दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन South Asian Association for Regional Cooperation - SAARC

दक्षेस

दक्षेस (सार्क) दक्षिण एशिया के आठ देशों को क्षेत्रीय सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से एक मंच पर लाता है।

मुख्यालय: काठमांडू (नेपाल)।

सदस्यता: बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका और अफगानिस्तान।

पर्यवेक्षक राष्ट्र: ऑस्ट्रेलिया, चीन, यूरोपीय संघ, ईरान, जापान, मॉरीशस, म्यांमार, दक्षिण कोरिया और संयुक्त राज्य अमेरिका।

उत्पति एवं विकास

यद्यपि दक्षिण एशिया विश्व का एक प्रमुख क्षेत्र है, लंबे समय तक यहां किसी बहु-सरकारी सहयोग संगठन का अस्तित्व नहीं था। क्षेत्र के लोगों के सामूहिक कल्याण के लिये एक संगठन स्थापित करने का विचार सबसे पहले बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान ने उस समय प्रस्तुत किया जब वे 1977-80 की अवधि में पड़ोसी देशों की राजकीय यात्रा कर रहे थे। नवंबर 1980 में बांग्लादेश ने दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग विषय पर एक दस्तावेज तैयार किया और उसे दक्षिण एशियाई देशों में वितरित किया। 1981 और 1988 के मध्य सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु परिचालन एवं संस्थागत संपर्क गठित करने के लिये विदेश सचिव स्तर पर कई बहुपक्षीय बैठकें हुई। 1983 में नई दिल्ली (भारत) में एक मंत्रिस्तरीय सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन के फलस्वरूप दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग समिति का गठन हुआ और एकीकृत कार्यक्रम योजना की शुरूआत हुई। एकीकृत कार्यक्रम योजना के अंतर्गत सदस्य देशों के बीच निम्नांकित क्षेत्रों में सहयोग स्थापित करने पर सहमति हुई- कृषि, संचार, शिक्षा, संस्कृति एवं खेल, पर्यावरण और मौसम विज्ञान,

दक्षेस संगठन के सिद्धांत

दक्षेस (सार्क) के चार्टर में अनुच्छेद-2 के अनुसार मुख्यतः तीन सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है-

  • संगठन के ढांचे के अंतर्गत सहयोग, सार्वभौम सहायता, समानता संघीय एकात्मकता, क्षेत्रीय अखंडता, राजनितिक स्वतंतत्रा, अहस्तक्षेप तथा परस्पर लाभ के सिद्धांतों का सम्मान करना एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों में दखल न देने को आधार मानकर संगठन का ढांचा तैयार करना।
  • संगठन के ढांचे में यह भी उल्लेख किया गया कि सहयोग द्विपक्षीय और बहुपक्षीय उत्तरदायित्वों का विरोध नहीं करेगा।
  • संगठन के ढांचे में यह भी व्यवस्था की गई कि सहयोग द्विपक्षीय अथवा बहुपक्षीय सहयोग के एवज में नहीं होगा।

स्वास्थ्य, जनसँख्या नियंत्रण एवं बल कल्याण, अवैध मादक-पदार्थ व्यापार और औषधि दुरूपयोग पर रोक, ग्रामीण विकास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यटन, परिवहन तथा महिला विकास। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय समिति, जिसके सदस्य बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका के मंत्री थे, के प्रमुख कार्य थे- इस कार्यक्रम का पर्यवेक्षण करना, क्षेत्रीय और बाह्य संसाधनों की संघटित करना तथा सहयोग के लिये अतिरिक्त क्षेत्रों की पहचान करना।

एसएआरसी की अनुशंसा के आधार पर दिसंबर 1985 में ढाका (बांग्लादेश) में पहला शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना के लिये जारी घोषणा-पत्र (Charter) को स्वीकृति प्रदान की गई।

उद्देश्य

सार्क के उद्देश्य हैं- दक्षिण एशियाई क्षेत्र की जनता के कल्याण एवं जीवन स्तर में सुधार लाना; क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास की गति देना; सदस्य देशों की सामूहिक आत्मनिर्भरता में वृद्धि करना; विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में पारस्परिक सहायता में तेजी लाना; समान लक्ष्यों और उद्देश्यों वाले अंतरराष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय संगठनों के साथ सहयोग स्थापित करना; अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समान हितों के मामलों में सदस्य देशों के मध्य सहयोग की भावना को मजबूती प्रदान करना, तथा; अन्य विकासशील देशों के साथ सहयोग स्थापित करना।

