चट्टानें Rocks

चट्टानें एवं खनिज - भूपटल के पदार्थ Rocks Minerals Material Earth's Crust

भूपटल पर पाए जाने वाले वे समस्त पदार्थ जो पातुएँ नहीं (Non Metallic) हैं, चाहे वे चीका मिट्टी (Clay) की भाँति मुलायम हो अथवा ग्रेनाइट की भांति कठोर हो, चट्टान कहलाते हैं। चट्टानें ग्रेनाइट तथा बलुआ पत्थर (Sandstone) की भांति कठोर भी हो सकती हैं अथवा चीका मिट्टी (Clay) और बालू (sand) की भांति मुलायम भी। यह खड़िया मिट्टी (Chalk) और चूने के पत्थर (Limestone)  की भांति छिद्रमय (Pervious) भी हो सकती हैं और ग्रेनाइट (Granite) तथा स्लेट (slate) की भांति अछिद्रमय या अप्रवेश्य (Impervious) भी।

टॉर एवं मार्टिन नामक भूगोलवेत्ताओं के अनुसार, “चट्टान कई बार केवल एक ही खनिज द्वारा निर्मित होती है, किन्तु सामान्यतः यह दो या अधिक खनिजों का योग होती है।” सर आर्थर हॉम्स का कहना उचित है कि चट्टानें अधिकतम विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थों का संयोग होती हैं।”

साधारण भाषा में चट्टानें खनिजों का समूह हैं Rocks are Aggregate of Minerals

खनिज कुछ चट्टानें एक ही खनिज से निर्मित होती हैं, जैसे-बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, संगमरमर, आदि, किन्तु कुछ चट्टानों में एक से अधिक खनिजों का सम्मिश्रण होता है; जैसे ग्रेनाइट, स्फटिक, फेल्सफर (Felsfer) और अभ्रक (Mica) जो तीन या चार खनिजों से मिलकर बनते हैं, कुछ अन्य अनेक प्रकार की धातु एवं अधातु खनिजों के जटिल मिश्रण से भी बनती हैं; जैसे एलुमिना, कोग्लोमरेट, लिमोनाइट अयस्क, आदि।

भूवैज्ञानिकों द्वारा अब तक लगभग 2,000 खनिजों का पता लगाया जा चुका है, किन्तु भूपटल के निर्माण में इनमें से केवल 20 खनिज ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं। खनिज विशेष प्रकार के गुणों वाला मूल-तत्वों का रासायनिक यौगिक (Chemical Compound) होता है। अभी तक 118 मूल तत्वों के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकी है, किन्तु भू-पृष्ठ के निर्माण में इसमें से केवल 8 ही प्रमुख माने गए हैं। मोटे रूप में कहा सकता है कि भू-पृष्ठ का 98.59 प्रतिशत भाग केवल 8 खनिजों –

  • ऑक्सीजन - 46.8 %
  • सिलीकन - 27.7 %
  • एल्युमिनियम - 8.13 %
  • लोहा -  5.0 %
  • कैल्सियम -  3.63 %
  • सोडियम - 2.83 %
  • पोटैशियम - 2.49 %
  • मैग्नीशियम - 2.09 %

से निर्मित है। पृथ्वी के शेष 1.41 प्रतिशत भाग की रचना टाइटैनियम, हाइड्रोजन, फॉस्फोरस, कार्बन, मैंगनीज, गन्धक, बेरियम, क्लोरीन, सोना, चांदी, तांबा, पारा, सीसा, आदि शेष सभी तत्वों से हुई है।

चट्टानों की रचना अथवा विकास Formation Or Evolution Rocks

पृथ्वी पर मुख्य रूप से आग्नेय परतदार तथा रूपान्तरित चट्टानें पायी जाती हैं। इनकी रचना की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है जिसे चट्टान चक्र (Rock Cycle) कहते हैं।

ज्वालामुखी उद्गार या लावा प्रवाह द्वारा आग्नेय चट्टानें बनती हैं। इसके उपरान्त इन चट्टानों का अपक्षय विभिन्न कारणों से होता है। इन टुकड़ों के अपरदन के कारण टुकड़े छोटे-छोटे होकर जमते जाते हैं जिससे परतदार चट्टानें बनती हैं। परतों पर निरन्तर दबाव और भार बढ़ने तथा ताप वृद्धि के कारण यह रूपान्तरित होती जाती है जिससे रूपान्तरित चट्टानें बनती हैं। दाब तथा ताप की निरन्तर वृद्धि के कारण अति रूपान्तरण (Ultrametamorphism) होता है, इसके बाद ये चट्टानें पुनः लावा या मैग्मा में बदल जाती हैं जो पुनः ज्वालामुखी से निस्सृत होकर आग्नेय चट्टानें बनती हैं। इस प्रकार यह चक्रीय प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है और चट्टानों की रचना होती है, या विकास चक्र चलता रहता है।

