शक्तियों का पृथक्करण Separation of Powers

शक्ति पृथक्करण का सैद्धांतिक विकास

मोंटेस्क्यू (Montesquieu), जो कि फ्रांस का एक प्रसिद्ध राजनीतिक दार्शनिक था, को शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का मुख्य शिल्पकार माना जाता है। उसने 1748 में प्रकाशित अपनी पुस्तक द स्पिरिट ऑफ लॉज (The Spirit of the Laws) में शक्ति पृथक्करण की बेहतरीन प्रत्यय को उद्घाटित किया। मोंटेस्क्यू, जो कि मानव गरिमा की पुरजोर वकालत करते थे, ने शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का विकास लोगों की स्वतंत्रता बनाए रखने के एक हथियार के रूप में किया। उनका विश्वास था कि यह सिद्धांत एक अंग विशेष की अत्यधिक बढ़ती शक्ति को अवरुद्ध करेगा जो राजनितिक स्वतंत्रता के लिए घातक बनेगी। उसके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति जिसे कुछ शक्ति सौंपी गयी है, उनका दुरूपयोग करता है। जब कार्यकारी एवं विधायी शक्तियां ऐसे व्यक्ति को दी जाती हैं तो स्वतंत्रता कहां रह जाती है। हालांकि मोंटेस्क्यू प्रथम विद्वान नहीं थे जिन्होंने शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को विकसित किया। इसका उद्गम,राजनीति विज्ञान के पिता अरस्तु की तरफ जाकर ढूंढा जा सकता है। वस्तुतः अरस्तु ने इस पर विस्तृत चर्चा नहीं की है। इसके अतिरिक्त तेरहवीं शताब्दी के आगे के कई अन्य दार्शनिकों ने शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर कुछ ध्यान दिया। आधुनिक काल के प्रारंभिक विचारकों में से एक जीन बोदिरी ने कार्यकारी एवं न्यायिक शक्तियों के पृथक्करण के महत्व को समझा। किंतु, वास्तव में इस सिद्धांत को अट्ठारहवीं शताब्दी में बेहद महत्व प्राप्त हुआ। अट्ठारहवीं शताब्दी के दार्शनिकों में जॉन लॉक एक ऐसे दार्शनिक थे जिन्होंने सरकार की शक्तियों के केंद्रीकरण की समस्या की तरफ ध्यान दिया। उन्होंने तर्क दिया कि स्वतंत्रता की खातिर कार्यकारी एवंविधायी शक्तियां पृथक की जानी चाहिए। स्वतंत्रता बाधित होती है जब एक ही निकाय कानून निर्माण एवं क्रियान्वयन का काम करता है।

मोंटेस्क्यू का मत है कि किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के एक निकाय में विधायी, कार्यकारी एवं न्यायिक कार्यों के केंद्रीकरण का परिणाम सत्ता का दुरुपयोग होता है और ऐसा संगठन निरंकुश बन जाता है। उसने कहा कि सरकार के तीन अंग बेहद संगठित होने चाहिए और प्रत्येक को भिन्न व्यक्तियों को सौंपा जाना चाहिर और प्रत्येक अंग को सौंपी गई शक्तियों के क्षेत्रांतर्गत भिन्न कार्यों का निष्पादन करना चाहिए।

शक्ति पृथक्करण के लाभ एवं हानियां

लाभ

  • मोंटेस्क्यू के अनुसार यह लोगों की स्वतंत्रता की सुरक्षा की सर्वोत्तम गारंटी देता है।
  • यह सिद्धांत एवं व्यवस्था प्रशासन में दक्षता को प्रोत्साहित करता है।

हानियां

  • संपूर्ण शक्ति पृथक्करण न तो संभव है और न ही आवश्यक।
  • शक्ति पृथक्करण प्रशासन में अक्षमता फैला सकता है।
  • यह सिद्धांत मानता है कि सरकार के तीनों अंग समान महत्व के हैं, लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं है।
  • लोगों की स्वतंत्रता शक्ति पृथक्करण की अपेक्षा उनकी सोच, राजनीतिक संस्कृति, सचेतना एवं संस्थाओं पर अधिक निर्भर होती है।

विभिन्न देशों में शक्ति पृथक्करण

संयुक्त राज्य अमेरिका शक्ति पृथक्करण के दर्शन ने संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान निर्माण को बेहद प्रभावित किया, जिसके अनुसार अमेरिकी सरकार की विधायी कार्यकारी एवं न्यायिक शाखाओं की शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के क्रम में पृथक् रखा गया है। शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत संतुलन एवं अवरोध तंत्र से जुड़ा होता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान के अंतर्गत अनुच्छेद-1 विधानमण्डल को शक्तियां प्रदान करता है; अनुच्छेद-2 राष्ट्रपति को कार्यकारी शक्तियां प्रदान करता है; और अनुच्छेद-3 एक स्वतंत्र न्यायपालिका का सृजन करता है। कांग्रेस का चुनाव राष्ट्रपति से पृथक् रूप से किया जाता है, जो विधानमण्डल का भाग नहीं होता। सर्वोच्च न्यायालय कांग्रेस और राष्ट्रपति दोनों के कृत्यों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है। कांग्रेस को संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कानून बनाने की एकाधिकारी शक्ति है। अप्रदत्त सिद्धांत के अंतर्गत, कांग्रेस अपनी विधि-निर्माण की जिम्मेदारियों को किसी अन्य एजेंसियों को नहीं दे सकती। राष्ट्रपति अपने किसी विधेयक को रोकने की वीटो शक्ति के द्वारा कांग्रेस को नियंत्रित करता है, लेकिन कांग्रेस प्रत्येक सदन में दो-तिहाई बहुमत से वीटो को समाप्त कर सकता है। जब दोनों सदन स्थगन की तिथि पर सहमत नहीं हो पाते, राष्ट्रपति इस विवाद का निपटारा कर सकते हैं। राष्ट्रपति एक सदन या दोनों सदनों के आपात सत्र को आहूत कर सकते हैं। राष्ट्रपति संयुक्त राज्य अमेरिका की सेना एवं नौसेना का नागरिक कमाण्डर-इन-चीफ होता है। सामान्यतः यह समझा जाता है कि आपात संकट की स्थिति में उसके पास उचित सैनिक कार्रवाई का आदेश देने की शक्ति होती है। हालांकि, युद्ध घोषित करने की शक्ति स्पष्ट रूप से एकमात्र कांग्रेस को प्रदान की गई है। साथ ही सैनिक बलों के प्रबंधन और वित्तीयन के प्राधिकार भी कांग्रेस के पास हैं। कांग्रेस के पास सशस्त्र बलों को संचालित करने वाले कानून एवं विनियम बनाने का प्राधिकार एवं कर्तव्य भी हैं, जैसे सैनिक न्याया की समान संहिता, और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त सभी जनरल एवं एडमिरल के उनके पद धारण करने से पूर्व सीनेट के बहुमत द्वारा उनकी नियुक्ति की पुष्टि की जाती है।

