स्कन्दगुप्त: 455-467 ई. Skandagupta: 455-467 AD

स्कन्दगुप्त कुमारगुप्त का पुत्र था। स्कन्दगुप्त एक वीर व पराक्रमी योद्धा था। इसने सम्भवतः कुमारगुप्त के पश्चात् शासक बनने की कोशिश की।

स्कन्दगुप्त के शासन-काल की बहुत सी घटनाएँ उल्लेखनीय हैं। उसने पुष्यमित्रों, म्लेच्छों तथा हूणों के साथ संघर्ष करके उन्हें पराजित किया। भितरी व जूनागढ़ अभिलेख में इसका उल्लेख है। भीतरी अभिलेख में कहा गया है कि अपने पिता के समय में, अपने वंश का भाग्य पुन: स्थापित करने के लिए ने एक रात पृथ्वी पर व्यतीत की और शत्रुओं को पराजित कर गुप्तों की मर्यादा को फिर से प्रतिष्ठापित किया। जूनागढ़ अभिलेख में भी कहा गया है कि अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् स्कन्दगुप्त ने पराक्रम से अपने शत्रुओं को पराजित किया और सभी दिशाओं में समुद्र तथा पृथ्वी को विजित किया जिसके चारों ओर समृद्ध राज्य थे। म्लेच्छ देशों में शत्रुओं के अभियान को जड़ से उखाड़ कर उसने घोषणा करवाई कि उसने विजय प्राप्त कर ली है। दोनों अभिलेखों से विदित हो जाता है कि स्कन्दगुप्त ने पुष्यमित्रों, म्लेच्छों तथा हूणों के साथ संघर्ष किया।

भीतरी अभिलेख के अनुसार स्कन्दगुप्त ने शक्तिशाली हूणों का सामना कर उन्हें पराजित कर पृथ्वी को हिला दिया। जूनागढ़ अभिलेख में कहा गया है कि स्कन्दगुप्त ने मानदर्प से अपने फणों को उठाने वाले सर्परूपी नरपतियों का दमन किया। उन्होंने म्लेच्छ देश से अपने शत्रुओं के दर्प को भग्न कर उन्हें अपनी विजय स्वीकार करने पर बाध्य किया। इस प्रकार उन्होंने समस्त पृथ्वी और अपने शत्रुओं के गर्व पर विजय प्राप्त की। कई इतिहासकार यह मानते हैं कि म्लेच्छों के साथ युद्ध का तात्पर्य भितरी अभिलेख से स्पष्ट रूप से उल्लेखित हूणों के साथ हुए युद्धों से है। कुछ का मानना है कि जूनागढ़ उल्लेखित म्लेच्छ हूण नहीं हैं। वे सम्भवत: किदार कुषाण हैं। आर्य-मंजूश्री-मूलकल्प से पता चलता है कि अपने युवराज काल में स्कन्दगुप्त ने पुष्यमित्रों पर विजय प्राप्त की और दूसरी महत्वपूर्ण विजय उसने हूणों पर प्राप्त की थी। इस ग्रन्थ से यह भी संकेत मिलता है की हूणों की संख्या विशाल थी जबकि स्कन्दगुप्त की छोटी। इतना होने पर भी विजय स्कन्दगुप्त को मिली। स्कन्दगुप्त ने पश्चिमी सीमा की सुरक्षा की ओर समुचित तरीके से ध्यान दिया। योग्य राज्यपालों की नियुक्ति की। 461 ई. के कहोम स्तम्भ लेख में गुप्तकालीन शान्ति की अवस्था का वर्णन है। इस समय तक गुप्त साम्राज्य विदेशी आक्रमणकारियों के भय से पूर्णतः मुक्त हो चुका था। इतिहासकारों के मध्य यह विवाद का विषय बना हुआ है कि स्कन्दगुप्त साम्राज्य की सुरक्षा प्रदान कर पाया अथवा नहीं। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि इन युद्धों ने गुप्त साम्राज्य को जर्जरित कर दिया तथा स्कन्दगुप्त के समय से ही गुप्तों के साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया। यह धारणा युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होती क्योंकि स्कन्दगुप्त ने अपने अन्तिम समय तक उत्तराधिकार में प्राप्त गुप्त साम्राज्य को अक्षुण रखा।