चट्टानों का वर्गीकरण Classification of Rocks

भूपटल या पृथ्वी की सतह पर पायी जाने वाली चट्टानों को उनकी रचना के अनुसार तीन भागों में बाँटा जा सकता है-

आग्नेय चट्टानें Igneous Rock

आग्नेय शब्द लैटिन भाषा के इग्निस (Ignis) शब्द से सम्बन्धित है जिसका अर्थ ‘अग्नि’ होता है। पृथ्वी (Inner Core) आन्तरिक क्रिया द्वारा पृथ्वी के ऊपरी परत या ऊपरी धरातल पर जब पिघला हुआ पदार्थ ठोस रूप धारण करता है तो आग्नेय चट्टानें बनती हैं। इन चट्टानों का निर्माण पृथ्वी में पदार्थों के तरल अवस्था से ठण्डे हो जाने से जमकर ठोस अवस्था में बदल जाने से हुआ है। वारसेस्टर के अनुसार, Igneous rocks are formed through the solidification of molten material.

पृथ्वी के भीतरी भाग में मध्यवर्ती गहराइयों में बहुत उच्च तापमान एवं दवाव के मध्य जो अर्द्ध द्रव अथवा द्रव अवस्था में पदार्थ चट्टानें  एकत्रित हैं उसे मैग्मा (Magma) या लावा (Lava) कहते हैं। यह मैग्मा ज्वालामुखी के मुख या दरार द्वारा बाहर आता है तो इसके मार्ग में या धरातल के ऊपर ठण्डा होने से आग्नेय चट्टानें बनती हैं।

यद्यपि आग्नेय चट्टानें धरातल पर सबसे पहले बनी हैं, तथापि ज्वालामुखी की क्रिया द्वारा इनका निर्माणक्रम अभी भी जारी हैं। इनमें से कुछ चट्टानें बहुत ही प्राचीन और कुछ नवीन हैं। इन चट्टानों का विशेष महत्व यह है कि अन्य सभी चट्टानों की रचना प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं चट्टानों द्वारा हुई है अत: इन्हें प्राथमिक चट्टानें (Primary Rocks) भी कहा जाता है।

आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण Classification of Igneous Rocks

पिघले हुए पदार्थ जमने का कार्य पृथ्वी के भीतर और बाहर दोनों ही स्थानों पर होता है। अतः इस पदार्थ के ठोस होने की क्रिया के अनुसार आग्नेय चट्टानें सामान्यतः तीन उपविभागों में बाँटी जा सकती हैं।

अ) पातालीय आग्नेय चट्टानें Plutonic Igneous Rock - भू-गर्भ का जो मैग्मा भूतल पर न आकर भीतरी भागों में बहुत अधिक गहराई पर ठण्डा होकर जम जाता है और उससे जो चट्टानें बनती हैं उन्हें पातालीय चट्टानें कहा जाता है। ये चट्टानें पूर्ण रूप से स्फटीय अर्थात् रवेदार (Crystalline) होती हैं क्योंकि द्रव पदार्थ भूगर्भ की गहराई में धीरे-धीरे ठण्डा होता है, अतः उसमें बड़े-बड़े दाने पड़ जाते हैंI ग्रेनाइट, गेब्रो, डाइओराइट चट्टानें इनके मुख्य उदाहरण हैं। भू-गर्भ में बनने वाली इन चट्टानों के कई रुप होते हैं। विशाल रूप में एकत्रित आग्नेय चट्टान के शैल समूह को बेथोलिथ (Batholith) कहा जाता है। यह चट्टान बड़े गुम्बद (Arch) के समान होती है, जिसके किनारे खड़े होते हैं।

ब) मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानें Hypabyssal Igneous Rocks- भू-गर्भ से निकलने वाला मैग्मा धरातल पर न पहुँचकर मार्ग में मिलने वाली सन्धियों, दरारों अथवा तलों में ही जमकर ठोस हो जाता है, तो ऐसी चट्टानों को मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानें कहा जाता है। ऐसी चट्टानें धरातल में कुछ गहराई पर ठण्डी होती हैं, इस कार्य में वितलीय चट्टानों को कम समय लगता है। अत: इसमें बनने वाले रवे प्राय: मध्यम आकार के होते हैं। लावा जमाव के अनुसार इन चट्टानों के अनेक रूप धरातल पर पाए जाते हैं, परन्तु इसके प्रमुख रूप निम्न हैं-