न्यायिक शक्ति सर्वोच्च न्यायालय में निहित होती है और अधीनस्थ न्यायालय कांग्रेस द्वारा स्थापित किए जाते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सीनेट की सलाह एवं सहमति से की जाती है। न्यायाधीश अपने सद्व्यवहार तक पद पर बने रहते हैं और उन्हें प्राप्त लाभों को उनके पदस्थ रहने तक कम नहीं किया जा सकता। यदि एक न्यायालय केन्यायाधीश इस प्रकार की योग्यताएं नहीं रखते, तो वह न्यायालय संयुक्त राज्य अमेरिका की न्यायिक शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता। ऐसे न्यायालय जो न्यायिक शक्तियों का निर्वहन करते हैं, उन्हें संवैधानिक न्यायालय कहा जाता है। कांग्रेस विधायी न्यायालय अवस्थापित कर सकती है, जो न्यायिक एजेंसी या आयोगों के स्वरूप के नहीं होते, जिनके सदस्यों को संवैधानिक न्यायालय के न्यायाधीशों के समान पदावधि की सुरक्षा या लाभ प्राप्त नहीं होते। विधायी न्यायालय संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यायिक शक्तियों का निर्वहन नहीं कर सकते।

न्यायालय न्यायिक समीक्षा द्वारा कार्यपालिका और विधायिका दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं। संविधान में इस प्रकार का उल्लेख नहीं है, किंतु इसका प्रावधान विभिन्न संविधान निर्माताओं ने किया। सर्वोच्च न्यायालय ने मारबरी बनाम मेडिसन मामले में न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था की। कानून की संवैधानिकता की समीक्षा करने की शक्ति को कांग्रेस द्वारा सीमित किया जा सकता है, जिसे न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र निर्धारित करने की शक्ति है।

संविधान स्पष्ट रूप से सरकार की किसी विशेष शाखा के पूर्वोदय का संकेत नहीं करता।

यूनाइटेड किंगडम

यद्यपि शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत ने यूनाइटेड किंगडम के संवैधानिक सिद्धांत में एक भूमिका अदा की है, लेकिन यूनाइटेड किंगडम के संविधान को अक्सर एक कमजोर शक्ति पृथक्करण वाली व्यवस्था के तौर पर विवेचित किया जाता है। उदाहरणार्थ, यू.के. में, कार्यपालिका विधानमण्डल की उप-व्यवस्था बन गई है। प्रधानमंत्री, मुख्य कार्यपालिका, यूनाइटेड किंगडम में संसद के एक सदस्य के तौर पर पदासीन होता है, वह हाउस ऑफ लॉईस में या तो पीयर के तौर पर होता है या हाउस ऑफ कॉमन के निर्वाचित सदस्य के तौर पर होता है और प्रभावी रूप से सामान्य बहुमत से पद से हटाया जा सकता है। इसके अलावा, जबकि यूनाइटेड किंगडम में न्यायालय नि:संदेह रूप से विश्व में सर्वाधिक स्वतंत्र निकाय है, विधि लाईस, जो कि यू.के. किसी भी न्यायिक विवाद को निपटाने के अंतिम मध्यस्थ थे, समान रूप से संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ लॉर्डस में भी बैठते थे, यद्यपि यह व्यवस्था वर्ष 2009 में समाप्त कर दी गई, जब यू.के. में एक पृथक् सर्वोच्च न्यायालय अस्तित्व में आया। इससे बढ़कर, संसदीय सर्वोच्चता के कारण, जबकि शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का अध्ययन वहां किया जा सकता है, जैसी व्यवस्था यूनाइटेड किंगडम में है, उसे बेहद सही तौर पर शक्ति संलयन के तौर पर वर्णित किया जाता है।

न्यायपालिका को प्राथमिक कानून को शून्य करने की शक्ति नहीं है, और केवल द्वितीय कानून को नियंत्रित कर सकती है यदि यह प्राथमिक कानून के साथ असंगत होता है। संसदीय सर्वोच्चता की अवधारणा के तहत्, संसद अपनी पसंद के किसी भी प्रथम विधान की लागू कर सकती है।

भारत में विभिन्न घटकों के बीच शक्ति पृथक्करण

संवैधानिक प्रावधान

भारत के संविधान में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन सरकार के विभिन्न अंगों के कार्यों में पर्याप्त रूप से अंतर है, इस प्रकार सरकार का एन अंग दूसरे अंग के कार्य हथिया नहीं सकता। संविधान ने सरकार के तीनों अंगों- विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को भिन्न-भिन्न भूमिकाएं प्रदान की हैं। प्रत्येक अंग की शक्ति, विशेषाधिकार एवं कर्तव्यों को लेकर किसी प्रकार की अस्पष्टता नहीं है। संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका इन्हें लागू करती है और न्यायपालिका इनकी व्याख्या करती है।

