क्रांतिकारी आतंकवाद Revolutionary Terrorism

क्रांतिकारी आतंकवाद के उदय के मुख्यतः वही कारण थे, जिनसे राष्ट्रीय आंदोलन में उग्रवाद का जन्म हुआ था। अंतर केवल इतना था आतंकवादी अतिशीघ्र परिणाम चाहते थे। स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन के मंद पड़ने के पश्चात क्रांतिकारी आतंकवाद का और तेजी से विकास हुआ।

उदारवादियों के नेतृत्व में आंदोलन की असफलता के पश्चात युवा राष्ट्रवादियों का मोह भंग हो गया। वे युवा, जिन्होंने इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था, हताश हो गये तथा अपनी राष्ट्रवादी ऊर्जा की अभिव्यक्ति के लिये उपयुक्त मंच की तलाश करने लगे। उग्रवादियों के उग्र तेवर भी क्रांतिकारी आतंकवाद के उदय में सहायक रहे। इनके कार्यकलापों से ऐसे युवा राष्ट्रवादियों को प्रोत्साहन मिला। अतिवादियों ने हालांकि अपने अभियान में बड़ी संख्या में युवाओं को सम्मिलित किया तथा उन्हें त्याग करने की प्रेरणा दी किंतु वे एक प्रभावी संगठन बनाने या तरुणों की क्रांतिवादी भावनाओं को स्वतंत्रता अभियान हेतु उपयोग करने में असफल रहे। अंततः युवाओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के सभी तत्कालीन साधनों को अनुपयुक्त पाया तथा निष्कर्ष निकाला कि यदि उपनिवेशी शासन को समाप्त करना है तो हिंसक तरीके अपनाना आवश्यक है। उन्होंने यूरोपीय प्रशासकों की हत्या तथा अंग्रेज विरोधियों को समूल नष्ट करने का प्रयत्न किया। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हत्या, डकैती लुट इत्यादि सभी हिंसक गतिविधियों को उन्होंने वैध माना।

क्रांतिकारी आतंकवादियों के कार्यक्रम

क्रांतिकारी आतंकवादियों ने निर्णय किया की अंग्रेजी शासन को समाप्त करने के लिए सभी भारतीयों को हिंसक गतिविधियों में सहयोग करना चाहिए। इसके लिये एक राष्ट्रव्यापी हिंसक आंदोलन चलाया जाये तथा साम्राज्यवादियों एवं उसके समर्थकों का दमन किया जाये। क्रांतिकारियों ने रूसी निहिलिस्टों एवं आयरलैंड के आतंकवादियों से प्रेरणा ली।

आतंकवादियों के कार्यक्रमों में- व्यक्तिगत तौर पर हिंसक कार्य करना, ब्रिटिश क्रांतिकारी गतिविधयों के लिये धन एकत्र करना तथा सरकार विरोधी लोगों के सहयोग से सैनिक षड़यंत्र करने जैसी गतिविधियां सम्मिलित थीं। आतंकवादी चाहते थे कि हिंसात्मक कार्यों के द्वारा शासकों को आंतकित किया जाये तथा भारतीयों के इस भय को दूर किया जाये कि अंग्रेज शक्तिशाली एवं अजेय हैं। इन्होंने राष्ट्रवादी भावनाओं का प्रसार कर भारतीयों से उनके कार्यों में सहयोग देने की अपील की तथा युवाओं से इस कार्य के लिये आगे का आह्वान किया क्योंकि बड़ी संख्या में अंग्रेजों ने तरुणों का दमन किया था। अतिवादी भी अपने कार्यों से आतंकवाद को रोकने में सफल नहीं हुये उल्टे उन्होंने इसके उदय में अप्रत्यक्ष रूप से उत्प्रेरक की भूमिका निभायी।