छत्रशिला Laccolith- छत्रशिला लावा के गुम्बदाकार जमाव होते हैं जो परतों के बीच गर्म लावा के भर जाने से बनते हैं। इसकी ऊपरी परत वाष्प और गैस के दबाव के कारण ऊपर की ओर गुम्बद के रूप में उठ जाती है और रिक्त स्थान में लावा भर जाता है।

 भित्तिशिला या डाइक Dyke- लावा बाहर निकलते समय जब मार्ग में अवसादी चट्टानों के बीच एक लम्बवत् दीवार या बांध के रूप में जम जाता है तो उसे भित्तिशिला कहते हैं।

पत्र या पत्रकशिला Sill- जब लावा अवसादी चट्टानों की परतों में प्रवेश कर समानान्तर तहों के रूप में जम जाता है तो उसे पत्रकशिला कहते हैं। लैपोलिय Lapolith- अवसादी चट्टानों में जब लावा जमकर तश्तरीनुमा आकार ग्रहण कर लेता है तो उस आकृति को लैपोलिथ कहा जाता है।

फैकोलिय Facolith- फैकोलिथ भूमि के भीतर लावा का लहरदार जमाव होता है।

उपर्युक्त दोनों प्रकार की चट्टानों को अन्तर्वेधी या आभ्यन्तरिक चट्टानों (Intrusive Rocks) भी कहते हैं। इन चट्टानों पर जल का प्रभाव धीरे-धीरे पड़ता है और इनमें प्रवेश होने वाले जल की मात्रा भी कम होती है। ये चट्टानें परतहीन और अधिक कठोर होती हैं।

) ज्वालामुखी चट्टानें Volcanic Rocks- ज्वालामुखी के उद्भेदन के समय मैग्मा के धरातल पर आकर ठण्डे होने से जो चट्टानें बनती हैं वे ज्वालामुखी चट्टानें कहलाती हैं। इन्हें बहिर्वेधी चट्टानें (Extrusive Rocks) भी कहा जाता है। इसमें धरातल पर लावा बहुत शीघ्र ठण्डा हो जाता है, इसलिए इन चट्टानों में रवे नहीं पड़ते अथवा वे बहुत सूक्ष्म होते हैं। फलतः ज्वालामुखी चट्टानें प्रायः अस्फटीय (Noncrystalline) होती हैं। वैसाल्ट (Basalt) ऐसी ही चट्टानों का उदाहरण है।

संरचना के आधार पर आग्नेय चट्टानों का वर्गीकरण Classification Of Igneous Rocks Based On The Structure

संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है-

अधिसिलिक आग्नेय चट्टानें Acid ligneous Rocks- वे चट्टानें होती हैं जिसमें बालू या सिलिका की मात्रा अधिक होती है (65% से 80% तक) शेष भाग एल्युमिनियम, मैग्नीशियम व क्षार पदार्थ एवं चूना होता है।

अल्पसिलिक आग्नेय चट्टानें Basic Igneous Rocks- इनमें सिलिका की मात्रा 40% से 55% तक होती है। शेष लोहा, चूना और मैग्नीशियम के अंश होते हैं।

प्रमुख आग्नेय चट्टानों के उदाहरण हैं- ग्रेनाइट (Granite), डायोराइट (Diorite), पैरीडोटाइट (Paridotite), रायोलाइट (Riolite), आब्सिडियन (Obsidian), एंडीसाइट (Andicite), सिलिका (Silica), बैसाल्ट, डोलोमाइट, फेलस्फर और अभ्रक।