भारत के संविधान में, उल्लिखित है कि अनुच्छेद 53(1) और अनुच्छेद 154(1) के तहत् संघ और राज्य की कार्यपालिका शक्ति क्रमशः राष्ट्रपति एवं राज्यपाल में निहित होगी, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो विधायी एवं न्यायिक शक्तियां किसी विशेष अंग की देने की बात करता हो। यह गौरतलब है कि संविधान का अनुच्छेद-50 राज्य पर यह दायित्व डालता है कि वह न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के कदम उठाएगा। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अधिनियमित किए जाने के पश्चात् न्यायिक प्रणाली में कार्यपालिका के अधिकारियों को कोई काम नहीं सौंपा गया है। न्यायपालिका को पूरी तौर से कार्यपालिका से अलग कर दिया गया है।

विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका के मध्य शक्ति विभाजन

इसी दिशा में कुछ खास संवैधानिक प्रावधान संसद सदस्यों की शक्तियों, विशेषाधिकारों एवं उन्मुक्तियों के लिए भी प्रदान किए गए हैं। ऐसे प्रावधान विधायिका की स्वतंत्रता के लिए बनाए गए हैं। लेकिन, यदि सावधानीपूर्वक अध्ययन किए जाएं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत भारत में इसके यथार्थ रूप में अपनाया नहीं गया है। कार्यपालिका, विधायिका का एक हिस्सा है। अपने कृत्यों के लिए कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी है और यह अपना प्राधिकार भी विधायिका से ही प्राप्त करती है। भारत, क्योंकि एक संसदात्मक व्यवस्था है, इसलिए यह विधायिका एवं कार्यपालिका में मध्य घनिष्ठ सहयोग एवं अतरंग संपर्क पर आधारित है। हालांकि, कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, लेकिन यथार्थ में वह एक नाममात्र का अध्यक्ष है और प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद् सहित वास्तविक प्रमुख है।

सामान्य तौर पर, विधायिका विधि निर्माण कार्य करती है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत राष्ट्रपति को भी विधायी कृत्यों की शक्ति प्रदान की गई है। जैसे अध्यादेश जारी करना, लोक सेवाओं के मामले पर नियम एवं विनियम बनाना, कानून निर्माण करना, जब आपातकाल की उद्घोषणा प्रवृत हो। ये कुछ उदाहरण है जब कार्यपालिका अध्यक्ष विधायी कृत्यों को करने लगता है। राष्ट्रपति न्यायिक कृत्य भी करता है।

दूसरी तरफ, कुछ विशेष मामलों में संसद भी न्यायिक कृत्य करती है। यह अपने विशेषाधिकारों के हनन के प्रश्न पर निर्णय लेती है, और राष्ट्रपति पर महाभियोग की स्थिति में; दोनों सदन क्रियाशील सहभागिता करके आरोपों निर्णय करते हैं। न्यायपालिका, भारत में, भी प्रशासनिक कृत्यों को करती देखी जा सकती है जब वह अपने अधीनस्थ न्यायालयों का पर्यवेक्षण करती है। इसे विधायी शक्ति भी है जो इसके मामलों के निपटान एवं आचार प्रक्रियाओं के लिए नियम-विनियम बनाने में प्रतिबिम्बित होता है।

हमारे संविधान में शक्तियों का कठोरता से पृथक्करण नहीं है। दिल्ली लॉज एक्ट वाले वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य का कोई भी अंग संविधान द्वारा उसे दिए गए सारवान कृत्यों को किसी और को नहीं सौंप सकता। यह सांविधानिक न्यास के सिद्धांत पर आधारित है। विधायी और न्यायिक शक्तियां विशिष्ट निकायों में निहित नहीं की गई हैं। किंतु संविधान यह बताता है कि प्रत्येक सांविधानिक इकाई की शक्तियां और कृत्य क्या हैं। विधि बनाने का कार्य साधारणतः विधानमण्डल में निहित है किंतु अनुच्छेद-123 और अनुच्छेद-213 अध्यादेश जारी करने की शक्ति क्रमशः राष्ट्रपति और राज्यपाल को प्रदान करते हैं। इस शक्ति का प्रयोग सुसंगत दशाओं और शर्तों के अनुसार किया जाना चाहिए। हमारा संविधान विभिन्न अंगों को विभाजित करने के लिए उनके बीच चीन की दीवार खड़ी नहीं करता। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अधिकथित किया है कि पृथक्करण की शक्ति संविधान का आधारिक लक्षण है जिसे संविधान का संशोधन करके क्षीण नहीं किया जा सकता।

विभिन्न घटकों के मध्य विवाद निपटान तत्र एव सस्थाएं

यदि भारत में सरकार के किन्हीं दो अंगों के मध्य विवाद उत्पन्न हो जाता है, तो सभी तंत्रों एवं संस्थाओं के ऊपर भारत का संविधान व्यापक रूप से मामले को देखता है। उदाहरणार्थ, भारत के संविधानका अनुच्छेद-121 सर्वोच्च न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बारे में उनके कर्तव्यों के निर्वहन को लेकर संसद में किसी प्रकार का विचार-विमर्श को प्रतिबंधित करता है। इसी प्रकार का प्रावधान राज्य विधानमण्डल के संदर्भ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-211 में किया गया है, समान रूप से, अनुच्छेद 361(क) प्रावधान करता है कि कोई व्यक्ति संसद के या किसी राज्य के विधानमण्डल के किसी सदन की कार्यवाहियों के सारतः सही विवरण के प्रकाशन की बाबत किसी न्यायालय में किसी भी प्रकार की कार्रवाई का उत्तरदायी नहीं होगा।

