राष्ट्रकूट वंश Rashtrakuta Dynasty

राष्ट्रकूट की उत्पत्ति और मूल निवास के विषय में विद्वानों में मतभेद है। डॉ. फ्लीट का विचार है कि राष्ट्रकूट उत्तर के राठौरों के वंशज थे। इसके विपरीत बर्नेल का विचार है कि उनका सम्बन्ध आन्ध्र प्रदेश के द्रविड़ रेड्डियों से है। रेड्डी शब्द राष्ट्र का अपभ्रंश है और इस प्रकार राष्ट्रकूट रेड्डियों के वंशज हैं। इन दोनों मतों को अधिक मान्यता प्राप्त नहीं है।

एक अन्य सम्भावना यह है कि राष्ट्रकूट मान्यखेट के राष्ट्रिकों या राठिकों के वंशज थे। राष्ट्रिकों का वर्णन अशोक के अभिलेख में भी मिलता है। राष्ट्रकूटों की भाषा कन्नड़ थी और इन्होंने कन्नड भाषा को राजाश्रय प्रदान किया। कई अभिलेखों में उन्हें लट्टलूरपुर-वराधीश अर्थात् सुन्दर नगर लातूर का स्वामी कहा गया है। लातूर निजाम की रियासत का एक छोटा सा नगर था। कुछ विद्वानों का यह भी विचार है कि मान्यखेट के राष्ट्रकूट महाराष्ट्र के निवासी थे। राष्ट्रकूटों ने यह भी दावा किया कि वे महाभारत काल के यदुवंशी कृष्ण के वंशज हैं।

नर्मदा नदी के दक्षिण में एक शक्तिशाली राज्य का उदय हुआ जिसके राजा राष्ट्रकूट कहलाये। राष्ट्रकूट राजा पहले चालुक्यों के सामन्त थे। राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग ने चालुक्य राजा कीर्तिवर्मा द्वितीय के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। मान्यखेट के राष्ट्रकूटों का महत्त्वपूर्ण काल दन्तिदुर्ग के शासन-काल से ही प्रारम्भ हुआ। उसने 8वीं शताब्दी के मध्य चालुक्य-शक्ति का अन्त करके अपनी शक्ति का विस्तार किया। उसने कांची के पल्लवराज, कंलिगराज, कौशलराज, मालव (उज्जैन का गुर्जर-प्रतिहार नरेश), लाट (दक्षिण गुजरात) और श्री शैल (कर्नूल जिला) के राजाओं को पराजित किया। उसने उज्जैन में हिरण्यगर्भ यज्ञ किया। जिसमें प्रतिहार राजा ने द्वारपाल का कार्य किया। दन्तिदुर्ग ने महाराजाधिराज, परमेश्वर और परमभट्टारक की उपाधियाँ धारण की। दन्तिदुर्ग ने अरब आक्रमण को विफल बनाया जिसके बाद चालुक्य शासक विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वी वल्लभ की उपाधि दी।

दन्तिदुर्ग के कोई पुत्र नहीं था। उसके बाद उसका चाचा कृष्ण प्रथम 758 ई. में सिंहासनारूढ़ हुआ। कृष्ण प्रथम ने चालुक्य शक्ति को, जिसका विनाश दन्तिदुर्ग ने किया था, पूर्णरूपेण पराजित किया। उसने अपने पुत्र गोविन्द द्वितीय को एक सेना के साथ वेगी के चालुक्य राजा पर आक्रमण करने भेजा। वेंगी के चालुक्य राजा ने आत्मसमर्पण कर दिया। कृष्ण प्रथम (758-773 ई.) एक महान् विजेता ही नहीं, एक महान् निर्माता भी था। एलोरा में ठोस चट्टान को कटवाकर उसने शिव मन्दिर (कैलाशनाथ) का निर्माण कराया। उसने राजाधिराज परमेश्वर की उपाधि ली।

कृष्ण प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र गोविन्द द्वितीय शासक बना। वह विलासी था और उसके छोटे भाई ध्रुव ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया। ध्रुव ने पल्लव नरेश दन्ति वर्मन् को पराजित किया। ध्रुव गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज और पाल राजा धर्मपाल का समकालीन था। ध्रुव ने अपनी सैनिक गतिविधियां उत्तर भारत तक बढ़ा दी। उसने वत्सराज और धर्मपाल दोनों को युद्ध में पराजित किया। इन विजयों के फलस्वरूप यद्यपि राष्ट्रकूट साम्राज्य की सीमा में वृद्धि नहीं हुई, परन्तु इससे ध्रुव की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई और गंगा-यमुना के दोआब में राजनैतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए राष्ट्रकूटों, पालों और प्रतिहारों में पारस्परिक संघर्ष प्रारम्भ हो गया। ध्रुव ने निरूपम, कालीवल्लभ और धारावर्ष की उपाधि ली।

राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय (793-814 ई.)

