गुप्त काल में धर्म Religion in the Gupta period

आधुनिक हिन्दू धर्म का जो स्वरूप है, वह बहुत कुछ गुप्तकालीन धर्म पर आधारित है। गुप्तकालीन हिन्दू धर्म में लोक आस्थाओं का प्रवेश हो गया था। परम्परागत धर्म नवीन तत्त्वों को भी समाहित करने लगा था। इसी दृष्टिकोण का प्रभाव पुराणों व स्मृतियों पर पड़ा। इनमें धर्म के परम्परागत स्वरूप के साथ-साथ देश व काल के अनुरूप नवीनता को स्वीकारा गया है।

भागवत धर्म- गुप्तकाल में ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान हुआ। मूर्ति उपासना का केन्द्र बन गई। यज्ञ का स्थान उपासना ने ले लिया। भागवत धर्म ब्राह्मण धर्म से इस बात में भिन्न था कि उसने उपनिषद् द्वारा प्रतिपादित विश्व ब्रह्म की जगह एक व्यक्तिगत ईश्वर को उपासना का केन्द्र बनाया। भागवत धर्म पाणिनी के समय से ही प्रचलित था जबकि वैष्णव शब्द का प्रयोग 5वीं सदी से होने लगा। था। पाणिनी ने वसुदेव के पुजारी वासुदेवका की चर्चा की है। मेगस्थनीज का भी कहना है कि सुरेसन (मथुरा) के लोग वासुदेव की पूजा करते थे। ऐतरेय ब्राह्मण में विष्णु का उल्लेख सर्वोच्च देवता के रूप में हुआ है। पतंजलि ने वासुदेव के पर्यायवाची नामों में कृष्ण और जनार्दन का उल्लेख किया है। उसने केशव और राम के मन्दिरों में उत्सवों का भी जिक्र किया है। वासुदेव कृष्ण वृष्णि अथवा सतवत् वंश के थे। यादव कुल के नायक जो धार्मिक आंदोलन के नेता थे, कालांतर में देवता बन गए। आभीर जातियों ने ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में वासुदेव की पूजा को लोकप्रिय बना दिया। छांदोग्य उपनिषद् में वासुदेव कृष्ण की चर्चा है। उन्हें ऋषि घोरा का शिष्य और देवकी का पुत्र बताया गया। ऋग्वेद काल में ही हमें विष्णु देवता मिलते हैं। ऋग्वेद में वे सूर्य संबंधित हैं। उत्तर वैदिक काल में विष्णु की उपासना यज्ञ के द्वारा की जाती थी। भागवत गीता के अनुसार भागवत धर्म का सिद्धांत सबसे पहले ब्रह्म ने सूर्य बताया, फिर सूर्य ने मनु को बताया और मनु ने इच्छवाकु को सिखाया। सिद्धांत को सतवत् पद्धति का योग कहा जाता है। छांदोग्य उपनिषद् मानता कि वासुदेव कृष्ण का उदय सातवीं एवं छठीं सदी ई.पू. हुआ था। इसकी पुष्टि जैन परंपरा के अनुसार भी होती है क्योंकि यह वासुदेव कृष्ण को अरिष्टिनेमी (जैन तीर्थंकर) का समकालीन मानता है। तैत्तरीय अरण्यक वासुदेव को नारायण और विष्णु से जोड़ता है। बौधायन के धर्मसूत्र में भी वासुदेव और नारायण को जोड़ा गया है। नारायण की पूजा पद्धति संभवत: सबसे पहले हिमालय क्षेत्र में प्रचलित हुई थी। नारायण के उपासक मौलिक रूप से पांचरात्रिक के नाम से जाने जाते थे। बाद मेंवासुदेव से संयुक्त हो गए। पांचरात्र शब्द सबसे पहले शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित है। मान्यता यह है कि पुरुष नारायण ने पांचरात्र सत्र किया जो पांच रातों तक चलता रहा। इससे सृष्टि का विकास हुआ। इसके विकासक्रम में भगवान के 5 रूपों की ओर संकेत है। वैष्णवों ने इन 5 रूपों पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी और अर्चा (मूर्ति) का नाम दिया है। अर्थात् वासुदेव जो है वे क्रमश: 5 रूपों में प्रकट होते हैं। पाँचरात्र मत के अनुसार समस्त सृष्टि का बीज भगवान वासुदेव में सिमटा हुआ है। इससे छः गुण- ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज विकसित हुए। इनमें ज्ञान और बल, ऐश्वर्य और वीर्य, शक्ति और तेज के तीन जोड़े बनते हैं। इन जोडों को व्यूह कहते हैं। ये तीन व्यूह संकर्षण (बलराम), प्रद्युम्न (वासुदेव का पुत्र) और अनिरुद्ध (वासुदेव का पौत्र) हैं। इनके ऊपर वासुदेव कृष्ण हैं। ये चार व्यूहों से 16 उपव्यूह फिर 4 विद्येश्वर बनते हैं। ये सब मिलकर वासुदेव की 24 मूर्तियाँ होती हैं। इसके बाद भगवान अपने आप को प्रकृति के विविध रूपों में प्रकट करते हैं।  ये इनके विभव है। यही अवतार है। विभव अवतार भी कहे जाते हैं। घोसुंडी (उदयपुर, राजस्थान) से दूसरी ई.पू. का अभिलेख प्राप्त हुआ। ज्ञात है नारायण की पूजा के लिए बने एक अहाते में सकर्षण और वासुदेव उपासना के लिए भी अहाता बना हुआ है। इसका निर्माण पराशरी का पुत्र गजायान ने करवाया था। एक पंचाल राजा विष्णुमित्र का एक सिक्का प्राप्त हुआ, जिस पर चार हाथों वाला ईश्वर का चित्र है जिनके बाँये हाथ में एक चक्र है। उसी तरह कुषाण काल की एक मुहर प्राप्त होती है जिस पर ऐसी तस्वीर मिली है, जिसके एक हाथ में शंख, दूसरे हाथ में चक्र, तीसरे में गदा और चौथे हाथ में रिंग की तरह कोई चीज है। कनिघम ने इस सिक्के को हुविष्क से संबंद्ध माना है। प्रथम शताब्दी के मथुरा के मोरा नामक जगह से एक अभिलेख मिला है। इस अभिलेख में पाँच वृष्णि नायकों का वर्णन है। वायु पुराण में कहा गया है कि वासुदेव (वासुदेव-देवकी का पुत्र)। संकर्षण (रोहिणी से वसुदेव का पुत्र) प्रद्युम्न (रुक्मणी से वासुदेव का पुत्र) शम्ब (जाम्बती से वासुदेव का पुत्र) थे। भागवत एवं पाँचरात्र संप्रदाय ने ही ब्राह्मण धर्म में मूर्तिपूजा को प्रोत्साहित किया। उत्तर मध्य काल में राधा-कृष्ण के साथ जुड़ गये। शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित मत्स्य कच्छप तथा वराह के स्वरूप को विष्णु से संबंधित कर दिया गया। गुप्तयुग में अवतारवाद की अवधारणा प्रचलित हो गई। सबसे पहले भागवत गीता में अवतारवाद के सिद्धांत का व्यापक निरूपण किया गया है। अहीरबधन्य संहिता में 39 अवतारों की चर्चा है। इनमें शान्तोत्मा, बुद्ध का परिचायक है परन्तु आमतौर पर 10 अवतारों की चर्चा मिलती है- 1. मत्स्य, 2. क्रुर्म, 3. बराह, 4. नरसिंह, 5. वामन, 6. परशुराम, 7. राम, 8. कृष्ण, 9. बुद्ध, 10. कल्कि- आने वाला अवतार (विष्णु के) हैं।