संविधान के अनुच्छेद 361 के अंतर्गत राष्ट्रपति अथवा राज्य का राज्यपाल या राजप्रमुख अपने पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के-पालन के लिए या उन शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने द्वारा किए गए या किए जाने के लिए तात्पर्थित किसी कार्य के लिए किसी न्यायालय को उत्तरदायी नहीं होगा। राज्य सभा का नियम 238 और लोकसभा का नियम 352 संसद सदस्यों पर कुछ निर्बंधन आरोपित करता है। इन नियमों में कहा गया है कि कोई सदस्य किसी उच्चाधिकारी के आचरण पर आक्षेप नहीं करेगा। भारत जैसे प्रत्येक लोकातंत्रिक संविधान में उच्चतम न्यायालय देश का सर्वोच्च न्यायालय होता है जिसे संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करने का अधिकार क्षेत्र एवं शक्ति होती है। इस संबंध में, भारत के उच्चतम न्यायालय को शक्तियां प्रदान की गई हैं। संविधान का अनुच्छेद-144 घोषणा करता है कि भारत के राज्य क्षेत्र के सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारी उच्चतम न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे। अनुच्छेद-141 प्रावधान करता है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होगी। अनुच्छेद-129 के अनुसार, उच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अपमान के लिए दंड देने की शक्ति होगी। अनुच्छेद-142(2) के तहत् उच्चतम न्यायालय को भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र के बारे में किसी व्यक्ति को हाजिर कराने के, किन्हीं दस्तावेजों के प्रकटीकरण या पेश कराने के अथवा अपने किसी अपमान का अन्वेषण करने या दंड देने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश करने की समस्त और प्रत्येक शक्ति होगी। इसी प्रकार अनुच्छेद-215 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति होगी। यह, इतिहास में ऐसा देखा गया है, उच्चतम न्यायालयों के पास एक शक्तिशाली हथियार है जिससे वे अपने आदेश का पालन करवा सकते हैं।

शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर व्यापक सहमति होने के बावजूद, व्यवहार में, समय-समय पर, विवाद उत्पन्न हो जाता है जब राज्य का एक अंग संविधान के तहत् उसे सौंपे गए कृत्यों की सीमाएं लांघ देता है।

बतौर संविधान का संरक्षक, भारत का सर्वोच्च न्यायालय विधानमण्डल और न्यायपालिका के मध्य विवाद निपटान तंत्र है। 1973 में केशवानंद भारत मामले में, जब उच्चतम न्यायालय ने संविधान संशोधन की विधायिका की शक्ति की समीक्षा की थी। न्यायालय ने सुनिश्चित किया कि संविधान का आधारिक लक्षण अपरिवर्तनीय लक्षण है जिसे यहां तक कि संसद के अधिनियम द्वारा भी परिवर्तित नहीं किया जा सकता। 1975 में, हालांकि, इस विचार को तत्कालीन सरकार ने उच्चतम न्यायालय की विशेष बेंच के समक्ष चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि संसद सर्वोच्च है और लोगों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है। जैसाकि, यदि संसद में लोगों के प्रतिनिधि व्यक्तिगत स्वतंत्रता या न्यायिक जांच के क्षेत्र को सीमित करने के लिए विशेष कानून में परिवर्तन करने का निर्णय करते हैं, तो न्यायपालिका को इसे प्रश्नगत करने का अधिकार नहीं है कि क्या वह संवैधानिक है या नहीं।

हालांकि, विधिक तर्क को सुनने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि आधारिक संरचना का सिद्धांत भारत के संविधान की अपरिवर्तनीय विशेषता है।

सिद्धांतत: विधायिका एवं न्यायपालिका दोनों के शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत की कुछ हद तक वैधता है। इस प्रकार, इस पर सही तौर पर बात की जा सकती है कि संसद विधि-निर्माण की सर्वोच्च संस्था है, और न्यायालयों को इस तरह के फैसले नहीं देने चाहिए जो संसद द्वारा अनुमोदित विधिक स्थिति को प्रभावित करते हों। यह देखा गया है कि, कुछ पुष्टियों के साथ, विगत समय में न्यायालय के कुछ फैसले विधिक तौर पर गलत थे और उच्च न्यायालय द्वारा पूर्व निर्णयों को पलटा गया था सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी बेंच ने ऐसा किया। इस तरह, उच्चतम न्यायालय को भी कभी गलती न करने वाला नहीं माना जा सकता। विगत कुछ संवैधानिक निर्णय शायद निजी हितों को संरक्षण प्रदान करने वाले थे। उदाहरणार्थ, स्वतंत्रता के ठीक बाद, 1951 में, कोर्ट के कई निर्णयों ने भूमि सुधार के उपायों को पलटा इसलिए कि वे भूमि स्वामियों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करने वाले थे। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार को, भूमि सुधारों के क्रियान्वयन के लिए संविधान संशोधन करना पड़ा, जिन्हें देश के आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति के लिए बेहद जरूरी समझा गया। इसी प्रकार, 1970 में, इंदिरा गांधी सरकार द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण के निर्णय को भी उच्चतम न्यायालय ने गलत ठहराया। राष्ट्रीयकरण को संभव बनाने के लिए संसद द्वारा एक विशेष विधान पारित करना पड़ा। एक बड़ी संख्या में ऐसे उद्धरण दिखाई दे सकते हैं जहां उच्चतम न्यायालय या अन्य न्यायालयों के निर्णय लोकप्रिय आशाओं के अनुरूप नहीं थे।

संसद द्वारा अनेक बार विवादास्पद निर्णय लिए गए। दिसंबर 1978 में लोक सभा ने एक ऐसा प्रस्ताव स्वीकार किया, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सदन के सत्रावसान तक जेल में रखने की बात करते हुए विशेषाधिकारों के अतिक्रमण एवं सदन की अवमानना के लिए उनकी सदस्यता समाप्त कर दिए जाने की बात कही गई थी।

मई 1981 में केंद्र में इंदिरा गांधी सरकार की वापसी के पश्चात् पूर्व लोकसभा द्वारा पारित किया गया उनका निष्कासन सम्बन्धी प्रस्ताव नवगठित संसद द्वारा निरस्त कर दिया गया। इस संदर्भ में सदन द्वारा यह संकल्प पारित किया गया कि 1978 का निष्कासन संसदीय विशेषाधिकार सम्बन्धी कानूनों में कोई पूर्वोदहारण नहीं है और यह निर्णय संसदीय विशेषाधिकार के कानून के सुस्थापित सिधान्तों का उल्लंघन करता है।

