्र न्याय दिलाने तथा अल्प व्यय के आधार पर आपसी समझौतों द्वारा निपटाने का प्रयास करती है। लोक अदालत की स्थापना के पीछे समाज के तीन वर्गों का महत्वपूर्ण योगदान है- पहला, देश के सर्वोच्च न्यायालय के गिने-चुने महत्वपूर्ण न्यायवेत्ता; दूसरा, स्वैच्छिक संस्थाओं के सामाजिक कार्यकर्ता, तथा; तीसरा, कानून के युवा छात्र। इन्हीं लोगों के प्रयासों का परिणाम है- लोक अदालत। इन्हीं लोगों ने संबंधित व्यक्तियों को शीघ्र तथा अल्प व्यय न्याय के लिए लोक अदालत को अपनाने के लिए प्रोत्साहित तथा प्रेरित किया।

अक्टूबर, 1985 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती की अध्यक्षता में प्रथम लोक अदालत का आयोजन दिल्ली में किया गया। उसी एक दिन में 116 विवादों का आपसी समझौते द्वारा समाधान तथा निर्णय किया गया। न्यायिक सेवा प्राधिकार अधिनियम 1987 ने लोक अदालत के अभियान को महत्वपूर्ण योगदान प्रदान किया है। इस अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार या राज्य सरकार या जिला प्रशासन समय-समय पर और निर्धारित स्थानों पर लोक-अदालत का आयोजन कर सकती हैं। न्यायिक सेवा प्राधिकार संशोधन अधिनियम 2002 के अंतर्गत स्थायी लोक अदालतों की स्थापना का प्रावधान किया गया है। देश के लगभग सभी जिलों में स्थायी लोक अदालतें गठित की जा चुकी हैं। इन अदालतों द्वारा अभी तक लगभग डेढ़ करोड़ मामले निपटाए गए हैं। लोक अदालत के निर्णय दीवानी या सिविल अदालत द्वारा दिये गये निर्णय माने जाते हैं तथा संबंधित व्यक्ति निर्णय के प्रति बाध्य होते हैं। यह निर्णय अंतिम होते हैं। इनके द्वारा दिए गए निर्णयों के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती। इसमें यह भी प्रावधान है कि लोक अदालत द्वारा निर्णय दे दिये जाने के बाद विवादों से संबंधित व्यक्तियों को कोर्ट शुल्क वापस कर दिये जाते हैं। इस अधिनियम के अनुसार न्यायिक पदाधिकारी अथवा सरकार द्वारा निर्धारित योग्यता रखने वाले व्यक्ति लोक अदालत की अध्यक्षता करते हैं।

अतः लोक अदालत अल्प समय, अल्प खर्चे तथा आपसी समझौते के द्वारा विवादों का निर्णय करती है। साथ ही, अन्य न्यायालयों के भारी बोझ को कम करने का प्रयास भी करती है। सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था में लोक अदालत का महत्वपूर्ण स्थान बन गया है।

प्रथम लोक अदालत का आयोजन 6 अक्टूबर, 1985 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती की अध्यक्षता में दिल्ली में किया गया था।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण

संविधान के भाग-4 के अनुच्छेद 39(क) के अंतर्गत राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशिष्टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए, उपयुक्त विधान स्कीम द्वारा किसी अन्य रीति से निशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा गरीब एवं असहाय व्यक्तियों को निशुल्क सेवा प्रदान की जाती है। इसके अंतर्गत अनुसचित जाती, एवं जनजाति, महिला, बच्चे, विकलांग, प्राकृतिक आपदा एवं देह पीड़ित व्यक्ति, बेरोजगार व्यक्ति तथा जिसकी अधिकतम वार्षिक आय 25,000 (उच्च न्यायालय हेतु), एवं 50,000 (उच्चतम न्यायालय हेतु) है, निशुल्क कानूनी सहायता पाने का भागी होगा।

ग्राम न्यायालय

गांव-गांव तक त्वरित एवं सस्ता न्याय पहुँचाने के उद्देश्य हेतु संसद ने दिसंबर 2008 में ग्राम न्यायालय विधेयक को मंजूरी प्रदान की। इसके अंतर्गत खण्डस्तर पर 5,067 न्यायालय स्थापित किए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि यह अधिनियम 2 अक्टूबर, 2009 से प्रभावी हो गया है। यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम एवं जनजाति क्षेत्रों को छोड़कर समस्त भारत पर प्रभावी होगा।