कश्मीरी लेखक क्षेमेन्द्र की (1050 ई.) दशावतारचरित में बुद्ध को अवतार माना गया है। जयदेव अपने गीत गोविन्द में लिखते हैं कि विष्णु पशुओं के प्रति करूणा का भाव रखने के कारण बुद्ध के नजदीक आ गए। वैष्णववादी अवधारणा के विकास के दूसरे चरण में विष्णु की पत्नी के रूप में भी श्री या लक्ष्मी की पहचान हुई। स्कंदगुप्त के समय लक्ष्मी विष्णु से जुड़ गई। कुछ अभिलेखों में उसे वैष्णवी कहा गया है। वैष्णव धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने की तीन विधियां हैं- ज्ञान, कर्म और भक्ति। इनमें सर्वाधिक महत्त्व भक्ति को दिया गया है। वैष्णव धर्म में तप और धार्मिक अनुष्ठान के बदले ईश्वर की कृपा पर अधिक बल दिया गया है। भक्ति का अभिप्राय सभी इच्छाओं और कमों को भगवान को अर्पित कर देना है। ज्ञान का संबंध भक्ति से जोड़ दिया गया। दूसरी तरफ कर्म के महत्त्व पर भी बल दिया गया, ऐसा माना गया कि निष्क्रियता नहीं, वरन् सच्चे कर्म से भगवान प्रसन्न होते हैं। दुर्गा, कार्तिकेय एवं गणेश जैसे देवी-देवताओं के उदय के साथ संकर्षण ने अपना महत्त्व खो दिया। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध को विष्णु के 4 मुखों के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उन्हें क्रमश: विष्णु के बल, ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति का प्रतिनिधि माना गया है। भागवत एवं वैष्णव संप्रदाय में अहिंसा पर बल दिया गया है। भागवत धर्म का महत्त्वपूर्ण स्रोत निम्न है- महाभारत, भागवद्गीता, भगवतपुराण, नारदसूत्र, शाण्डिल्यसूत्र। भागवत अथवा वैष्णव धर्म का चरमोत्कर्ष गुप्त राजाओं के शासन-काल (319-550 ई.) में हुआ। गुप्त नरेश, स्वत: वैष्णव, मतानुयायी थे। अधिकांश शासकों ने परम भागवत की उपाधि धारण कर रखी थी। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के सिक्के पर परमभागवत खुदा हुआ है। चन्द्रगुप्त और समुद्रगुप्त के सिक्के पर विष्णु के वाहन गरूड़ की प्रतिमा बनी हुई है। स्कंदगुप्त के भीतरी स्तंभलेख में वासुदेव कृष्ण की मूर्ति का उल्लेख है। स्कंदगुप्त के जूनागढ़ तथा बुद्धगुप्त के एरण अभिलख विष्णु की स्तुति से प्रारंभ होते है। देशागढ़ का दशावतार मंदिर, गुप्तकाल में वैष्णव धर्म से सम्बंधित सबसे महत्वपूर्ण मन्दिर है।

