मौर्योत्तर काल में धर्म Religion in Post-Mauryan Period

धर्म

मौर्य युग बौद्ध धर्म के उत्कर्ष का युग था। मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरान्त शुंग और सातवाहन शासकों की धार्मिक नीतियों ने सनातन वैदिक धर्म के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त किया किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि बौद्ध या जैन धर्म के अस्तित्व एवं प्रगति पर विराम लग गया। वस्तुत: इस काल-खण्ड में वैदिक धर्म के उत्कर्ष के साथ बौद्ध धर्म भी विकास-पथ पर बढ़ता रहा। कुषाण शासक कनिष्क ने बौद्ध धर्म के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए। यहाँ हम इस युग के धार्मिक परिदृश्य पर एक दृष्टि डालने का प्रयास करेंगे।

इस युग में धर्म को प्रभावित करने वाले दो महत्त्वपूर्ण कारक थे–

  1. यज्ञ का महत्त्व घट गया और यज्ञ का स्थान भक्ति ने ले लिया।
  2. एक अन्य धार्मिक और सामाजिक पहलू यह था कि बहुत सारे अनार्य तत्त्वों का आर्य समाज में आत्मसातीकरण हुआ।

बौद्ध धर्म- शुंग वंश के शासन-काल में बौद्ध धर्म को कुछ धक्का लगा। हालाँकि शुंग वंश के अंतर्गत ही भरहुत स्तूप का निर्माण हुआ था। सिनाडर, कुजुल कदफिसस और कनिष्क बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। कनिष्क के शासन-काल में पार्श्व के परामर्श पर चौथा बौद्ध सम्मेलन हुआ। कनिष्क ने पेशावर में स्तूप का निर्माण करवाया। दक्षिण के सातवाहन शासक और पश्चिमी भारत के क्षत्रप भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उदाहरण के लिए सातवाहन वशिष्ठ पुत्र पुलुमावी के शासन-काल में अमरावती स्तूप का परिष्कार कर, इसे संगमरमर के टुकड़ों से सजाया गया। पश्चिम भारत में सातवाहन शासकों के द्वारा कई गुफाएँ निर्मित करायी गई। ऐसी गुफाएँ नासिक, कालें भज, गुन्नार, कन्हेरी आदि स्थानों पर बनाई गयीं।

महायान बौद्ध धर्म- महायान बौद्ध धर्म का विकास प्रथम शताब्दी ई. पूर्व में आंध्र प्रदेश में हुआ। कनिष्क के समय इसे मान्यता प्राप्त हुई। प्रथम एवं द्वितीय शताब्दी के दौरान महायान धर्म संपूर्ण दक्षिण भारत में फैल गया। नागार्जुन महायान शाखा के प्रथम प्रवर्तक थे।

महायान मत पहले महासंघिका के द्वारा प्रतिपादित किया गया। इसके अनुसार सभी मनुष्य बुद्धत्व प्राप्ति की आकांक्षा रख सकते हैं और विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजरकर बोधिसत्व की प्राप्ति कर सकते हैं। प्रतिभापूर्ण कायों से बोधिसत्व की प्राप्ति होती है जबकि हीनयान का मानना है कि बुद्धत्व प्राप्ति का द्वार सभी लोगों के लिए खोलना उचित नहीं है।

महायान बौद्ध धर्म के अन्तर्गत आने वाली विभिन्न संप्रदायों के प्रमुख केन्द्र इस प्रकार थे-

  • कौशाम्बी - यह थेरावादियों का केंद्र था।
  • मथुरा - यह सर्वास्तिवादियों का केंद्र था।
  • नासिक और कन्हेरी - ये भद्रयानिका के केंद्र थे।

सातवाहनों के शासन-काल में धान्यकटक (अमरावती) बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण केद्र था। उत्तर भारत में र्स्थावरवादी अधिक लोकप्रिय थे।

जैन धर्म- कलिंग का खारवेल नरेश जैन धर्म का महँ संरक्षक था। उसने तथा उसकी रानी ने जैन साधुओं के निर्वाह के लिए प्रभूत दान दिया था और गुहाविहार बनवाए थे। कुशन काल में जैन धर्म मथुरा में लोकप्रिय था। मथुरा मूर्तिकला केंद्र में तीर्थंकरों की मूर्तियां निर्मित की गयीं। तमिल देश में तमिल राजाओं द्वारा कुछ गुफाएं जैन धर्म को अर्पित की गयीं। तमिल राजा नेटुमन अंजी ने दक्षिण के आर्काट जिले के जबाई नामक स्थान पर कुछ गुफाएँ जैनों को अर्पित कीं। सितानवसाल (जिला-पुड्डकोटई) में आम लोगों ने जैन साधुओं के लिए गुफाएँ अर्पित कीं।

