समाज- उत्तर वैदिक काल Society- Later Vedic period

समाज

उत्तर वैदिक काल में, सम्पूर्ण भारत में, जीवन के विभिन्न पक्षों में एक निश्चित दिशा की ओर परिवर्तन हुए। इस युग में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक दृष्टि से एक ऐसे ढाँचे का आविर्भाव हुआ जो सामान्य परिवर्तनों के साथ लम्बे काल तक चलता रहा। इस युग की प्रमुख विशेषताएँ थीं- कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था, कबायली संरचना में विघटन, वर्णव्यवस्था का जन्म और क्षेत्रगत साम्राज्यों का उदय। उत्तर वैदिक काल में आर्यों के सामाजिक जीवन में स्थायित्व ही नहीं देखा जाता है, बल्कि पूर्वकाल की तुलना में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होते हैं। आर्य यद्यपि ग्रामों में निवास करते थे, किन्तु इस युग में बड़े-बड़े नगरों का विकास हुआ। इस काल तक आते-आते वर्ण का अभिप्राय भी बदला था। शूद्र को सम्मिलित करते हुए चार वर्णों की परिकल्पना की गई।

समाज का आधार रक्त संबंध था। समाज की महत्त्वपूर्ण इकाई कुल था। अब चारों वर्णों के बीच भेद-भाव उत्पन्न होने लगे। सम्बोधन की दृष्टि से चारों वर्णों के लिए चार शब्द आए हैं। ब्राह्मण के लिए ऐहि, क्षत्रिय के लिए आगच्छ, वैश्य के लिए आद्रव (जल्दी आओ) और शूद्र के लिए आधाव (दौड़कर आओ) शब्द प्रयुक्त होते थे। ऊपर के तीन वर्णों को द्विज की स्थिति प्राप्त हुई। द्विज का शाब्दिक अर्थ है दुबारा जन्म लेना। तैत्तरीय ब्राह्मण के अनुसार ब्राह्मण सुत का, क्षत्रिय सन का और वैश्य ऊन का यज्ञोपवीत धारण करते थे। ब्राह्मणों का उपनयन संस्कार वसन्त में, क्षत्रियों का ग्रीष्म में और वैश्यों का शीत ऋतु में होता था।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र के लिए वर्ण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में मिलता है। ऋग्वेदकाल में किसी भी वर्ग का व्यक्ति अपनी इच्छा तथा क्षमता के अनुसार, किसी भी वर्ण का कार्य अपना सकता था। किन्तु उत्तर वैदिककाल में वर्ण व्यवस्था में पूर्ववत् लचीलापन नहीं देखा जाता। प्रत्येक वर्ण में परस्पर पृथकता दर्शाने की दृष्टि से नियम एवं विधान बना दिये गये थे। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि गायत्री मंत्र का प्रारम्भ ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य अलग-अलग ढंग से करें। सामान्यतः शूद्रों को धार्मिक कृत्यों के अधिकार से वंचित रखा गया। इस प्रकार परवतीं संहिताओं के काल में वर्ण शब्द प्रयोग निश्चित रूप से जाति के लिए प्रयुक्त हुआ है। इस जाति व्यवस्था का विकास ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में होता हुआ देखते हैं जिसमें समाज के चार वर्णों के अस्तित्त्व को विराट पुरुष के विविध अंगों से सम्बद्ध कर दिया गया जिसकी चर्चा पूर्व में की गई है। उपरोक्त चार जातियों के अतिरिक्त अन्य जातियों एवं उपजातियों का विकास अनेक कारणों से सम्भव हुआ। विविध कामगारों की संस्थाओं ने जातियों के रूप में विकसित होने के लिए प्रेरित किया और किसी एक जाति द्वारा अपनाया गया व्यवसाय पैतृक बनता गया। इन्हीं पैतृक व्यवसायों ने धीरे-धीरे एक जाति का स्वरूप ग्रहण कर लिया। जातियों के विकास के साथ गोत्र परम्परा विकसित हुई जिसके अन्तर्गत अपने गोत्र से बाहर विवाह करने की परम्परा चल पड़ी। विवाह अपनी जाति में ही किये जाने लगे किन्तु समान गोत्र में नहीं। यह परम्परा जाति प्रथा को अधिक कठोर बनाने में सहायक बनी। अथर्ववेद में व्रात्य शब्द का बहुधा मिलता है जिसका अर्थ होता था, वह आर्य जो अपनी धर्मनिष्ठा से च्युत हो चुका है और जिसकी वेदों पर कोई श्रद्धा नहीं रही है। व्रात्य लोग खेती नहीं करते थे।