क्रांतिकारी, वे प्रेरणा जिसे उदारवादी दल ने लोकप्रिय बनाया था तथा धीमे प्रभाव की नीति, जिसे उग्रवादियों ने अपनाया था, दोनों में विश्वास नहीं रखते थे। क्रांतिकारियों का मानना था कि साम्राज्यवादी शासन भारत की धार्मिक एवं राजनितिक स्वतंत्रता, संस्कृति, सभ्यता एवं नैतिक मूल्यों इत्यादि सभी को नष्ट कर देगा। इन क्रांतिकारियों का एकमात्र उद्देश्य मातृभूमि को विदेशी दासता से मुक्त करना था।

क्रांतिकारी आतंकवादी गतिविधियां

प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् भारत एवं विदेशों में आतंकवादियों द्वारा किये गये विभिन्न कायों को निम्न परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है-

गाल

बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन का सूत्रपात भद्रलोक समाज से हुआ। 1870 तक कलकत्ता में छात्रों द्वारा अनेक गुप्त समितियों का गठन किया जा चुका था, किंतु ये समितियां ज्यादा सक्रिय नहीं हो सकीं। बंगाल में क्रांतिकारियों का प्रथम गुप्त संगठन अनुशीलन समिति था, जिसका गठन 1902 में किया गया। मिदनापुर में ज्ञानेंद्रनाथ बसु ने इसकी स्थापना की, जबकि कलकत्ता में इसका गठन पी. मित्रा ने किया। कलकत्ता की अनुशीलन समिति में जतीन्द्रनाथ बनर्जी एवं बरीन्द्र कुमार घोष जैसे प्रसिद्ध क्रांतिकारी इसके सदस्य थे। किंतु अनुशीलन समिति को गतिविधियां, अपने अनुयायियों को शारीरिक एवं नैतिक प्रशिक्षण देने तक ही सीमित रहीं तथा 1908 तक आते-आते यह लगभग निष्क्रिय हो गयी।

अप्रैल 1906 में अनुशीलन समिति के दो सदस्यों बरीन्द्र कुमार घोष और भूपेंद्रनाथ दत्ता ने युगांतर नामक सप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। इसी समय अनुशीलन समिति के सदस्यों ने कुछ आतंकवादी गतिविधियां भी संपन्न कीं। 1905-06 तक युगांतर के अतिरिक्त कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं ने भी क्रांतिकारी विचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, जिनमें संध्या का नाम प्रमुख है। किंतु बंगाल में क्रांतिकारी विचारधारा के प्रचार-प्रसार में सबसे प्रमुख कार्य युगांतर ने ही किया। उदाहरणार्थ- बैरिसल सम्मेलन के प्रतिनिधियों पर पुलिस द्वारा किये गये अत्याचारों का विरोध करते हुये युगांतर ने लिखा कि ‘समस्या का समाधान लोगों द्वारा ही किया जा सकता है, भारत में निवास करने वाले 30 करोड़ लोगों के उपनिवेशी दमन एवं शोषण को रोकने के लिए 60 करोड़ हाथों का प्रयोग करना चाहिए, ताकत को ताकत द्वारा ही रोका जा सकता है’। युगांतर के कुछ प्रमुख लेखों का संग्रह मुक्ति कौन पाथे (मुक्ति किस मार्ग से) नामक पुस्तक में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में भारतीय सैनिकों से भारतीय क्रांतिकारियों को हथियार देने का आग्रह किया गया। रासबिहारी बोस एवं सचिन सान्याल ने दूरदराज के क्षेत्रों पंजाब, दिल्ली एवं सयुंक्त प्रांत में क्रांतिकारी आंतकवाद के विकास हेतु अनेक गुप्त समितियों का गठन किया, जबकि हेमचंद्र कानूनगो ने राजनीतिक एवं सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु विदेशों की यात्रा की।

