कश्मीर का राज्य State of Kashmir

कश्मीर का प्राचीन भारत में शेष भारत के साथ बहुत गहरा और अविच्छिन्न राजनैतिक सम्बन्ध नहीं था, परन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से कश्मीर कभी भारत से पृथक नहीं था। कुछ समय तक तो कश्मीर संस्कृत विद्या के प्रमुख केन्द्र के रूप में रहा। अशोक का कश्मीर पर अधिकार था। यहां पर उसने अनेक स्तूप बनवाये। नेपाल के नगर ललितपाटन की भाँति कश्मीर में भी अशोक ने एक नगर की स्थापना की थी। चीनी यात्री के विवरण के अनुसार, अशोक ने सम्पूर्ण कश्मीर को एक बौद्ध संघ के व्ययार्थ दान कर दिया था। इस बात का उल्लेख कल्हण की राजतरंगिणी में मिलता है कि अशोक की मृत्यु के बाद जब मौर्य साम्राज्य की केन्द्रीय शक्ति का ह्रास होने लगा तो उसके पुत्र जालोक ने, जो कश्मीर में राज्य-प्रतिनिधि के रूप में शासन कर रहा था, अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा करके केन्द्र से पृथक एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना कर दी थी। जालोक के उपरान्त कश्मीर में किस राजा अथवा राजवंश का अधिकार था, यह विश्वसनीय रूप में हमें ज्ञात नहीं, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि कश्मीर पर बाद में कुषाणों का अधिपत्य स्थापित हो गया था। कनिष्क ने एक बौद्ध संगीति का कश्मीर-प्रदेश में आयोजन किया था। हूण-आक्रमणों के विषय में विचार करते हुए हम यह देख चुके हैं कि किस प्रकार मालवा और मध्य भारत से बालादित्य द्वारा निकाले जाने पर मिहिरकुल ने कश्मीर के राजा के यहां शरण ली थी और छल प्रर्वचनामयी नीति का अवलम्बन करके उसने कश्मीर पर अधिकार जमा लिया था। कल्हण ने मिहिरकुल का उल्लेख किया है। कश्मीर के इतिहास के विषय में ये बातें मालूम हो जाती है, परन्तु इसके बाद के समय से राजतरंगिणी में एक नवीन राजवंश की स्थापना से जिस इतिहास का वर्णन कल्हण ने किया है, वह अधिकांश रूप में विश्वसनीय है।

कर्कोटक राजवंश- दुर्लभवर्द्धन ने कश्मीर में नाग या कर्कोटक वंश की स्थापना की। उसके राज्य-काल में ह्वेनसांग ने कश्मीर की यात्रा की थी। चीनी यात्री के लेख से ज्ञात होता है कि दुर्लभवद्धन का राज्य केवल मुख्य कश्मीर तक ही सीमित नहीं था, वरन् पश्चिमी और उत्तरी-पश्चिमी पंजाब के कुछ भाग पर भी उसका अधिकार था। दुर्लभवद्धन ने छत्तीस वर्षों तक राज्य किया। उसके पुत्र और उत्तराधिकारी दुर्लभक का शासन-काल पचास वर्षो तक रहा, परन्तु उसके विषय में कोई ज्ञातव्य ऐतिहासिक बात मालूम नहीं है।

कश्मीर के राजसिंहासन पर दुर्लभक के उपरान्त उसका पुत्र चन्द्रापीड़ समासीन हुआ। चन्द्रापीड़ कश्मीर का एक प्रसिद्ध नरेश था। उसने अरबों के विरुद्ध सहायता प्राप्त करने के लिए सम्राट् के पास अपना एक राजदूत भेजा था। यद्यपि उसे चीन देश से कोई सहायता प्राप्त न हो सकी, तथापि उसने मुहम्मद बिनकासिम को कश्मीर की सीमा में घुसने नहीं दिया था। कल्हण ने चन्द्रापीड़ की न्यायप्रियता का विस्तार के साथ वर्णन किया है। चन्द्रापीड़ का राज्य-काल केवल साढ़े आठ वर्षों तक ही रहा।