ब्राह्मण- प्रारंभ में 16 पुरोहितों में ब्राह्मण भी एक पुरोहित था किन्तु कालान्तर में यज्ञ की विधि द्वारा उसने समाज में प्रतिष्ठा स्थापित कर ली। ब्राह्मण को वैदिक ग्रंथों में अदायी (दान लेने वाला) और सोमपायी (भ्रमण करने वाला) कहा गया है। ब्राह्मण अपना राजा सोम को मानते थे। ब्राह्मण ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य संहिताओं के विवरण से ज्ञात होता है कि ब्राह्मणों, क्षत्रियों एवं वैश्यों के कर्त्तव्यों में विभाजक रेखायें स्पष्ट हो गई थीं। तैत्तरीय संहिता में विवेचन मिलता है कि ब्राह्मण ऐसे देवता हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। देवता के दो प्रकार उसे अन्य को प्रदान करते हैं अत: मानव देवता हैं; ऐतरेय ब्राह्मण में आया है कि जब वरुण से कहा गया कि राजा हरिश्चन्द्र के पुत्र के स्थान पर ब्राह्मण पुत्र की बलि दी जायेगी। तो वरुण ने कहा कि ब्राह्मण तो क्षत्रिय से उत्तम समझा ही जाता है। ब्राह्मण को दिव्यवर्ण का कहा गया और उसमें समस्त देवताओं का निवास माना गया। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, ब्राह्मणों के चार विलक्षण गुण है- ब्राह्मण (ब्राह्मण के रूप में पवित्र पैतृकता), प्रतिरूपचय (पवित्राचरण), यश (महत्ता) एवं लोकपक्ति (लोगों को पढ़ाना या पूर्ण करना)। जन सामान्य द्वारा ब्राह्मण से ज्ञान अर्जित किये जाने पर उसे चार विशेषाधिकार मिलते थे-अर्चा (आदर), दान, अज्येयता (कोई कष्ट न देना) एवं अवध्यता। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार- राजा पर निर्भर होने पर भी ब्राह्मण राजा से श्रेष्ठ हैं। वाजसनेयी संहिता में ब्राह्मणों को राजा से उत्तम कहा गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि समाज में ब्राह्मण को कष्ट मिलने पर जल में टूटी हुई नाव की तरह राजा नष्ट हो जाता है। अत: शतपथ ब्राह्मण भी राजा की शक्ति का आधार ब्राह्मण को ही मानता है। किन्तु दूसरी ओर काठक संहिता में ब्राह्मण के ऊपर क्षत्रिय की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है और ऐतरेय ब्राह्मण में भी एक स्थान पर ब्राह्मण को क्षत्रिय से नीचा कहा गया है।

क्षत्रिय- इसका शाब्दिक अर्थ होता है क्षेत्र पर अधिकार करने वाला। वैदिक काल में लोहे के युद्धास्त्रों के कारण क्षत्रियों की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई। समाज की सुरक्षा का अधिभार क्षत्रिय पर था। ब्राह्मण और क्षत्रिय के आपसी प्रतिस्पर्द्धा थी। शतपथ ब्राह्मण में एक जगह पर क्षत्रिय को ब्राह्मण श्रेष्ठ बताया गया है। इसी प्रतिस्पर्द्धा के कारण कुछ क्षत्रिय विद्वान् दार्शनिक राजा बन गए। उपनिषद् काल में श्वेतकेतु आरूणि ने प्रवाहण जैबली से शिक्षा पाई थी।

