जनमत Public Opinion

जैसाकि जनमत शब्द से ही स्पष्ट है कि यह दो शब्दों जन और मत के योग से बना है। जन का अर्थ संयुक्त हित वाले लोगों की समष्टि है। मत मौखिक रूप से अभिव्यक्त मनोभाव है जो किसी हित अथवा महत्वपूर्ण विषय पर व्यक्तियों अथवा समूहों के मनोभाव की झलक दर्शाता है। जनमत शब्द का प्रयोग प्रायः लोगों के उन विचारों के योग एवं समूह को दर्शाने के लिए किया जाता है जो वे अपने समुदाय के हितों को प्रभावित करने विषयों के संबंध में व्यक्त करते हैं। अतः यह माना गया है कि जनमत सभी प्रकार के विरोधी विचारों, विश्वासों, भ्रमों, पूर्वाग्रहों तथा आकांक्षाओं का संचय है।

जनमत की मान्यताएं

  • जनता वाद-विवाद एवं विचार-विमर्श के माध्यम से विवेकपूर्ण निर्णयों पर पहुंचती है।
  • जनता विषयों के बारे में बेहतर जानती है।
  • नागरिक सरकार के कार्यों में रुचि रखते हैं।
  • जनता चिंतन-मनन के पश्चात् चुनावों में या अन्यत्र अपनी इच्छा को व्यक्त करती है।
  • जनता की इच्छा अथवा कम-से-कम सामान्य इच्छा को कानून में बदला जाएगा।
  • निरंतर चौकसी और आलोचना जागरूक जनमत बनाए रखने को सुनिश्चित करेगी जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक नैतिकता एवं न्याय के सिद्धांत पर जन नीति बनेगी।

व्यक्ति के विचार उस चर्चा और बहस के आधार पर बनते हैं जो वह अपने निकट के लोगों जैसे- परिवार, पड़ोस, स्कूल, कॉलेज, मित्र समूह, हित समूह, क्लबों अथवा संस्थाओं में करता है। ये मनोवृतियां, विषय और उसकी महत्ता के आधार पर मत अथवा विश्वास का रूप ले सकती हैं। राजनीतिक दल भी जनमत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दल विभिन्न मुद्दों पर सभाएं, विरोध प्रदर्शन एवं हड़ताल इत्यादि करते हैं जिस कारण मुद्दों पर जनव्यापी बहस छिड़ जाती है, परिणामस्वरूप जनमत का निर्माण होता है। वर्तमान में कई बार जनसंचार माध्यमों से प्राप्त जानकारी भी जनमत का आधार बनती है। आज इंटरनेट, रेडियो, टेलिविजन एवं पत्र-पत्रिकाओं के युग में जानकारी का विपुल प्रवाह हो रहा है। यह जानकारी जनमत की आकृति एवं पुनराकृति प्रदान करती है। कई बार जनसंचार के साधनों अथवा विशेषज्ञों के प्रभाव से जनता किसी नीति का समर्थन अथवा विरोध, बिना जाने करती है कि वह जनसाधारण के हितों के विरुद्ध भी हो सकता है।

वस्तुतः कुछ विचारकों का मत है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के सफल संचालन के लिए आवश्यक तीन तत्वों में से जनमत एक है और अन्य दो हैं- सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार एवं प्रतिनिध्यात्मक संस्थाएं। व्यवस्क मताधिकार लोकतांत्रिक सहभागिता की नींव है; प्रतिनिध्यात्मक संस्थाएं लोकतांत्रिक नियुक्तियों और जनमत लोकतांत्रिक संवाद को सुनिश्चित करते हैं। जनमत को नागरिकों की सामान्य अभिव्यक्ति समझे जाने के कारण सरकार के लिए भी उसे पूर्णतया नकार देना अत्यंत कठिन होता है।

