प्रान्तीय राजवंश: बंगाल Provincial Dynasty: Bengal

बंगाल

बंगाल पर दिल्ली के सुल्तानों का अधिकार सदैव अनिश्चित रहा तथा यह सर्वप्रथम स्वतंत्रता स्थापित करने वाले राज्यों में एक था। दिल्ली से इसकी दूरी एवं इसकी अत्याधिक सम्पत्ति से प्राय: इसके शासकों को केन्द्रीय शक्ति के विरुद्ध विद्रोह करने का लोभ हो जाता था, जिसके कारण, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, इल्तुतमिश एवं बलबन को बहुत कष्ट रहा। दिल्ली सरकार का अधिकार फिर ग्यासुद्दीन तुगलक के समय में स्थापित हुआ। ग्यासुद्दीन तुगलक ने ग्यासुद्दीन बहादुर शाह को पराजित कर प्रान्त को तीन स्वतंत्र प्रशासनिक विभागों में बाँट दिया, जिनकी राजधानियाँ क्रमश: लखनौती, सातगाँव एवं सोनार गाँव में हुई। राजसिंहासन पर बैठते ही मुहम्मद बिन तुगलक ने कद्र खाँ को लखनौती की सरकार और हज्जुद्दीन आजूमुलमुल्क को सातगाँव की सरकार में नियुक्त किया तथा ग्यासुद्दीन बहादुर शाह को सोनारगाँव की सरकार में फिर से बहाल किया, किन्तु अपने दूध-भाई (धात्री-पुत्र) तारतार खाँ को, जो बहराम खाँ के नाम से अधिक प्रसिद्ध है, उसके संग कर दिया। पर बंगाल के इस विभाजन से उस प्रांत के पुराने रोग दूर नहीं हुए। ग्यासुद्दीन बहादुर ने शीघ्र विद्रोह कर दिया तथा सोनारगाँव एवं ग्यासपुर की टकसालों से सिक्के निकाले। पर वह शीघ्र परास्त होकर मार डाला गया और बहराम खाँ सोनारगाँ, सात गाँव तथा अस्थायी रूप से लखनौती का अकेला शासक बना। 1336 ई. में बहराम खाँ की मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसके सिलाहबरदार या सिलाहदार (कवच ले जाने वाले) फखरुद्दीन ने फौरन अपने को फखरुद्दीन मुबारक शाह के नाम से सोनारगाँव का शासक घोषित कर दिया। शीघ्र ही अलाउद्दीन अली शाह (1339-1345 ई.) उत्तर बंगाल में स्वतंत्र हो गया तथा अपनी राजधानी को लखनौती से हटाकर पाण्डुआ ले गया। फखरुद्दीन के सिक्के उत्तमकोटि के थे। इनका वर्णन सिक्का गढ़ने की कला के वास्तविक रत्नों के रूप में किया गया है और इनसे सोनारगाँव के कलाकारों की निपुणता के बारे में पता चलता है। इनका आकार नियमित है, इन पर खुदे अक्षर आश्चर्यजनक ढंग से स्पष्ट एवं सुडौल हैं और इनके चारों ओर परिष्कृत रुचि की छाप है। कुछ सिक्कों के प्रमाण पर यह दृढ़तापूर्वक स्वीकार किया गया है कि दस वर्षों के लगातार शासन के बाद फखरुद्दीन मुबारक शाह की स्वाभाविक मृत्यु हो गयी। उसके बाद सोनार गाँव की गद्दी पर इख्तियारुद्दीन गाजी शाह बैठा, जो संभवत: उसका पुत्र था।

