शेरशाह की शासन व्यवस्था और प्रशासन Sher Shah's Governance and Administration

शेरशाह के राजत्व का सिद्धान्त और प्रशासन शासन की सुविधा के लिए सम्पूर्ण साम्राज्य सैतालीस इकाईयों (सरकारों) में विभक्त था, जिनमें से प्रत्येक पुन: कई परगनों में विभाजित थी। परगने में एक शिकदार-ए-शिकदारान, एक कोषाध्यक्ष एवं हिसाब रखने के लिए एक हिन्दू एवं एक फारसी लेखक होते थे। अगली बड़ी प्रशासनिक इकाई-सरकार में एक तथा एक मुन्सिफ-ए-मुन्सिफान होते थे, जो परगने के अधिकारियों के कार्य की देखभाल करते थे। अधिकारियों के अपने अधिकार-क्षेत्रों में अनुचित प्रभाव को रोकने के लिए सुल्तान ने उन सब को हर दो या तीन वर्षों में स्थानान्तरित करने की योजना बनायी, जो उसके शासन की अल्पकालीन अवधि के कारण अधिक समय तक नहीं चल सकी। शासन की प्रत्येक शाखा की व्यक्तिगत देखभाल शेरशाह स्वय करता था। अशोक तथा हर्ष के समान वह इस सूत्र के अनुसार कार्य करता था कि बड़ों को सदैव क्रियाशील होना शोभा देता है।

माना जाता है कि अफगानों के समय राजतंत्र कमजोर था। अफगानो में जनजातीय स्वतंत्रता की भावना थी। बहलोल लोदी अपने अमीरो को अमीर-ए-आली कहा करता था और उसके साथ कालीन पर बैठता था। सिकन्दर लोदी ने अमीरों को नियंत्रित करने की कोशिश की और उसने मुक्ती या बली की आय को लेखाबद्ध कराना शुरु किया।

शेरशाह ने राजतंत्र को शक्तिशाली बनाना चाहा और उसने प्रशासन के केन्द्रीयकरण पर बल दिया। माना जाता है कि शेरशाह (प्रतिमान) कुछ हद तक अलाउद्दीन खिलजी के मॉडल से प्रभावित था और इस मॉडल ने अकबर के मॉडल को भी प्रभावित किया। शेरशाह के मॉडल का अध्ययन करते हुए निम्नलिखित बातों पर बल देना चाहिए-

  1. यह कहाँ तक परम्परा से प्रभावित था।
  2. शेरशाह ने उसमें कौन सी नयी बातें जोडी और
  3. शेरशाह के मॉडल ने किस हद तक अकबर के मॉडल को प्रभावित किया।

शेरशाह ने कुछ हद तक परम्परागत मॉडल को भी अपनाया। उसके अंतर्गत निम्नलिखित विभाग महत्त्वपूर्ण थे-

दीवान-ए-वजारत- यह भू-राजस्व के निर्धारण एवं वसूली से सम्बद्ध विभाग था। शेरशाह ने सासाराम के प्रबंधन में अतिरिक्त अनुभव प्राप्त किया था। अत: इस विभाग में शेरशाह का हस्तक्षेप अधिक था।

दीवान-ए-आरिज- यह सैनिकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण एवं वेतन से सम्बन्धित विभाग था। शेरशाह ने दाग एवं हुलिया की पद्धति पुनर्जीवित की।

दीवान-ए-इन्सा- यह पत्राचार से सम्बधित विभाग था। शाही घोषणा-पत्र, सन्देशों के अभिलेख, राज्यपालों तथा अन्य स्थानीय अधिकारियों के पत्राचार रखना, इसी विभाग का कार्य था।

दीवान-ए-रसालत- यह धर्म से सम्बधित विभाग था।

दीवान-ए-कजा- यह न्याय विभाग था।

शेरशाह ने इस परम्परागत मॉडल में नयी बातें भी जोड़ी। शेरशाह ने प्रशासन का अतिकेन्द्रीयकरण किया। उसने मत्रियों को व्यक्तिगत सचिव में तब्दील कर दिया। उसके अंतर्गत लगभग 12 विभाग थे। प्रशासन के अतिकेन्द्रीयकरण के कारण ही सूर साम्राज्य का पतन हुआ क्योंकि उसके उत्तराधिकारी इतने योग्य नहीं थे कि इस उत्तरदायित्व का निर्वहन कर पाते।