भूमंडलीकरण के युग में सरकारें केवल जनमत से ही नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय जनमत के प्रति भी सजग रहती हैं। गैर-राजनीतिक संस्थाओं, अंतरराष्ट्रीय जनमत औरराष्ट्रीय सीमाओं से पार मानवाधिकार की सुरक्षा एवं विस्तार, पर्यावरण, नाभिकीय, आणविक हथियारों की होड़ का विरोध, जातिगत भेदभाव, बल मजदूरी पर प्रतिबंध, लिंग आधारित न्याय के विस्तार जैसे आन्दोलनों के समक्ष सरकार को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के समक्ष उत्तरदायी होना पड़ता है। इसलिए सरकार अंतरराष्ट्रीय जनमत के प्रति चिंतित रहती है। भारत के संदर्भ में सरकार को अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संस्थाओं- एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच व अन्य संस्थाओं को मानवाधिकार उल्लंघना, सांप्रदायिक हिंसा और जातीय अत्याचार मुद्दों पर जवाब देने पड़ते हैं। इस प्रकार सरकारों को आंतरिक और बाह्य जनमत के तीव्र दबाव में होने के कारण अपनी नीतियां और निर्णय निर्धारित करते समय जनमत का ध्यान रखना पड़ता है।

जनमत को जानने का सबसे प्रभावी, सरल एवं स्वीकृत माध्यम प्रेस एवं मीडिया है। मीडिया सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों को उनके बल और कमजोरियों के साथ उजागर करता है। हालांकि मीडिया की जनमत के नाम पर सरकार को प्रभावित करने के लिए अपने पक्ष, पूर्वाग्रह, निष्ठा, आदर्शों और हितों के अनुरूप आंकड़े तथा घटनाएं चुनने एवं दर्शाने के लिए निंदा भी होती रही है। वस्तुतः भारत में मीडिया पर अधिकतर बड़े व्यापारिक घरानों तथा उद्योगपतियों का नियंत्रण है। लेकिन यह सत्य है कि वर्तमान में मीडिया की व्यापक पहुंच, एवं उसके बीच बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा ने विभिन्न विचारों एवं दृष्टिकोणों को अपेक्षतयाः अधिक व्यापक धरातल मुहैया कराया है।

जनमत संग्रहण लोगों की राय एकत्रित करने का एक महत्वपूर्ण ढंग बन गया है। यह राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी रणनीति बनाने, कार्यक्रम समायोजित करने तथा चुनाव के दौरान आवश्यक गठबंधन करने में सहायता करता है। यह सरकार को उसकी नीतियों एवं शासन के प्रति लोगों के संतोष या असंतोष की जानकारी भी देता है। जनमत संग्रह एवं सर्वेक्षण लोकप्रिय हो रहे हैं तथा सरकार, राजनितिक दल, मीडिया एवं शोधकर्ता, जनमत को समझने एवं विश्लेषण करने के लिए इसका प्रयोग एक उपयोगी साधन के रूप में कर रहे हैं।


भारत में जहां अधिकांश जनसंख्या गांवों में व्याप्त अशिक्षा, गरीबी, जाति और समुदाय के आधार पर विभाजित है तथा प्रभावशाली लोगों के नियंत्रण में रहती है,वहां जनमत का स्वच्छ एवं निष्पक्ष निर्माण मुश्किल हो जाता है। बहुधा जनमत लोगों की वास्तविक इच्छा जानने के बजाय, शासकीय वर्ग के हितों को सही ठहराने का जरिया बन जाता है। लोगों को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर, शिक्षा के प्रसार, मीडिया के आगमन एवं विकास योजनाओं द्वारा ग्रामीण-शहरी अंतर को कम कर जनमत भारतीय गणतांत्रिक एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अधिक प्रभावी, महत्वपूर्ण, सकारात्मक एवं चमत्कारी भूमिका निभा सकता है।