इस काल में राजपद को नई शक्ति एवं अधिकार मिलने के फलस्वरूप क्षत्रिय वर्ण को नया स्वरूप प्राप्त होता है। राजा को सभी वर्गों से श्रेष्ठ माना गया। इस युग में राजा को ब्राह्मण को निष्कासित करने, वैश्य से कर वसूल करने तथा शूद्र को दण्डित करने के अधिकार प्राप्त थे। राजन्य वर्ग में यह धारणा बन गई थी कि वाजपेय, राजसूय आदि यज्ञों के माध्यम से राजा की महिमा में अभिवृद्धि होती है और इन यज्ञों का सम्पादन ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा किया जाता था। जब राजा को राज्याभिषेक के अवसर पर मुकुट पहनाया जाता था तो यह समझा जाता था कि यह एक सबका अधिपति एवं ब्राह्मणों तथा धर्म की रक्षा करने वाला उत्पन्न किया गया है। क्षत्रिय को कोई कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ब्राह्मण के पास जाना चाहिए, ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के सहयोग से यश मिलता है। एक ब्राह्मण बिना राजा के रह सकता है, किन्तु एक राजा बिना पुरोहित के नहीं रह सकता। यहाँ तक कि देवताओं के लिए भी पुरोहित की आवश्यकता मानी गई। त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप देवताओं के पुरोहित थे। शतपथ ब्राह्मण में अन्य राजा के समक्ष बलशाली होने के लिए, राजा को ब्राह्मण के प्रति नम्रता पूर्ण व्यवहार करने का निर्देश मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है कि यदि राजा ब्राह्मण के निर्देशन में कार्य करता है तो राष्ट्र समृद्ध बनता है। इससे परिलक्षित होता है कि तत्कालीन सामाजिक एवं राजनैतिक परिवेश में ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के मध्य एक घनिष्ठ सम्बन्ध की परिकल्पना की गई एवं राष्ट्र के लिए दोनों के एकत्व पर जोर दिया गया।

वैश्य- उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण एवं राजन्य वर्ग की तुलना में वैश्य वर्ग की सामाजिक स्थिति निम्नतर देखी जाती है। ऐतरेय ब्राह्मण में उसे अनस्य बलिकृत कहा है। याजक क्रियाओं में भी वैश्यवर्ग का सहयोग अपेक्षित माना गया था। कहा गया है कि जब देवता लोग पराजित हुए तो वे वैश्य की दशा को प्राप्त हो गये। राजा के लिए विशमत्ता अथवा विश का भक्षक पद उनकी निम्न स्थिति को इंगित करता है। मनुष्यों में वैश्य तथा पशुओं में गायें अन्य लोगों के उपभोग की वस्तुएँ कही गई हैं। आर्थिक दृष्टि से यह वर्ग सम्पन्न था क्योंकि व्यवसायों पर इस वर्ग का आधिपत्य था। फलस्वरूप इसे अन्य दो वर्णों के समकक्ष ही रखा जाता था। मुख्यतः यह वर्ण कृषि कार्य, पशुपालन, विविध उद्योग एवं वाणिज्य व्यापार में संलग्न था। बहुसंख्यक पशुओं का स्वामी होना विशेष गर्व की बात मानी जाती थी। वैश्य को न केवल यज्ञादि कर्म करने का अधिकार प्राप्त था, बल्कि उपनयन एवं वैदिक शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार भी थे। ऐतरेय ब्राह्मण में यह प्रसंग मिलता है कि वैश्य अन्य लोगों के लिए अन्न उत्पादित करते थे एवं कर देते थे। स्पष्ट है कि वैश्य अन्य दोनों उच्च वर्णों की तुलना में संख्या में अधिक थे एवं कृषि, पशुपालन एवं व्यापार करते थे। वे ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों से दूर रहते थे और उनकी आज्ञा पालन करते थे।