शेरशाह के मॉडल ने कुछ हद तक अकबर के मॉडल को भी प्रभावित किया। शेरशाह के समय प्रांतीय प्रशासन था अथवा नहीं, इस विषय में विवाद है किन्तु इतना तय है कि मानक प्रांतीय प्रशासन की शुरुआत अकबर के समय हुयी। कानूनगो का मानना है कि शेरशाह के समय प्रांतीय प्रशासन नहीं था और साम्राज्य का विभाजन सरकारों में हुआ था। जबकि परमात्मा शरण मानते है कि शेरशाह के समय प्रांतीय प्रशासन था। अबुल फज़ल का मानना है कि शेरशाह का साम्राज्य 63 सरकारों में विभाजित था। उसके अनुसार 16 सरकारें बंगाल में थी और 47 सरकारे देश के अन्य भागों में।

दोआब क्षेत्र में भू-राजस्व प्रबंधन और प्रशासनिक कार्यों के लिए सरकार ही सर्वोच्च ईकाई थी। किन्तु कुछ अन्य क्षेत्रों में सुरक्षा और प्रशासन को ध्यान में रखते हुए एक अन्य प्रशासनिक ईकाई को अपनाया गया था जो विलायत के नाम से जाना जाता था। विलायत में एक से अधिक सरकारें शामिल होती थी। बंगाल, मालवा, राजपूताना और मुल्तान में विलायत का गठन किया गया था। सरकार सल्तनत काल के शिक का ही विस्तृत रूप था और इस पर दो प्रकार के अधिकारी नियुक्त किये जाते थे- शिकदार-ए-शिकदारान और मुसिफए-मुसिफान। प्रथम अधिकारी सामान्य प्रशासन से सम्बन्धित था और दूसरा भू-राजस्व प्रशासन से जुड़ा हुआ था। सरकारों का विभाजन परगनों में हुआ था। परगना में सामान्य प्रशासन की देख-रेख शिकदार नामक अधिकारी करता था, जबकि भू-राजस्व प्रशासन मुसिफ या आमील नामक अधिकारी के अंतर्गत था। परगनों में खजानदार नामक अधिकारी की भी नियुक्ति की जाती थी। प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई डेल या मौजा था जो गाँव का ही रूप था। वैसे गाँव डेल कहलाते थे जिसमें कृषि की भूमि के साथ वास की भी भूमि होती थी। मौजा वैसे गाँव को कहा जाता था जिसमें केवल कृषि की भूमि होती थी। इसका प्रधान मुखिया या पटवारी होता था। भू-राजस्व प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई गाँव ही थी।

विवेकपूर्ण एवं मानवतायुक्त सिद्धान्तों पर आधारित शेरशाह के भूमि-राजस्व-सम्बन्धी सुधारों का भारत के प्रशासनिक इतिहास में अद्वितीय महत्त्व है, क्योंकि इन्होंने भविष्य की भूमि-विषयक प्रणालियों के लिए नमूने का काम किया। भूमि की सावधानी से और औचित्य के साथ जाँच कर उसने भूमि-कर सीधे खेतिहरों के साथ निश्चित किया। राज्य की औसत उपज का चौथाई अथवा तिहाई भाग मिलता था, जो अनाज या नकद के रूप में दिया जा सकता था। नकद का तरीका बेहतर समझा जाता था। राजस्व इकट्ठा करने के असली काम के लिए सरकार अमीनों, मकदमों, शिकदारों, कानूनगो तथा पटवारियों-सरीखे अधिकारियों की सेवाओं का उपयोग करती थी। नियम कर को निश्चित समय पर एवं पूर्ण रूप से देने पर जोर दिया जाता था तथा आवश्यकता पड़ने पर शेरशाह ऐसा कराता भी था। उसने राजस्व विभाग के अधिकारियों को आदेश दिया था कि वे कर-निर्धारण के समय दया दिखलाएँ, परन्तु कर वसूलने के समय सख्त हो जाएँ रैयतों के अधिकार उचित रूप में माने जाते थे। प्रत्येक को क्या देना है यह कबुलियत में जो सरकार उससे लेती थी तथा पट्टे में, जो सरकार उसे बदले में देती थी, स्पष्ट लिखा होता था।, करों की माफी होती थी। शायद सिपाहियों के पड़ाव डालने या काफी वर्षा न होने के कारण फसलों के नुकसान हो जाने पर रैयतों को ऋण दिये जाते थे। राजस्व सम्बन्धी इन सुधारों से राज्य के साधन बढ़ गये तथा साथ-साथ जनता के लिए हितकर भी हुए।