राज्य सरकार, संबद्ध उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात्, अधिसूचना के द्वारा पंचायत समिति स्तर पर एक या अधिक ग्राम न्यायालय का गठन कर सकेगी, लेकिन जिन राज्यों में पंचायत समिति का माध्यम स्तर नहीं है, वहां पर ग्राम पंचायत के समूहों के लिए उसके सन्निकट ग्राम न्यायालय स्थापित कर सकेगी। इसका मुख्यालय पंचायत समिति के मुख्यालय में होगा या वहां, जहां राज्य सरकार निर्देशित करे। राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के परामर्श से, प्रत्येक ग्राम न्यायालय के लिए एक न्यायाधिकारी नियुक्त करेगी एवं ऐसा न्यायाधिकारी प्रथम श्रेणी के न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य होना चाहिए। ऐसे न्यायाधिकारी एवं समुदायों को जिन्हें राज्य सरकार समय-समय पर अधिसूचना में उल्लिखित करे, पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। न्यायाधिकारी के वेतन-भत्ते एवं सेवाकाल तथा शर्ते प्रथम श्रेणी के न्यायाधीश के समान होंगी।

न्यायाधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले गांवों का दौरा करेगा एवं घटना स्थल के आस-पास कार्यवाही आरंभ कर सकेगा। ग्राम न्यायालय को ऐसे आपराधिक, दीवानी मामले, दावों एवं विवादों को स्वीकार करने का अधिकार है जिनमे मृत्युदंड, आजीवन कारावास एवं दो वर्ष से अधिक की सजा का प्रावधान न ही। चोरी एवं संपत्ति संबंधी मामले ग्राम न्यायालय में स्वीकार किए जा सकते हैं। ग्राम न्यायालय को दीवानी न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी। उल्लेखनीय है कि ग्राम न्यायालय की स्थापना एवं संचालन सम्बन्धी खर्चे केंद्र सरकार वहां करेगी।

वस्तुतः ग्राम न्यायालय के अस्तित्व में आने से दूरस्थ भारतीयों एवं ग्रामीणों तक न्याय की पहुँच संभव हो सकेगी जो न्यायिक व्यवस्था के विकेंद्रीकरण को सशक्त करेगा।

राष्ट्रीय न्याय अकादमी

राज्यों और केंद्र प्रशासित क्षेत्रों के न्यायिक अधिकारियों के अतिरिक्त उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के विभागीय अधिकारियों को सेवाकाल के दौरान प्रशिक्षण देने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की स्थापना की है। इसका प्रारंभ 5 सितंबर, 2002 को किया गया। इसके अंतर्गत न्यायिक सुधार और नीति-निर्माण के साथ-साथ बेहतर कुशलता एवं शोध प्रदत्त सेवाएं शामिल हैं। साथ ही न्यायालयों के प्रशासन एवं प्रबंधन में सुधार भी इसका उद्देश्य है।

त्वरित न्याय एवं विधि सुधारों हेतु राष्ट्रीय मिशन

त्वरित न्याय प्रदान करने और विधि सुधारों के लिए राष्ट्रीय मिशन की स्थापना जून 2011 में निम्नलिखित लक्ष्यों के दृष्टिगत की गई-

  • न्याय प्रदान करने में देरी एवं लंबित मामलों को कम करके न्याय प्रणाली तक पहुंच बढ़ाना।
  • संरचनात्मक बदलाव के जरिए और कार्य निष्पादन मानदंड एवं क्षमताएं निर्धारित करके जवाबदेही बढ़ाना।

यह मिशन पूरी तरह से कार्यात्मक हो चुका है और नीतिगत निर्देशों का पालन कर रहा है। नीति की रूपरेखा तैयार करना व विधायी परिवर्तन, प्रक्रियाओं व अदालती प्रक्रियाओं का पुनः अभियांत्रिकीकरण, मानव संसाधन विकास पर ध्यान देना, बेहतर न्याय प्रदान करने के लिए सूचना व संचार प्रौद्योगिकी व उपकरणों का लाभ लेना। मिशन न्यायिक प्रशासन में विलंब व लंबित मामलों के चरणबद्ध परिसमापन के लिए समन्वित दृष्टिकोण अपनाएगा जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ, कम्प्यूटरीकरण सहित अदालतों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा, अधीनस्थ न्यायपालिका को और मजबूत बनाना, अत्यधिक मुकदमेबाजी से ग्रसित क्षेत्रों में नीतिगत व विधिक उपाय करना व मुकदमों के शीघ्र निपटान के लिए अदालती प्रक्रिया का पुनः अभियांत्रिकरण करना शामिल है।