अन्त में अलाउद्दीन अलीशाह का दूध-भाई (धात्रीपुत्र) हाजी इलियास 1345 ई. के लगभग, शम्सुद्दीन इलियास शाह के नाम से, सम्पूर्ण बंगाल प्रान्त का स्वतंत्र शासक बन बैठा। सिंहासन पर बैठने के शीघ्र बाद उसने विभिन्न दिशाओं में अपनी शक्ति बढ़ायी। उसने 1350 ई. में नेपाल पर भी आक्रमण किया और वहाँ के अनेक नगर नष्ट किये। ऐसा प्रतीत होता है कि 1352 ई. में सोनारगाँव के पूर्वीय राज्य को मिला लेने के बाद, उसने उड़ीसा एवं तिरहुत के राज्यों से कर वसूल किया तथा बनारस तक बढ़ गया। उसने कामरूप के भागों को भी अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार उसके काम दिल्ली के लिए उसकी पूर्वी सीमा पर संकटजनक सिद्ध हुए। उसी के राज्यकाल तुगलक वंश के फीरोज ने खोये हुए बंगाल प्रान्त को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न किया, जो अन्त में निष्फल सिद्ध हुआ। 1357 ई. में पाण्डुआ में इलियास की मृत्यु हो गयी। उसके राज्यकाल में शान्ति एवं समृद्धि थी, जो राष्ट्रीय एवं विशिष्ट सिक्कों के उद्घाटन तथा शान्ति की कलाओं-विशेषत: वास्तुविद्या में रुचि के विकास से प्रमाणित होता है।

इलियास का पुत्र सिकंदर शः उसका उत्तराधिकारी बना। उसके राज्यकाल के आरम्भ में ही दिल्ली के सुल्तान ने बंगाल को पुनः प्राप्त करने के लिए दूसरी बार प्रयत्न किया, पर उसे नीरस होकर लौटना पड़ा। लहभग 33 वर्षों के सफल शासन के बाद सिकंदर की मृत्यु अपने पुत्र गयासुद्दीन आजम से लड़ते हुए पाण्डुआ के निकट गोपालपाड़ा नामक स्थान पर संभवतः अक्टूबर, 1930 में हो गई। उसके राज्यकाल की समृद्धि पाण्डुआ में उसके शानदार मस्जिद (आदीनी मस्जिद) के निर्माण करने तथा उसके सिक्कों की आकृति, उसकी संख्या, प्रकार से प्रमाणित होती है। अगले शासक ग्यासुद्दीन आज़म का प्रसिद्ध कवि हाफिज से पत्र-व्यवहार चलता था। वह एक योग्य राजा था। कानून और मुस्लिम संतों के लिए वह अत्यन्त उदार था। 1405, 1408 और 1409 ई. में उसने चीन के मिंगवंश के सम्राट् चुंग ली के पास उपहार के साथ दूत-मण्डल भेजे। चीनी सम्राट् ने भी बदले में उसके पास दूत-मण्डल और उपहार भेजे। लगभग 20 वर्षों के राज्यकाल के बाद 1410-11 ई. में ग्यासुद्दीन आजमशाह की मृत्यु हो गयी। उसका पुत्र सैफुद्दीन हमजाशाह उसका उत्तराधिकारी हुआ। किन्तु लगभग इसी समय कुछ असफल सैनिक अभियानों के परिणामस्वरूप इलियासशाही शासन की निरन्तर बढ़ती कमजोरी का लाभ उठाकर उत्तर बंगाल के भाटरिया का हिन्दू जमीन्दार और बंगाल के इलियासशाही शासकों का एक प्रभावशाली अफसर राजा गणेश (फारसी पाण्डुलिपियों में जिसे भूल से कंस पढ़ा गया है) अपनी शक्ति बढ़ाने लगा। तत्कालीन कठपुतले शासकों के राज्यकाल में उसने अपने को वस्तुतः निरंकुश शासक बना लिया। उसने दनुज-मर्दनदेव की उपाधि ली। ये कठपुतली शासक थे- नफुद्दीन हमजाशाह जिसने दो या तीन वर्षों तक राज्य किया, शाहाबुद्दीन बायजीद शाह, जो सैफुद्दीन हमजाशाह का दत्तक पुत्र या गुलाम था और जिसका राज्यकाल भी 1412-13 ई. से 1414-15 ई. तक रहा और सैफुद्दीन हजमाशाह का पुत्र एवं उत्तराधिकारी अलाउद्दीन फिरोजशाह जिसने नाम के लिए कुछ महीनों तक ही राज्य किया और जब वह मर गया, जिसने नाम के लिए कुछ महीनों तक ही राय किया और जब वह मर गया, राजा गणेश ने (1415 ई. के प्रारंभ) में बंगाल गद्दी हथिया ली। गणेश के द्वारा राज्य का अपहरण एवं हिन्दू शासन की पुनः स्थापना बंगाल के मुसलमानों के एक दल को पसंद नहीं आयी।