आग्नेय चट्टानों की विशेषताएं Characteristics Igneous Rocks

  1. इन चट्टानों का सम्बन्ध प्रायः ज्वालामुखी क्रिया से होता है अतः इनका वितरण मुख्यतः ज्वालामुखी क्षेत्रों में पाया जाता है।
  2. आग्नेय चट्टानों में कण गोल नहीं होते। ये भिन्न-भिन्न रूप तथा भिन्न प्रकार के स्फटिकों से बनी होती हैं। चट्टानों के टूटकर घिसने से ही कण गोल बनते हैं।
  3. इन चट्टानों में परतें नहीं होती। ये पूर्णतया सघन (compact) होती हैं, किन्तु इनमें वर्गाकार सन्धियाँ होती हैं। ये संधियां ही चट्टानों के निर्बल स्थल होती हैं। ऋतु अपक्षय का प्रभाव पड़ने यही चट्टानें टूटती जाती हैं।
  4. ये चट्टानें कठोर (Hard) तथा अप्रवेश्य (Non-porous) होती हैं, अतः जल कठिनाई से सन्धियों के सहारे इनमें पहुँच पाता है। परन्तु यान्त्रिक अथवा भौतिक अपक्षय का प्रभाव इन पर पड़ता है अतः विखण्डन के फलस्वरूप इनके टुकड़े हो जाते हैं।
  5. इन चट्टानों में किसी प्रकार के जीवाश्म (Fossils) नहीं पाए जाते क्योंकि इनका निर्माण गर्म और तरल मैग्मा के ठण्डे होने से होता है अतः अत्यधिक गर्मी के कारण जीवांश यदि हीं भी तो नष्ट हो जाते हैं।
  6. इन चट्टानों में बहुमूल्य खनिज पाए जाते हैं एवं उनके चूर्ण से बनी लावा मिट्टी बड़ी उपजाऊ होती है।

आग्नेय चट्टानों के क्षेत्र Areas of Igneous Rocks

विश्व में प्राचीनतम आग्नेय चट्टानों की आयु लगभग 15 अरब वर्ष आँकी गयी है। इस प्रकार की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत में अधिक पायी जाती हैं। राजस्थान का अरावली पर्वत, छोटा नागपुर की गुम्वदनुमा पहाड़ियाँ, राजमहल की श्रेणी और रांची का पठार इसी प्रकार की चट्टानों के बने हैं। अजंता की गुफाएं इन्हीं को काटकर बनायीं गयी हैं।

आग्नेय चट्टानों का आर्थिक उपयोग तथा लाभ Importance of Igneous Rocks

आग्नेय चट्टानों में विभिन्न प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। अधिकांश खनिज व धातु-अयस्क इसी प्रकार की चट्टानों में पाए जाते हैं। लौह अयस्क, सोना, चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबा, मैंगनीज, आदि महत्वपूर्ण घातु खनिज आग्नेय चट्टानों में पाए जाते हैं।

ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानों का उपयोग भवन निर्माण में व उसके सजाने में किया जाता है। भारत के छोटा नागपुर ब्राजील का मध्य पठारी भाग, संयुक्त राज्य अमरीका व कनाडा के लारेंशियन शील्ड के भागों में आग्नेय चट्टानों में अधिकांश खनिज पाए जाते हैं।

अवसादी या परतदार चट्टानें Sedimentary Rocks

धरातल पर पायी जाने वाली अधिकांश चट्टानें अवसादी चट्टानें होती हैं। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि पृथ्वी के धरातल का लगभग 75% भाग इन्हीं चट्टानों द्वारा बना हुआ है और शेष 25% भाग में आग्नेय चट्टानें तथा कायान्तरित चट्टानें फैली हुई हैं। यद्यपि भूपटल पर अवसादी चट्टानों का अधिक विस्तार पाया जाता है, किन्तु इनका घनत्व बहुत कम है और ये केवल धरातल के ऊपरी भाग में ही फैली हुई हैं।

प्रारम्भ में जब पृथ्वी द्रव अवस्था से ठोस अवस्था को प्राप्त हुई तो पृथ्वी का समस्त भू-पृष्ठ आग्नेय चट्टानों का बना हुआ था। बाद में अनाच्छादन प्रक्रिया के प्रभाव से धीरे-धीरे आग्नेय चट्टानों का विनाश होने लगा, जिससे आग्नेय चट्टानें टूटकर चूर्ण रूप में बदलने लगीं। आग्नेय चट्टानों का यही क्षय पदार्थ जल, पवन और हिम द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जमा किया जाने लगा। इस प्रकार जमा किए गए पदार्थों से बनी चट्टानों को अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks) कहते हैं।

अवसादी चट्टानों का विकास एवं रचना Formation Sedimentary Rocks

ये चट्टानें प्राथमिक अर्थात् आग्नेय चट्टानों के जनक पदार्थों (Parental Materials) तथा अपरदन के कारकों के योगदान से बनती हैं। इनकी रचना निम्न अवस्थाओं से होकर गुजरती है-