विगत कुछ समय से न्यायपालिका जनहित मामलों में सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर रही है, जिसका परिणाम शक्ति में थोड़े असंतुलन के रूप में सामने आया है। 1964  में उत्तर प्रदेश विधानसभा यह समझती थी कि उसे यह शक्ति प्राप्त है कि वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ के दो जजों, जिन्होंने सदन की अवमानना के लिए कारावास की सजा प्राप्त एक व्यक्ति को जमानत प्रदान की थी, को हिरासत में लेकर अपने समक्ष प्रस्तुत करवा सकती है- वर्तमान समय में ऐसा होना असम्भव है।

इसी प्रकार की एक परिस्थिति उस समय उत्पन्न हुई, जब एक निजी टेलिविजन चैनल द्वारा किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन के द्वारा संसद के सदस्यों द्वारा पैसा लेकर प्रश्न पूछने का सनसनीखेज मामला उजागर हुआ।

संसद की आचार समिति (ethics committee) की सिफारिश के पश्चात् राज्य सभा ने एक सदस्य को निलम्बित कर दिया। समिति ने उसे स्टिंग ऑपरेशन के दौरान कैमरे के सामने अनुचित और गैर-कानूनी रूप से पैसा लेकर संसद की छवि खराब करने का दोषी पाया था।

लोक सभा ने पैसा लेकर प्रश्न पूछने के इस मामले में पवन बंसल की अध्यक्षता में एक 5 सदस्यीय बहुदलीय समिति का गठन किया। इस समिति ने 10 दोषी सदस्यों को निलम्बित किए जाने की सिफारिश की।

सदन में निलम्बन की कार्यवाही के दौरान दोषी सदस्यों को अपने बचाव का एक भी अवसर नहीं दिया गे, जिसकी काफी आलोचना भी की गयी।

संसद के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब 11 संसद सदस्यों की सदस्यता एक साथ समाप्त की गई थी।

इन निलम्बित सदस्यों में से एक राज्य सभा सांसद राजा राम पाल (बहुजन समाज पार्टी) ने अपने निलम्बन के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट (writ) याचिका दाखिल की। उसकी यह याचिका इस आधार पर थी कि अनुच्छेद-102 के अंतर्गत उल्लिखित अयोग्यताएं प्रकृति में सर्वसमावेशी (exhaustivein nature) प्रकार की हैं तथा वे यथोचित अथवा न्यायसंगत रूप से व्याख्यात्मक नहीं हैं। अतः संसद की अपने सदस्यों को निलम्बित कर सकने की शक्ति संवैधानिक दृष्टिकोण से अनुमोदित नहीं है। पुनश्चः, याचिका में तर्क दिया गया कि लोक सभा सदस्यों को निलम्बित करते समय अनुच्छेद-103 की अनदेखी नहीं कर सकती, जिसके अनुसार अयोग्यता सम्बन्धी प्रश्न राष्ट्रपति के समक्ष है। इस संदर्भ में राष्ट्रपति द्वारा निर्वाचन आयोग से भी परामर्श लिया जा सकता है।

16 जनवरी, 2006 को सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार जारी कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस के परिप्रेक्ष्य में लोक सभाध्यक्ष द्वारा 20 जनवरी, 2006 को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई। इस बैठक के पीछे लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथचटर्जी का गुप्त मंतव्य सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस को नकारना एवं उसके समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं करना था। यह महसूस किया गया कि यह मुद्दा न्यायिक नहीं है और न्यायालय द्वारा इस संदर्भ में कोई भी याचिका (निलम्बन आदेश के विरुद्ध) स्वीकार नहीं की जानी चाहिए थी।

शीर्ष न्यायालय द्वारा जारी नोटिस के प्रत्युत्तर में लोक सभा अध्यक्ष ने महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाया- विधायिका की शक्तियां बनाम न्यायपालिका की शक्तियां। संविधान के अनुच्छेद-194(3) द्वारा राज्य व्यवस्थापिका को तथा अनुच्छेद-105(3) के माध्यम से संघीय संसद की कुछ शक्तियां, विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियां प्रदान की गई हैं। भारत में किसी भी विधान द्वारा इनकी व्याख्या नहीं की गई है।

विधायिका द्वारा न्यायपालिका के ऊपर यह आक्षेप लगाया गया कि वह विधायिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण कर रही है।