1907 में युगांतर समूह के सदस्यों ने बंगाल के अलोकप्रिय लेफ्टिनेंट गवर्नर फुलर की हत्या का असफल प्रयास किया। 30 अप्रैल 1908 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के न्यायाधीश श्री किंग्सफोर्ड की हत्या करने के उद्देश्य से खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने उनकी गाड़ी पर बम फेंका। मुख्य प्रेसीडेंसी दण्डनायक के रूप में किंग्सफोर्ड ने युवकों को छोटे-छोटे अपराधों के लिये बड़ी-बड़ी सजायें दी थीं। लेकिन गलती से बम श्री कैनेदी की गाड़ी पर लग गया जिससे दो महिलायें मारी गयीं। इसके पश्चात प्रफुल्ल चाकी एवं खुदीराम बोस पकड़े गये। प्रफुल्ल चाकी ने आत्महत्या कर ली तथा खुदीराम बोस पर मुकदमा चलाकर उन्हें फांसी दे दी गयी। सरकार ने मानिकटोला उद्यान एवं कलकत्ता में अवैध हथियारों की तलाशी के लिये अनेक स्थानों पर छापे मारे तथा 34 व्यक्तियों को बंदी बनाया गया। इनमें दो घोष बंधु, अरविन्द तथा बरिन्द्र घोष भी शामिल थे। इन पर अलीपुर षड़यंत्र काण्ड का अभियोग चलाया गया। मुकदमें के दिनों में पुलिस दीप्ती सुपरिटेंडेंट, सरकारी प्रसीकयूटर तथा सरकारी गवाह नरेंद्र गोसाईं की हत्या कर दी गयी। नरेंद्र गोसाईं की हत्या जेल में की गयी, 1908 में पुलिस डिप्टी सुरीटेंडेंट को कलकत्ता हाईकोर्ट में गोली मार दी गयी। 1909 में कलकत्ता में सरकारी प्रॉसीक्यूटर की हत्या कर दी गयी। पुलिन दास के नेतृत्व में ढाका अनुशीलन समिति के सदस्यों ने बारा में डकैती डाली।

तत्कालीन अनेक समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में क्रांतिकारियों की इन गतिविधियों की मुक्त कंठ से प्रसंशा की गयी। बंगाल में संध्या एवं युगांतर तथा महाराष्ट्र में काल में क्रांतिकारियों के कार्यों को सही बताते हुये उनके समर्थन में अनेक लेख लिखे गये।

अंत में कहा जा सकता है कि क्रांतिकारी आतंकवाद, स्वदेशी आंदोलन की असफलता के पश्चात उदय हुआ तथा इसने तत्कालीन युवा पीढ़ी में राष्ट्रवाद की एक नयी भावना का संचार किया। किंतु धर्म पर अत्याधिक बल देने के कारण मुसलमानों का समर्थन इसे नहीं मिला तथा मुस्लिम युवाओं ने इसमें भाग नहीं लिया। आतंकवाद का सामाजिक आधार भी ज्यादा व्यापक नहीं था तथा बंगाल में उच्च वर्ग ने ही इसे सबसे ज्यादा समर्थन एवं सहयोग प्रदान किया। संकुचित सामाजिक आधार एवं व्यापक जनसहयोग के अभाव में यह सरकारी दमन को बदाश्त नहीं कर सका तथा धीरे-धीरे इसका अस्तित्व समाप्त हो गया।

महाराष्ट्र

1918 की विद्रोह समिति की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में क्रांतिकारी आतंकवाद का प्रारंभ सर्वप्रथम महाराष्ट्र में ही हुआ। यहां क्रांतिकारी गतिविधियों का शुभारम्भ वासुदेव बलवंत फड़के के रामोसी कृषक दल ने 1879 में किया। इस दल ने सशस्त्र विद्रोह के जरिये देश से अंग्रेजों को खदेड़ने की योजना बनायी। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने संचार लाइनों को नष्ट कर सरकारी संचार सेवा को ठप्प करने का प्रयास किया। इन्होंने आतंकवादी गतिविधियों हेतु धन एकत्र करने के लिये अनेक स्थानों पर डकैतियां डालीं। किंतु 1890 में इसके पूर्ण विकास से पहले ही सरकार ने बर्बरतापूर्वक इसका दमन कर दिया।

बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र के लोगों में स्वराज्य के प्रति प्यार और अंग्रेज विरोधी अपने समाचार-पत्रों मराठा एवं सरी में अनेक लेख लिखे। तिलक के दो शिष्यों दामोदर चापेकर एवं बालकृष्ण चापेकर ने 1897 में पूना में प्लेग समिति के प्रधान रैण्ड एवं लैफ्टिनेंट एयसर्ट की हत्या कर दी। बाद में चापेकर बन्धु पकड़े गये तथा उन्हें फांसी की सजा दी गयी। विनायक दामोदर सावरकर एवं उनके भाई गणेश दामोदर सावरकर ने 1899 में एक गुप्त सभा मित्र मेला का गठन किया, मैजिनी की तरुण इटली की तर्ज पर जिससे 1904 में अभिनव भारत की स्थापना हुयी।

शीघ्र ही बम्बई, पूना एवं नासिक बम बनाने वाले केंद्रों के रूप में उभरे। 1909 में नासिक के जिला मजिस्ट्रेट जैक्सन की अभिनव भारत के एक सदस्य अनन्त कान्हेर ने हत्या कर दी।

पंजाब

पंजाब में क्रांतिकारी आतंकवाद के उदय में अनेक तत्वों ने सम्मिलित भूमिका निभायी। इनमें लगातार दो अकालों के बावजूद भू-राजस्व एवं सिंचाई करों में अत्यधिक वृद्धि, जमींदारों द्वारा आरोपित बेगार प्रथा एवं बंगाल की घटनाएं प्रमुख हैं। इसके साथ ही लाला लाजपत राय एवं भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने भी पंजाब में क्रांतिकारी आतंकवाद के उदय में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लाला लाजपत राय ने अपने समाचार पत्र पंजाबी के माध्यम से पंजाब के लोगों को किसी भी स्थिति में स्वयं के प्रयासों द्वारा उत्पीड़न का विरोध करने हेतु प्रोत्साहित किया।

जबकि अजीत सिंह ने लाहौर में अन्जुमन-ए-मोहिसबान-ए-वतन नामक क्रांतिकारी समिति का गठन किया तथा भारत माता नामक पत्र का प्रकाशन किया। अजीत सिंह ने भारत माता में अनेक क्रांतिकारी लेख लिखे तथा लोगों से दमन एवं उत्पीड़न का विरोध करने हेतु आगे आने का आह्वान किया। प्रारम्भ में अजीत सिंह एवं उनके समर्थकों ने चिनाब तथा बारी-दोआब नहरी क्षेत्रों के किसानों पर लगाये गये भारी भूमि-राजस्व को वापस लेने हेतु अभियान चलाया किंतु बाद में उनका रुझान आतंकवादी गतविधियों की ओर हो गया। लाला लाजपत राय एवं अजीत लालचंद फलक ने भी पंजाब में क्रांतिकारी आतंकवाद के उदय एवं प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

पंजाब में क्रांतिकारी आतंकवाद के प्रारम्भ होते ही सरकार ने इसके दमन के प्रयास शुरू कर दिये तथा मई 1907 में एक कानून बनाकर राजनीतिक सभाओं एवं समितियों पर प्रतिबंध लगा दिया। लाला लाजपत राय को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया तथा अजीत सिंह देश से निवासित कर दिये गये। अजित सिंह निर्वासन के पश्चात फ्रांस चले गये लेकिन इसके पश्चात भी उन्होंने अपने सहयोग सहयोगियों जैसे- सूफी अम्बा प्रसाद, भाई परमानन्द एवं लाला हरदयाल इत्यादि के सहयोग से क्रांतिकारी आतंकवाद को जारी रखा।