नूर कुतुब आलम के नेतृत्व में इन लोगों ने स्थानीय मुस्लिम धर्माचायों के साथ उसका विरोध किया। नूर कुतुब आलम ने जौनपुर के शासक इब्राहिम शर्की के पास एक अत्यन्त उत्तेजक पत्र लिखा और गणेश के राज्य को खत्म करने के बंगाल पर आक्रमण करने को आमंत्रित किया। बंगाल जाते समय मिथिला होते हुए चला, जहाँ जौनपुर शासन की अधीनता को चुनौती देकर और अपने पिता देवी सिंह को गद्दी से उतारकर शिव सिंह ने अपने को स्वतंत्र शासक बना लिया था। गणेश के मित्र और सहायक शिव सिंह ने जौनपुर की सेना का विरोध किया किन्तु इसकी अधिक संख्यागत शक्ति के द्वारा परास्त कर दिया गया। उसका पिता जौनपुर के सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने पर फिर मिथिला का शासक बना दिया गया। बंगाल में राजा गणेश जौनपुर की विशाल सेना के सामने अधिक दिनों तक टिक नहीं सका और उसे गद्दी छोड़ देनी पड़ी। गद्दी के लालच में उसके पुत्र जदुसेन ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया। सम्भवत: 1415 ई. के अन्त में इब्राहिम शर्की ने जलालुद्दीन नाम से उसे बंगाल का शासक बना दिया। किन्तु बंगाल से इब्राहिम शकीं की वापसी के तुरन्त बाद राजा गणेश ने बंगाल में पुनः प्रभुता प्राप्त कर ली और दनुजमर्दन देव की उपाधि धारण की। 1418 ई. के मध्य तक राजा गणेश ने अपराजेय शक्ति के साथ एक विस्तृत राज्य पर शासन किया जिसमें वस्तुत: सम्पूर्ण बंगाल शामिल था। गणेश ने शुद्धीकरण द्वारा अपने पुत्र को पुन: हिन्दू धर्म में वापस लाने की कोशिश की। किन्तु ऐसा लगता है कि यह शुद्धि हिन्दू समाज को मान्य नहीं हुई और जदुसेन को अपने पिता के अवशिष्ट राज्यकाल में प्रायः जाति-बहिष्कृत व्यक्ति की तरह अपने दिन बिताने पड़े।

गणेश बुद्धिमान और समर्थ शासक था। यह अल्पज्ञात हिन्दू, जिसने बंगाल में उच्चतम शक्ति प्राप्त की और जिसने कुछ काल के लिए इस्लाम के बन्धन तोड़ दिये, अवश्य ही शक्तिशाली और निपुण व्यक्ति रहा होगा। फरिश्ता और कुछ अन्य लेखकों ने भी शासक के रूप में उसके गुणों की प्रशंसा की है। उसने अपने राज्य पर उत्तम रीति से शासन किया और सामान्यतः मुस्लिम प्रजा के प्रति उसका बर्ताव मैत्रीपूर्ण था। लेकिन उसने बेहिसाब बढ़ी हुई एवं अनियंत्रित मुस्लिम धर्म की मठ-व्यवस्था (खानकाह) को अनुशासित करने की कोशिश की।

गणेश 1418 ई. में शांतिपूर्वक मर गया। इसी साल पाण्डुआ और चटगाँव से चण्डी के उपासक महेन्द्र देव नामक राजा द्वारा बंगला-अक्षरांकित सिक्के लाये गये। सम्भवत: वह गणेश का छोटा बेटा था जिसको उसी वर्ष इस्लाम धर्म पुर्नग्रहण कर जलालुद्दीन मुहम्मद नाम से जदुसेन की गद्दी पर आरूढ़ होने के पहले, उसके कुछ पक्षपातियों ने कुछ महीनों के लिए ही गद्दी पर बैठाया था। उसके राज्यकाल में जौनपुर के इब्राहिम शर्की ने 1420 ई. में दूसरी बार बंगाल पर चढ़ाई की।