जनवरी 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने धन लेकर प्रश्न पूछने के मामले में सभी 11 सांसदों की बर्खास्तगी को सही ठहराया । शीर्ष न्यायालय की संवैधानिक पीठ द्वारा बहुमत से दिया गया यह निर्णय सराहनीय होने के साथ-साथ निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों के लिए एक सबक भी है कि वे अपनी सीमारेखा का अतिक्रमण करने की कोशिश न करें। न्यायालय बनाए रखने का प्रयास किया है, वहीं इसके अधिकार पर अपनी मुहर लगा दी है। इस फैसले का सबसे ज्यादा असर भाजपा पर हुआ है, जिसके पांच सांसदों पर तलवार गिरी है। फिर भी उसने इसका स्वागत कर शुचिता का परिचय दिया है। जो भी हो, इस निर्णय से विधायिका और न्यायपालिका के बीच तनाव की पैदा हुई स्थिति पर विराम लग गया है। ऐसा नहीं है कि जिन सांसदों की सदस्यता खत्म की गई थी, उन्हें अपना पक्ष रखने की छूट नहीं मिली। इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पांच सदस्यों की एक समिति गठित कर बर्खास्त सांसदों के नैसर्गिक अधिकार को मान्यता दी थी। समिति ने पूरे मामले पर गंभीरता से विचार कर सदन की सदस्यता से बर्खास्त करने की सिफारिश की, जिसे स्वीकार कर लिया गया। यह सही है कि अगर स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन ने इसकी पोल नहीं खोली होती, तो शायद ही साधारण मतदाता इससे परिचित होता। भ्रष्टाचार के उजागर होने के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय का निर्माण वास्तव में एक ऐसा कदम है, जिससे सहमत न होना मुश्किल होगा। संवैधानिक पीठ के चारजजोंने संसद के अधिकार क्षेत्र को उचित मान्यता दी है लेकिन एक जज न्यायमूर्ति आर.वी. रविन्द्रन ने संसद की कार्रवाइयों की गलत बताया और सांसदों की सदस्यता बनाए रखने की बात कही है। इसकी गहराई से समीक्षा होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने जहां संसद की गरिमा को बहाल रखा है, वहीं यह कहकर विधायिका और न्यायपालिका के बीच लक्ष्मण रेखा भी खींच दी है कि उसे संसद के न्यायिक और अर्द्ध-न्यायिक निर्णयों की समीक्षा करने का अधिकार है। यह सही है कि संविधान में सांसदों की निष्कासित करने की व्याख्या नहीं की गई है, लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि सांसद होने के नाते उन्हें भ्रष्टाचार की छूट दी जाए। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने शीर्षन्यायालय के इस निर्णय का स्वागत किया है, लेकिन उन्होंने इस प्रश्न पर चुप्पी साध ली है कि संविधान के किसी भी हिस्से की न्यायिक समीक्षा का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है। जो भी ही संसद को अनैतिक कार्यों में संलग्न सदस्यों को बर्खास्त करने का अधिकार है। प्रश्न है कि अधिकार के इस औजार की क्या वह आपराधिक मामले में चल रहे मुकदमे के दौरान चुने गए सांसदों के विरुद्ध प्रयुक्त करेगी? राजनीति और अपराधीकरण की जो तस्वीर सामने है, उसे देखते हुए इस मामले में संसद को सक्रिय होना चाहिए। यह लोकतंत्र की मर्यादा बनाये रखने के लिए अत्यावश्यक है।

न्याययिक सक्रियता या न्यायिक पहुंच को एक तरफ विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच और दूसरी तरफ कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच महत्वपूर्ण झगड़े की जड़ माना जाता है। न्यायिक सक्रियता को अतिक्रमण मानते हुए, आलोचकों ने संकेत किया है कि ऐसे कई मौके हैं जहां न्यायपालिका ने कार्यपालिका एवं विधायिका के क्षेत्र में घुसपैठ की है जो कि न तो लोकतांत्रिक है और न ही संवैधानिक और जिसने शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत की अवहेलना की है। यहां तक कि कुछ विधिवेत्ताओं एवं उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने खुले तौर पर न्यायिक निर्बंधन की आवश्यकता जतायी है। यह हमेशा ध्यान रखा जाना चाहिए कि सामान्य तौर पर विधि निर्माण का कार्य या प्रशासनिक निर्णय विधायिका और कार्यपालिका का काम है न कि न्यायपालिका का। कुछ विश्लेषकों ने महसूस किया कि नर्सरी दाखिला, अवैध निर्माण, मच्छर फैलने किए समस्या, आवारा कुत्तों का मामला, मोटर वाहन जुर्माना, वायु प्रदूषण रोकथाम, विद्यालयों में पीने के पानी का अभाव इत्यादि मामले राज्य के दो अंग (विधायिका एवं कार्यपालिका) के हैं, और साथ ही साथ अभिभावकों एवं अधिकारियों के हैं, न कि न्यायाधीशों के। उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों पर विचार करने से रोका जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय, जैसाकि देश का सर्वोच्च न्यायालय है, को आदर्श रूप मूलभूत महत्व के मामलों को देखना चाहिए, जैसाकि उसके समकक्ष संयुक्त राज्य अमेरिका न्यायालय करता है, जो संवैधानिक एवं संघीय महत्व से सम्बद्ध कानूनों के प्रश्नगत मामलों को ही अक्सर देखता है। इससे कुछ हद तक सुनिश्चित होगा कि न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करती।

राज्य के अंगों के सम्बद्ध न्यायाधिकार क्षेत्र के मामले ने हाल ही में केंद्र एवं राज्यों में गठबंधन राजनीति के संदर्भ में एक नया वेग प्राप्त कर लिया है। इस प्रकार, 2005 के प्रारंभ में राज्य चुनावों के दौरान, कुछ राज्यों में, विशेष रूप से झारखण्ड, गोवा एवं बिहार में न किसी दल को या दलों के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत-प्राप्त नहीं हुआ। इस तथ्य से स्थिति और अधिक जटिल हो गई कि न तो इन राज्यों के राज्यपाल और न ही राज्य विधानमण्डलों के अध्यक्ष अपने निर्णयों में निष्पक्ष थे। इन संवैधानिक प्राधिकरणों द्वारा लिए गए अत्यंत महत्व के निर्णयों से इतर, खिन्न दलों ने न्यायालयों में अपील की, जो इसलिए अनुपेक्षणीय बन गई। मामले को देखते हुए, भारत के राष्ट्रपति ने राज्य की अनुशंसा, एवं केंद्रीय कैबिनेट की सलाह पर बिहार विधानसभा को भंग कर दिया। कुछ महीनों की समाप्ति पर, राज्य राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत था, और विधानसभा निलम्बित स्थित में थी, जैसाकि फरवरी 2005 में पूर्व चुनावों में कोई दल या दलों के गठबंधन स्पष्ट बहुमत के साथ उदित नहीं हो पाया। विधायकों के बीच कथित खरीद-फरोख्त के आधार पर, राज्यपाल ने अचानक केन्द्रीय कैबिनेट को राज्य विधानसभा भंग करने की अनुशंसा करने का निर्णय लिया, और कैबिनेट के माध्यम से राष्ट्रपति की। अनुशंसा को मान लिया गया और राज्य विधानसभा को भंग कर दिया गया। कुछ प्रभावित विधायकों ने कार्यपालिका की इस कार्रवाई के खिलाफ न्यायालय में मामला दर्ज किया।

