संसद के सत्र, सत्रावसान, और विघटन Sessions of Parliament, Prorogation and Dissolution

राष्ट्रपति को दोनों सदनों को आहूत करने की, सत्रावसान और लोकसभा का विघटन करने की शक्ति है। आहूत करने के बारे में संविधान ने राष्ट्रपति पर एक कर्तव्य अधिरोपित किया है, वह यह है कि वह दोनों सदनों को ऐसे अंतराल पर आहूत करेगा कि एक सत्र की अंतिम बैठक 6 मास से अधिक का अंतराल नहीं होगा [अनुच्छेद 85(1)]।

सत्र
सामान्यतया प्रतिवर्ष संसद के तीन सत्र या अधिवेशन होते हैं यथा बजट अधिवेशन (फरवरी-मई), वर्षाकालीन अधिवेशन (जुलाई-सितंबर) एवं शीतकालीन अधिवेशन (नवम्बर-दिसंबर)। किंतु राज्यसभा के मामले में, बजट अधिवेशन की दो अधिवेशनों में विभाजित कर दिया जाता है। इन दो अधिवेशनों के मध्य तीन से चार सप्ताह का अवकाश होता है। इस प्रकार राज्यसभा के एक वर्ष में चार अधिवेशन होते हैं।

इस संदर्भ में सत्रावसान और विघटन का स्थगन से विभेद करना उपयोगी होगा।

संसद के प्रथम अधिवेशन और उसके सत्रावसान या विघटन के बीच की अवधि को सत्र कहा जाता है। दीर्घावकाश संसद के सत्रावसान होने और नए सत्र में उसके समवेत होने के बीच के समय को कहते हैं।

सदन की बैठक (i) विघटन (ii) सत्रावसान (iii) स्थगन द्वारा समाप्त की जा सकती है।

  • ज्ञातव्य है कि केवल लोकसभा का ही विघटन हो सकता है। विघटन दो प्रकार से होता है-
  1. समय व्यतीत हो जाने पर अर्थात् 5 वर्ष की अवधि की समाप्ति पर या आपात की उद्घोषणा के दौरान विस्तारित अवधि की समाप्ति पर।
  2. राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 85(2) के अधीन शक्ति के प्रयोग द्वारा।
  • राष्ट्रपति विघटन और सत्रावसान की शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार करता है। लोकसभा और राज्यसभा की दैनिक बैठकों को स्थगित करने की शक्ति क्रमशः लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को है। विघटन से लोकसभा का अंत हो जाता है। सत्रावसान से केवल सत्र की समाप्ति होती है। स्थगन से संसद के सत्र की विधिमान्यता का अंत नहीं होता केवल विनिर्दिष्ट समय के लिए कामकाज का आगे चलना स्थगित हो जाता है। स्थगन घंटे, दिन या सप्ताह के लिए हो सकता है।
  • विघटन से विद्यमान लोकसभा के जीवनकाल का अंत हो। जाता है, जिससे सदन के समक्ष लम्बित सभी विषय विघटन पर समाप्त हो जाते हैं। यदि इन विषयों को आगे बढ़ाना है तो उन्हें नए निर्वाचन के पश्चात् आगामी सदन में पुनः रखना होगा। इस लम्बित कामकाज के अंतर्गत न केवल सूचना प्रस्ताव आदि आते हैं बल्कि विधेयक भी आते हैं। वे विधेयक भी जो राज्यसभा में प्रारंभ हुए थे और लोकसभा को भेजे गए थे तथा वे विधेयक भी जो लोकसभा में प्रारंभ हुए थे और राज्यसभा को भेजे गए थे और विघटन की तारीख को राज्यसभा में लम्बित थे। किंतु ऐसा विधेयक जो राज्यसभा में लम्बित है किंतु लोकसभा द्वारा पारित नहीं किया गया है, विघटन पर समाप्त नहीं होगा। सदनों की संयुक्त बैठक आहूत करने के आशय की राष्ट्रपति की अधिसूचना के पश्चात् यदि लोकसभा का विघटन बीच में हो जाता है तो दोनों सदनों की संयुक्त बैठक पर इसका प्रभाव नहीं होगा, अनुच्छेद [108(5)]। 
  • भारत की संसद राष्ट्रपति और दोनों सदनों-राज्यसभा और लोकसभा-से मिलकर बनती है।
  • दोनों सदनों का सत्र आहूत करने की, सत्रावसान एवं लोकसभा के विघटन की शक्ति राष्ट्रपति को प्राप्त है।
  • सत्रावसान से केवल सत्र की समाप्ति होती है, जबकि स्थगन से सदन की कार्यवाही कुछ समय के लिए टाल दी जाती है। इससे सत्र की समाप्ति नहीं होती।
  • विघटन से लोकसभा भंग हो जाती है और सदन के समक्ष लम्बित सभी विषय समाप्त हो जाते हैं।