गणेश के वंश का शासन अधिक समय तक नहीं टिका। जलालुद्दीन मुहम्मद की मृत्यु 1431 ई. में हो गई। उसके बाद उसका पुत्र शम्सुद्दीन अहमद गद्दी पर बैठा, जिसने सम्भवत: 1435-1436 ई. तक राज्य किया। अपने अत्याचार के कारण यह राजा लोगों में अत्यन्त अप्रिय हो गया तथा वह अपनी सरकार के शादी खाँ और नासिर खाँ नामक दो अधिकारियों के द्वारा, अपने विरुद्ध संगठित षड्यंत्र का शिकार बन गया। नासिर खाँ एवं शादी खाँ शीघ्र एक दूसरे के विद्वेषी बन बैठे, क्योंकि दोनों की आंखें बंगाल की गद्दी पर लगी थीं। नासिर खाँ ने अपने प्रतिद्वन्द्वी को मौत के घाट उतार दिया। पर उसे भी कुछ ही दिनों के लिए राज्य करना लिखा था, क्योंकि शम्सुद्दीन अहमद से सम्बन्धित सरदारों ने शीघ्र ही उसकी प्रभुता का विरोध किया तथा उसे मार डाला। तब उन लोगों ने हाजी इलियास के एक पौत्र नसिरुद्दीन को राजसिंहासन पर बैठाया जिसने, जैसा कि उसके सिक्कों से पता चलता है, नसिरुद्दीन अबुल मुजफ्फर महमूद शाह की उपाधि धारण की। इस प्रकार इलियास शाही वंश का शासन पुनः स्थापित हुआ।

जैसा कि कुछ सिक्कों से प्रमाणित होता है, नसिरुद्दीन महमूद ने अनेक वर्षों तक न्यायी और उदार शासक के रूप में राज्य किया। उसे गौड़ में कुछ भवन तथा सातगाँव में एक मस्जिद बनवाने का श्रेय दिया जाता है। 1451 ई. में उसकी मृत्यु होने पर उसका पुत्र रुक्नुद्दीन बरबकशाह बंगाल की गद्दी पर बैठा। फरिश्ता के अनुसार वह हिन्दुस्तान का सर्वप्रथम शासक था जिसके पास अत्याधिक संख्या में अबिसीनियन दास थे जिनमें कुछ को ऊँचे पद मिले। कुछ इतिहासकारों ने एक चतुर और नियमपालक सम्राट् के रूप में उसकी प्रशंसा की है "जिसके राज्य में सैनिक और नागरिक एक समान रूप से संतुष्ट और सुरक्षित थे। 1474 ई. में उसकी मृत्यु हुई। उसके बाद उसका पुत्र शम्सुद्दीन युसुफ़ शाह गद्दी पर बैठा, जिसका वर्णन उसके अभिलेखों में शम्सुद्दीन अबुल मुजफ्फर यूसुफ शाह के रूप में है। वह गुणवान, विद्वान् एवं पुण्यात्मा शासक था। उसने 1481 ई. तक राज्य किया। उसकी मृत्यु के पश्चात् सरदारों ने उसके पुत्र सिकंदर द्वितीय को सिंहासन पर बैठाया। पर नया शासक, दोषयुक्त बुद्धि का पाया जाने के कारण, शीघ्र ही गद्दी से हटा दिया गया