मिशन ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में, प्रत्येक रणनीतिक क्षेत्र में कई कदम उठाए हैं। न्यायिक मानक व जवाबदेही विधेयक तैयार किया गया है। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के लिए एक व्यापक प्रस्ताव तैयार किया गया है और यह प्रस्ताव सचिवों की समिति के समक्ष रखा गया है। 25 राज्यों ने सरकारी मुकदमेबाजी कम करने के लिए इससे संबंधित नीतियां तैयार की हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मुकदमेबाजी नीति भी विचाराधीन है।

न्याय मामलों के शीघ्र निपटान के लिए, न्यायिक सुधारों का एक महत्वपूर्ण पहलू अदालत की कार्यप्रणाली और प्रक्रिया के पुनः अभियांत्रिकरण से संबंधित है। उच्चतम न्यायालय द्वारा मुकदमों के प्रबंधन, अदालती प्रबंधन, अदालतों के प्रदर्शन और देश में न्यायिक सांख्यिकी की राष्ट्रीय प्रणाली के मुद्दों को उठाने के लिए एक राष्ट्रीय न्यायालय प्रबंधन प्रणाली अधिसूचित की गई है।

अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए बुनियादी ढांचे का विकास राष्ट्रीय मिशन के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।


फास्ट ट्रैक कोर्टअपराध नियंत्रण एवं त्वरित सुनवाई की युक्तियुक्त पहल

1987 में ही विधि आयोग ने भारत की जनसंख्या के हिसाब से यहां जजों की काफी कम संख्या के बारे में बेहद चिंता जताई थी। लॉ कमीशन ने कहा था भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर मात्र 11 जज हैं जबकि विकसित देशों में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर तकरीबन 100 न्यायाधीश हैं। इसलिए आयोग के द्वारा यह सुझाव भी दिया गया था कि जजों की संख्या को बढ़ाकर कम से कम 50 प्रति 10 लाख किया जाना चाहिए।

वर्तमान में न्यायालयों में लंबित मामलों की सुनवाई के लिए जजों की वर्तमान संख्या के ठीक 5 गुणा जजों की भारत में तत्काल आवश्यकता है। वस्तुतः केंद्र एवं राज्य सरकारें भी इस बात को महसूस करती हैं कि भारत में युक्तियुक्त ढंग से लोकतंत्र की बहाली हेतु यहां पर बड़ी संख्या में अदालतें एवं न्यायिक अधिकारियों की आवश्यकता है परंतु वे कभी इसे अमल में नहीं ला पाते।

11वें वित्त आयोग ने 1784 फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का सुझाव दिया था ताकि लंबित मामलों का त्वरित निपटारा हो सके। ये मामले अधिकतर सेशन कोर्ट में लम्बित पड़े हैं। वित्त मंत्रालय द्वारा 502.90 करोड़ रुपये की रकम स्वीकृत की गई ताकि न्याय संबंधी खास समस्याओं एवं न्यायिक मामलों के निपटारे में सुधार लाया जा सके। यह योजना 5 वर्षों के लिए निश्चित की गई थी। इस प्रकार त्वरित निपटान न्यायालयों का गठन किया गया ताकि न्यायालयों में लंबित मामलों का त्वरित निपटारा हो सके। त्वरित निपटान न्यायालयों की योजनावधि सन् 2005 में समाप्त हो गई। उच्चतम न्यायालय ने इन त्वरित न्यायालयों की निगरानी का जिम्मा लिया था तथा अपने एक निर्देश में यह भी कहा कि त्वरित न्यायालयों की अचानक खत्म नहीं किया जा सकता। साथ ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि फास्ट ट्रेक कोर्ट को चालू रहने दिया जाए। अतः सरकार ने 1562 त्वरित न्यायालयों को जारी रखने का निर्णय लिया।

भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली में बलात्कार कांड की त्वरित सुनवाई के लिए सन् 2013 में दिल्ली में एक फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्घाटन किया गया ताकि दोषियों को तुरंत सजा सुनाई जा सके। फास्ट ट्रैक कोर्ट की शुरुआत केंद्र सरकार द्वारा की गई थी। इस तरह की अदालत के गठन का सुझाव राष्ट्रीय न्यायिक नीति आयोग, 1999 की 120वीं क्राइम रिपोर्ट पर तैयार की गई रिपोर्ट में दिया गया था। नेशनल क्राइम ब्यूरो द्वारा भी इसकी अनुशंसा की गई थी। उच्चतम न्यायालय के लगभग प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश द्वारा भी इस तरह की अदालत के गठन का सुझाव दिया गया था।