जैन धर्म के प्रचार के लिए जैन साधुओं ने राहत सेवा दल संघटित किया। आरंभ में इस सेवा दल का उद्देश्य अकाल और भुखमरी से पीड़ित जैन साधुओं की सेवा करना था। परन्तु धीरे-धीरे यह राहत सेवा दल, धार्मिक सेवा दल में परिवर्तित हो गया और जैन धर्म का प्रचार इसका उद्देश्य हो गया। इस प्रकार का राहत सेवा दल सबसे पहले मौर्य काल में शुरू हुआ था। एक श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार खारवेल के शासन-काल में जैन साधु मगध से पूर्वी आंध्र तट की ओर बस गए थे। हाथीगुंफा अभिलेख से भी इसकी पुष्टि होती है। एक अन्य परंपरा के अनुसार जैन मथुरा में बस गये। मथुरा में कंकाली टीले का खंडहर इसका प्रमाण है। कालकाचार्य की कहानी से यह पता चलता है कि प्रथम या द्वितीय शताब्दी में जैन धर्म मालवा की ओर फैल गया। जूनागढ़ अभिलेख से ज्ञात होता है कि यह प्रारंभिक शताब्दी में गुजरात में फैल गया।

विभिन्न केंद्र- प्रथम और द्वितीय शताब्दी में राजगृह एक महत्त्वपूर्ण केद्र था। इस स्थल से श्वेताम्बर संप्रदाय के ब्रजमुनि का नाम जुड़ा हुआ है। मथुरा और उज्जैन भी महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। तक्षशिला में सिरकप बौद्ध केद्र के साथ-साथ जैन केंद्र भी थे। उसी प्रकार भड़ौंच और सोपारा भी महत्त्वपूर्ण केंद्र थे।

ब्राह्मण धर्म-शैव उपासना- शिव से प्रथम परिचय सिंधु घाटी की सभ्यता में होता है। वैदिक युग में रुद्र एक साधारण देवता थे। उत्तर वैदिक काल के अन्त में उसका महत्त्व बढ़ गया। बाद में शिव उपासना के साथ भक्ति के तत्त्व भी जुड़ गए। तैत्तरीय संहिता और श्वेताश्वतर उपनिषद् में शिव की चर्चा मिलती है। श्वेताश्वर उपनिषद् में भक्ति का पहला उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ का ऋषि श्वेताश्वर भक्तिपूर्वक रूद्र की शरण लेता है। बौद्ध ग्रंथ निद्देश में शिव उपासकों की भी चर्चा है। सांख्यान, कौशितिकी एवं अन्य ब्राह्मणों में शिव एवं उसके अन्य नाम रुद्र, शिव, महादेव और महेश्वर भी मिलते हैं। कौशितकी ब्राह्मण में ईसन और महादेव की चर्चा है। अथर्ववेद में रूद्र का महत्त्व बढ़ गया। उनके सात नामों का उल्लेख होता है- रूद्र, भव, शर्व, पशुपति, उग्र, महादेव और इषन्। शतपथ एवं कौशितकी ब्राह्मण में उनके आठवें नाम अशनि का भी उल्लेख हुआ। उनके चार नाम दयालु रूप और चार विनाशक रूप को प्रदर्शित करते हैं। पाणिनी ने अष्टाध्यायी में शैव भागवत की चर्चा की है। श्वेताश्वर में रुद्र को परम ब्रह्म का पर्याय बताया गया है। उसमें कहा गया है- जो अपनी शक्ति से संसार पर शासन करता है, जो प्रबन्ध के समय प्रत्येक वस्तु के सामने विद्यमान रहता है तथा उत्पत्ति के समय जो सभी वस्तुओं का सृजन करता है, वह रुद्र है। मेगस्थनीज, डायोनिसस की पूजा का वर्णन करता है। ईसा पूर्व दूसरी सदी में पतंजलि ने शिव भागवतों की चर्चा की है और संकेत किया है कि उस समय शिव की मूर्तिपूजा आरंभ हो चुकी थी। पतंजलि ने शैव भागवत को अयस्स शुलिकाह कहा है (वह जो लोहे का डंडा धारण करता है)। शैव भावगत दंडजिन कहलाते थे। मद्रास के पास गुड्डीमलम एवं मध्यप्रदेश में भिटा से ऐसे लिंग प्राप्त होते हैं जिन पर शिव की आकृति भी मिलती है। महाभारत पाँच दार्शनिक विचारधाराओं में, सांख्य, योग, पांचरात्र और वेद के साथ पाशुवत स्कूल की भी चर्चा करता है। पुराणों के अनुसार पाशुपक्षसम्प्रदाय की प्रवर्तन लकुलीश नामक एक ब्रह्मचारी ने की थी। कहीं लकुलीश के स्थान पर लकुलिन, नकुलीश का प्रयोग हुआ है। उन्हें शिव का अट्ठाइसवाँ और अन्तिम अवतार मान लिया गया है। उनके विचार पाशुपत सूत्र में मिलते हैं। इसके आधार पर चौदहवीं सदी में माधवाचार्य ने सर्वदर्शन संग्रह लिखा। लकुलीश को पंचरात्रविद्या नामक ग्रंथ लिखने का श्रेय दिया जाता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा स्तंभ अभिलेख से लकुलीश के विषय में जानकारी मिलती है। लकुलीश के चार शिष्य थे- कुसिक, मित्र, गर्ग और कौरूस्य। लकुलीश शिव को समस्त सृष्टि का कारण मानते हैं और उन्हें पति कहते हैं। जीवात्मा को पशु माना गया है। पशु 23 भौतिक तत्त्वों के जाल में जकड़ा हुआ है। इनके लिए कला या पाश शब्द का प्रयोग हुआ है। किन्तु पशु का एक गुण विद्या भी है। इसके द्वारा वह कलाओं और पाशों से छुटकारा पाता है। इस मुक्ति के लिए उसे विधि के अनुसार व्रतों का पालन करना पड़ता है और द्वारों से गुजरना होता है। इसी से योग की स्थिति उत्पन्न होती है एवं पशु पति से मिलता है। इसके परिणामस्वरूप दु:खों का अन्त हो जाता है। आगे पाशुपत धर्म से ही कापालिक और कालामुख संप्रदाय का विकास हुआ। कार्यालयों के इष्टदेव भैरव हैं जो शंकर के अवतार माने जाते हैं। इस संप्रदाय के अनुयायी भैरव को ही सृष्टि का सर्जक और संहारक मानते हैं। भवभूति के मालती माधव नामक नाटक से पता चलता है कि श्री शैक नामक स्थान कापालिकों का प्रमुख केन्द्र था। कालामुख सम्प्रदाय के अनुयायी कापालिकों के ही वर्ग के थे। किन्तु वे अधिक अतिवादी थे। नर कपाल में भोजन करना, जल पीना, सुरा पीना तथा नटशव का भस्म शरीर पर लगाना आदि कार्य उनकी अतिमार्गी प्रवृत्ति व्यक्त करते हैं। शैव मत के अन्य सम्प्रदाय कश्मीर शैव, वीर शैव तथा विंगायत है।