भू-राजस्व प्रशासन में भी शेरशाह के मॉडल ने अकबर के मॉडल को प्रभावित किया। शेरशाह से पूर्व अलाउद्दीन खिलजी एवं सिकन्दर लोदी ने भूमि की माप करायी थी। शेरशाह के भू-राजस्व सुधार के निम्नलिखित उद्देश्य थे- 1. उत्पादन वृद्धि 2. रैयतों की सुरक्षा 3. राजकीय आय में वृद्धि।

शेरशाह ने अहमद खान नामक अधिकारी को अधिकृत किया। अहमद खान ने हिन्दू ब्राह्मणों की सहायता से भूमि की माप करायी और कृषि भूमि का एक दस्तावेज तैयार किया। भूमि माप में शेरशाह ने माप की ईकाई के रूप में गज-ए-सिकन्दरी का प्रयोग किया जो 32 अंगुल या 3/4 मीटर होता था। शेरशाह की भूमि माप की पद्धति जब्ती पद्धति कहलाती है। जब्ती पद्धति टोडरमल पद्धति के भी नाम से जानी जाती थी क्योंकि टोडरमल को इस प्रणाली का जनक माना जाता है। माप की ईकाई के लिए शेरशाह ने जरीब का प्रयोग किया। यह सन के डण्डे या रस्सी का बना होता था। माप की सबसे छोटी ईकाई बीघा को माना गया और सबसे बड़ी ईकाई परगना को बनाया गया था।

शेरशाह की पद्धति रैयतवाडी पद्धति के नाम से जानी जाती थी। शेरशाह ने किसानों से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित किए। प्रत्येक किसान को पट्टा दिया जाता था और उससे कबूलियत लिखवायी जाती थी। पट्टे में जमीन का प्रकार, स्वामी का नाम आदि स्पष्ट किया जाता था और कबूलियत में यह बात स्पष्ट की जाती थी कि सम्बन्धित किसान को कितना राजस्व प्रदान करना है। भू-राजस्व अधिकारियों को स्पष्ट रूप में निर्देश था कि वे नियमों का पालन करें।

शेरशाह ने जमीन को तीन भागों में विभाजित किया था और यह विभाजन उत्पादकता के आधार पर किया गया था। यह विभाजन उत्तम, मध्यम और निम्न भूमि में किया गया था। शेरशाह के समय भू-राजस्व की राशि क्या थी, इस विषय में विवाद है। कानूनगो एवं कुरैशी का मानना है कि यह कुल उत्पादन का 1/4 थी और सम्भवतः वे शेरशाह के उस फरमान को आधार बनाते हैं जो उसने मुल्तान के गवर्नर हैबत खाँ को दिया था किन्तु मोरलैण्ड ऐसा नहीं मानते हैं। इनका मानना है कि यह कुल उपज का 1/3 होता था। परमात्माशरण भी यही मानते हैं। निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि शेरशाह के समय भू-राजस्व की दर कुल उत्पादन का 1/3 थी।