अच्छे कार्य संपादन के बावजूद इन फास्ट ट्रैक कोर्ट को समाप्त कर दिया गया जिसे केंद्र सरकार द्वारा इस आधार पर सही ठहराया गया कि 13वें वित्त आयोग ने 5000 करोड़ रुपए की अनुशंसा की थी ताकि न्याय दिलाने का कार्य बेहतर हो सके। इस रकम में से 2500 करोड़ रुपए लोक अदालतों तथा न्यायिक सेवा प्राधिकरण पर खर्च होना था। इस तरह फास्ट ट्रैक कोर्ट पर कुछ भी खर्चा नहीं किया गया। बाद में उच्चतम न्यायालय, ने राज्य सरकारों की दलीलों जिनके आधार पर फास्ट ट्रैक कोर्ट को समाप्त किया गया था, उचित नहीं माना क्योंकि इन न्यायालयों द्वारा अपने कार्यों को अच्छे ढंग से संपादित किया गया था।

अतः राज्यों के द्वारा पुरानी व्यवस्था की न हटाकर नई व्यवस्था करने की बात स्वीकार नहीं की। परंतु केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया। क्योंकि फास्ट ट्रैक कोर्ट पहले ही समाप्त कर दिए गए थे। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए वित्त मुहैया कराने की अनुशंसा की थी।

केंद्र सरकार के समक्ष कोर्ट की सलाह की अनदेखी एस.पी. गुप्ता बनाम प्रेसिडेंट ऑफ इण्डिया केस, 1981 के उस निर्णय के खिलाफ था जिसमें यह कहा गया था कि यह राज्य का कर्तव्य है कि वह न्याय प्रशासन को पारदर्शिता के साथ चलाने के लिए आवश्यक एवं समुचित प्रयास करे। पुनः निर्णय में यह भी कहा गया था कि अनुच्छेद-216 के अंतर्गत राष्ट्रपति का यह कर्तव्य है की वहकेंद्र सरकार को यह ताकीद करे की कंद्र सरकार न्याय प्रक्रिया को बहाल करने के लिए समुचित उपाय करे। ऑल इण्डिया जज-प्रकरण 1998 में पुनः कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि केंद्र सरकार न्यायाधीश शेट्टी आयोग की रिपोर्ट लागू करे जिसमें न्यायाधीश की सेवा शर्तों की इस तरह बहाल करे ताकि उनकी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे। हालांकि फास्ट ट्रैक कोर्ट को भले ही फंड के अभाव में समाप्त किया गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि केंद्र एवं राज्य सरकारें न्यायालयों के लिए बजट में वृद्धि करें तथा न्यायाधीशों की संख्या में 5 गुणा वृद्धि करें, साथ ही हजारों फास्ट ट्रेक कोर्ट का निर्माण भी करें।

राज्यों में फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थिति:

  • ओडीशा, उत्तर प्रदेश एवं तमिलनाडु में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने लंबित मामलों के निपटारे में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है।
  • आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, एवं हरियाणा में फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए केंद्रीय सहायता सबसे अधिक रही है।
  • बिहार में फास्ट ट्रेक कोर्ट की संख्या सर्वाधिक है लेकिन बिहार में लंबित मामलों की संख्या के लिहाज से यह अन्य राज्यों के मुकाबले दूसरे स्थान पर है।
  • त्रिपुरा में फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा लंबित मामलों के निपटारे का प्रतिशत 96 रहा है।
  • अरुणाचल प्रदेश में फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या सबसे कम (3) है।
  • यहां लबित मामलों के निपटारे का प्रतिशत 40 है जो बेहद कम है।
  • मणिपुर में मात्र 2 फास्ट ट्रैक कोर्ट हैं लेकिन मामलों के निपटान में इसका प्रतिशत 94 है जो बेहद बेहतर है।

हालांकि फास्ट ट्रैक कोर्ट के बारे में कई लोग संदेह प्रकट करते हैं और उनका मानना है कि इससे शायद ही समस्या का हल संभव हो। लेकिन विगत् कुछ वर्षों में जिस तरह फास्ट ट्रैक कोर्ट के द्वारा बड़ी संख्या में न्यायिक मामले सुलझाए गए हैं, उससे यह उम्मीद बंधती है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन से न्यायिक मामलों का निपटारा संभव हो सकेगा। ओडीशा के फास्ट ट्रैक कोर्ट ने त्वरित कार्रवाई की एक मिसाल पेश की है।

यह एक अच्छी बात है कि केंद्र सरकार द्वारा फास्ट ट्रैक कोर्ट को समाप्त किए जाने की सलाह देने के बावजूद भी कई राज्य सरकारें अपने बजट पर स्वयं फास्ट ट्रैक कोर्ट को जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं।

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