संरचना

सार्क के संगठनात्मक ढांचे में शासनाध्यक्षों का शिखर सम्मेलन, मंत्रिपरिषद, विदेश सचिवों की स्थायी समिति, कार्यकारी समिति, तकनीकी समितियां और सचिवालय सम्मिलित हैं।

राष्ट्राध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में सभी सदस्य देश सम्मिलित होते हैं तथा यह सार्क का सर्वोच्च निर्णयकारी अंग हैं। सामान्यतया वर्ष में एक बार इस शिखर सम्मेलन का आयोजन होता है। मंत्रिपरिषद सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बनी होती है। इसके कार्य हैं- नीतियों का निर्धारण, इन नीतियों की प्रगति की समीक्षा और सहयोग के नये क्षेत्र तथा उनके लिये आवश्यक प्रक्रियाओं की पहचान करना। मंत्रिपरिषद की वर्ष में कम-से-कम दो बैठकें आवश्यक रूप से होती हैं, यद्यपि आवश्यकता पड़ने पर इसकी दो से अधिक बैठकें हो सकती हैं। मंत्रिपरिषद की सहायता देने के लिये कार्यकारी समिति, विदेश मंत्रियों की स्थायी समिति और 11 तकनीकी समितियों की व्यवस्था है। स्थायी समिति सहयोग कार्यक्रमों के समग्र पर्यवेक्षण और समन्वयन के लिये उत्तरदायी होती है। इसकी बैठक सामान्यता मंत्रिपरिषद की बैठक से पहले होती है। तकनीकी समितियां अपने-अपने क्षेत्र के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन, समन्वयन और पर्यवेक्षण के लिए उत्तरदायी होती है।

1987 में काठमांडू में सार्क के स्थायी सचिवालय की स्थापना हुई। सचिवालय का प्रधान अधिकारी महासचिव होता है, जिसकी सदस्यता के लिए अनेक अधिकारियों और कर्मचारियों की व्यवस्था है। महासचिव की नियुक्ति सदस्य देश के प्रतिनिधियों में से वर्णमाला क्रम में तथा चक्रण पद्धति के आधार पर होती है। सचिवालय के मुख्य कार्य हैं-

  1. कार्यक्रमों का पर्यवेक्षण, समन्वयन एवं क्रियान्वयन करना, तथा;
  2. सार्क के विभिन्न अंगों की बैठकों की व्यवस्था करना।

इस संगठन का अध्यक्ष वही देश होता है जहां सार्क का अंतिम शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ है। अग्रिम शिखर सम्मेलन के समय नये अध्यक्ष की घोषणा की जाती है।

सार्क के निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं तथा द्विपक्षीय एवं विवादास्पद मुद्दे टाल दिए जाते हैं। संगठन के संविधान में यह प्रावधान भी है कि सार्क के अंतर्गत कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिये, जो विद्यमान द्वि-पक्षीय और बहुपक्षीय अनुबंधों के विरुद्ध हो। साथ ही, सार्क कार्यक्रमों को सदस्य देशों के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप की नीति पर आधारित होना चाहिए।

गतिविधियां

सार्क ने केंद्रीय आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिये अनेक कदम उठाए हैं। इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम था—1991 में व्यापार, उत्पादनों और सेवाओं (Trade,Manufactures and Services-TMS) पर क्षेत्रीय अध्ययन का समापन। उसी वर्ष व्यापार और आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिये एक उच्चस्तरीय आर्थिक सहयोग समिति (सीईसी) का गठन किया गया। सदस्य देशों के वाणिज्य सचिव इस समिति के सदस्य होते हैं।

1993 में ढाका में आयोजित सार्क के सातवें शिखर सम्मेलन में सार्क अधिमान्य व्यापार (SAARC- Preferential Trading Arrangement-SAPTA) स्थापित करने के लिये एक समझौता हुआ। साप्टा दिसंबर 1995 में प्रभाव में आया। साप्टा सार्क देशों में आर्थिक और व्यापार सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से शुल्क राहतों के विनिमय के लिये एक ढांचा प्रदान करता है। साप्टा के अधीन शुल्क, अतिरिक्त-सीमा-शुल्क (paratariff), गैर-शुल्क (non-tariff) तथा प्रत्यक्ष व्यापार उपाय आते हैं। साप्टा के अधीन चलने वाली सभी वार्ताओं और समझौतों का अंतिम उद्देश्य 2005 तक दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (एसएएफटीए) की स्थापना करना है।

सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन मई 1995 में नई दिल्ली में हुआ। इस सम्मेलन में सार्क (infrastructural) विकास कोष को विलीन करके दक्षिण एशिया विकास कोष (एसएडीएफ) स्थापित करने का निर्णय लिया गया। दक्षिण एशिया विकास कोष एक या अधिक सार्क देशों में विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है, जिनसे अन्य सार्क देश लाभान्वित होते हैं। एसएडीएफ के शासी निकाय की पहली बैठक ढाका में जून 1996 में हुई। इस कोष का सचिवालय ढाका में अवस्थित है।

कोलम्बो (श्रीलंका) शिखर सम्मेलन, 1991 में 2002 तक दक्षिण एशिया में निर्धनता उन्मूलन के लक्ष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी। निर्धनता के विभिन्न आयामों को समझने तथा इस समस्या के निदान के लिये सुझाव प्राप्त करने के उद्देश्य से स्वतंत्र दक्षिण एशियाई निर्धनता-उन्मूलन आयोग (Independent South Asian Commission on Poverty Alleviation– ISACPA) का गठन किया गया। सार्क के सभी सदस्य देश निर्धनता के मौलिक कारणों को स्वास्थ्य, शिक्षा, संसाधन और सूचना के अधिकारों से लाभान्वित कराने हेतु कृत संकल्प हैं, 1995 को सार्क निर्धनता उन्मूलन वर्ष घोषित किया गया।

सबके लिये खाद्य सुरक्षा के संबंध में, सदस्य देशों में आपात खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिये सार्क खाद्य सुरक्षा निधि की स्थापना हुई। इस निधि ने 1988 में कार्य करना शुरू किया।

1987 में काठमांडू शिखर सम्मेलन में सदस्यों ने आतंकवाद के दमन हेतु क्षेत्रीय अभिसमय (Regional Convention on the Suppression of Terrorism) पर हस्ताक्षर  अगस्त 1988 में प्रभाव में आया। 1990 के माले शिखर सम्मेलन में सार्क मादक दवाएं और मनोलाक्षनणिकपदार्थ अभिसमय (SAARC Convention on Narcotic Drugs and Psychotropic Substances) पर हस्ताक्षर हुए, जो 1993 प्रभाव में आयाI

महत्वपूर्ण क्षेत्रों मे सहयोग को मजबूत करने के लिए कई संयुक्त परियोजनाएं शुरू की गई हैं- कृषि क्षेत्र में शिक्षा और सूचना के प्रसार के लिये 1988 में ढाका में सार्क कृषि सूचना केंद्र की स्थापना; तपेदिक-उन्मूलन और अनुसंधान के लिये 1992 में तपेदिक केन्द्र की स्थापना; 1994 में नई दिल्ली में सार्क प्रलेखन केंद्र की स्थापना; 1995 में ढाका में मौसम विज्ञान अनुसंधान केंद्र की स्थापना। इनके अतिरिक्त, इस्लामाबाद में एक मानव संसाधन विकास केंद्र निर्माणाधीन है।

लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने और सामाजिक विकास के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। 1993 में महिला और परिवार स्वास्थ्य विषय पर आयोजित सार्क मंत्रिस्तरीय सम्मेलन द्वारा पारित काठमांडू महिला एवं परिवार स्वास्थ्य प्रस्ताव के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। 1991-2000 के दशक को सार्क बालिका (Girl Child) दशक घोषित किया गया। वर्ष 1996 को सार्क साक्षरता वर्ष के रूप में मनाया गया। कोलम्बो शिखर सम्मेलन, 1998 में सार्क महिला एवं बल वेश्यावृत्ति निवारण अभिसमय तथा सार्क बल कल्याण प्रोत्साहन अभिसमय को अंतिम रूप दिया गया, जिसे 2002 के ग्यारहवें काठमांडू शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षरित किया गया। 2001 से 2010 के दशक को सार्क बाल अधिकार दशक के रूप में घोषित किया गया है। सार्क देशों के मध्य संपर्क बढ़ाने के लिये और कई कदम उठाये गये हैं, जैसे- 1998 में सदस्य देशों के न्यायाधीशों और सांसदों को वीजा औपचारिकताओं से मुक्त कर दिया गया।

सार्क ने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कई क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग स्थापित किया है।