शेरशाह की सफलता इस बात में है कि उसने अनाजों की दर तालिका तैयार करायी, जिसे रय के नाम से जाना जाता है। दर निर्धारण के लिए आस-पास के क्षेत्रों के मूल्य को आधार बनाया जाता था। किसानों को यह विकल्प दिया गया था कि वे अनाज या नकद में भू-राजस्व अदा कर सकते हैं। भू-राजस्व के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रकार के कर भी लिये जाते थे। भूमि माप के अधिकारी एवं भू-राजस्व वसूल करने वाले अधिकारी को वेतन देने के लिए जरीबाना और मुहसिलाना नामक कर भी लगाया गया। जरीबाना उत्पादन का 2.5 प्रतिशत होता था और मुहसिलाना उत्पादन का 5 प्रतिशत होता था। इसके अतिरिक्त यह भी प्रावधान था कि अकाल से निपटने के लिए कुल उत्पादन का 2.5 सेर प्रति मन अनाज राजकीय गोदाम में सुरक्षित रखा जाता था। इसकी सूचना हमें हसन खाँ से प्राप्त होती है।

शेरशाह के मुद्रा एवं चुगी सम्बन्धी सुधार भी उसके साम्राज्य की सामान्य आर्थिक अवस्था सुधारने के विचार से किये गये थे। उसने न केवल टकसाल में कुछ विशेष परितर्वन किये, बल्कि पूर्वगामी राजाओं की बढ़ती हुई अवनति को ठीक करने का भी प्रयत्न किया। शेरशाह ने मानक सिक्कों का विकास किया जो सोने, चाँदी एवं ताँबे के बने होते थे। उसने 167 ग्रेन के सोने के सिक्के जारी किए, जो अशर्फी के नाम से जाना जाता है। उसने 180 ग्रेन के चाँदी के सिक्के, जिसमें 175 ग्रेन शुद्ध चाँदी थी, जारी किए। यह रुपये के नाम से जाना जाता था। 1835 ई. तक ब्रिटिश काल में भी चला। उसने 322 ग्रेन के ताँबे के सिक्के भी जारी किए, जो दाम के नाम से जाना जाता था। शेरशाह के समय एक रुपया 64 दाम के बराबर होता था। उसने कष्टप्रद करों को हटाकर तथा व्यापार की वस्तुओं पर केवल सरहदों पर तथा बेचने के स्थानों पर कर लगाने की अनुमति देकर चुंगी का सुधार किया। इससे वाणिज्य-व्यापार में बड़ी सहायता मिली क्योंकि व्यापार के मालों का परिवहन सुगम एवं सस्ता हो गया।

यातायात के साधनों में सुधार कर इसे और भी सहायता दी गयी। साम्राज्य की प्रतिरक्षा एवं जनता की सुविधा के लिए शेरशाह ने अपने राज्य के महत्वपूर्ण, स्थानों को अच्छी सड़कों की एक श्रृंखला से जोड़ दिया। इनमें सबसे लम्बी ग्रैंड ट्रक रोड, जो अब भी वर्तमान है, पंद्रह सौ कोस लम्बी थी तथा पूर्वी बंगाल के सोनारगाँव से सिन्धु तक चली जाती थी। एक सड़क आगरे से बुरहानपुर चली गयी थी, दूसरी आगरे से जोधपुर तथा चित्तौड़ के किले तक तथा चौथी लाहौर से मुल्तान तक थी। कुछ विगत शासकों की परम्पराओं का अनुसरण कर शोरशाह ने पक्की सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवा दिये। थोड़ी-थोडी दूरा पर सरायें अथवा विश्रामगृह बनाये गये, जहाँ मुसलमानों तथा हिन्दुओं के लिए अलग-अलग प्रबन्ध थे। ये सरायें डाकघरों का भी काम देती थीं, जिससे समाचार का शीघ्र विनिमय सुगम हो गया तथा सरकार को साम्राज्य के विभिन्न भागों से सूचना मिलने लगी। गुप्तचरों की एक सक्षम व्यवस्था रखने से भी शासक को यह मालूम होने लगा कि उसके राज्य में क्या हो रहा है।