शैव धर्म- ऋग्वेद में शिव के लिए रूद्र नाम आया है। स्कंदगुप्त के बैल के आकार का सिक्का प्राप्त हुआ है। कालिदास के रघुवंश में शिव की स्तुति है। कालिदास की रचनाओं में काशी के विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल मंदिर की चर्चा है। लिंग पूजा का प्रथम वर्णन मत्स्य पुराण में मिलता है। उत्तर में मांऊट कैलाश और द. में चिदरम्बम् एवं तिल्लई शिव का स्थान माना गया है। कुमारगुप्त के समय शिव के साथ पार्वती भी जुड़ गई। कुमारगुप्त प्रथम के सिक्के पर मयूर पर बैठे कार्तिकेय की आकृति है। मानव आकार में शिव की मूर्ति कोसम से प्राप्त होती है। वामन पुराण के अनुसार शैव धर्म से जुड़े हुए गुप्त काल में चार उपसंप्रदाय हुए- (1) शैव धर्म (2) पाशुपत धर्म (3) कापालिक धर्म (4) कालामुख धर्म। पाशुपत धर्म सबसे प्राचीन था। इसके संस्थापक लकुलीश थे। पाशुपत धर्म के अनुयायी पांचर्थिक कहलाते थे। कापालिक संप्रदाय के इष्टदेव भैरव थे। इन्हें शिव का अवतार माना गया। इनके उपासक क्रोधी स्वभाव के थे। इनका प्रमुख केन्द्र श्रीशैल था। इसका प्रमाण भवभूति के मालती माधव से मिलता है। कापालिक संप्रदाय के लोग भी अतिवादी विचारधारा के थे। शिवपुराण में इन्हें महाव्रतधर कहा गया है। इस संप्रदाय के लोग नर ककाल में भोजन करते थे और चिता की भस्म शरीर पर मलते थे।

शिव के विभिन्न रूपों में दक्षिण की मूर्ति भी प्रचलित थी। इसमें शिव को सार्वभौमिक शिक्षक के रूप में दिखाया गया है। दक्षिण में शिव की पत्नी के रूप में मीनाक्षी को दिखाया गया है।