  1. सर्वप्रथम आग्नेय चट्टानों का भौतिक रासायनिक या जैविक कारणों से अपने स्थान पर टूटना-फूटना अर्थात् अपक्षय (weathering) की प्रक्रिया।
  2. टूटे-फूटे चट्टानी पदार्थों का नदी, भूमिगत जल, पवन, हिमनदी, सागरीय तरंगें, आदि कारकों द्वारा अपने साथ एक स्थान से दूसरे स्थान को परिवहन (Transportation) इस प्रक्रिया में चट्टानी टुकड़े अपघर्षण तथा सन्निघर्षण द्वारा छोटे हो जाते हैं।
  3. जब अपरदन के कारकों की परिवहन शक्ति क्षीण हो जाती है तो वह इन पदार्थों का जमाव करने लगते हैं, यही जमाव समय-समय पर विभिन्न दरों में होते हैं जिससे परतों में जमाव होता है जो परतदार चट्टानें बनाते हैं।

अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण Classification of Sedimentary Rocks

इन चट्टानों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है-

1. निर्जेय अथवा अवसादी चट्टानें Inorganic Sedimentary Rocks – ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण अपरदन की विभिन्न शक्तियों द्वारा होता है। इनमें जीवधारियों के अवशेष (Fossils) नहीं पाए जाते हैं। ये चट्टानें पहले से बनी चट्टानों के अपक्षय से उत्पन्न बड़े-बड़े खण्डों से बनती हैं, अतः इन्हें खण्डाश्म (Clastic) कहा जाता है। इन चट्टानों के प्रमुख प्रकार निम्न हैं-

  1. बालू प्रधान चट्टानें Arenaceous Rocks - इनमें बालू और बजरी की अधिकता होती है। ये चट्टानें सरंध्र होती हैं। बालुका प्रस्तर (Sandstone) इसका मुख्य उदाहरण है।
  2. चिकनी मिट्टी प्रधान या मृण्मय चट्टानें Argillaceous Rocks- ये वे चट्टानें होती हैं जिनमें बालू की अपेक्षा चीका मिट्टी के कणों की अधिकता पायी जाती है। ये चट्टानें अरंध्र होती हैं। ये नरम और कमजोर होती हैं अतः अपरदन के कारकों द्वारा सरलता से कट जाती हैं। प्रवाल और चूनापत्थर इनके प्रमुख उदाहरण हैं।

2. जैव अथवा प्राणिज चट्टानें Organic Rocks-  ये वे चट्टानें हैं जिनकी तहों में जीवधारियों के अवशेष पाए जाते हैं। ये चट्टानें निम्न प्रकार की होती हैं-

  • चूना प्रघान चट्टानें Calcareous Rocks- विश्व के उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबन्धीय छिछले सागरों के जल में घुले हुए चूने तथा जीव जन्तुओं के अवशेषों से बनी होने के कारण इन्हें चूना प्रधान चट्टानें कहा जाता है। ये चट्टानें अपरदन के कारकों द्वारा सरलता से काट दी जाती हैं। खड़िया, जिप्सम और डोलोमाइट ऐसी ही चट्टानें हैं।
  • कार्बनप्रधान चट्टानें Carbonaceous Rocks- ये वे चट्टानें होती हैं जिनमें कार्बन तत्वों की अधिकता होती है। जलाशयों में संगृहीत मिट्टी, जलजीवों और पौधों के जीवाश्मों के जमते रहने से इस प्रकार की चट्टानें बनती हैं। कोयला पीट, भूरा, बिटुमिनस आदि और आयल शेल (Oil shale) इन शैलों के उदाहरण हैं।

3. रासायनिक क्रिया द्वारा बनी चट्टानें Chemicallyformed Rocks- जल में कई रासायनिक तत्व घुले रहते हैं। कभी-कभी ये तत्व झीलों, आदि में एकत्रित हो जाते हैं। जल वाष्प बनकर उड़ जाता है, किन्तु रासायनिक पदार्थ इनकी तहों में जमे रह जाते हैं। यही जमाव कालान्तर में चट्टानों का रूप लेते हैं। सेंधा नमक (Rock Salt), जिप्सम (Gypsum),  ऊलाइट (Oolite), लोहा निक्षेप (Iron Deposit) तथा आश्चुताश्म (stalactite) और निश्चुताश्म (Stalagmite), आदि सभी ऐसी चट्टानें हैं।

उत्पति के अनुसार इन चट्टानों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जाता है-