सिटीजन चार्टर

देश की सम्पूर्ण शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी प्रशासन के ऊपर होती है, जनता प्रशासन से यह उम्मीद करती है कि प्रशासन तंत्र एक सुशासन की स्थापना करे। सुशासन का तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है जिसमें प्रशासन तंत्र नागरिकों की सेवा विधि के अनुसार पारदर्शी एवं निष्पक्षतापूर्ण तरीके से निभाएं अर्थात् लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना की सार्थकता को सिद्ध करने का प्रयत्न करे, क्योंकि प्रशासन स्वयं में अंतिम नहीं है, अपितु प्रशासन जनता की सेवा के लिए है। संगठन के निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक भ्रष्टाचार व्याप्त है। छोटे से लेकर बड़े अधिकारी किसी भी काम के एवज में अलग से धन उगाही करते हैं। ऐसे में इस भ्रष्ट शासन तंत्र को अच्छे शासन तंत्र में बदलने के लिए तथा समाज में सुशासन की अवधारणा को सुनिश्चित करने के लिए नागरिक अधिकार-पत्र या सिटीजन चार्टर को एक प्रभावशाली विधि माना जाता है। विश्वभर में प्रशासनिक तंत्र की जनता के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए विगत् दो दशक में तीव्रता से प्रयास हुए हैं। सन् 1991 में सर्वप्रथम ब्रिटेन में नागरिक अधिकार पत्रों की शुरुआत हुई। इन नागरिक अधिकार पत्रों में प्रशासनिक कार्यालय या संगठन द्वारा उन नियमों, कानून, प्रक्रियाओं तथा अधिकारों का वर्णन होता है जो जनता या उपभोक्ताओं के हितों के संवर्द्धन के लिए होते हैं। इन अधिकार पत्रों द्वारा जनता को जागरूक तथा चेतनाशील बनाने के अतिरिक्त-प्रशासनिक पारदर्शिता भी सुनिश्चित की जाती है। मुख्यतः जनसाधारण की शिकायतों के निवारण की ओर गम्भीरतापूर्वक ध्यान दिया जाता है।

नब्बे के दशक में भारत में नागरिक अधिकार पत्रों की मांग बहुत-से उपभोक्ता संगठनों ने भी उठायी। सन् 1996 में नई दिल्ली में आयोजित राज्यों में मुख्य सचिवों के सम्मेलन में प्रभावी एवं उत्तरदायी प्रशासन के लिए गंभीरता से विचार-विमर्श हुआ। एक वर्ष पश्चात् 24 मई, 1997 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल की अध्यक्षता में प्रभावी एवं उत्तरदायी प्रशासन विषय पर मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में नौसूत्री कार्य योजना बनाई गई जिसमें निम्नांकित बिंदु सम्मिलित किए गए-

  • नागरिकों के लिए अधिकार पत्र तथा जवाबदेय प्रशासन।
  • प्रभावी एवं त्वरित लोक शिकायत निवारण।
  • ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय निकायों को अधिक अधिकार।
  • प्रवर्तित कानूनों और प्रक्रियाओं की समीक्षा तथा सरलीकरण।
  • प्रशासन में पारदर्शिता।
  • सरकारी कार्यालयों से सूचना प्राप्त करने का अधिकार।
  • लोक सेवकों के लिए आचार संहिता।
  • भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कर्मचारियों के कार्यकाल में स्थायित्व, तथा
  • सेवाओं का विकेंद्रीकरण।

इस निर्णय के पश्चात् भारत सरकार के अनेक मंत्रालयों तथा संगठनों ने नागरिक अधिकार पत्र निर्मित किए तथा आम जनता के लिए जारी किए गए। इसमें तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, पासपोर्ट संभाग, विदेश मंत्रालय, औद्योगिक नीति संवर्द्धन विभाग, सार्वजानिक वितरण विभाग, भारतीय जीवन बीमा निगम, साधारण बीमा निगम, दिल्ली विकास प्राधिकार, डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल, दिल्ली तथा सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकांश बैंक अग्रणी संस्थाओं के रूप में सम्मिलित हैं। राजस्थान में भी सन् 1998 में सार्वजनिक वितरण विभाग तथा राजस्व विभाग, पुलिस विभाग सहित अन्य विभागों ने भी नागरिक अधिकार पत्र घोषित कर प्रशासनिक सुधारों को आगे बढ़ाया है। इनके अतिरिक्त मध्य प्रदेश ने वर्ष 2010 में अपने यहां सिटीजन चार्टर लागू किया तथा यह भारत का सिटीजन चार्टर लागू करने वाला पहला राज्य बन गया। दिल्ली में 15 सितम्बर, 2011 को कुछ विभागों में सिटीजन चार्टर लागू किया गया है।