पूजा या सौर सम्प्रदाय- हिन्दू समाज में सूर्य पूजा की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। ऋग्वेद में सूर्य के लिए सविता शब्द का प्रयेाग हुआ है। गुप्त काल में सूर्य पूजा का प्रचलन था। इस तथ्य के अनेक साक्ष्य उपलब्ध है। महाकवि

कालिदास के ‘रघुवंश’ में सूर्य के सात हरे अश्वों का उल्लेख है। गुप्त सम्राट् कुमारगुप्त के शासन-काल में रेशम बुनने वालों के एक संघ ने मंदसौर के निकट दशपुर में एक सूर्यमन्दिर का निर्माण कराया था। उस युग की अनेक सूर्य-प्रतिभाएँ मिली हैं। सूर्य पूजा की परम्परा परवर्ती युग में भी चलती रही और आज भी किसी न किसी रूप में वह प्रचलित है।


मध्यभारत एवं कश्मीर में कुछ उदारवादी शैव संप्रदाय भी विकसित हुए। कश्मीरी शैव सिद्धान्त को तीन शाखाएँ हैं- आगम शास्त्र, स्पन्दन शास्त्र और प्रत्यभिज्ञा शास्त्र प्रत्यभिज्ञा उपसंप्रदाय के संस्थापक वसुगुप्त थे और स्पंदशास्त्र उपसंप्रदाय का संस्थापक कलात् और सोमानंद थे। मध्य भारत और दक्कन में मत्तामयूर नामक उपसंप्रदाय विकसित हुआ। कलचूरि, चेदी शासकों के समय यह उत्थान पर था। आगे चलकर कई अन्य उपसंप्रदाय भी विकसित हुए। आगमन्त संप्रदाय के संस्थापक- अघोर शिवाचार्य थे। शुद्ध शैव-सं. श्रीकांत शिवाचार्य ने इसका प्रतिपादन किया। वीर शैव सम्प्रदाय का उद्भव दक्षिण भारत में हुआ। बसव पुराण के अनुसार इस सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन अल्लभ प्रभु और उनके शिष्य वसव (या वसवण्ण) थे। वसव एक ब्राह्मण थे, वे कलचुरी शासक विजय के एक मंत्री थे। मत्स्येन्द्रनाथ (मछेन्द्रनाथ) ने नाथप की स्थापना की। यह भी शैव धर्म का ही एक उपसंप्रदाय था। शैव एवं वैष्णव मत दोनों ईश्वरवादी एवं एकेश्वरवादी थे। जहाँ वैष्णव मत व्यक्ति के मानवीय एवं भावनात्मक पक्ष को छूता था वहीं शैव, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक विचारधारा पर अत्यधिक बल देता था।

दक्षिण में शासन करने वाले चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव, चोल आदि राजवंशों के समय में शैव धर्म की उन्नति हुई तथा शिव के अनेक मन्दिर और मूर्तियाँ बनाई गई। पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार नायनारों द्वारा किया गय। नायनार सन्तों की संख्या 63 बताई गई है। जिनमें अप्पार तिरुज्ञान सम्बन्दर, सुन्दरमूर्ति, मणिक्य वाचगर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इनके भक्ति गीतों को देवारय में संकलित किया गया है।

शक्ति उपासना (शाक्त धर्म)- गुप्त काल में शक्ति पूजा प्रचलित थी, कुमारगुप्त के गंगाधर अभिलेख में शक्ति पूजा का उल्लेख है। मार्कण्डेय पुराण में देवी की स्तुति है। वृहत् संहिता में भी देवी पूजा का उल्लेख है। गुर्जर प्रतिहार शासक देवी के उपासक थे और अपने को परमभगवति भक्त कहते थे। आगे भक्ति आंदोलन के उदय के साथ देवी पूजा का महत्त्व घटता गया, फिर भी वह बंगाल और असम में लोकप्रिय रहा। निम्नलिखित रूप में देवी की पूजा होती थी- (1) पार्वती (हिमालय की पुत्री) (2) गौरी (3) अन्नपूर्णा (4) माता (तमिल में अम्मई) 5. दुर्गा (6) काली (7) चण्डी (8) कोराबाई। इन्द्र की सवारी ऐरावत मानी जाती थी। वे नीचे के स्वर्ग अमरावती में विद्यमान थे। वे पूर्वी भाग के स्वामी थे। वे शक्र के नाम से भी जाने जाते थे।