ध्रुव ने अपने शासनकाल में अपने तृतीय पुत्र गोविन्द को युवराज घोषित कर दिया था। 793 ईं में ध्रुव के पश्चात् गोविन्द तृतीय राजा बना। परन्तु उसके सिंहासन पर अधिकार को, उसके भाई स्तम्भ ने जो गंगवाड़ी का राज्यपाल था, चुनौती दी। उसने बारह राजाओं का संघ बनाया और गोविन्द तृतीय के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। गोविन्द तृतीय ने स्तम्भ को राजाओं के संघ के साथ पराजित कर दिया। परन्तु गोविन्द तृतीय ने अपने शत्रुओं के प्रति उदारता का परिचय दिया। उसने अपने भाई स्तम्भ को गंगावाड़ी का पुनः राज्यपाल बनाया। मालवा को जीतकर उसने उपेन्द्र नामक व्यक्ति को शासक नियुक्त किया।

गोविन्द तृतीय ध्रुव के समन ही एक महँ विजेता था। उसने पूर्ण तैयारी के साथ उत्तरी भारत पर आक्रमण किया। वह भोपाल और झाँसी के मार्ग से आगे बाधा। गुर्जर राजा नाग्भात्त द्वितीय ने उसका सामना किया। नागभट्ट द्वितीय पराजित हुआ और युद्धस्थल से भाग गया। गोविन्द तृतीय कन्नौज की ओर बढ़ा। कन्नौज के राजा चक्रयुद्ध ने उसके सामने आत्मसमर्पण कर दिया। बंगाल के राजा धर्मपाल ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। मालवा के शासक ने गोविन्द की अधीनता स्वीकार कर ली। गोविन्द तृतीय ने गुजरात पर विजय प्राप्त की और वहां का राज्य अपने भाई इन्द्रराज को सौंप दिया।

जब गोविन्द तृतीय उत्तर भारत के विजय अभियान पर था, तब गंग, केरल, पाण्ड्य और पल्लव राजाओं ने उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचा। गोविन्द तृतीय ने उत्तर भारत के विजय अभियान से लौटकर इन्हें करारी पराजय दी। गोविन्द तृतीय के विजय अभियानों की जानकारी से लंका का राजा भयभीत हो गया और उसने गोविन्द तृतीय की अधीनता स्वीकार कर ली।

अमोघवर्ष (814-878 ई.)- गोविन्द तृतीय की मृत्यु के पश्चात् अमोघवर्ष सिंहासन पर बैठा। उसने नई राजधानी मान्यखेत की स्थापना की। राज्याभिषेक के समय उसकी आयु 12 वर्ष थी। उसकी अल्पावस्था का लाभ उसके विरोधियों ने उठाया। सामन्तों ने विद्रोह कर दिया। मंगवाड़ी के शासक ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। वेंगी के राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने बदला लेने के लिए राष्ट्रकूट साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। अमोघवर्ष को सिंहासन से हाथ धोना पड़ा। कुछ समय पश्चात् उसने पुनः सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

अमोघवर्ष साहित्य प्रेमी और विद्वानों का आश्रयदाता था। अमोघवर्ष ने कन्नड़ भाषा में कविराज मार्ग की रचना की। उसने जिनसेन (लेखक-आदिपुराण) महावीराचार्य और शकतायन को राज्य संरक्षण प्रदान किया।

कृष्ण द्वितीय (878-914 ई.)- अमोघवर्ष के पश्चात् उसका पुत्र कृष्ण द्वितीय राजा बना। उसे अपने पड़ोसी राज्यों से लगातार संघर्ष करना पड़ा। उसके महत्त्वपूर्ण युद्ध प्रतिहारों और चालुक्यों के साथ हुए।

कृष्ण द्वितीय के उत्तराधिकारी- कृष्ण द्वितीय के पश्चात् उसका पौत्र इन्द्र तृतीय (914-922 ई.) शासक बना। उसने प्रतिहारों के साथ युद्ध किया। उसने कन्नौज पर भी आक्रमण किया और सफलता प्राप्त की।