सार्क पिछले 15 वर्षों से भी अधिक समय से अस्तित्व में है, लेकिन इसका रिकॉर्ड बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं रहा है। 1985-88 की अवधि में क्षेत्रीय संगठन में विश्वास बना रहा। यद्यपि आईपीए तुलनात्मक रूप से बाह्य क्षेत्रों तक ही सीमित था, इसे सदस्यों ने बहुत गंभीरतापूर्वक लिया। लेकिन 1989 के पश्चात् इस संगठन के प्रयासों के प्रति सदस्यों में पहले जैसा उत्साह नहीं रहा है। अतः इसकी गतिशीलता में धीमापन स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। सार्क के विभिन्न अंग अपनी समय-सारणी का अनुकरण करने में सफल नहीं रहे हैं। यहां तक कि शिखर सम्मेलनों को भी कई बार स्थागित या रद्द कर दिया गया, जैसे-1999 में काठमांडू में आयोजित होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन को पाकिस्तान में सैनिक सत्ता-परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में स्थगित कर दिया गया।

सार्क की प्रगति को बाधित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है सदस्य देशों के मध्य राजनीतिक विद्वेशों (जिनमें अधिकतर भारत-केंद्रित हैं) की निर्बाध संस्कृति। भारत और पाकिस्तान के बीच व्याप्त तनाव इस संगठन के विकास में एक बड़ा अवरोधक है। इतिहास साक्षी है कि क्षेत्रीय सहयोग तभी सफलतापूर्वक स्थापित हो पाता है जब संबद्ध देशों के राजनीतिक उद्देश्यों में न्यूनतम साझेदारी स्थापित हो चुकी हो। किसी संगठन के गठन का मूल आधार सामूहिक आर्थिक लाभ हो सकता है; फिर भी, इसकी सफलता में राजनीतिक कारकों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसमें संदेह नहीं कि इस संगठन को आर्थिक अंश (content) देने के प्रयास किये गये हैं, लेकिन तकनीकी और पूंजी की अल्प आपूर्ति और अल्प-विकसित मौलिक आर्थिक संरचना इसकी प्रमुख बाधाएं हैं। सार्क देशों के मध्य व्यापार स्तर बहुत निम्न है, यद्यपि कई सदस्यों ने निर्यातोन्मुखी नीतियां अपनायी हैं। कुछ सदस्य देशों ने द्वि-पक्षीय मुक्त व्यापार संधियां की हैं (उदाहरण के लिये, भारत और श्रीलंका ने 1998 में मुक्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किये), जो इस बात की संकेतक हैं कि साफ्टा कभी भी प्रभावशाली नहीं हो पायेगा।

इसके अतिरिक्त, यह अनुभव किया जा रहा है कि सार्क की संस्थागत संरचनाएं पर्याप्त नहीं हैं। अतः यह सदस्य देशों द्वारा पारित अनेक परियोजनाओं को क्रियान्वित करने में असमर्थ हैं।

काठमांडू स्थित सार्क सचिवालय के पास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिये न तो सहायक सुविधाएं हैं न ही राजनीतिक शक्ति।

यदि सार्क कोई अर्थपूर्ण प्रगति चाहता है तो इसके सदस्यों को कभी समाप्त न होने वाले राजनीतिक विवादों को ठंडे बस्ते में डालकर आपसी व्यापार संबंधों को और मजबूत करना होगा। उन्हें यह समझना चाहिये कि एकजुट रहने से वे उत्तर-विश्व व्यापार संगठन (post-WTO) उदारवादी अर्थव्यवस्था का अधिक लाभ उठा सकेंगे। सस्ते श्रम एवं अन्य लाभकारी परिस्थितियों के कारण सार्क देश कई कृषि वस्तुओं तथा कपड़ा एवं आभूषण उत्पादों के मामले में विश्व के अन्य देशों को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में हैं। लेकिन जहां तक अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रश्न है, तो ये सुविधाएं इनके लिये हानिकारक सिद्ध हो रही हैं। चाय, चावल, जूट, और अब आभूषण, जैसी वस्तुओं में उन्हें विकसित देशों के उत्पादों के साथ प्रतियोगिता में भाग लेना पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप विकासशील देश अपनी वस्तुओं को कम मूल्य पर बेचने के लिये विवश हैं। फिर भी, विश्व व्यापार संगठन व्यवस्था के अंतर्गत व्यापारिक गतिरोधों को कम किया जा रहा है। इस परिस्थिति में इन देशों में विदेशी वस्तुओं और सेवाओं का ढेर लगना तय है। कोई विकासशील देश इस दबाव को अकेले झेलने में कठिनाइयों का अनुभव करेगा। लेकिन सामूहिक प्रयासों से विकासशील देश इस संकट का सामना आसानी से कर सकते हैं।