वरुण- वे पश्चिमी भाग के स्वामी थे। बाद में तमिल क्षेत्र में मछुवारे के देवता हो गए और उन्हें वरूण कहा जाने लगा। उनके प्रतीक के रूप में शार्क मछली के सींग की पूजा की जाने लगी।

यम- ये दक्षिणी भाग के स्वामी थे। कुबेर वैश्रवण के नाम से जाने जाते थे और वे उत्तरी भाग के स्वामी थे। ये चारों देवता मिलकर लोकपाल कहलाये।

षड्दर्शन- (भौतिक दर्शन)

न्याय- न्याय दर्शन तर्क और ज्ञान पर आधारित है। इसकी उत्पत्ति अक्षपाद गौतम के सूत्रों से हुई।

वैशेषिक- यह न्याय दर्शन का पूरक है और संभवत: उससे पुराना भी है। यह एक प्रकार का परमाणु दर्शन है, जो भौतिक विज्ञान से संबद्ध है। इसका प्रवर्तक उलूक कणाद है। इसका व्याख्याता प्रशस्तपाद है।

सांख्य- इसमें 25 मूल सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इसमें प्रकृति एवं पुरुष के ध्रुवीकरण पर बल दिया गया है। इसके प्रवर्तक कपिल हैं। कृष्ण द्वारा प्रतिपादित सांख्यकारिका इसका सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसमें प्रकृति की व्याख्या के क्रम में रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण पर बल दिया गया है। इस पर जैन धर्म का प्रभाव सबसे अधिक है।

योग- यह शरीर विज्ञान से संबंधित है। इसका आधार पतंजलि का योगसूत्र है। बाद में व्यास द्वारा इसमें संशोधन और परिमार्जन किया गया।

पूर्व मीमांसा (मीमांसा)- मीमांसा द्वारा वेदों को प्रतिष्ठित करने का कार्य किया गया। इसमें अनुष्ठान कायों पर विशेष बल दिया गया। मंत्रों के महत्त्व को स्पष्ट किया गया। छठी सदी ई.पू. का जैमिनी सूत्र इससे संबंधित प्राचीनतम ग्रन्थ है। इससे संबंधित सबसे महत्त्वपूर्ण आचार्य शबरस्वामिन है।

उत्तर मीमांसा (वेदांत)- ई. सन् के प्रारंभ में बादरायण ने इसका प्रतिपादन किया। इसका मुख्य व्याख्याता गौड़पाद है। बाद में शंकराचार्य ने उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और भागवत्गीता पर टीकाएं लिखीं, जो शंकर के वेदांत के नाम से जानी जाती हैं।

बौद्ध धर्म- गुप्तकाल से पूर्व युग में बौद्ध धर्म व दर्शन का प्रचार बड़े पैमाने पर हुआ था। गुप्त युग में बौद्ध धर्म वह स्थान प्राप्त न कर सका जो कि अशोक व कनिष्क के समय प्राप्त था। गुप्त शासकों की धार्मिक सहिष्णुता की नीति के कारण ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म का भी विकास हुआ। बौद्ध धर्म के दोनों सम्प्रदाय हीनयान व महायान गुप्तकाल में विकसित होते रहे। प्रारंभिक गुप्त शासकों का झुकाव वैष्णव धर्म की ओर अधिक था लेकिन परवर्ती गुप्त शासकों का बौद्ध धर्म की ओर।