तथा नसिरुद्दीन महमूद का पुत्र जलालुद्दीन फतह शाह गद्दी पर बैठाया गया। उसे तीव्र बुद्धि और उदार शासक के रूप में वर्णित किया गया है, जिसने अतीत कायम रखा और जिसके समय में जनता प्रसन्न और सुखी के बढ़ते हुए प्रभाव से जो खतरा था, उसे समझने के लिए फतहशाह के पास पर्याप्त बुद्धि थी। पर इसे रोकने के प्रयत्न का मूल्य उसे अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। असन्तुष्ट अबिसीनियनों ने एक हिजड़े के नेतृत्व में उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र रचा। हिजडे ने फतह शाह को 1486 ई. में मरवा, बरबक शाह सुल्तान शाहजादा की उपाधि धारण कर, बंगाल की गद्दी हड़प ली। पर महीनों के अन्दर ही इन्दील खाँ ने बरबक की हत्या कर दी। इंदील खाँ अबिसीनियन होने पर भी फतह शाह के प्रति वफादार था तथा सिद्ध योग्यता का युद्ध सेनापति था। गद्दी स्वयं लेने के बारे में उसने शिष्ट ढंग से कुछ अनिच्छा जाहिर की। पर फतह शाह की विधवा तथा गौड़ आग्रह करने पर वह सैफुद्दीन फीरोज के नाम से बंगाल की गद्दी पर बैठ गया। यदि रियाज के लेखक पर भरोसा किया जाए, तो उसमें जो एक योग्य शासक एवं सेनापति के रूप में विश्वास किया गया था उसे उसने कार्यों द्वारा सच कर दिखाया। पर वह दान देने में आगे-पीछे का विचार नहीं करता था। 1489 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। तब सरदारों ने सैफुद्दीन फीरोज शाह के एक पुत्र को नासिरुद्दीन महमूद शाह द्वितीय के नाम से राजसिंहासन पर बैठाया। पर 1490 ई. में सादी बदर नामक एक महत्त्वाकांक्षी अबिसीनियन ने इस शासक को मार डाला तथा शम्सुद्दीन अबू नसर मुजफ्फर शाह के नाम से गद्दी हथिया ली। इस अबिसिनियन के तीन वर्षों तथा कुछ महीनों के शासनकाल में अत्याचार तथा अव्यवस्था फैली रही। फलस्वरूप सैनिकों तथा अधिकारियों में अत्याधिक असन्तोष फैल गया। इन असन्तुष्ट अधिकारियों में उसका बुद्धिमान वजीर सैयद हुसैन भी था, जो अरब वंश का था। उन्होंने उसे गौड़ में चार महीनों तक घेर कर रखा, जिस बीच उसकी मृत्यु हो गयी। तब बंगाल के सरदारों ने सैयद हुसैन को अलाउद्दीन हुसैन शाह के नाम से उसके गुण एवं योग्यता की स्वीकृति के रूप में (1493 ई. में) गद्दी पर बैठाया।