शान्ति एवं व्यवस्था सुरक्षित रखने के लिए पुलिस विभाग को पुन: संगठित किया गया तथा स्थानीय अपराधों के लिए स्थानीय उत्तरदायित्व के सिद्धान्त को लागू किया गया। इस प्रकार गाँवों के मुखियों को ग्रामीण क्षेत्रों में अपराधियों के पकड़ने तथा शान्ति बनाये रखने के लिए उत्तरदायी बना दिया गया। सभी मुसलमान लेखकों ने इस व्यवस्था की कार्यक्षमता की परिपुष्टि की है। निजामुद्दीन, जिसके शेरशाह का पक्षपाती होने का कोई कारण नहीं था, लिखता है कि- आम रास्ते की सुरक्षा की ऐसी अवस्था थी कि यदि कोई सोने (के टुकड़ों) से भरा हुआ थैला लेकर चलता था तथा रातों तक मरुभूमि (निर्जन स्थानों) में सोता था, तो रखवाली करने की कोई आवश्यकता न होती थी।

शेरशाह को न्याय का प्रबल विचार था। उसके अधीन न्याय का शासन निष्पक्ष रूप से होता था। ऊँच-नीच में कोई अन्तर नहीं किया जाता था। सुल्तान के निकट सम्बन्धी तक इसके आदेशों से मुक्त नहीं थे। परगने में दीवानी मुकदमों का फैसला अमीन करता था तथा अन्य मुकदमों-अधिकतर फौजदारी-को काजी एवं मीरे-अदल देखते थे। कई परगनों के ऊपर एक मुनसिफे-मुनसिफान होता था, जो दीवानी मुकदमों की जाँच करता था। राजधानी में प्रधान काजी और राजकीय सदर थे तथा सबसे ऊपर सुल्तान अन्य विषयों की तरह न्याय में भी सर्वोच्च अधिकारी था।

यद्यपि शेरशाह एक धर्मपरायण मुसलमान था, परन्तु वह भयंकर धर्मान्ध नहीं था। हिन्दुओं के प्रति सामान्यत: उसका व्यवहार सहिष्णुतापूर्ण एवं न्याययुक्त था। उसने हिन्दुओं को राज्य के महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया। उसका एक सबसे योग्य सेनापति था ब्रह्मजित गौड़। डाक्टर कानूनगो कहते हैं कि- हिन्दू धर्म के प्रति उसका रुख घृणापूर्ण उदासीनता का नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण भावना का था; इसे राज्य में उचित स्वीकृति मिली।

शेरशाह प्रबल एवं कार्यक्षम सेना रखने के महत्त्व को समझता था। इसलिए उसने इसे पुनर्संगठित किया। इस कार्य में उसने अधिकांशत: अलाउद्दीन खल्जी की सैनिक प्रणाली के मुख्य सिद्धान्तों का अनुसरण किया। उसकी आवश्यकताओं के लिए सशस्त्र प्यादों की एक जमात अथवा सामन्तों की सेना की सेवा पर्याप्त नहीं समझी गयी। उसने नियमित रूप से एक सेना का प्रबन्ध किया तथा सैनिकों का सम्बन्ध उनके निकटवर्ती अधिकारी के द्वारा व्यक्तिगत भक्ति एवं अनुशासन के मजबूत बन्धन से सीधा अपने साथ किया। शेरशाह के अपने खास अधिकार में डेढ़ लाख घुड़सवारों, पचीस हजार पैदल, तीन सौ हाथियों एवं तोपों की एक बड़ी सेना थी। राज्य के विभिन्न सामरिक महत्व के स्थानों पर संरक्षक सेनाएँ रखी जाती थीं। इनमें प्रत्येक का नाम फौज था तथा यह एक फौजदार के अधिकार में थी। शेरशाह ने सेना में कठोर अनुशासन लागू किया तथा सैनिकों में भ्रष्टाचार रोकने का पूरा उपाय किया। सैनिकों की भर्ती की उचित देखभाल करने के अतिरिक्त वह स्वयं उनका वेतन निश्चित करता तथा उनकी विवरणात्मक नामावली लिखता था। उसने घोडे दागने की प्रथा को पुन: चलाया।