  1. समुद्री चट्टानें Marine or Aqueous Rocks- जो चट्टानें सागरों या महासागरों के नितल पर अवसाद के जमने से बनती हैं, समुद्री चट्टानें कहलाती हैं। कंकड़ (pebbles), चूना-पत्थर, चीका इसी प्रकार की चट्टानें कहलाती हैं।
  2. सरोवरीय चट्टानें Lacustrine Rocks- वे चट्टानें जी झीलों के तल में अवसाद के जम जाने से बनती हैं, सरोवरीय चट्टानें कहलाती हैं।
  3. नदीकृत चट्टानें Riverine Rocks- वे चट्टानें जो नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नदियों के जल में मिले अवसाद के जम जाने से बनती हैं, नदीकृत चट्टानें कहलाती हैं। भारत की जलोढ़ या कॉप मिट्टी के जमाव इस प्रकार की चट्टानों के रूप हैं।
  4. वायुवीय चट्टानें Aeolian Rocks- पवनों द्वारा उड़ाकर लायी गयी मिट्टी उपयुक्त स्थितियों में जमकर कठोर चट्टान का रूप धारण कर लेती है। इन्हें वायूढ़ चट्टानें कहा जाता है। चीन के मैदान में जमी लोएस (Loess) मिट्टी इसका उदाहरण है।
  5. हिमनदीय चट्टानें Glacial Rocks- हिमनदियाँ अपने साथ मिट्टी, कंकड़, पत्थर, आदि को अपने मार्ग में जमा करती रहती हैं, जिससे निक्षेप चट्टानें बन जाती हैं। इन निक्षेपों को हिमोढ़ (Moraine) कहते हैं।

अवसादी चट्टानों का वर्गीकरण Distribution of Sedimentary Rocks

अवसादीचट्टानें विश्व के लगभग 75% भाग पर पायी जाती हैं। ये केवल पृथ्वी के ऊपरी धरातल पर ही मिलती हैं। नीचे गहराई पर ये कम पायी जाती हैं। भारत में इनके क्षेत्र गंगा, यमुना, , ब्रह्मपुत्र, नर्मदातापी ताप्ती,महानदी, दामोदर, कृष्णा, गोदावरी आदि नदियों की घाटियों में पाए जाते हैं। ये चट्टानें लगभग 5 करोड़ वर्ष पुराणी मानी जाती हैं। इनकी रचना अधिकांशतः प्लिस्टोसीन युग के बाद हुई है।

अवसादी चट्टानों की विशेषताएं Characteristics of Sedimentary Rocks

  1. ये चट्टानें भिन्नभिन्न रूप की होती हैं जिनका निर्माण छोटे बड़े भिन्न-भिन्न कणों से होता है।
  2. इन चट्टानों में परत अथवा स्तर होते हैं जो एक-दूसरे पर समतल रूप में जमे रहते हैं।
  3. इन चट्टानों में वनस्पति एवं जीवजन्तुओं के जीवाश्म (Fossils) पाए जाते हैं। इन्हीं चट्टानों से कोयला, स्लेट, संगमरमर, नमक, पेट्रोलियम, आदि खनिज प्राप्त किए जाते हैं।
  4. ये चट्टानें अपेक्षतया मुलायम होती हैं। इनका निर्माण सामान्यतः जल, पवन, हिम, जीवजन्तु अथवा रासायनिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप होता है।
  5. ये शैलें ढीले कणों वाली होने से छिद्रमय होती हैं।

बलुआ पत्थर, चूनापत्थर, जिप्सम, चट्टानी नमक, कोयला, प्रवाल, पोटाश-लौह-निक्षेप, खड़िया तथा चिकनी मिट्टी प्रमुख अवसादी चट्टानें हैं।

अवसादी चट्टानों का आर्थिक उपयोग Economic Importance of sedimentary rocks

अवसादी चट्टानें अनेक प्रकार से उपयोगी हैं। वर्तमान में सभी देशों में नदियों द्वारा निर्मित समतल अवसादी मैदान, बालू के महीन जमाव के लोयस के मैदान आदि विश्व के सबसे उपजाऊ एवं सघन क्रियाकलाप एवं सघन बसाव के प्रदेश हैं। विश्व की सभ्यता के विकास का ड्रामा इन्हीं मैदानों में निरन्तर रचा जाता रहा है। बलुआ पत्थर, चूने के पत्थर, आदि का उपयोग भवन निर्माण में किया जाता है जो चूने के पत्थर से तैयार किया जाता है। चूना एवं डोलोमाइट व अन्य मिट्टियाँ इस्पात उद्योग में काम में आती हैं अवसादी चट्टानों में चूने के पत्थर का उपयोग सीमेण्ट बनाने में किया जाता है। सीमेण्ट उद्योग आज विश्व के प्रमुख उद्योगों में गिना जाता है।