मध्य प्रदेश के पश्चात् बिहार एवं पंजाब में भी यह कानून लागू किया जा चुका है। बिहार में आम लोगों को निर्धारित समय सीमा के भीतर कुछ चुनी हुई लोक सेवाएं उपलब्ध कराने वाला कानून 15 अगस्त, 2011 से लागू किया गया। यह कानून बिहार लोक सेवाओं का अधिकार अधिनियम, 2011 के नाम से जाना जाएगा। इसके अंतर्गत राज्य सरकार ने फिलहाल 10 विभागों से जुड़ी 50 सेवाएं सूचीबद्ध की हैं। इनमें राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और जमीन जायदाद के दस्तावेज दिए जाने के अतिरिक्त आवास, जाति, चरित्र और आमदनी से सम्बंधित प्रमाणपत्र दिए जाने जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं। इस अधिनियम का सबसे खास प्रावधान यह है कि तय की गई अवधि में आवेदकों को लोक सेवाएं उपलब्ध नहीं करा सकने वाले सरकारी कर्मचारी या अधिकारी दडित होंगे।

मध्य प्रदेश में सेवा के अधिकार कानून के अंतर्गत 19 सेवाओं को रखा गया है। ज्ञातव्य है कि मध्य प्रदेश सेवा का अधिकार कानून लागू करने वाला पहला राज्य है। दंड के रूप में कर्मचारी/अधिकारी के लिए आर्थिक भुगतान की सीमा जहां 100 रुपए से 5000 रुपए तक हो सकती है। मध्य प्रदेश के अतिरिक्त पंजाब, दिल्ली, झारखंड, केरल, उत्तराखंड इत्यादि राज्यों में भी इस दिशा में पहल की जा चुकी है।

राज्यों के तहत् राइट टू सर्विस की दिशा में पहल
मध्य प्रदेशलोक सेवा प्रदायन की गारंटी अधिनियम, 2010
बिहारराइट टू सर्विस अधिनियम, 2011
पंजाबराइट टू पब्लिक सर्विस अधिनियम, 2011
उत्तराखंडउत्तराखंड राइट टू सर्विस अधिनियम, 2011
झारखंडराइट टू सर्विस अधिनियम, 2011
हिमाचल प्रदेशपब्लिक सर्विस गारंटी अधिनियम, 2011
राजस्थानपब्लिक सर्विस गारंटी अधिनियम, 2011
उत्तर प्रदेशराइट टू सर्विस अधिनियम, 2011
केरलपब्लिक सर्विस एश्योरेंस अधिनियम, 2011
छत्तीसगढ़लोक सेवा गारंटी अधिनियम, 2011
केंद्र सरकारद सिटीजन्स राइट टू ग्रिवान्स रिड्रेसल बिल-2011

