दाब Pressure

दाब = बल/क्षेत्रफल अतः दाब का SI मात्रक है : न्यूटन/मीटर2 जिसे, पास्कल कहते हैं। दाब एक अदिश राशि है।

द्रवों में दाब

द्रव के अंदर किसी बिंदु पर द्रव के कारण दाब द्रव की सतह से उस बिंदु की गहराई द्रव के घनत्व तथा गुरुत्वीय त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।

दाब = F = h x d x g

द्रवों के दाब के नियम

  1. स्थिर द्रव में एक ही क्षैतिज तल में स्थित सभी बिंदुओं पर दाब समान होता है।
  2. स्थिर द्रव के भीतर किसी बिंदु पर दाब प्रत्येक दिशा में बराबर होता है।
  3. द्रव के भीतर किसी बिंदु पर दाब स्वतंत्र तल से बिंदु की गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है।
  4. किसी बिंदु पर द्रव का दाब द्रव के घनत्व पर निर्भर करता है।

पास्कल का नियम

पात्रस्थ स्थिर द्रव के किसी भी बिंदु पर दाब लगाने पर सम्पूर्ण द्रव में समान दाब संचारित हो जाता है।

पास्कल के नियम पर आधारित यंत्रः हायड्रॉलिक लिफ्ट, हाइड्रॉलिक जैक, हाइड्रालिक ब्रेक इत्यादि।

\frac { { F }_{ 1 } }{ { A }_{ 1 } } =\frac { { F }_{ 2 } }{ { A }_{ 2 } }

पदार्थ के गुण

द्रव्य क्या है?

प्रत्येक ऐसी वस्तु जो स्थान घेरती है तथा जिसमें भार होता है, द्रव्य कहलाती है, जैसे-जल, लोहा, लकड़ी, वायु, दूध, आदि क्योंकि इनमें से प्रत्येक वस्तु स्थान घेरती है (अर्थात् उसका कुछ आयतन होता है) तथा उसमें भार होता हैं।

द्रव्य चार अवस्थाओं में पाया जाता है: ठोस, द्रव, गैस तथा प्लाज्मा।

  1. ठोस: जैसे, कांच की बोतल, परखनली, कुर्सी, मेज, आदि। इन वस्तुओं का आयतन और आकार निश्चित होता है।
  2. द्रव: जैसे, जल, दूध, आदि। इनका आयतन तो निश्चित होता है परन्तु आकार नहीं।
  3. गैस: जैसे, वायु, ऑक्सीजन, आदि। इनका न तो आयतन निश्चित होता है और न ही आकार।
  4. प्लाज्मा: यह द्रव्य की आयनित अवस्था है, जिसमें घनायन तथा स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन बराबर संख्या में होते हैं। प्लाज्मा प्रायः अन्तरातारकीय स्थान, तारों के वायुमण्डल, विसर्जन नलिका तथा तापीय नाभिकीय रिएक्टर में पाए जाते हैं।

द्रव्य का अणुगति सिद्धांत

द्रव्य अत्यधिक सूक्ष्म कणों से बना होता है, जिन्हें अणु कहते हैं। एक ही द्रव्य के समस्त अणु गुणधर्मों में समान होते हैं, जबकि विभिन्न द्रव्यों के अणु विभिन्न गुणधर्म वाले होते हैं। द्रव्य के अणुओं के बीच मुक्त आकाश होता है, जिसे अन्तरा-अणुक आकाश कहते हैं। द्रव्य के इन अणुओं के बीच परस्पर आकर्षण बल होता है। द्रव्य की भौतिक अवस्था बदलने के साथ-साथ अणुओं के बीच आकर्षण बल घटता-बढ़ता रहता है। ठोस अवस्था में अणु प्रबल आकर्षण बल के कारण एक-दूसरे के अत्यन्त निकट होते हैं। इन अणुओं की स्थानान्तरीय गति लगभग शून्य होती है, जिससे वे अन्तरा-अणुक आकार में कम्पन करते रहते हैं। ये अणु सदैव गतिशील रहते हैं। इन अणुओं की गति की चाल अणुओं के द्रव्यमान और ताप पर निर्भर करती है। ताप बढ़ने से अणुओं की चाल में वृद्धि होती है और अणुओं का द्रव्यमान बढ़ने से उनकी चाल कम हो जाती है। यह द्रव्य का अणु-गति सिद्धांत कहलाता है।