कश्मीरी शैव सिद्धान्त कापालिक तथा कालामुख सम्प्रदाय जीवन शैली से भिन्न है। इस सम्प्रदाय में ज्ञान और ध्यान को परमब्रह्म की प्राप्ति का प्रधान आधार माना गया है। वीर शैव की अनुयायी लिंगायत या जंगम भी कहलाते हैं। बसव पुराण के अनुसार इस सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन अल्लमप्रभु और उनके शिष्य बसव (या बसवण्ण) नामक ब्राह्मण ने किया था। ये लोग निष्काम कर्म में विश्वास करते हैं। लिंगायत लोग शिवलिंग को चाँदी के सम्पुट में बाँध कर अपने गले में लटकाए रहते हैं। शक शासक मोगा की मुद्राओं पर त्रिशूलधारी शिव अंकित है। उसी तरह गंडोफर्निस के कुछ सिक्कों पर त्रिशूलधारी शिव अंकित हैं। पार्थियन शासक गंडोफर्निस के सिक्के पर नन्दी, त्रिशूल और शिव चित्र अंकित है। कुषाण शास वीम कदफिसस के सिक्कों पर नन्दी, त्रिशूल और शिव का चित्र अंकित है। उसने अपने को महेश्वर कहा है। केन उपनिषद् शिव की पत्नी उमा को उच्च स्थान दिया गया है। अथर्वसिरस उपनिषद् में पाशुपत धर्म की चर्चा है। सिकन्दर के इतिहासकारों ने शिव पूजकों की चर्चा और उन्हें शिवई कहा है। अत: पूर्वी भारत में ही नहीं उत्तर भारत में भी धर्म का प्रसार हुआ था। ग्रीक इतिहासकार हेसियस ने कहा है कि वृषभ (बैल) गंधार का देवता था। आगे ह्वेनसांग भी कहता है कि पुष्कलावती के में एक देवता का मन्दिर है जो संभवत: शिव का मन्दिर है। पंतजर अभिलेख (122 ई.) उत्तर पश्चिम के महावन क्षेत्र में एक शिव स्थल की चर्चा करता है।