इत्सिंग के विवरण से स्पष्ट होता है कि गुप्त वंश के आदि पुरुष श्री गुप्त ने मृगशिखापत्तन (सारनाथ) में एक बौद्ध मंदिर बनवाया था। चीनी यात्री ने यह भी लिखा है कि सिंह नरेश मेघवर्ण के अनुरोध पर समुद्रगुप्त ने बोधगया में बौद्ध विहार बनाने की अनुमति प्रदान की थी। कुमारगुप्त व स्कंदगुप्त ने भी बहुत से संघारामों का निर्माण करवाया। यह आश्चर्यजनक लगता है कि बौद्ध धर्म को गुप्त काल में मौर्य काल की तुलना में राज्याश्रय प्राप्त नहीं हुआ। तब भी बौद्ध धर्म और बौद्ध साहित्य स्वाभाविक रूप से संवर्धित होता रहा। पी.एल. गुप्त के अनुसार बौद्ध धर्म को गुप्त सम्राटों को प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष संरक्षण अवश्य प्राप्त था। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समकालीन चीनी यात्री फाह्यान के विवरण से भी स्पष्ट है कि उसके समय बौद्ध धर्म विकसित अवस्था में था। बुद्धगुप्त के काल में तो बौद्ध धर्म का विकास राजधर्म के रूप में हुआ। ह्वेनसांग के विवरण से उसका बौद्ध होना प्रमाणित होता है। इसका उत्तराधिकारी वैन्यगुप्त शिव का उपासक होते हुए भी बौद्ध धर्म के प्रति सहानुभूति रखता था। उसने बौद्ध विहार के लिए गाँव दान में दिया था।

तत्कालीन अभिलेखों, स्मारकों, मूर्तियों से भी गुप्तकाल में बौद्ध धर्म के विकास के प्रमाण मिलते हैं। अभिलेखों में उन स्थानों का उल्लेख है जो बौद्ध धर्म के विकास के प्रमाण मिलते हैं। अभिलेखों में उन स्थानों का उल्लेख है जो बौद्ध धर्म के केंद्र थे। गुप्त युग में मथुरा, सांची, बोधगया, कुशीनगर आदि शहर बौद्ध गतिविधियों के केंद्र थे। अभिलेखों में बहुत सारे बौद्ध विहारों के अस्तित्व की ओर भी संकेत मिलता है। बहुत बड़ी संख्या में बुद्धमूर्तियों के प्राप्त होने से स्पष्ट है की बौद्ध धर्म को प्रसिद्धि मिल चुकी थी। फाह्यान ने अपने यात्रा-विवरण में लिखा है मथुरा में तीन सहस्र भिक्षु रहते थे। कन्नौज, वाराणसी आदि नगरों में भी उसने बौद्ध भिक्षुओं को देखा था। फाह्यान यह भी लिखता है की इस काल में साकेत, श्रावस्ती, कोशल, कपिलवस्तु आदि का महत्त्व बौद्ध धर्म की दृष्टि से घट गया था। कश्मीर, पंजाब और अफगान में बौद्ध धर्म का अधिक प्रचार था। नालंदा बौद्ध विहार, बौद्ध धर्म और विद्या का केंद्र था। नालंदा विश्वविद्यालय को गुप्त सम्राटों द्वारा अनुदान प्राप्त होता था। अजंता, एलोरा, भाजा, काले, कन्हेरी आदि स्थानों में बौद्ध गुफाओं, विहार व् चैत्यों आदि का निर्माण हुआ। ये बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थल थे। इनमें बुद्ध व् बोधिसत्व की कथाओं का सुन्दर चित्रण हुआ है।

गुप्त युग में हीनयान सम्प्रदाय की दो शाखायें थीं- थेरवाद (स्थविरवाद) और वैभाषिक (सर्वास्तिवाद)। महायान सम्प्रदाय की भी दो प्रमुख शाखायें थीं- माध्यमिक और योगाचारा गुप्तकाल में दोनों सम्प्रदायों के विहार पृथक-पृथक थे। पाँचवीं शताब्दी में बुद्धघोष ने विसुद्धिमग की रचना की। यह गया का निवासी था एवं वर्ण से ब्राह्मण था। विसुद्धिमग में शील, समाधि और प्रज्ञा को निर्वाण प्राप्ति का साधन बताया गया है। बुद्धघोष ने त्रिपिटक के बहुत से अंशों पर महत्त्वपूर्ण टीकायें लिखी हैं। बौद्ध धर्म के प्रमुख दार्शनिक वसुबंधु और असंग इसी युग से सम्बद्ध थे। वसुबंधु के प्रसिद्ध ग्रन्थ अभिधम्मकोष में वैभाषिक शाखा के सिद्धान्तों की व्याख्या की गयी है। असंग की रचनाओं से विज्ञानवाद के नये सिद्धान्तों की जानकारी मिलती है। दिङ्नाग ने प्रमाण समुच्चय ग्रन्थ की रचना की।