जैसाकि उच्चतम न्यायालय के समक्ष शपथ पत्र दायर किया गया, इस मामले में केंद्र की विधिक स्थिति थी कि, न्यायालय इस मामले में जांच नहीं कर सकता कि क्या किसी मंत्री या मंत्रिपरिषद् द्वारा राष्ट्रपति को सलाह दी गई थी और वह सलाह क्या थी। यह राष्ट्रपति और उसकी मंत्रिपरिषद् के बीच का मामला है। अन्य शब्दों में, सरकार के विचार में, मंत्रिपरिषद् किसी आदेश को पारित करने की सलाह दे सकती है; राष्ट्रपति के पास कोई विकल्प नहीं है, लेकिन वह उस सलाह को संविधान के अंतर्गत स्वीकार करे; और न्यायालय को यह अधिकार नहीं है कि वह कार्यपालिका की कार्रवाई की जांच करे कि क्या वह वैधानिक थी या नहीं।

तकों को सुनने के पश्चात्, अक्टूबर, 2005 में, अपने संक्षिप्त निर्णय में घोषित किया कि सरकार द्वारा बिहार विधानसभा को भंग किया जाना असंवैधानिक एवं अतार्किक था। न्यायालय ने, हालांकि, पुरानी विधानसभा को जीवित करने के आदेश नहीं दिए क्योंकि चुनाव आयोग द्वारा नए चुनावों की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी।

गौरतलब है कि भारत में न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका के मध्य उत्पन्न विवादों का अधिनिर्णयन करने की संस्था है। विधायिका एवं कार्यपालिका शक्तियों पर न्यायिक सक्रियता एवं अतिक्रमण एडीएम जबलपुर मामले में बहुमत के निर्णय के साथ खिड़की से बाहर चला गया, जिसमें कहा गया कि मूल अधिकारों के निलम्बन के कारण, व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता, जीवन एवं अभिव्यक्ति का अधिकार के प्रति सभी संरक्षण खो देता है। हर समय न्यायालय ने क्रियाशील भूमिका अदा की है, इस पर शासन द्वारा आरोप लगाया गया। हालांकि, इन सभी मामलों में जो महत्वपूर्ण है वह यह कि न्यायालय ने लोगों को राहत प्रदान की है और न्यायालय के निर्णय देश के लोगों के हित में थे। इसलिए उस हद तक आलोचना का स्तर मौन रहा और न्यायिक अतिक्रमण आरोप नेपथ्य में चला गया जैसाकि इन सभी निर्णयों को लोगों के द्वारा स्वीकारा गया और अन्य दो अंगों (विधायिका एवं कार्यपालिका) के पास भी इन निर्णयों को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

बेहद मामलों के अधिनिर्णयन से, उच्चतम न्यायालय अपने न्यायिक सक्रियता से नाटकीय परिणाम प्राप्त करने के योग्य हो गया। दिल्ली के बाहर प्रदूषक उद्योगों को ले जाना, यमुना नदी की सफाई, और दिल्ली में मोटर वाहनों को पेट्रोल से सीएनजी ईंधन में परिवर्तित करना ऐसे उदाहरण हैं। लेकिन बेहद प्रभावित करने वाला निर्णय था कि सरकार को निर्देश देना कि बंद सार्वजनिक वितरण दुकानों को फिर से खोलना और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली द्वारा अधिशेष खाद्यान्न की आपूर्ति करना। निश्चित रूप से, विश्व में किसी अन्य न्यायालय में ऐसी उपलब्धि प्राप्त नहीं की, जिसके द्वारा, न केवल सौ या हजार, अपितु कई सौ हजार लोग लाभान्वित हुए।

भारत में दूसरा भ्रम जनहित याचिका (पीआईएल) को न्यायिक सक्रियता के साथ मिलाने का है। न्यायिक सक्रियता पीआईएल नहीं है। एक न्यायालय पीआईएल के इतर न्यायिक रूप से सक्रिय या अक्रिय हो सकता है। जनहित याचिका लोगों, विशेष रूप से निर्धन, शोषित एवं सीमांत वर्ग, जिनके मूल अधिकार न्यायालय के आदेश द्वारा संरक्षित किए जाते हैं, लाभ हेतु उपयोगी न्यायिक प्रक्रिया हो सकती है\ व्यक्तियों के मूलभूत अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं का प्रवर्तन एवं सुरक्षा न्यायालयों का ऐतिहासिक एवं संवैधानिक कर्तव्य है।

भारत में कार्यपालिका एवं विधायिका के मध्य संबंध उनके मूल कार्यों में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को अपनाने के बावजूद सहयोग के सिद्धांत पर आधारित है। विधायिका अविश्वास मत, प्रश्न-पूछना एवं स्थगन प्रस्ताव के माध्यम से कार्यपालिका को नियंत्रित करती है। कार्यपालिका का जीवन विधायिका की इच्छा पर निर्भर करता है क्योंकि यह अपने पद पर तभी तक बनी रह सकती है जब तक इसे विधायिका में बहुमत का विश्वास प्राप्त होता है। जिस क्षण कैबिनेट बहुमत का विश्वास खो देती है, तो इसे अविश्वास मत से हटाया जा सकता है।