सार्क के अभी तक (मई 2014 तक) 17 सम्मेलन हो चुके हैं। सार्क का 12वां शिखर सम्मेलन 4-6 जनवरी, 2004 को इस्लामाबाद में आयोजित किया गया, और मालदीव तथा श्रीलंका के राष्ट्रपति और बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया। इसी प्रकार 13वां शिखर सम्मेलन 12-13 नवम्बर, 2005 को ढाका और 14वां शिखर सम्मेलन 3-4 अप्रैल, 2007 को नई दिल्ली में आयोजित किया गया। 15वां शिखर सम्मेलन 1-3 अगस्त, 2008 को कोलम्बो (श्रीलंका) में आयोजित किया गया। इसमें क्षेत्रीय सहयोग, दक्षिण एशिया के लोगों के विकास के लिए साझेदारी, संपर्क, उर्जा, पर्यावरण, जल संसाधन, निर्धनता निवारण, सार्क विकास कोश, परिवहन सुचना एवं संचार तकनीकी विकास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यटन, संस्कृति, दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र, सार्क सामाजिक चार्टर, महिला एवं बच्चे, शिक्षा, आतंकवाद से युद्ध, और ऑस्ट्रेलिया एवं म्यांमार का पर्यवेक्षक राष्ट्र के तौर पर शामिल करना जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई। इस सम्मेलन में वैश्विक खाद्य संकट चर्चा के बड़े बिंदुओं में से था।

28-29 अप्रैल, 2010 को सार्क का 16वां शिखर सम्मेलन भूटान की राजधानी थिम्पू में आयोजित किया गया। भूटान ने पहली बार सार्क सम्मेलन की मेजबानी की। जलवायु परिवर्तन इस शिखर सम्मेलन का केंद्रीय विषय था। सार्क नेताओं ने जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए पर्यावरण सहयोग अभिसमय पर हस्ताक्षर किए। सार्क राष्ट्रों ने आगामी पांच वर्षों के भीतर 10 मिलियन पौधे लगाने की शपथ भी ली।

दक्षिण एशिया के आठ देशों (भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, मालदीव व अफगानिस्तान) के क्षेत्रीय संगठन दक्षेस का 17वां शिखर सम्मेलन मालदीव में आडू सिटी में 10-11 नवम्बर, 2011 को सम्पन्न हुआ। इस शिखर सम्मेलन की थीम थी- सम्पर्क निर्माण (Building Bridges)। इस सम्मेलन में भारत ने कम विकसित देशों के लिए साफ्टा (एसएएफटीए) के अंतर्गत संवेदनशील उत्पादों की सूची को 480 से घटाकर 25 करने की घोषणा की। इससे सूची से हटाई गई वस्तुओं का भी अब शुल्क मुक्त आयात इन देशों से किया जा सकेगा। दक्षेस राष्ट्रों के एक साउथ एशियन पोस्टल यूनियन गठन को सहमति सम्मेलन में हुई। आतंकवाद व नशीली दवाओं की अवैध तस्करी पर प्रभावी रोक के लिए समन्वित प्रयासों को और मजबूत बनाने का फैसला जहां किया गया, वहीं समुद्री दस्युओं से निपटने के लिए भी साझा उपायों की दिशा में आगे बढ़ने की सहमति हुई। पारस्परिक सहयोग के चार महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर सम्मेलन में किए गए।