जिप्सम का उपयोग विविध प्रकार के उद्योगों में किया जाता हैचीनी मिट्टी के बर्तन, सीमेण्ट, आदि में इसका उपयोग किया जाता है।

अनेक प्रकार क्षार, रसायन पोटाश एवं नमक जो कि अवसादी चट्टानों से प्राप्त होते हैं विभिन्न रासायनिक उद्योगों के आधार हैं। कोयला एवं खनिज़ तेल भी अवसादी चट्टानों में प्राप्त होते हैं। ये शक्ति का प्रमुख स्रोत है। आज का औद्योगिक विकास कोयले के कारण ही सम्भव हो सका है।

कायान्तरित चट्टानें Metamorphic Rocks

उच्च तापमान, दवाव अथवा दोनों के प्रभाव से एवं ऊँचे ताप की वाष्प व जल से रासायनिक क्रिया से आग्नेय और अवसादी चट्टानों में मूल रूप में परिवर्तन हो जाता है। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप बनी चट्टानें कायान्तरित चट्टानें कहलाती हैं। वारेस्टर के अनुसार, “The agents that produce changes are chiefly heat, compression and solution acting singly or together.” ऐसी चट्टानों का गुण, रंग, खनिज संरचना एवं रवे पुर्णतः नए सिरे से बनते हैं। इन चट्टानों में कठोरता एवं दृढ़ता भी अधिक होती है।

कायान्तरित चट्टानों की उत्पत्ति Origin of Metamorphic Rocks

सामान्यतः कायान्तरित चट्टाने निम्नलिखित कारणों से बनती हैं-

  1. जब ज्वालामुखी उद्वभेदन के समय भीतरी भागों से तीव्र गति से आने वाला लावा अपने मार्ग में पड़ने वाली चट्टानों में घुस जाता है तो अत्यधिक ताप और दबाव के कारण मार्ग की ये चट्टानें परिवर्तित हो जाती हैं।
  2. पर्वत निर्माणकारी प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों पर अत्यधिक दबाव या भिंचाव पड़ने से वे या तो टूट जाती हैं या मुड़ जाती हैं और कभी-कभी ऊपर के दबाव के कारण भिंचकर नीचे की ओर खिसक जाती हैं। यहाँ से अत्यधिक गर्मी के कारण पिघल जाती हैं और कालान्तर में ठण्डी होकर नया रूप ले लेती हैं।
  3. विवर्तनिक बलों (Tectonic forces) के प्रभाव से कभी-कभी विस्तृत भू-भाग पर अत्यधिक दबाव के कारण कायान्तरित चट्टानें बन जाती हैं। वस्तुत: इन चट्टानों के निर्माण में दो कारण मुख्य हैं- अत्यधिक ताप एवं दबाव।

कायान्तरित चट्टानों की विशेषताएं Characteristics Metamorphic Rocks

  1. इन चट्टानों के निर्माण पर ताप और दाब का गहरा प्रभाव पड़ता है, अत: अवसादी चट्टानों के जीवाश्म नष्ट हो जाते हैं और कुछ आग्नेय चट्टानों के खनिज द्रव्य पुनः संगठित होकर एकत्रित होने लगते हैं।
  2. इन चट्टानों में रवे (crystals) भी पाए जाते हैं।
  3. यह अन्य चट्टानों से अधिक कठोर होती हैं। इनमें छिद्र नहीं होते हैं।
चट्टानें और उनके परिवर्तित रूप
मूल रूपपरिवर्तित रूप
आग्नेय चट्टानें और उनके परिवर्तित रूपग्रेनाइटग्रेनाइट नीस
साइनाइटसाइनाइट नीस
गेब्रोगेब्रोनीस सरपेंटाइन
बेसाल्टस्लेट
रायोलाइटहल्का शिस्ट
अवसादी चट्टानें और उनके परिवर्तित रूपसपिण्डसपिण्ड शिस्ट
बलुआ पत्थरस्फटिक और स्फटिक शिस्ट क्वार्टजाइट
केओलिन व् चिकनी मिट्टीस्लेट, अभ्रक शिस्ट
चूने का पत्थर, डोलोमाइटसंगमरमर
लिग्नाइट कोयलाएन्थ्रेसाइट कोयला
बिटुमिनस कोयलाग्रेफाइट व हीरा