सेवा के अधिकार को भारतीय संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अन्दर व्याख्यापित किया है जहाँ राज्य के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में समान एवं उचित न्याय दिलाने के लिए राज्य को कई दिशा-निर्देश दिए गए हैं। यद्यपि संविधान में उल्लिखित नीति निर्देशक तत्व न्यायालय में वाद योग्य नहीं हैं परंतु फिर भी यह राज्य पर एक प्रकार के नैतिक दबाव का कार्य करता है ताकि देश के नागरिकों को समानता और सामाजिक न्याय दिलाकर उनकी न्यूनतम आवश्यकताओं को सुनिश्चित किया जा सके। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय सुनिश्चित कराने की बात कही गई है। नीति-निर्देशक तत्वों में तो उन दिशा-निर्देशों का उल्लेख भी किया गया है जिससे वैसा वातावरण तैयार हो जिसमें देश के नागरिक अपने मूल अधिकारों का बिना किसी अड़चन एवं भय के उपयोग कर सकें। सेवा के अधिकार से संबंधित नीति-निर्देशक तत्वों की मूल भावना को देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य विवाद 1992 के संदर्भ में व्याख्यायित किया गया था।

इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए 20 दिसंबर, 2011 को लोक सभा में सिटीजन चार्टर बिल पेश किया गया। जैसाकि नाम से ही जाहिर है कि इसके लागू हो जाने पर आम आदमी का काम निश्चित समय में पूरा होने की गारंटी दी जाएगी। ज्ञातव्य है कि समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी जन लोकपाल बिल से संबंधित आंदोलन के अंतर्गत तीन अहम शर्ते रखी गई थीं-

  1. निचली ब्यूरोक्रेसी को लोकपाल के दायरे में लाना
  2. राज्यों में भी लोकपाल की तर्ज पर लोकायुक्त
  3. नागरिक घोषणापत्र के अंतर्गत जनता के सारे कार्य नियत समय सीमा में हों।

सिटीजन चार्टर के बिल के अंतर्गत यह प्रावधान है की भ्रष्टाचार संबंधी मामला नहीं होने पर भी कोई नागरिक किसी सरकारी कर्मचारी/अधिकारी के विरुद्ध शिकायत इस आधार पर कर सकता है कि संबंधित विभाग के कर्मचारी द्वारा उसके किसी कार्य की अनदेखी की गई है, उसे उचित प्रत्युत्तर नहीं दिया गया है तथा समय सीमा के अंतर्गत उसकी शिकायतों का निवारण नहीं किया गया। शिकायत की जांच हो जाने के पश्चात् उस कर्मचारी पर 50,000 रुपए तक का जुर्माना किया जा सकता है यदि उसने 30 दिनों के भीतर शिकायत का निपटारा नहीं किया हो।

सेवा का अधिकार सुनिश्चित कराने के लिए सिटीजन चार्टर बिल के अंतर्गत प्रत्येक कर्मचारी/अधिकारी के कर्तव्यों की एक सूची तैयार की जाएगी। यह सरकार के प्रत्येक विभाग तथा अधिकारी के लिए तैयार किया जाएगा जिसे दफ्तर के बाहर सूचना पट्ट पर रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त सरकार इस सूची तथा इससे संबंधित कर्तव्यों को मीडिया एवं इंटरनेट के सहारे भी आम जनता के लिए सर्कुलेट करेगी। सिटीजन चार्टर में उन अधिकारियों/कर्मचारियों का नाम स्पष्ट रूप से दिया जाएगा जिन्हें तय समय सीमा के भीतर कार्य/शिकायत का निपटान करना है। इससे जनता को यह स्पष्ट रूप से पता होगा कि किस अधिकारी द्वारा उन्हें अपने कार्यों का निपटान करवाना है और ऐसा न होने पर वे उस अधिकारी/कर्मचारी विशेष के विरुद्ध शिकायत दर्ज करा सकेंगे।