घनत्व तथा आपेक्षिक घनत्व

द्रव्य का घनत्व: उसकी संहति/उसका आयतन द्रव्य का आपेक्षिक घनत्व = द्रव्य का घनत्व/पानी का घनत्व

घनत्व का SI मात्रक किलोग्राम मीटर होता है तथा आपेक्षिक घनत्व केवल एक मात्रकहीन संख्या है।

समताप मंडल में वायुमण्डलीय ताप लगभग एक समान रहता है इसलिए इसे समताप मण्डल कहते हैं।

आयनमण्डल: यह भाग 50 किमी से लगभग 1000 किमी. तक फैला हुआ है। इसमें अधिकांशत: आयनित गैसे होती है। इसमें ताप ऊंचाई के साथ बढ़ता है।

बर्हिमण्डल: लगभग 400 किमी. की ऊंचाई से आगे वाले भाग को बर्हिमण्डल भी कहते है।

विसरण-  यह वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा विभिन्न पदार्थ एक दूसरे में मिश्रित हो जाते हैं, यह क्रिया पदार्थों के परमाणु, अणु या आयनों की अनियमित गति के कारण होती है।

वाष्पीकरण

जब किसी द्रव को खुले पात्र में रखा जाता है तो उसकी खुली सतह से द्रव के अणु धीरे-धीरे वाष्पीकृत होकर वायु में मिल जाते हैं। इस क्रिया को वाष्पीकरण या वाष्पन कहते हैं। द्रव के अणु लगातार इधर-उधर दौड़ते रहते हैं, अर्थात् उनमें गतिज ऊर्जा होती है। खुली सतह पर द्रव के अणुओं की गतिज ऊर्जा अधिक होती है और द्रव के अन्दर के भागों में कम होती है। अत: खुली सतह के निकट के अणु पारस्परिक आकर्षण बल को पार करके द्रव को छोड़कर वायु में चले जाते हैं। यदि अन्तरा-अणुक बल बहुत प्रबल हो तो वाष्पीकरण कम होता है।

किसी द्रव को स्थिर ताप पर वाष्पीकृत होने के लिए जितनी ऊष्मा की आवश्यकता होती है उसे वाष्पीकरण की ऊष्मा या वाष्पन ऊष्मा कहते हैं। जल की वाष्पन ऊष्मा 25 डिग्री सैल्सियस पर 44.180 जूल प्रति मोल होती है, जिसे वह अपने सम्पर्क में स्थित बाह्य माध्यम से अवशोषित करता है।

आर्किमिडीज़ का सिद्धांत

जब कोई वस्तु द्रव में पूरी अथवा आंशिक रूप से डुबोई जाती है तो उसके भार में कमी का आभास होता है। भार में यह आभासी कमी वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होती है।

आभासी भार = वास्तविक भार - उत्पलावन बल

(U) उत्पलावन बल = हटाए गए द्रव का भार

U = डूबा हुआ भाग का

आयतन x घनत्व x g

तैरने के नियम

  1. जब वस्तु द्रव पर तैरती है तो इसका भार इसके द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है।
  2. ठोस का गुरुत्व- केन्द्र तथा हटाए गए द्रव का गुरुत्व-केन्द्र दोनों एक ही उर्ध्वाधर रेखा में होने चाहिए।
  3. लोहे के टुकड़े का भार उसके द्वारा हटाए गए जल के भार से अधिक होता है, जिससे वह जल में डूब जाता है। लोहे के जहाज का ढांचा इस प्रकार बनाया जाता है कि उसके थोड़े से हिस्से द्वारा हटाए गए जल का भार, जहाज तथा उससे लदे समान के भार के बराबर हो जाता है, जिससे जहाज पानी पर तैरने लगता है।

संसंजक बल और आसंजक बल

प्रत्येक पदार्थ अणुओं से मिलकर बना होता है, जिनके बीच आकर्षण बल कार्य करता है। एक ही पदार्थ के अणुओं के मध्य लगने वाले आकर्षण बल को संसंजक बल कहते हैं। ठोसों में संसंजक बल का मान अधिक होता है। अत: उनके अणु दृढ़तापूर्वक बंधे रहते हैं तथा ठोसों का एक निश्चित आकार होता है। द्रवों में संसंजक बल का मान बहुत कम होता है। अत: द्रवों का कोई निश्चित आकार नहीं होता। गैसों में संसंजक बल का मान नगण्य होता है, जिससे उनमें विसरण का गुण पाया जाता है।