अलाउद्दीन हुसैनशाह के राज्यारोहण से एक नये वंश का शासन आरम्भ होता है, जो लगभग आधी सदी तक टिका रहा तथा जिसे विभिन्न उपयोगी कार्य करने का श्रेय प्राप्त है। वह अपनी राजधानी हटाकर एकदला ले गया। हम लोगों को हुसैन शाह के कई अभिलेख प्राप्त हैं। उसके एवं उसके पुत्र नसरत शाह के सिक्के विभिन्न प्रकार के तथा बहुसंख्यक हैं। उसके दो महत्त्वपूर्ण हिन्दू अधिकारी रूप और सनातन थे। हुसैनशाह एक ज्ञानी एवं बुद्धिमान पुरुष था। वह महान् वैष्णव धर्मोपदेशक चैतन्य देव का समकालीन था। वह बंगाल की गद्दी पर बैठने वालों में से अधिक लोकप्रिय शासकों में से था। अपने राज्य के आन्तरिक शासन में पुन: व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से उसने राजमहल के संरक्षकों की शक्ति को दबाया। इन सरंक्षकों ने पूर्वगामी राज्य में रोम के प्रीटोरियन गाडौं के समान स्थान स्थापित कर लिया था। उसने अबिसीनियन को अपने राज्य से निकाल दिया, क्योंकि उनका बढ़ा हुआ प्रभाव राजसिंहासन के लिए एक भयंकर संकट बन गया था। 1494 ई. में उसने जौनपुर के हुसैन शाह शर्की का आदर-सहित स्वागत किया, जो अपने राज्य से दिल्ली के सिकंदर लोदी द्वारा खदेड़ा जाने पर बंगाल की ओर भाग आया था। भगोड़े राजा को कहलगाँव में (बिहार में भागलपुर के निकट) रहने की अनुमति मिली, जहाँ 1500 ई. में उसकी मृत्यु हुई। इस पर शीघ्र ही सिकन्दर लोदी ने बंगाल के नवाब के विरुद्ध कारवाई करने का निश्चय किया और महमूद लोदी तथा मुबारक लोहानी के अधीन 1495 ई. में एक सेना बिहार भेजी। बंगाल के हुसैनशाह ने भी अपने पुत्र दानियाल के अधीन उन्हें रोकने के लिए एक सेना भेजी। प्रतिस्पर्धी सेनाएँ बाढ़ में तब तक आमने-सामने खड़ी रहीं जब तक दोनों प्रतिपक्षियों में संधि न हो गयी। हुसैन शाह ने यह वादा किया कि भविष्य में वह दिल्ली के सुल्तान के शत्रुओं को आश्रय नहीं देगा। अपनी राजधानी के निकट व्यवस्था स्थापित करने के बाद हुसैनशाह ने बंगाल के खोये हुए प्रदेशों को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न किया। उसने अपने राज्य की सीमाओं को दक्षिण में उड़ीसा की सरहद तक बढ़ाया, हालाँकि उड़िया के विरुद्ध सैनिक अभियानों में वह सफल नहीं हो सका, जौनपुर के शर्कियों के अधिकार से मगध को फिर से प्राप्त कर लिया, उत्तर बिहार पर कब्जा कर लिया, आसाम के अहोम राज्य पर आक्रमण किया और 1498 ई. में कूचबिहार के कामतापुर पर अधिकार कर लिया। शीघ्र ही आसाम को इसके पुराने राजा ने पुनः प्राप्त कर लिया। हुसैन शाह ने तिपेरा के एक भूभाग को भी अपने राज्य में मिला लिया और अराकानियों के कब्जे से चटगाँव ले लिया। तब हुसैन शाह अपने राज्य की सीमाओं की सुरक्षा पक्की करने में लग गया। उसने इसके विभिन्न भागों में मस्जिदें एवं खैरातखाने बनवाये और उनके निर्वाह के लिए उचित धन समर्पित किया। 1519 ई. में उसकी मृत्यु हुई। उसके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र नसीब खाँ गद्दी पर बैठा। नसीब खाँ ने नसिरुद्दीन नसरत शाह की उपाधि धारण की। भारत के अन्य बहुत-से मुस्लिम शासकों से भिन्न नसरत शाह अपने भाईयों के प्रति उदार सिद्ध हुआ तथा उसने उनके पैतृक धन को दूना कर दिया। उसने तिरहुत पर आक्रमण किया, इसके राजा कंसनारायण को मार डाला तथा इसके शासन की देखभाल करने के लिए अपने बहनोई अलाउद्दीन एवं माखवमे-आलम को वहाँ रख दिया। मुग़ल-विरोधी संघ संघठित करने की नसरत शाह की कूटनीति सफल सिद्ध नहीं हो सकी और घाघरा नौकाघाट के निकट बाबर और नसरत शाह की सेनाओं में खुला संघर्ष हुआ जिसमें नसरत शाह की सेना अपनी बहादुरी का अच्छा सबूत देने के बाद अन्ततोगत्वा परास्त हो गयी। इसके बाद बाबर और नसरत शाह के बीच 1529 ई. में कुछ शर्तो पर समझौता हो गया। नुसरत शाह कला, वास्तुविद्या तथा साहित्य का आश्रयदाता था। उसने गौड में बड़ा सोना मस्जिद एवं कदम रसूल नामक दो प्रसिद्ध मस्जिदें बनवायीं। उसकी आज्ञा से महाभारत का एक बंगला अनुवाद किया गया। अन्त में उसके राजमहल के हिजड़ों ने 1532 ई. में उसकी हत्या कर दी। उसके बाद उसका पुत्र अलाउद्दीन फीरोज शाह गद्दी पर बैठा। अलाउद्दीन फीरोजू शाह तीन महीने भी शासन न कर पाया कि उसके चाचा ग्यासुद्दीन महमूद शाह ने उसे मार डाला। ग्यासुद्दीन महमूद शाह हुसैन शाही वंश का अन्तिम राजा था, जिसे शेर खाँ सूर ने बंगाल से भगा दिया।

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