कयान्तरित चट्टानों का वितरण Distribution Metamorphic Rocks

विश्व के प्रायः सभी प्राचीन पठारों पर कायान्तरित चट्टानें मिलती हैं। भारत में ऐसी चट्टानें दक्षिण के प्रायद्वीप, दक्षिण अफ्रीका के पठार और दक्षिणी अमरीका के ब्राजील के पठार, उत्तरी कनाडा, स्कैण्डेनेविया, अरब, उत्तरी रूस और पश्चिमी आस्ट्रेलिया के पठार पर पायी जाती हैं। इनमें सोना. हीरा, संगमरमर, चांदी आदि खनिज पाए जाते हैं।

कायान्तरित चट्टानों का आर्थिक उपयोग Economic Importance of Metamorphic Rocks

कायान्तरित चट्टानों में अनेक प्रकार के महत्वपूर्ण धातु खनिज पाए जाते हैं जो मानव के लिए अनेक प्रकार से उपयोगी हैं। अधिकांश बहुमूल्य खनिज सोना, चांदी और हीरा कायान्तरित चट्टानों से प्राप्त होते हैं।

संगमरमर जो एक प्रमुख कायान्तरित चट्टान है भवन निर्माण के लिए उपयोग में आता है।

विश्व प्रसिद्ध ग्रेफाइट एवं हीरा भी बहु-उपयोगी कायान्तरित चट्टान है। अभ्रक जैसे खनिज वारबार कायान्तरण होने से  बनते हैं। कठोर क्वार्टजाइट का निर्माण अवसादी चट्टान के कायान्तरण से हुआ है एवं इसका सुरक्षा एवं अन्य विशेष धातु उद्योग में अधिक उपयोग होता है।

चट्टानों का आर्थिक महत्व Economic Importance of Rocks

उपर्युक्त तीनों ही प्रकार की चट्टानें आर्थिक दृष्टि से किसी-न-किसी रूप में महत्वपूर्ण हैं। इन चट्टानों में ही खनिज पदार्थ पाए जाते हैं। आर्थिक दृष्टिकोण से इनका निम्नलिखित महत्व है-

  1. आग्नेय चट्टानों में सोना, चांदी, तांबा, जस्ता, सीसा, क्रोमाइट, अभ्रक, गन्धक, मैग्नेसाइट, मैंगनीज, आदि मिलते हैं। इन चट्टानों से सड़कें बनाने के लिए पत्थर (डोलोराइट, गेब्रो तथा ग्रेनाइट) प्राप्त किए जाते हैं। लावा की काली मिट्टी भी इन्हीं चट्टानों से मिलती है, जो कपास और गेहूं की खेती के लिए उपयुक्त है।
  2. अवसादी चट्टानों में कोयला, लिग्नाइट, प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम, जिप्सम, बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, इमारती पत्थर, फास्फेट, पोटाश, सेंधा , डोलोमाइट, आदि मिलते हैं। कृषि के लिए महत्वपूर्ण कांप या मिट्टी भी इन चट्टानों से प्राप्त होती है।
  3. कायान्तरित चट्टानों में चुम्बकीय तांबा, क्रोमियम, लोहा, ग्रेफाइट, यूरेनियम, संगमरमर, सोना, चांदी, हीरा, आदि मिलते हैं।
  4. चट्टानों से ही भवन-निर्माण के लिए विभिन्न प्रकार के इमारती पत्थर प्राप्त किए जाते हैं। आगरा, फतेहपुर सीकरी और दिल्ली से मस्जिदों और किलों में लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है। विश्व प्रसिद्ध प्राचीन मन्दिरों का निर्माण संगमरमर से किया गया है।
  5. चट्टानों से ही अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है, जैसे-सीमेण्ट उद्योग के लिए चूना, डोलोमाइट, कोयला, सिलिकायुक्त मिट्टी, कांच उद्योग के लिए विशेष प्रकार की बालू मिट्टी, रासायनिक पदार्थों के लिए नमक, पोटाश, रासायनिक खाद के लिए जिप्सम, गन्धक, पायराइट और फास्फेट, आदि की प्राप्ति चट्टानों से ही होती है।
  6. आग्नेय चट्टानों के क्षेत्र में अनेक स्थानों पर (भारत में महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा में) गन्धक, अन्य रसायन व खनिज मिश्रित जल के स्रोत पाए जाते हैं जिनमें स्नान करने से त्वचा के अनेक रोग मिट जाते हैं।
  7. हमारा सम्पूर्ण अभिनव औद्योगिक तन्त्र एवं विकसित सभ्यता का सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप चट्टानों एवं खनिजों के विविध या विशिष्ट प्रकार से बढ़ते हुए एवं बदलते हुए उपयोग के अनुसार ही संशोधित होता जा रहा है।

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