मार्शल ने प्रथम शताब्दी पूर्व में एक कांस्य मुद्रा तक्षशिला के सिरकाप नामक स्थल से प्राप्त की। इस पर शिव की आकृति है। इंडो-सिथियन (इंडोग्रीक), इंडो पार्थियन तथा कुषाण शासकों के सिक्के पर भी शिव का चित्र है। परन्तु वह भी मानवीय रूप में है। उनके साथ उनका पवित्र बैल नन्दी भी है। कुषाण शासक विमा कदफिसस स्वयं को महेश्वर अथवा महेश का भक्त कहता है। सभी कुषाण शासकों के सिक्के पर शिव को अपनी पत्नी उमा के साथ (जिसे अम्बा या दुर्गा कहा गया है) चित्रित किया गया है।

भागवत धर्म- पाणिनी सबसे पहले इस धर्म की चर्चा करता है। मेगस्थनीज हेराक्लीज की उपस्थिति की बात करता है। छांदोग्य उपनिषद् में यह कहा गया है कि वासुदेव कृष्ण, देवकी के पुत्र और ऋषि घोरा के शिष्य थे।

अनार्य देवता- इस युग में बहुत सारे यक्ष यक्षिणी, नाग और नागिनी की पूजा होती थी। इनके अतिरिक्त हाथी, घोड़े एवं गाय की पूजा भी होती थी। थुरा के कालियादाह नाग की कहानी से ऐसा प्रतीत होता है कि पहले मथुरा नाग पूजा प्रचलित थी। आगे वासुदेव कृष्ण की लोकप्रियता के सामने यह पीछे रह गई। गणेश पूजा पर भी नाग पूजा का प्रभाव है। गणेश को विनायक कहा जाता है। गणेश के अतिरिक्त कुमार कार्तिकेय की पूजा भी प्रचलित थी। गणेश पंचदेवतायन में शामिल थे। इसमें गणेश, विष्णु, शिव, शक्ति और सूर्य हैं। गणेश पूजा की छ: शाखाएँ प्रचलित थीं। अम्बिका के रूप में देवी का उल्लेख वाजसनेय संहिता में हुआ है। उमा शब्द का उल्लेख केन उपनिषद् में हुआ है। पेरीप्लस के अनुसर कन्याकुमारी में शक्ति पूजा कुमारी के रूप में की जाती थी। सातवाहन क्षेत्र में गौरी की पूजा का प्रचलन था। चक्रपूजा एक शाक्त अनुष्ठान है। इसमें नारी के अंग की पूजा चक्र के रूप में की जाती थी। शाक्तों वर्ग थे- 1.कौलिक- ये नारी के अंग की पूजा करते थे और 2.समयी- ये किसी सुंदर स्त्री के अंग की पूजा करते थे। इस युग में एक देवता जियस अम्ब्रियस की चर्चा मिलती है। इनकी पहचान इन्द्र अथवा पार्जन्य से हुई है। सिक्कों से ऐसा प्रमाणित होता है कि कुषाण साम्राज्य में ननैया, मित्र या मिहिर (सूर्य), माओ (चंद्रमा), फारो (अग्नि) जैसे वे दो बीलोनियन तथा ईरानियन देवता की भी पूजा होती थी। पार्थियन शासक गंडोफर्निस ने अपने सिक्के में अपने को देवव्रत या सुदेवव्रत कहा है। तारानाथ के अनुसार अश्वघोष बौद्ध बनने से पहले शिव का भक्त था। साहित्य में शिव के विभिन्न नाम हैं-ईश्वर, महेश्वर, जनाधि और शंकर। शिव के पुत्र कार्तिकेय की पूजा या तो अकेले या फिर स्कध के साथ होती थी। स्कंध, महासेन और कुमार को एक ही माना जा सकता है। किन्तु महाभारत कहता है कि विशाख का जन्म स्कंध के दक्षिण भाग में हुआ है। पतंजलि के अनुसार शिव स्कंद और विशाख की पूजा होती थी। पाशुपत संप्रदाय का उल्लेख महाभारत के नारायणीय खंड में मिलता है। शक्ति (दुर्गा) के सात नाम दिए गए हैं- ब्राह्म, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वराहि, नृसिंही और ऐन्द्रिव (ऐन्द्री)। देवी की अराधना तीन प्रकार से की जाती है- 1. समाधि (ध्यान द्वारा), 2. रहस्यपूर्ण चक्र पूजा और 3. सत्य सिद्धांत के द्वारा।

पुराणों में अनेक देवी-देवताओं का उल्लेख हुआ है, किन्तु उनमें पंचदेवताओं की अराधना प्रधान है। पंचदेवों में विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य आते हैं।

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