इन्द्र तृतीय के पश्चात् अमोघवर्ष द्वितीय, गोविन्द चतुर्थ और अमोघवर्ष तृतीय शासक बने। कृष्ण तृतीय (939-968 ई.) राष्ट्रकूट वंश का महान् शासक हुआ है जिसका काल संघर्ष में व्यतीत हुआ। उसने अकालवर्ष की उपाधि ग्रहण की। उसने चोलों को करारी पराजय दी। वहां उसने एक देवालय एवं विजय-स्तंभ की स्थापना की। सुदूर दक्षिण में राज्यों पर विजय प्राप्त की। लंका के राजा को भी उसने अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया। कृष्ण तृतीय के उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए और उस राज्य का शीघ्रता से पतन होने लगा। इस वंश के अन्तिम राजा कर्क को उसके एक सामन्त तैल या तैलप ने 973 ई. में गद्दी से उतार कर अपना अधिकार कर लिया। तैल ने कल्याणी के चालुक्य राजवंश की नींव डाली। अलमसूदी (1915-16 ई.) ने राष्ट्रकूट शासकों की बडी प्रशंसा की है और उसने इनकी तुलना विश्व के 4 शासकों से की है। तीन अन्य हैं- (1) बगदाद के खलीफा, (2) चीन और (3) कुस्तुनतुनिया के शासक।

राष्ट्रकूट-प्रशासन- राष्ट्रकूट काल में प्रशासन का केन्द्र-बिन्दु राजा था। सारे अधिकार राजा में निहित थे। वह परम भट्टारक, महाराजाधिराज की उपाधियां धारण करता था। राजा का पद वंशागत था और राजा की मृत्यु के पश्चात् ज्येष्ठ पुत्र सिंहासन पर बैठता था, परन्तु कभी-कभी अपवाद भी होते थे, जैसे बड़े-भाई के होते हुए गोविन्द तृतीय को उसके पिता ने अपने जीवन-काल में ही राजा मनोनीत किया था। युवराज प्रशासन में राजा की सहायता करता था। राजकुमारों को आमतौर पर राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता था। प्रशासन में परामर्श और सहायता देने के लिए राजा मत्रियों की नियुक्ति करता था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम-प्रमुख ग्राम का प्रशासन चलाता था। गांव में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखना उसी का कार्य था। ग्राम में स्वच्छता, सिंचाई, शिक्षा, मन्दिरों और तालाबों की देख-रेख के लिए उपसमितियां होती थीं जो ग्राम प्रमुख की देखरेख में कार्य करती थीं।

राष्ट्रकूट शासक सेना के संगठन और ट्रेनिंग पर विशेष रूप से ध्यान देते थे। सेना स्थायी थी। सेना का एक बड़ा भाग राजधानी में रहता था।

धर्म- राष्ट्रकूट शासक शिव और विष्णु के उपासक थे। उनकी मुहरों पर विष्णु के वाहन गरुड़ अथवा योगमुद्रा में आसीन शिव के चित्र अंकित हैं। शासकों ने अनेक यज्ञ कराये जैसे दन्तिदुर्ग ने उज्जैन में हिरण्यगर्भ यज्ञ किया। एक ही मन्दिर में विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की जाती थी, जैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश। हिन्दू-धर्म के अतिरिक्त जैन सम्प्रदाय के प्रति भी राष्ट्रकूट शासकों ने उदार दृष्टिकोण अपनाया। अमोघवर्ष प्रथम, इन्द्र द्वितीय, कृष्ण द्वितीय और इन्द्र तृतीय ने जैन-धर्म को संरक्षण प्रदान किया।

कला एवं साहित्य- कुछ राष्ट्रकूट शासकों ने कला के विकास में भी अपना योगदान दिया। कृष्ण प्रथम ने चट्टानों को कटवाकर एलोरा के विशाल कैलाश-मन्दिर का निर्माण करवाया जो कला की एक अद्भुत कृति है।

राष्ट्रकूट शासकों ने साहित्य को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। उन्होंने शिक्षण संस्थाओं के लिए प्रचुर मात्रा में दान दिया। उन्होंने कवियों और साहित्यकारों को अपने दरबार में राजाश्रय प्रदान किया। अमोघवर्ष ने काव्यशास्त्र पर कविराज मार्ग नामक पुस्तक की रचना की। उसके शासन-काल में शाक्तायन ने अमोघवृति की रचना की। पोन्ना ने शान्ति पुराण लिखा। पम्पा ने कृष्ण तृतीय के शासन-काल में भारत की रचना की। इस प्रकार राष्ट्रकूट काल में साहित्य के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई।

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