शेरशाह वास्तव में मध्यकालीन भारत के इतिहास में एक विलक्षण व्यक्तित्व है। केवल गुण एवं योग्यता के कारण वह एक अत्यन्त साधारण स्थिति से उन्नति कर अफगान पुनर्जागरण का नेता तथा भारत में उत्पन्न सबसे बड़े शासकों में एक बन गया। उसके सैनिक चरित्र में सावधानी एवं साहस का अद्भुत संयोग था। उसका राजनैतिक चरित्र सामान्य रूप से न्याययुक्त एवं मानवतापूर्ण था। उसका धार्मिक रुख मध्यकालीन धर्मान्धता से मुक्त था। इमारत बनाने में उसकी श्रेष्ठ रुचि का उत्तम प्रमाण आज भी सासाराम में उसके अच्छे मकबरे के रूप में मौजूद है। उसने अपना अथक उद्योग राज्य की सेवा में लगाया। उसके सुधार जनता के लिए कल्याणकारी थे। एर्सकिन कहता है कि- उसमें अकबर के पहले के किसी भी सुल्तान से कानून-निर्माता तथा अपनी प्रजा के संरक्षक की भावना अधिक थी। सच पूछिए तो उसके राज्य का वास्तविक महत्व इस बात में हैं कि उसमें वे ही गुण थे जिन्होंने भारत में एक राष्ट्रीय राज्य के लिए क्षेत्र तैयार कर दिया। यदि केवल पाँच वर्षों के शासन के बाद अचानक उसकी मृत्यु न हो जाती, तो मुगलों का पुनरुत्थान इतना शीघ्र संपादित नहीं होता।

शेरशाह द्वारा निर्मित अफगान-साम्राज्य उसकी मृत्यु के पश्चात् अधिक समय तक नहीं टिका। उसके प्रबल व्यक्तित्व के लुप्त होने तथा उसके उत्तराधिकारियों की दुर्बलता के कारण अफगान सरदारों में पुन: विद्वेष एवं कलह आरम्भ हो गयी, जिससे सम्पूर्ण राज्य अराजकता के अंक में डूब गया तथा इस प्रकार मुगलों के पुनरुत्थान का रास्ता साफ हो गया।

शेरशाह की मृत्यु होने पर उसका द्वितीय पुत्र जलाल खाँ, जो उस समय रेवा में था, सुल्तान इस्लाम शाह के नाम से सुल्तान घोषित किया गया। वह साधारणतया सलीम शाह के नाम से विख्यात है। सलीम ने कड़े उपायों से अपने भाई एवं उसके समर्थकों के विरुद्ध अपनी स्थिति को दृढ़ किया। उसने सेना की कार्यक्षमता एवं अपने पिता के अधिकतर विवकपूर्ण सुधारों को कायम रखा। उसका आन्तरिक शासन उत्तम था। परन्तु युवावस्था में नवम्बर, 1554 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। शीघ्र अव्यवस्था आरम्भ हो गयी। उसके नाबालिग पुत्र फीरोज खाँ की उसके मामू मुबारिज खाँ (शेरशाह के भाई निजाम खाँ सूर का पुत्र तथा फीरोज खाँ की माँ बीबी बाई का भाई) ने हत्या कर दी तथा सिंहासन पर अधिकार कर मुहम्मद आदिलशाह की उपाधि धारण कर ली। आदिलशाह के आलसी एवं अयोग्य सुल्तान होने के कारण स्वयं अपने परिश्रम से उन्नति प्राप्त करने वाले हीमू ने, जो मेवात में रेवाड़ी के एक साधारण बनिया की स्थिति से बढ़कर सूर सुल्तान का प्रधानमंत्री बन गया था, राजकाज का प्रबन्ध कुशलता से करने का प्रयत्न किया। परन्तु उसके स्वामी के शक्की स्वभाव और मूर्खतापूर्ण कारनामों के कारण उसकी चेष्टाएँ विफल हो गयीं, जिससे पतनशील अफगान-साम्राज्य की बड़ी हानि हुई। उसके शीघ्र बाद बंगाल एवं मालवा आदिलशाह के हाथों से निकल गये, उसके अपने सम्बन्धियों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया तथा शेरशाह के दो भतीजों ने भी उसके अधिकार को चुनौती दी और राजसिंहासन पर अपने हक़ जतलाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Mobile application powered by Make me Droid, the online Android/IOS app builder.