शूद्र- ऋग्वेद के दसवें मण्डल के पुरुष सूक्त में पहली बार शूद्रों की चर्चा हुई। इन्हें अन्य का मृत्य कहा जाता था, अर्थात् तीनों वर्णों का सेवक। शतपथ ब्राह्मण में शूद्रों द्वारा सोम यज्ञ में भाग लेने की बात की गई है। मैत्रायिणी संहिता में धनी शूद्रों का जिक्र है। उनकी स्थिति अभी उतनी गिरी नहीं थी क्योंकि राज्याभिषेक के समय शूद्र भी हिस्सा लेते थे। छुआछूत की अवधारणा अभी विकसित नहीं हुई थी। विभिन्न शिल्पियों में रथकार की स्थिति संभवत: अच्छी थी। उन्हें उपनयन का अधिकार था। बच्चे, विधवा स्त्री एवं संन्यासी वर्ण व्यवस्था से बाहर थे।

समाज में परिचारक के कार्य करने वाले शूद्रों का स्थान चौथा था। विद्वानों की धारणा है कि शूद्रों में दास तथा ऐसे व्यक्ति हो सकते थे जिनका जन्म आर्यों एवं दासों के मिश्रण से हुआ था। चौथे वर्ण में मिश्रण एवं अवश्यंभावी था और इसकी व्याख्या वर्ण संकरत्व के मूल रूप में की परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि चौथे वर्ण का आधार जाति एवं व्यवसाय दोनों थे। धर्म सूत्रों में शूद्रों को काले वर्ण का कहा गया है। तैत्तिरीय संहिता में शूद्रों को यज्ञाधिकार से वंचित किया गया है। उत्तर वैदिक काल में शूद्र वर्ण में दो प्रकार की जातियों का आविर्भाव हुआ। कुछ व्यवसाय सम्बन्धी जातियाँ थीं जो व्यवस्थित एवं धनी थीं। दूसरी अन्त्यज जातियाँ थीं जिनका समाज में अति निम्न स्थान था।

चाण्डाल- उत्तर वैदिक साहित्य (लगभग 1000-600 ई.पू.) में चांडाल का उल्लेख छ: स्थलों पर हुआ है। इसका सबसे पहले उल्लेख वाजसनेयी संहिता के एक उत्तरवर्ती अंश में पुरुषमेध (प्रतीकात्मक मानव बलि) की एक सौ चौरासी बोलियों के बीच हुआ है और उसे वायुदेव को अर्पित बताया गया है। लगता है, इस दौर में वह उन देशी जातियों में एक था जिनसे आर्यों का परिचय था और ये जनजातियाँ अप्रवासी आर्य बस्तियों की सीमाओं पर रहती थीं तथा आर्यों के साथ इनके पचने-खपने और आर्य संस्कृति में रंगने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी थी। निषाद, पर्णक, किरात और पौल्कस इस प्रकार की अन्य जातियाँ थी। ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य, शूद्र तथा कई अन्यों के साथ पुरुषमेध में, चंडाल के उल्लेख से, उसके अशौच का कोई संकेत नहीं मिलता। प्राचीन भारत में किसी को अपना उच्छिष्ट देने के बड़े कठोर नियम थे और चंडाल को सामान्यतः उसके लिए अनर्ह अर्थात् अयोग्य समझा जाता था, किन्तु अग्निहोत्र करने वालों को इसका अपवाद रखा गया था।

