प्रान्तीय राजवंश: जौनपुर Provincial Dynasty: Jaunpur

जिस वक्त दिल्ली सल्तनत के सुल्तान देश के अधिकांश भाग पर शासन कर रहे थे उस समय भी कई स्वतंत्र राज्य देश के विभिन्न हिस्सों में विद्यमान थे। दिल्ली सल्तनत के कमजोर होने से कई दूसरे राज्य भी अस्तित्व में आ गए।

जौनपुर

जौनपुर की स्थापना तुगलक वंश के फीरोज ने अपने चचेरे भाई एवं संरक्षक मुहम्मद जौन की स्मृति चिरस्थायी करने के लिए की थी। तैमूर के आक्रमण के बाद की फैली हुई गड़बड़ी के युग में ख्वाजा जहाँ ने दिल्ली सल्तनत की अधीनता त्यागकर, अपनी उपाधि मलिक-उश्-शर्क के नाम पर, जौनपुर में शर्की वंश नामक स्वतंत्र शासकों का एक वंश स्थापित किया था। 1399 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके दत्तक पुत्र मलिक करनफूल को उसकी गद्दी मिली जिसने मुबारक शाह शकीं की उपाधि धारण की। अल्पकालीन शासन के बाद 1402 ई. में मुबारक शाह की मृत्यु हो गयी। उसका अनुज इब्राहिम शाह शर्की उसका उत्तराधिकारी बना। इब्राहिम ने लगभग चौंतीस वर्षों तक राज्य किया। वह शर्की वंश का सबसे योग्य शासक था। वह स्वयं सुसंस्कृत व्यक्ति था तथा कला एवं साहित्य को आश्रय देता था। फलस्वरूप जौनपुर मुस्लिम विद्या का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। सुन्दर भवनों का निर्माण कर, जिन पर हिन्दू प्रभाव स्पष्ट था तथा साधारण ढंग की मीनारों से रहित मस्जिदें बनवाकर इस नगर को अलंकृत किया गया। प्रसिद्ध अटाला मस्जिद, जो अब जौनपुर शैली की शिल्पविद्या के देदीप्यमान नमूने के रूप में खड़ी है, 1408 ई. में पूरी हुई। 1436 ई. में इब्राहिम की मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका पुत्र महमूद शाह आया। नये राजा ने चुनार जिले के अधिकांश भाग को अपने राज्य में मिला लिया, पर कालपी के विरुद्ध उसका आक्रमण असफल सिद्ध हुआ। दिल्ली पर अधिकार करने का प्रयत्न करने पर वह बहलोल लोदी द्वारा पराजित हुआ। बहलोल लोदी ने उसे जौनपुर लौटने को विवश किया। 1457 ई. में महमूद की मृत्यु हो गयी। तब उसका पुत्र भीखन, मुहम्मद शाह के नाम से, सिंहासन पर बैठा। पर इस राजा के सिद्धांतशून्य आचरण से सरदार एवं उसके अपने सम्बन्धी बहुत चिढ़ गये तथा उसकी हत्या करवा कर उसके भाई हुसैनशाह को गद्दी पर बैठाया।

सिंहासन पर बैठने के शीघ्र बाद हुसैनशाह ने 1458 ई. में दिल्ली के बहलोल लोदी के साथ एक चतुर्वर्षीय विराम-संधि की। इस समय का उपयोग उसने तिरहुत के स्वतंत्र जमींदारों का शमन करने तथा उड़ीसा पर एक लूटपूर्ण आक्रमण करने में किया। उड़ीसा के राजा ने एक विशाल धनराशि देकर उससे छुट्टी पायी। 1466 ई. में ग्वालियर का दुर्ग भी विजय करने को वह एक सेना लेकर गया, पर इसे अधीन नहीं कर सका और जब इसके राजा मान सिंह ने उसे भारी हर्जाना दिया, तब वह लौट गया। इन प्रारम्भिक सफलताओं के पश्चात् जब हुसैनशाह ने बहलोल लोदी के साथ अपना युद्ध फिर से जारी किया, तब भाग्य उसके विरुद्ध हो गया। बहलोल लोदी ने उसे बिहार भगा कर जौनपुर के राज्य को दिल्ली में मिला लिया। बहलोल ने अपने पुत्र बरबक को जौनपुर का शासक नियुक्त किया तथा उसे राजकीय उपाधि का व्यवहार करने और सिक्के ढालने की अनुमति दे दी। इस प्रकार जौनपुर की स्वतंत्रता का अन्त हो गया। जौनपुर के लगभग पचासी वर्षों के शर्की शासनकाल की विशेषातएँ थीं- समृद्धि, शिल्पकला का विकास तथा एक उच्च श्रेणी की संस्कृति का प्रस्फुटन, जिससे उस नगर को इब्राहिम के राज्यकाल में भारत का शीराज की उपाधि प्राप्त हुई।

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