गुप्तकाल में महायान धर्म का अधिक प्रचार रहा। इस काल में महायान दर्शन से संबंधित ग्रन्थों की रचना नागार्जुन, आर्यदेव, असंग, वसुबंधु और द्विङ्नाग ने की। यह दर्शन लोगों की अभिरूचि के अनुरूप था। इसमें ज्ञान के स्थान पर भक्ति पर अधिक जोर दिया गया था। बुद्ध प्रतिमा व स्तूपों की पूजा को निर्वाण का साधन माना गया था। महायान की उपशाखाओं के साहित्य की भी रचना हुई। चतुशतक, वज्रच्छेदिका प्रज्ञानपारमिता, प्रज्ञापारमिता ह्रदयसूत्र, की रचना भी इसी युग में हुई। योगाचार शाखा से सम्बंधित भी कई ग्रंथों का प्रणयन हुआ। इसके संस्थापक मैत्रस्यनाथ थे जिनका काल 200 ई. के लगभग माना जा सकता है। असंग ने महायान सम्परिग्रह, योगाचार भूमिशास्त्र महायान सूत्रालंकार नामक ग्रन्थों की रचना की। दक्षिण में भी बौद्ध धर्म के बहुत से केन्द्र थे। नागार्जुनीकोंडा का प्रसिद्ध बौद्ध विहार दक्षिण में था। काँची भी बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र था। बौद्ध विहारों एवं चैत्यों पर हिन्दू धर्म के भक्तिवाद का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। पौराणिक अवतारवाद की भाँति अन्तर्गत भी अवतारवाद की धारणा का विकास हुआ। बुद्ध की निर्माण किया जाने लगा। गुप्तकाल के अंतिम चरण में बौद्ध धर्म तंत्रवाद का विकास होने लगा था।

जैन धर्म- गुप्तकाल में ब्राह्मण व बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन धर्म का भी विकास हुआ। गुप्तकालीन साहित्यिक व पुरातात्विक साक्ष्यों से भी जैन धर्म के अस्तित्व का बोध होता है। यद्यपि तुलनात्मक दृष्टि से इसका विकास कम था। जैन धर्म भारत के उत्तरी व पश्चिमी भाग में फैला था। दक्षिण भारत में भी इसके अस्तित्व के परमन मिलते हैं। जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या ब्राह्मण धर्म व बौद्ध धर्म के अनुयायियों से कम थी। मथुरा, वल्लभी, विदिशा, पुंड्रवर्द्धन आदि जैन धर्म के प्रमुख केन्द्र थे। वल्लभी में जैन धर्म की सभा का आयोजन किया गया था। कुषाण और गुप्त काल के जैन तीर्थंकरों की कांस्य प्रतिमाएँ चौसा (बिहार) से प्राप्त हुई हैं। बुद्धगुप्त का एक ताम्रलेख पहाड़पुर (पूर्वी बंगाल) से प्राप्त हुआ है जिसमें एक जैन विहार के निर्माण का उल्लेख है। विहार में अतिथि शाला के निर्माण के लिए एक ब्राह्मण द्वारा दान दिये जाने का भी उल्लेख है। कहांव के अभिलेख में उल्लेख आया है कि स्कदगुप्त के काल में मद्र नामक व्यक्ति ने जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना करवाई। इन जैन तीर्थकरों के नाम थे- आदिनाथ, शांतिनाथ, नेमिनाथ, पाश्र्वनाथ और महावीर। मथुरा के एक अभिलेख में हरिस्वामिनी नामक एक जैन महिला द्वारा किसी जैन मंदिर को दान देने का उल्लेख है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समकालीन चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा विवरण सेभी जन मंदिरों के अस्तित्व का बोध होता है।

313 ई. में मथुरा में द्वितीय संगति हुई और 453 ई. में वल्लभी में तृतीय संगति संपन्न हुई। वल्लभी संगति की अध्यक्षता देवार्धिक्षमाश्रमण ने की। मुनि सर्वनन्दी ने लोक विभग नामक ग्रंथ की रचना की। आचार्य सिद्धसेन ने न्यायावतार की रचना की। कुमारगुप्त के उदयगिरी अभिलेख से ज्ञात होता है कि शांकर नामक एक व्यक्ति ने पार्श्वनाथ की मूर्ति स्थापित की थी।

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