गोत्र- गोत्र की अवधारणा पहली बार उत्तर वैदिक काल में आयी। गोत्र का शाब्दिक अर्थ गोष्ठ अर्थात् वह स्थान, जहाँ पूरे गोत्र का गोधन रखा जाता था। परन्तु गोत्र का यह अर्थ कुछ समय के बाद बदल गया। अब एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न व्यक्ति एक गोत्र के कहे जाने लगे। प्रारंभ में गोत्र की अवधारणा ब्राह्मणों के लिए थी। ब्राह्मणों के द्वारा ही क्षत्रिय और वैश्य को गोत्र प्रदान किये गये। मौलिक रूप में सात गोत्र हैं जो ऋषियों के नाम पर हैं। यथा, कश्यप, वशिष्ठ, भृगु, गौतम, भारद्वाज अत्रि, तथा विश्वामित्र। आठवां गोत्र अगस्त्य ऋषि का माना जाता है। वे अनायों के ऋषि भी माने जाते हैं।

प्रवर- आगे चलकर केवल एक मूल पुरुष से उत्पन्न व्यक्ति की ही गणना नहीं की जाती थी, वरन् उस मूल पुरुष के पूर्वजों को भी ध्यान में रखा जाता था। सपिंड, सगोत्र आदि शब्दों पर विचार सूत्रकाल में होने लगा और इसी के साथ गोत्र बर्हिगमन की परिकल्पना आई। इसलिए विवाह में इसका ध्यान रखा जाता था।

गृह (परिवार) परिवार का मुखिया सर्वश्रेष्ठ होता था। उत्तर वैदिक काल में परिवार के मुखिया के अधिकारों में वृद्धि हुई। उदाहरण के लिए ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार, अजीगत ने अपने पुत्र सुन: शेप को 100 गायों के बदले बेच दिया। विश्वामित्र ने आज्ञा का उल्लंघन करने पर अपने 50 पुत्रों को घर से बाहर कर दिया। वैसे संपत्ति पर पुत्रों का अधिकार होता था। पर हम देखते हैं कि पिता के अधिकारों पर नियंत्रण की प्रक्रिया भी इस काल में शुरू हो गई थी। जैमिनीय ब्राह्मण से ज्ञात होता है कि पिता की वृद्धावस्था में सम्पत्ति के बंटवारे की मांग की गई। ऐतरेय ब्राह्मण से जानकारी मिलती है कि मनु के पुत्रों ने अपने पिता की सम्पत्ति का जीवितावस्था में ही विभाजन कर लिया था। इससे परिलक्षित होता है कि संयुक्त परिवार व्यवस्था के स्वरूप में बदलाव आने लगा था।

नारी की स्थिति- पूर्व काल के समान इस युग में भी स्त्रियों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था किन्तु हम परवर्तीकालीन हीन स्थिति का आरम्भ इस काल में होता हुआ देखते हैं। इसके लिए निन्दनीय शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा, शतपथ ब्राह्मण में उसे असत्यभाषी और अनृत कहा गया। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्रियों को दुख का कारण माना गया है। मैत्रायिणी संहिता में स्त्रियों की तुलना मदिरा एवं पाशा से की गई है। यज्ञ एवं अनुष्ठानादि के अवसर पर सोम पान से वंचित किये जाने का उल्लेख भी आया है, यह तथ्य समाज में स्त्रियों की स्थिति में गिरावट का प्रतीक माना जा सकता है। अथर्ववेद में पुत्री के जन्म पर खिन्नता का उल्लेख हुआ है। पितृसत्तात्मक समाज में, पुत्र का विशेष महत्त्व होना, स्वाभाविक तथ्य था। तथापि इस युग में भी स्त्रियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता था। कन्याओं की शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद ही विवाह के योग्य माना जाता था। आजीवन आध्यात्मिक चिन्तन में प्रवृत्त