दो विभिन्न पदार्थों के अणुओं के मध्य लगने वाले आकर्षण बल को आसंजक बल कहते हैं। आसंजक बल के कारण ही पानी कांच को भिगोता है, ब्लैड बोर्ड पर चॉक से लिखने पर अक्षर उभर आते हैं, पीतल के बर्तनों पर निकल की पॉलिश की जाती है।

जब किसी द्रव-ठोस युग्म के लिए आसंजक बल का मान, द्रव के अणुओं के संयोजक बल के मान से अधिक होता है तो वह ठोस को गीला कर देता है।

उदाहरण

  1. पानी कांच पर चिपकता है क्योंकि पानी और कांच के अणुओं के मध्य लगने वाला आसंजक बल पानी के अणुओं के मध्य संसंजक बल से अधिक होता है।
  2. पानी के स्वतंत्र पृष्ठ पर तेल की कुछ बूंदें डालने पर तेल पतली फिल्म के रूप में पानी के पृष्ठ पर फैल जाता है क्योंकि पानी और तेल के अणुओं के बीच लगने वाला आसंजक बल, तेल के अणुओं के मध्य लगने वाले संसंजक बल से अधिक होता है।

पृष्ठ तनाव

द्रव के अणुओं में संसंजक बल होने के कारण उसका स्वतंत्र पृष्ठ तनी हुई रबर की झिल्ली की तरह कार्य करता है। प्रत्येक तना हुआ पृष्ठ सदैव तनाव की स्थिति में होता है तथा उसमें संकुचित होने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार, द्रव का स्वतंत्र पृष्ठ सदैव तनाव की स्थिति में रहता है तथा उसमें कम-से-कम क्षेत्रफल प्राप्त करने की प्रवृत्ति होती है। द्रव के पृष्ठ का यह तनाव ही पृष्ठ तनाव कहलाता है।

किसी किए हुए आयतन के लिए गोलाकार आकृति के पृष्ठ का क्षेत्रफल अन्य आकृतियों के पृष्ठ के क्षेत्रफल से कम होता है। चूंकि द्रव का स्वतन्त्र पृष्ठ कम-से-कम क्षेत्रफल घेरने पर प्रयास करता है, अतः वर्षा की बूंदें तथा पारे के कण गोलाकार होते हैं।

पृष्ठ तनाव के कुछ प्रमाण

  1. लोहे का एक छल्ला लेते हैं तथा उसमें धागे का एक फन्दा डाल देते हैं। छल्ले को साबुन के गाढ़े घोल में डुबाकर निकालते हैं। फन्दे के अन्दर और बाहर साबुन की झिल्ली बन जाती है और फन्दा किसी भी आकृति में साम्यावस्था में पड़ा रहता है। अब गर्म पिन की नोंक से फन्दे के अन्दर की झिल्ली को तोड़ देते हैं। ऐसा करते ही फन्दा तनकर वृत्त की आकृति ग्रहण कर लेता है। इसका कारण यह है कि पहली स्थिति में फन्दे के दोनों ओर झिल्ली होने से फन्दे के प्रत्येक बिन्दु पर विपरीत दिशा में समान बल कार्य करता है, जिससे वह किसी भी स्थिति में साम्यावस्था में पड़ा रहता है, किन्तु दूसरी स्थिति में जब अन्दर की झिल्ली समाप्त हो जाती है। तो बाहर की झिल्ली में तनाव के कारण फन्दे के प्रत्येक बिन्दु पर बाहर की दिशा में बल लगता है। अत: धागे का फन्दा वृत्त की आकृति ग्रहण कर लेता है।
  2. जब मुलायम बालों से बने ब्रुश को पानी में डुबाते हैं तो उसके बाल अलग-अलग रहते हैं, किन्तु बाहर निकालने पर बाल आपस में चिपक जाते हैं। इसका कारण यह है कि ब्रुश को बाहर निकालने पर बालों पर लगे पानी का स्वतंत्र पृष्ठ होता है, जिसमें संकुचित होने की प्रवृत्ति है। अत: ब्रुश के बाल आपस में चिपक जाते हैं।