साफ्टा
रियायती प्रशुल्क दरों पर आपसी व्यवहार प्रारम्भ हो जाने के बाद दक्षिण एशिया क्षेत्र में एक व्यापारिक गुट (साफ्टा-साउथ एशियन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) स्थापित करने में सहायता मिल सकी है। दक्षेस राष्ट्रों के मध्य व्यापार संवर्द्धन हेतु दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौता (साफ्टा) 1 जनवरी, 2006 से प्रभावी हो गया।इस समझौते के अनुच्छेद-7 के अंतर्गत भारत-पाकिस्तान और श्रीलंका को 1 जनवरी, 2009 तक अपने-अपने देशों में सीमा शुल्क घटाकर शून्य से 5 प्रतिशत के बीच कर देना था, जबकि दक्षेस के अपेक्षाकृत कम विकसित देशों को इसके लिए 1 जनवरी, 2016 तक का समय दिया गया है। इस श्रेणी के देशों में बांग्लादेश, मालदीव, नेपाल और भूटान शामिल हैं। प्रशुल्क कटौतियों से इन देशों को होने वाली राजस्व क्षति की भरपाई क्षेत्र के अपेक्षाकृत विकसित देशों (भारत, पाकिस्तान व श्रीलंका) द्वारा की जाएगी। सदस्य देशों के घरेलू हितों की सुरक्षा के लिए साफ्टा समझौते में संवेदनशील उत्पादों का प्रावधान किया गया है। इस सूची में शामिल वस्तुओं का व्यापार साफ्टा के व्यापार उदारीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत नहीं किया जा सकेगा। अर्थात् साफ्टा के तहत् शुल्कों में कमी से संबंधित कोई भी प्रावधान इस सूची में शामिल वस्तुओं पर लागू नहीं होगे ।

साफ्टा के अंतर्गत चरणबद्ध व्यापार उदारीकरण कार्यक्रम (ट्रेड लिबरलाइजेशन प्रोग्राम) के प्रथम चरण की प्रशुल्क कटौती को भारत ने 1 जुलाई, 2006 से लागू कर दिया है। इसके तहत् 380 उत्पादों के दक्षेस देशों से आयात पर प्रशुल्क दरें घटाई गई हैं। इनमें मोटर कारें, मोटर साइकिलें, खाद्य तेल, कोकी एवं कोको उत्पाद, लैक्टोस व माल्टोस आदि शामिल हैं। दक्षेस के लीस्ट डेवलप्ड कंट्रीज (एलडीसी-बांग्लादेश, भूटान, मालदीव एवं नेपाल) तथा नॉन लीस्ट डेवलप्ड कंट्रीज (नॉन एलडीसी-पाकिस्तान एवं श्रीलंका) के मामलों में प्रशुल्कों में यह कटौतियां अलग-अलग हैं। इससे दक्षेस राष्ट्रों के आपसी व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। स्वदेशी उद्योगों/किसानों की विदेशी प्रतिस्पद्धि से सुरक्षा की दृष्टि से चुनिंदा उत्पादों की एक संवेदनशील सूची भी निर्धारित कर ली गई है। गैर-अल्पविकसित देशों के लिए 884 तथा अल्पविकसित देशों के लिए 768 उत्पादों को इस संवेदनशील सूची में शामिल किया गया है। इस सूची में शामिल उत्पादों के मामले में व्यापार उदारीकरण कार्यक्रम (टीएलपी) लागू नहीं होगा। व्यापार उदारीकरण के अंतर्गत नॉन लीस्ट डेवलप्ड स्टेट्स (भारत पाकिस्तान एवं श्रीलंका) दक्षेस के अन्य देशों से आयात पर 20 प्रतिशत शुल्क ही आरोपित करेंगे, जबकि अगले पांच वर्षों में इन्हें (श्रीलंका को 6 वर्षों में) प्रशुल्क घटाकर 0.5 प्रतिशत तक लाना होगा। लीस्ट डेवलप्ड स्टेट्स को प्रशुल्क 30 प्रतिशत तक रखने की छूट फिलहाल दी गई है। आगामी 8 वर्षों में इन्हें यह 0.5 प्रतिशत करनी होगी।

दक्षेस (सार्क) राष्ट्रों के मध्य हुई एक सहमति के तहत् इन देशों की साझा यूनिवर्सिटी की स्थापना नई दिल्ली में हुई। दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय नाम के इस विश्वविद्यालय में पहला सत्र अगस्त 2010 में शुरू हुआ था।

8 देशों के समूह दक्षेस ने अपने विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए समय सीमा 2012 तक निर्धारित की हुई थी। यह लक्ष्य प्राप्त न होने के कारण इनके लिए समय सीमा को पुनर्निर्धारित कर 2015 किया गया है। समय-सीमा में वृद्धि का फैसला 5 अप्रैल, 2013 को दक्षेस बैठक में किया गया। यह सार्क डेवलपमेंट गोल्स संयुक्त राष्ट्र संघ के 8 मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स की तर्ज पर निर्धारित 22 लक्ष्य हैं, जो लाइवलीहुड, हैल्थ, एजूकेशन व एन्वायरमेंट चार वर्गों में विभाजित हैं।

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