स्त्रियों का भी उल्लेख मिलता है जिन्हें ब्रह्मवादिनी की संज्ञा दी जाती थी। वैदिक युग में छात्राओं के दो वर्ग कहे गये हैं-सद्योवधू एवं ब्रह्मवादिनी। सद्योवधू वे छात्राएँ थीं जो विवाह से पूर्व वेद मंत्रों एवं याजक प्रार्थनाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेती थीं तथा ब्रह्मवादिनी आजीवन वैदिक शिक्षा में व्यतीत करती थीं। ऋषि कुशध्वज की पुत्री वेदवती ऐसी ही ब्रह्मवादिनी स्त्री थी। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी से विवाह के उपरान्त भी आध्यात्मिक जिज्ञासा होना, तत्कालीन उच्चस्तरीय स्त्री शिक्षा का अनुपम उदाहरण माना जा सकता है। मैत्रेयी ने कात्यायनी के पक्ष में अपनी सम्पत्ति का अधिकार त्याग कर एक मात्र ज्ञान दान की याचना की थी। वृहदारण्यक उपनिषद् में याज्ञवल्क्य एवं गार्गी की कथा है। इसके अनुसार याज्ञवल्क्य गार्गी को वाद-विवाद में डांटकर चुप करा देते हैं। फिर भी सूत्र काल की तुलना में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। मैत्रेयी एवं गार्गी परम विदुषी महिलाएँ थीं। इतना ही नहीं, स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करती थीं। यजुर्वेद में शिक्षित स्त्री एवं पुरुष के विवाह को ही उपयुक्त माना गया है। अथर्ववेद के अनुसार स्त्री के चार पति हैं- (1) सोम, (2) अग्नि, (3) गंधर्व तथा (4) वास्तविक पति। इसका सांकेतिक महत्त्व है अर्थात् यह स्त्रियों की शारीरिक एवं सांस्कृतिक विकास की चार अवस्थाएँ हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् में विदुषी पुत्री के जन्म की कामना करने वाले व्यक्ति के लिए एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान की व्यवस्था मिलती है। जनक की राजसभा में होने वाले शास्त्रार्थ में गार्गी ने अपनी अद्भुत तर्क शक्ति से याज्ञवल्क्य जैसे विद्वान् महर्षि को भी प्रभावित किया था। सामवेद के मंत्रों के गान में स्त्रियाँ विशेष रुचि रखती थीं। यह उनकी गान विद्या में अभिरुचि के साथ वैदिक मंत्रों के विधिवत् एवं विशुद्ध उच्चारण को भी इंगित करती है। स्त्रियाँ विवाह के बाद पुरुष की सहचारिणी बनती थीं, विवाह प्रक्रिया द्वारा अनेक धार्मिक अधिकार तथा सामाजिक स्वतन्त्रता मिलती थी। किन्तु पति-पत्नी के व्यवहार में पति की श्रेष्ठता को स्वीकार किया जाता था। पति के भोजन के पश्चात् पत्नी को भोजन करने के निर्देश तत्कालीन साहित्य में मिलते हैं। इतना ही नहीं पत्नी के शरीर पर पति के अधिकार की चर्चा भी मिलती है।

विवाह- विवाह एक आवश्यक कर्त्तव्य था। अविवाहित व्यक्ति यज्ञ नहीं कर सकता था। संभवत: पुरुषों में बहुविवाह का प्रचलन था क्योंकि हरिश्चन्द्र की 100 पत्नियां थीं। ऐतेरेय ब्राह्मण में ऐसा कहा गया है कि एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ हो सकती हैं, परन्तु एक स्त्री के अनेक पुरुष नहीं हो सकते थे। विधवा विवाह का प्रचलन था। तैतरीय संहिता में विधवा के पुत्र को दधिसत्य कहा जाता था। अंतर्जातीय विवाह का भी प्रचलन था। तैतरीय संहिता में आर्य पुरुष एवं शूद्र नारी के बीच वैवाहिक संबंधों की चर्चा है। शतपथ ब्राह्मण में ऋषि च्यवन और राजा शरीयात की पुत्री सुकन्या के बीच वैवाहिक संबंधों की चर्चा है। राजा की प्रधान रानी महिषी कहलाती थी। अन्य नारियों (रानियों) को परिव्रीति कहा जाता था, जो उपेक्षित रहती थी।

आहार- इस काल में मांस भक्षण एवं सुरा पान को नीची निगाह से देखा जाता था। अथर्ववेद के एक सूत्र में ऐसे आहार को गलत माना गया है।