केशिकत्व

एक ऐसी खोखली नली, जिसकी त्रिज्या बहुत कम तथा एकसमान होती है, केशनली कहलाती है।

जब दोनों सिरों पर खुली एक केशनली को पानी में डुबोया जाता है तो पानी केशलनी में कुछ ऊंचाई तक चढ़ जाता है। इसके विपरीत जब केशनली को पारे में डुबोया जाता है तो कुछ पारा नली में नीचे दब जाता है।

केशनली में द्रव के ऊपर चढ़ने या नीचे दबने की घटना को कशिकत्व कहते हैं।

किसी सीमा तक द्रव केशनली में चढ़ता या उतरता है, यह केशनली की त्रिज्या पर निर्भर करता है। सामान्यत: जो द्रव कांच को भिगोता है वह केशनली में ऊपर चढ़ जाता है और जो द्रव कांच को नहीं भिगोते वह नीचे दब जाता है।

केशिकत्व के उदाहरण

  1. ब्लॉटिंग पेपर स्याही को शीघ्र सोख लेता है, क्योंकि उसमें बने छोटे-छोटे छिद्र केशनलियों की तरह कार्य करते हैं।
  2. लालटेन या लैम्प की बत्ती में कशिकत्व के कारण ही तेल ऊपर चढ़ता है।
  3. मिट्टी के ढेले को जल में रखने पर वह ऊपर तक गीला हो जाता है क्योंकि उसमें असंख्य सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जो केशनलियों का काम करते हैं।
  4. पेड़-पौधों की शाखाओं, तनों एवं पत्तियों तक जल और आवश्यक लवण केशिकत्व की क्रिया द्वारा ही पहुंचते हैं।

श्यानता

जिस प्रकार एक ठोस वस्तु को दूसरी ठोस वस्तु पर फिसलने पर उनके मध्य घर्षण बल लगता है, जो उनकी आपेक्षिक गति को विशेष करता है। ठीक उसी प्रकार किसी द्रव या गैस की एक पर्त को दूसरी पर्त पर फिसलने पर उनके मध्य घर्षण बल लगता है- जो उनकी आपेक्षिक गति का विरोध करता है चूंकि यह घर्षण बल एक ही द्रव की दो विभिन्न परतों के मध्य लगता है न कि दो अलग-अलग पदार्थों की सतहों के बीच लगता है। अत: इस घर्षण बल को आन्तरिक घर्षण बल अथवा श्यान बल कहते हैं।

श्यानता केवल द्रवों तथा गैसों का गुण है।

सीमान्त वेग

जब कोई वस्तु किसी श्यान द्रव में गिरती है तो प्रारम्भ में इसका वेग बढ़ता जाता है किन्तु कुछ समय के पश्चात् वह नियत वेग से गिरने लगती है। इस नियम वेग को ही वस्तु का सीमान्त वेग कहते हैं।

तरलों की गति – बर्नूली प्रमेय

जब कोई तरल बिना घर्षण के एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहता है तो उसकी कुल ऊर्जा (गतिज + स्थितिज + दाब) एक समान बना रहता है।

इस प्रमेय (सिद्धांत) का महत्वपूर्ण उपप्रमेय है: तरल का दाब उसके वेग में वृद्धि के साथ घटता है।

जब फुहारक (स्प्रेअर) के पिस्टन को धकेला जाता है तो हवा उस नली के ऊपरी सिरे से बलपूर्वक जाती है, जिसका निचला भाग छिड़के जाने वाले द्रव के अंदर डूबा होता है। हवा के बढ़े हुए वेग के कारण नली के ऊपरी सिर के पास दाब कम हो जाता है। इसलिए पात्र में वायुमण्डलीय दाब द्रव को शीर्ष की ओर धकलता है, जहां से हवा का झोंका उसे बौछार के रूप में वितरित कर देता है।

बॉलर द्वारा घूमती गेंद को फेंकने पर, गेंद पर वायु के असमान दाब के फलस्वरूप वह दिशा परिवर्तन करती है।

वायुयान के पंखों की आकृति को इस प्रकार का बनाया जाता है जिससे उस पर नीचे की अपेक्षा ऊपर की ओर वायु का वेग अधिक रहे। इसके फलस्वरूप निचली ओर वायु दाब बढ़ जाने के कारण पंख वायुमण्डल को ऊपर उठाने में सहायक होते हैं।