संयुक्त बैठक
संविधान के अनुच्छेद 108 के अनुसार राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों (राज्यसभा एवं लोकसभा) की संयुक्त बैठक बुलाने का अधिकार है यदिः

  • एक सदन द्वारा पारित विधेयक दूसरे सदन द्वारा अस्वीकार कर दिया जाए।
  • विधेयक में किए जाने वाले संशोधनों के बारे में दोनों सदन अंतिम रूप से असहमत हो गए हों।
  • दूसरे सदन को विधेयक प्राप्त होने की तारीख से उसके द्वारा विधेयक पारित किए बिना छह मास से अधिक बीत गए हैं। इस प्रकार की संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता लोकसभा के स्पीकर द्वारा की जाती है तथा सभी निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से लिए जाते हैं।

संविधान के लागू होने से अभी तक केवल तीन बार दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन आहूत किया गया। 1961, 1978 एवं 2002 में। मार्च 2002 में पोटा विधेयक को पारित करने के लिए दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाया गया।

संसदीय ढंग की सरकार में कार्यकारिणी शक्ति विधानमंडल के सदस्यों के समूह के हाथों में रहती है। इस समूह को सदन का विश्वास मत प्राप्त होता है और यह सत्ता में तभी तक रहता है जब तक इसे बहुमत का समर्थन हासिल है। इस तरह संसद का एक महत्वपूर्ण कार्य कैबिनेट का गठन करना और उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करना है। इस विशिष्ट लक्षण का उप-प्रमेय यह है कि लोकसभा की यह भी देखना होता है कि कैबिनेट उसी समय तक सत्ता में रहे जब तक उसे सदन के बहुमत का समर्थन हासिल है। कैबिनेट नीतियों का निर्माण करती है। परंतु संसद को उन पर बहस करने व विश्लेषण करने का अधिकार है ताकि जनता के वैकल्पिक दृष्टिकोणों का मूल्यांकन कर सके।

संसद की कार्यवाहियों का प्रसारण
संसद को लोगों के निकट लाने के विचार से, दोनों सदनों के सदस्यों के समक्ष राष्ट्रपति के अभिभाषण का सीधा प्रसारण करके वर्ष 1989 में एक शुरुआत की गई थी। आकाशवाणी पर प्रश्न काल का प्रसारण 1992 में आरंभ किया गया। 1992 से रेल बजट तथा सामान्य बजट की प्रस्तुति जैसे महत्वपूर्ण अवसरों का भी दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण किया जा रहा है। दिसंबर 1994 से संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण दूरदर्शन के दो अलग-अलग कम शक्ति के चैनलों पर प्रतिदिन प्रसारित किया जा रहा है, जिसे केवल 15 किलोमीटर की परिधि के भीतर देखा जा सकता है।

कार्यकारिणी पर नियंत्रण प्रश्नों, अनुपूरकों, प्रस्तावों, स्थगन-प्रस्तावों के माध्यम से होता है। बहस और विशिष्ट प्रश्नों के उत्तर की प्रक्रिया में संसद, सूचना प्राप्त करने के प्राधिकृत साधन के रूप में कार्य करती है। कानून निर्माण संसद का बहुत महत्वपूर्ण कार्य है। संविधान संशोधन इसकी शक्तियों के अंतर्गत आता है।

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