राज्य ग्रिवान्स रिड्रेसल आयोग

राज्य शिकायत निपटान आयोग एक 11 सदस्यों वाली एक इकाई होगी जिसमें एक मुख्य आयुक्त तथा 10 अन्य आयुक्त होंगे। मुख्य शिकायत निपटान आयुक्त का दर्जा राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त के समकक्ष होगा। राज्य शिकायत निपटान आयोग के सदस्यों का चुनाव एक समिति द्वारा किया जाएगा जिसमें मुख्यमंत्री, विधानसभा में विरोधी दल का नेता, उच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश होगा। राज्य शिकायत निपटान आयोग का मुख्य आयुक्त वही होगा जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या दस वर्षों तक जिला न्यायाधीश रह चुका हो या फिर राज्य सरकार में सचिव के पद पर रह चुका हो। पदावधि पांच वर्ष या 65 वर्ष की आयु पूरा करने तक रहेगी। केंद्र स्तर पर भी इसी प्रकार का एक शिकायत निपटान आयोग होगा जहां केंद्र सरकार से संबंधित विभाग के किसी कर्मचारी के विरुद्ध की गई शिकायत का निपटान दी गई प्रविधि के अनुसार किया जाएगा।

यह एक सराहनीय पहल है तथा अन्य राज्यों के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाएगी। यदि पूरे भारत में सिटीजन चार्टर लागू होता है तो उसकी प्रशासन में निम्नलिखित भूमिका होगी-

  • वर्तमान में देश का एक बड़ा वर्ग लोक सेवाओं के खराब कार्य निष्पादन से अत्यधिक आहत है। नौकरशाही द्वारा कार्य में विलम्ब किया जाना तथा कार्य शीघ्र कराने के लिए सुविधा शुल्क की मांग करने से जनता में अत्यधिक असंतोष व्याप्त है, जिसकी परिणति आांदोलन के रूप में देखने को मिली है। समाज लोक सेवकों को अपनी प्रगति में अवरोधक मानता है। समाज की इस विचारधारा की लोक सेवकों, राजनेताओं तथा अपराधियों के खतरनाक त्रिगुट ने बल दिया है। ऐसे में सिटीजन चार्टर प्रशासन की बिगड़ी छवि को सुधारने का एक मूल्यवान एवं प्रभावी अवसर होगा।
  • भारत एक लोकतांत्रिक देश है तथा लोकतंत्र की सफलता के लिए नौकरशाही का उत्तरदायी, पारदर्शी तथा वचनबद्ध होना आवश्यक है। कौन-सा कार्य कब, कैसे, किस तरह से किया जाए इसके लिए नौकरशाही के पास पर्याप्त तर्क होने चाहिए अर्थात् काम के औचित्य को साबित करने के लिए नौकरशाही को सदैव तैयार रहना चाहिए। ऐसे में सिटीजन चार्टर प्रशासनिक उत्तरदायित्व निभाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
  • पारदर्शी प्रशासन तभी सम्भव है जब कार्य से संबंधित सूचना तक व्यक्ति की पहुंच संभव हो। यदि जनता को प्रशासन के करीब लाना है, तो इसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लानी होगी। सिटीजन चार्टर में प्रशासनिक कार्यो तथा प्रक्रियाओं का उल्लेख करके पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है।
  • सिटीजन चार्टर लागू होने से नागरिक स्वयं अपनी आवश्यकताओं का निर्धारण, नियोजन एवंसेवाओं के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इससे जन सहभागिता सुनिश्चित हो सकेगी।
  • सिटीजन चार्टर सेवाओं के स्तर तथा गुणवत्ता को तो प्रभावित करता ही है साथ ही यह सफल लोकतांत्रिक पद्धति का प्रतीक भी है। अतः भारत के संदर्भ में इस ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

इस प्रकार नागरिक अधिकार पत्रों की व्यवहारिक सफलता के लिए आवश्यक है कि कर्मचारियों तथा अधिकारियों में लोकहित की भावना का विकास किया जाए तथा इसके अनुकूल वातावरण तैयार किया जाए। वस्तुतः सूचनाओं को देना तथा कार्यों का निष्पादन करना प्रशासनिक तंत्र का कर्तव्य है और सेवाओं का उपयोग करना जनता का अधिकार है। जब प्रशासन तंत्र इस अवधारणा को आत्मसात् करेगा तभी अच्छे शासन की परिकल्पना की साकार करने में सिटीजन चार्टर मददगार हो सकेगा।

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