समान रूप से, कार्यपालिका संसदीय लोकतंत्र में विधायी शक्तियां रखती हैं। मुख्य कार्यपालक को विधानमण्डल के दोनों सदनों का सत्र बुलाने की शक्ति होती है। वह लोक सभा को भी भंग कर सकता है और नए चुनाव कराने का आदेश देता है। विधायिका द्वारा पारित विधेयकों को अंतिम अनुमोदन के लिए मुख्य कार्यपालक के पास भेजना होता है। कोई विधेयक तब तक कानून नहीं बन सकता जब तक कि मुख्य कार्यपालिका अपनी स्वीकृति प्रदान न कर दे। मुख्य कार्यपालिका कुछ विशेष प्रकार की वीटो शक्ति भी रखता है। मुख्य कार्यपालक विधानमण्डल के सत्रावकाश की स्थिति में अध्यादेश जारी कर सकता है। मुख्य कार्यपालक की आध्यादेश जारी करने की शक्ति, कार्यपालिका के हाथ में प्रत्यक्ष रूप से विधि निर्माण की शक्ति है। कार्यपालिका प्रमुख किसी भी समय विधानमण्डल को संबोधित कर सकते हैं। विधानमण्डल के सत्रों का प्रारंभ कार्यपालिका प्रमुख के भाषण से होता है। संसदीय कार्यपालक न्यूनाधिक विधानमण्डल के विधायी कार्य पर संपूर्ण नियंत्रण रखता है। यह सदन में सभी महत्वपूर्ण कार्यों को प्रारंभ करता है। निजी सदस्य द्वारा लाए गए विधेयक के पारित होने की संभावना बेहद क्षीण होती है, यदि इसे मंत्रिपरिषद् का समर्थन नहीं मिलता। कार्यपालिका प्रदत्त विधान की शक्ति प्राप्त है। संसद कानूनों को सामान्य तौर पर व्यापक रूप से बनती है और इसके विस्तृत स्वरूप के लिए बाकि कार्यपालिका को प्रदान करती है। प्रशासन संसद के कानून के अंतर्गत नियम एवं विनियम बनाने की शक्ति रखती है। कार्यपालिका वित्त पर नियंत्रण रखती है, बजट तैयार करती है और इसे संसद में प्रस्तुत करती है। भारत में कोई भी धन विधेयक कार्यपालिका की पूर्वसहमति के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

कार्यपालिका एवं विधायिका के मध्य संबंध का प्रश्न राजनीतिक विचारकों एवं संवैधानिक सिद्धान्तकारों का ध्यान आकर्षित करता रहा है। उदाहरणार्थ, भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में संसद की भूमिका में ह्रास और कार्यपालिका की बढ़ती शक्ति पर काफी चर्चा होती रही है।

सिद्धांततः, संसद अभी भी सर्वोच्च है, और कैबिनेट इसके प्रति उत्तरदायी है। व्यवहार में हालांकि, कार्यपालिका की संसद के प्रतिउत्तरदायी होना नाममात्र का रह गया है, क्योंकि सरकार को बहुमत प्राप्त होता है। एक दल के नेता की इसके सदस्यों पर शक्ति सर्वोच्च है और अविवादित है, और संसद में क्या हो रहा है। अधिकांशतः अब इस बात द्वारा निर्धारित होता है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के तात्कालिक राजनीतिक हित क्या हैं। हाल के राजनीतिक विकास का एक बेहद महत्वपूर्ण परिणाम है कि कुछ चंद लोगों द्वारा छोटे दलों पर प्रभुत्व किया जा रहा है, और अधिकतर दलों में आंतरिक लोकतंत्र अनुपस्थित है। कुछ दलों में, चाहे छोटे दल हो या बड़े, तो एक या दो नेता हैं जो चुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवारों का चयन करते हैं। नेता यह भी निर्धारित करते हैं कि दूसरी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में कौन सरकार का सदस्य बनेगा और किसे राज्य सभा में भेजा जाएगा। अधिकतर छोटे दलों का बेहद संकीर्ण सामाजिक अधर है, लेकिन उनके नेता दूसरे दलों को समर्थन देकर सत्ता का आनंद उठाते हैं।

संविधान कार्यकरण समीक्षा पर राष्ट्रीय आयोग ने संघीय एवं राज्य विधानमण्डल के कार्यकरण का अवलोकन किया कि यदि संसद एवं राज्य विधानसभाओं ने जिस तरीके से काम किया है, उस पर गौर करें तो हाल ही के वर्षों में इसकी मात्रा एवं गुण दोनों में ह्रास हुआ है। इस बात को लेकर चिंता बढ़ी है कि संसद में विचार-विमर्श का स्तर गिरता जा रहा है, नैतिक प्राधिकरण और लोगों की सर्वोच्चता संस्था की गरिमा का ह्रास होता जा रहा है।

विधानसभा एवं कार्यपालिका के कार्यकरण के सन्दर्भ में विवाद निपटान तंत्र में संविधान, संयुक्त संसदीय समिति एवं लोक सभा अध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति को शामिल किया जा सकता है। संविधान के संदर्भ में, जैसाकि वास्तविक कार्यकरण में भी है, विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच सम्बन्ध बेहद घनिष्ठ हैं और वस्तुतः किसी विभाजन को स्वीकार नहीं करता। दोनों की शक्ति के केंद्र हेतु प्रतिस्पर्द्धा करने वाले संस्थानों के तौर पर नहीं देखा जाता लेकिन शासन के कार्यों में दोनों की भूमिका सहयोगियों की है। संसद एक बड़ी संस्था है। मंत्रिपरिषद् संसद की एक बड़ी कार्यकारी समिति है जिसे संसद की तरफ से शासन करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। संयुक्त संसदीय समिति एक अस्थायी या तदर्थ समिति है जो बेहद महत्वपूर्ण एवं आपात राष्ट्रीय मामलों की जांच करती है। लोक सभा में अध्यक्ष पूरे सदन को नियंत्रित करता है। संविधान एवं लोकसभा नियमों एवं विनियमों के तहत लोकसभा की कार्रवाई की जाती है। लोक सभा अध्यक्ष लोक सभा के सुचारू रूप से कार्यकरण के लिएसर्वदलीय बैठक आयोजित कर सकते हैं। इसी प्रकार, राज्य सभा की बैठकों की अध्यक्षता के लिए सभापति को सशक्त किया गया है। राज्य सभा का सभापति सदन के सुचारू रूप से कार्यकरण हेतु सर्वदलीय बैठक बुला सकता है।

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