स्कन्दगुप्त की सफलताओं का आधार उसकी प्रशासनिक व्यवस्था थी। उसने पश्चिमोत्तर सीमा का पूरा महत्त्व समझा और उसकी रक्षा का समुचित प्रबन्ध किया। स्कन्दगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में सौराष्ट्र (काठियावाड़) से लेकर पूर्व में बंगाल और उत्तर भारत के मध्यप्रदेश तक फैला हुआ था। वह एक विशाल साम्राज्य का मालिक था। उसका साम्राज्य विभिन्न प्रान्तों में विभाजित था।

गिरनार पर्वत पर सुदर्शन झील की मरम्मत करवाने में स्कन्दगुप्त ने तत्परता दिखाई। गुप्त संवत् 136 (455 ई.) में अधिक वर्षा के कारण सुदर्शन झील टूट गयी। पलाशिनी आदि नदियाँ जो निकटतम उर्जयत और खेतक नामक पर्वतों से निकल कर सुदर्शन झील में गिरती थीं, वे समुद्र की ओर बह निकलीं। स्कन्दगुप्त ने असीम धन खर्च कर दो महीने के भीतर ही दरार को बन्द कर बांध को पुनः बनवा दिया। स्कन्दगुप्त ने इसकी मरम्मत के लिए सौराष्ट्र के राज्यपाल पर्णदत्त को आज्ञा दी। पर्णदत्त ने यह उत्तरदायित्व अपने पुत्र चक्रपालित को सौंपा जिसने इस झील पर नया बांध बनाने के साथ एक विष्णु मन्दिर भी बनवाया। इसके अवशेष हमें प्राप्त नहीं हैं। यह बांध 100 हाथ लम्बा, 68 हाथ चौड़ा और 7 पुरिसा ऊँचा था। जूनागढ़ अभिलेख में सुदर्शन झील के निर्माण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी वर्णन है। उसके निर्माण में स्कन्दगुप्त की लोककल्याणकारी भावना विदित हो जाती है।

स्कन्दगुप्त ने तीन प्रकार की मुद्राएँ चलाई- धनुर्धर प्रकार, राजा और लक्ष्मी प्रकार एवं अश्वारोही प्रकार। पश्चिमी एवं मध्य भारत में चाँदी की मुद्राएँ भी प्रचलित कीं। स्कन्दगुप्त की मुद्राएँ शुद्ध सोने की नहीं हैं। उनमें अन्य धातु की मिलावट है। उसकी मुद्राओं से स्कन्दगुप्त के व्यक्तित्व के साथ-साथ तत्कालीन समाज के विभिन्न पक्षों की जानकारी मिलती है। मुद्राओं की धातु में मिलावट से यह अनुमान किया जाता है कि स्कन्दगुप्त के समय में गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था में गिरावट आने लगी थी। सिक्कों पर उसका विरुद विक्रमादित्य अंकित है। वेदी छाप प्रकार की रजत मुद्राओं पर विक्रमादित्य की उपाधि भी मिलती है। हो सकता है अपने पितामह के अनुकरण में ही यह मुद्रा धारण की हो। काहौम अभिलेख में उसे शक्रोपम कहा गया है।

स्कन्दगुप्त ने अपने पूर्वजों की भाँति धार्मिक सहिष्णुता का परिचय दिया। उसने भितरी (गाजीपुर) में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करवायी। सौराष्ट्र में चक्रपालित ने सुदर्शन झील के तट पर विष्णु के मन्दिर का निर्माण कराया। उसके अभिलेखों में परम भागवतो महाराजाधिराज श्रीस्कन्दगुप्तः का उल्लेख है। वह स्वयं वैष्णव था फिर भी वह जैन और बौद्ध धमों का समान रूप से पालन करता था। उसके साम्राज्य में सभी सम्प्रदायों को धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त थी।

स्कन्दगुप्त एक महान् विजेता, राष्ट्र का मुक्तिदाता, गुप्त साम्राज्य के विलुप्त गौरव की पुनस्थापना करने वाला उदार शासक था।

स्कन्दगुप्त का अन्तिम समय शान्तिपूर्ण ढंग से व्यतीत हुआ। कई इतिहासकार यह मानते हैं कि स्कन्दगुप्त के अन्तिम काल में, गुप्त साम्राज्य में पृथकतावादी प्रवृत्तियों का विकास होने लगा था। यह तो स्पष्ट है कि स्कन्दगुप्त ने अपनी जीवितावस्था तक गुप्त साम्राज्य की एकता बनाए रखी।

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