दिल्ली

दिल्ली में क्रांतिकारी गतिविधियों की स्पष्ट अभिव्यक्ति तब हुयी जब क्रांतिकारियों ने 23 दिसम्बर 1912 को वायसराय लार्ड हार्डिंग के काफिले पर बम फेंका। इस बम हमले में हार्डिंग के कई सेवक मारे गये तथा वे बुरी तरह घायल हो गये। इस घटना में रासबिहारी बोस तथा सचिन सन्याल की मुख्य भूमिका थी। घटना के पश्चात पुलिस ने तेरह व्यक्तियों को गिरफ्तार किया, जिनमें मास्टर अमीरचन्द्र, अवध बिहारी, दीनानाथ, सुल्तान चन्द्र, हनुमंत सहाय, बसंत कुमार, बाल मुकुंद एवं बलराज इत्यादि शामिल थे। इन सभी पर दिल्ली षड़यंत्र केस के नाम से मुकदमा चलाया गया। इनमें से कुछ को फांसी दी गयी तथा शेष को देश से निर्वासित कर दिया गया।

क्रांतिकारी आतंकवादियों की विदेशों में गतिविधियां

आतंकवादियों ने भारत के अलावा विदेशों में भी कई स्थानों पर क्रांतिकारी आतंकवाद को जारी रखा। इनमें से कुछ स्थान/देश निम्नानुसार हैं-

इंग्लैंण्ड

लंदन में क्रांतिकारी आतंकवाद का नेतृत्व मुख्यतः श्यामाजी कृष्णवर्मा, विनायक दामोदर सावरकर, मदनलाल ढींगरा एवं लाला हरदयाल ने किया। श्यामाजी कृष्णवर्मा ने 1905 में यहीं भारत स्वशासन समिति की स्थापना की, जिसे इण्डिया हाउस के नाम से जाना जाता था। इस संस्था का उद्देश्य अंग्रेज सरकार को आतंकित कर स्वराज्य प्राप्त करना था। यहां से एक समाचार पत्र सोशियोलॉजिक का प्रकाशन भी प्रारंभ किया। लंदन से सरकारी दमन के कारण श्यामाजी पेरिस तथा अंततः जिनेवा चले गये। श्यामाजी कृष्ण वर्मा के पश्चात इण्डिया हाउस का कार्यभार विनायक दामोदर सावरकर ने संभाला। यहीं सावरकर ने 1857 का स्वतंत्रता संग्राम नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी। उन्होंने मैजिनी की आत्मकथा का मराठी में अनुवाद भी किया। 1909 में मदनलाल ढींगरा ने कर्नल विलियम कर्जन वाइली की हत्या कर दी। ढींगरा को भी गिरफ्तार कर फांसी पर चढ़ा दिया गया। 13 मार्च 1910 को नासिक षड़यंत्र केस में सावरकर को भी गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन्हें काले पानी की सजा दी गयी।

फ़्रांस

यहां श्री एस.आर. राणा एवं श्रीमती भीकाजी रुस्तम कामा ने पेरिस से आतंकवादी गतिविधियों को जारी रखा। 1906 में श्यामाजी कृष्णवर्मा भी लंदन से यहाँ पहुँच गए जिससे इनकी गतिविधियाँ और तेज हो गयीं। इन्होंने यहाँ बंदेमातरम नामक समाचार पत्र निकालने का प्रयास भी किया। यहां एस.आर. राणा ने भारतीय छात्रों हेतु छात्रवृत्तियां प्रारंभ की लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के समय फ़्रांस एवं इंग्लैंड में मित्रता हो जाने के कारण क्रांतिकारियों की गतिविधियां धीमी पड़ गयीं।

अमेरिका तथा कनाडा

संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा में क्रांतिकारी आंदोलन का नेतृत्व लाल हरदयाल ने किया। 1 नवंबर 1913 को लाला हरदयाल ने सैन फ्रेंसिस्को में गदर पार्टी की स्थापना की। विश्व के अनेक भागों में इसकी शाखायें खोली गयीं। गदर दल ने 1857 के विद्रोह की स्मृति में गदर नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ किया।

जर्मनी

प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ होने पर इंग्लैण्ड तथा जर्मनी के संबंध तनावपूर्ण हो गये, फलतः क्रांतिकारियों ने जर्मनी को अपनी गतिविधियों का केंद्र बना लिया। लाला हरदयाल तथा उनके साथी अमेरिका से जर्मनी आ गये। वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ने बर्लिन को अपनी गतिविधियों का केंद्र बना लिया।

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