आमोद-प्रमोद- विभिन्न स्थानों पर सैलुश (अभिनेता) की चर्चा है। बड़े-बड़े उत्सवों पर वीणा-गथिन (वीण बजाने वाले) उपस्थित होते थे। सौ तन्तु के वाद्य यंत्र को सततंतु कहा जाता था।

शिक्षा

वैदिक साहित्य का अपार भण्डार इस तथ्य का द्योतक है कि प्राचीन काल में शिक्षा की सुनियोजित व्यवस्था थी। उत्तर वैदिक काल को बौद्धिक विकास का युग कहा जाये, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि इसी काल में विशाल वैदिक साहित्य का सृजन हुआ, जिसका आधार था, उपनयन संस्कार के द्वारा विद्यार्थी जीवन के साथ ही सुनियोजित शिक्षा प्रणाली का प्रारम्भ। वैदिक शिक्षा पद्धति का प्रधान आधार था शिक्षक, जिसे आचार्य या गुरु कहा जाता था। प्राचीन काल में शिक्षा का अभिप्राय केवल पुस्तकीय ज्ञान न होकर अन्तर्दृष्टि का विकास भी कहा गया है, ऐसी अन्तर्दृष्टि का विकास जिससे मोक्ष प्राप्त हो सके। प्रारम्भ में पिता से ही पुत्र को शिक्षा मिलती थी, जैसा कि हमें वृहदारण्यक उपनिषद् के श्वेतकेतु आरुणेय आख्यान से ज्ञात होता है। गुरुकुल प्रणाली प्राचीन भारतीय शिक्षा की प्रमुख विशेषता थी जिसके अन्तर्गत विद्यार्थी को अन्तेवासी अर्थात् आचार्य के सान्निध्य में रहना (आश्रम में) होता था। इस दौरान विद्यार्थी का प्रमुख कार्य गुरु के पास रहकर गुरु की सेवा तथा अध्ययन करना था। प्रत्येक शिष्य का स्तर आश्रम में समान था, सबको समान रूप से जलाने की लकड़ियाँ (समिधायें) एकत्र करना, गौचारण तथा भिक्षाटन करना होता था। इस प्रक्रिया से विद्यार्थियों में छोटे-बड़े की भावना का विकास नहीं हो पाता था।

वैदिक काल में अध्ययन का साहित्य बहुत विशाल था। शतपथ ब्राह्मण ने स्वाध्याय के अन्तर्गत ऋचाओं, यजुष, साम एवं अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, गाथाओं का उल्लेख किया है। गोपथ ब्राह्मण में सभी वेद, कल्प, रहस्य, ब्राह्मण, उपनिषद्, इतिहास, अन्वाख्यान, पुराण, अनुशासन आदि अध्ययन योग्य साहित्य कहा गया हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में एक विवरण मिलता है जिसमें नारद सनत्कुमार से कहते हैं कि- उन्होंने (नारद ने) चारों वेद, इतिहास, पुराण (पंचम वेद रूप) व्याकरण, राशि (अंकगणित), दैव (लक्षण विद्या), निधि (खनिज उत्खनन विद्या), एकायन (राजनीति), देवविद्या (निरुक्त) ब्रह्मविद्या (छन्द एवं ध्वनि विद्या), क्षत्र विद्या (धनुर्वेद), नक्षत्र विद्या, सर्प विद्या एवं देवजन विद्या (गान एवं नृत्य) सीख ली थी। इससे प्रतीत होता है कि उस युग में इन विषयों की शिक्षा दी जाती थी।

ध्यातव्य है कि आश्रमों में विशेष रूप से ब्रह्मविद्या सीखने का अवसर मिलता था जिससे शिष्य का आत्मिक विकास एवं नैतिक उत्थान होता था। यही भारतीय शिक्षा पद्धति की रीढ़ थी। इसी परिप्रेक्ष्य में विशाल वैदिक साहित्य का सृजन सम्भव हुआ।

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