ललितादित्य मुक्तापीड कर्कोटक राजवंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था जो 724 ई. में में सिंहासनारूढ़ हुआ। ललितादित्य कश्मीर का तो सबसे प्रसिद्ध शासक था ही, अपने समकालीन शासकों में भी उसकी सर्वोपरि स्थान प्राप्त था। वह एक महान् विजेता और उल्लेखनीय सम्राट् था। उसकी विजयों का वर्णन कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहासकार कल्हण ने किया है।

लगभग सन् 760 ई. में ललितादित्य की मृत्यु हुई। उसने छत्तीस वर्षों तक राज्य किया। उसके पश्चात् कश्मीर के सिंहासन पर कई दुर्बल नरेश बैठे जिनके शासन-काल में कोई महत्त्वपूर्ण घटना नहीं घटित हुई। जयापीड विनयादित्य कर्कोटक राजकुल का अन्तिम पराक्रमी और प्रतापी सम्राट् था। उसने अपने वंश के विलुप्त गौरव को पुन: प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया। अपने पितामह की भांति जयापीड विनयादित्य ने कन्नौज पर आक्रमण किया और यहाँ के राजा वज्रायुध अथवा इंद्रायुध को सिंहासन-च्युत कर दिया। कल्हण ने उसकी अन्य विजयों का भी उल्लेख किया है, परन्तु वे सर्वथा असंदिग्ध नहीं कही जा सकती। जयापीड विद्वानों का संरक्षक था। उसका शासन-काल 810 ई. तक था। उसके बाद, उसके उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए। नवीं शताब्दी के मध्य में कश्मीर का राज्य कर्कोटकों के हाथ से निकल गया और वहाँ उत्पल वंश की स्थापना हुई।

कश्मीर में उत्पल वंश का शासन

कश्मीर में उत्पल वंश की स्थापना करने वाला अवन्तिवर्मन था। उसे इस बात का गौरव प्राप्त है कि उसने युद्ध से बिरत होकर प्रजा के सुख-संवर्द्धन की ओर ध्यान दिया। अपने जीवन के अन्तिम समय में जयापीड स्वयं भी धनलोलुप हो गया था और उसके उत्तराधिकारियों ने भी जनता का शोषण किया था, जिससे कश्मीर के लोग दु:खी और निर्धन हो गये थे। अवन्तिवर्मन ने अपने राज्य के आर्थिक साधनों को विकसित करने तथा बढ़ाने का प्रयत्न किया। उसने सबसे पहले उन राजकीय अधिकारियों को उनके पदों से हटा दिया जो निर्धन ग्रामवासियों को प्रपीड़ित करते थे। अवन्तिवर्मन ने अपने राज्य में सिंचाई के विकसित साधनों की व्यवस्था की। उसका कर्मसचिव सुय्य लोक-कल्याण के कार्यों में बड़ी अभिरुचि रखता था। उसने नालियों और बांधों का निर्माण कराया और वितस्ता (झेलम) के मार्ग को बदल कर बाढ़ से प्रदेश की रक्षा की। अवन्ति-वर्मन की राजसभा को विद्वान् और साहित्यकार अपनी उपस्थिति द्वारा गौरवान्वित किया करते थे। उसने अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया। इन सब कार्यों का वर्णन कल्हण ने बड़े उत्साह से किया। एक इतिहासकार के रूप में कल्हण के लिए यह गौरव की बात है कि उसने अपने देश के सम्राटों और शासकों की विजयों या सैनिक सफलताओं के वर्णनों से ही अपनी पुस्तक के पृष्ठ नहीं भरे हैं, वरन् उसने उनके लोक-कल्याण-सम्बन्धी कार्यों की प्रशंसा करते हुए उनका सविस्तार उल्लेख किया है।

राज्याधिकार के लिए अवन्तिवर्मन के बाद उसके पुत्रों में युद्ध छिड़ गया। अपने भाइयों को पराजित कर शांकरवर्मन ने राज-सिंहासन पर अपना अधिकार जमा लिया। शकरवर्मन के पश्चात् उसका पुत्र गोपालवर्मन राजा हुआ। इसके शासनकाल में शासन-व्यवस्था और अधिक बिगड़ गई। प्रजा का दु:ख किसी प्रकार भी कम न हो सका।

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