प्रत्यास्थता

दैनिक जीवन में हम देखते हैं कि रबड़ को खींचने पर उसकी लम्बाई बढ़ जाती है तथा छोड़ने पर अपनी पूर्वावस्था पर आ जाती है। धातु के तार पर भार लटकाने पर उसकी लम्बाई बढ़ जाती है, लेकिन भार हटाने पर वह अपनी प्रारम्भिक लम्बाई प्राप्त कर लेता है। यदि किसी पतली छड़ को मोड़ते हैं तो वह मुड़ जाती है तथा छोड़ते ही वह अपनी पूर्वावस्था पर वापस आ जाती है। इस प्रकार, जब किसी वस्तु पर बाह्य बल लगाया जाता है तो उसकी लम्बाई, आयतन अथवा आकृति में कुछ परिवर्तन हो जाता है (यदि वस्तु चलने अथवा घूमने के लिए स्वतंत्र न हो)। इस बाह्य बल को विरुपक बल कहते हैं तथा वस्तुओं के इस गुण को प्रत्यास्थता कहते हैं।

इस प्रकार, प्रत्यास्थता पदार्थ का वह गुण है जिसके कारण वस्तु, उस पर लगाए गए बाह्य बल से उत्पन्न किसी भी प्रकार के परिवर्तन का विरोध करती है तथा जैसे ही बल हटा दिया जाता है, वह अपनी पूर्व अवस्था में वापस आ जाती है।

जब किसी वस्तु की आकृति अथवा आकार बदल जाता है तो हम कहते हैं कि वस्तु विकृत हो गयी है तथा इस क्रिया को विरूपण कहते हैं।

प्रत्यास्थता का कारण

प्रत्येक पदार्थ अणुओं से मिलकर बना है। अणुओं के मध्य एक निश्चित दूरी तक आकर्षण बल लगता है। इस निश्चित दूरी को अणुओं के बीच की साम्य दूरी कहते हैं। जब अणुओं के बीच की दूरी, साम्य दूरी से कम हो जाती है तो उनमें प्रतिकर्षण बल लगता है। प्रतिकर्षण बल का मान, अणुओं के मध्य दूरी घटने पर आकर्षण बल की अपेक्षा अधिक तेजी से बढ़ता है।

जब किसी पदार्थ पर विरूपक बल लगाकर उसे दबाते हैं तो पदार्थ के अणुओं की दूरी, साम्य दूरी से कम होती है जिससे उनके मध्य प्रतिकर्षण बल लगने लगता है जो विरूपक बल को हटाने पर पदार्थ को पूर्वावस्था में ले आता है। इसी प्रकार, जब पदार्थ को विरूपक बल लगाकर खींचते हैं तो पदार्थ के अणुओं के मध्य दूरी, साम्य दूरी से अधिक होती है जिससे उनके मध्य आकर्षण बल लगने लगता है जो विरूपक बल को हटाने पर पदार्थ को पूर्वावस्था में ले आता है।

प्रत्यास्थता की सीमा

प्रयोगों द्वारा हम देखते है कि लोहे के तार पर अल्प बल लगाने पर वह लम्बाई में कुछ बढ़ जाता है और बल हटाने पर वह पुनः अपनी पूर्व लम्बाई पर वापस आ जाता है। लेकिन यदि हम लोहे के तार पर बहुत अधिक बल लगा दें तो वह सदैव के लिए खिंचकर लम्बा हो जाएगा या टूट जाएगा। अत: विरूपक बल के परिमाण की वह सीमा, जिससे कम बल लगाने पर पदार्थ में प्रत्यास्थता का गुण बना रहता है तथा जिससे अधिक बल लगाने पर पदार्थ का प्रत्यास्थता का गुण समाप्त हो जाता है, प्रत्यास्थता की सीमा कहलाती है। भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिए प्रत्यास्थता की सीमा भिन्न-भिन्न होती है।

विकृति तथा प्रतिबल

किसी तार पर विरूपक बल लगाने पर माना उसकी प्रारम्भिक लम्बाई L में वृद्धि / होती है तो I/L को विकृति कहते हैं तथा प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगाए पर बल को प्रतिबल कहते हैं। प्रतिबल और विकृति के अनुपात को तार के पदार्थ की प्रत्यास्थता का यंग मापांक कहते हैं।

हुक का नियम

प्रत्यास्थता की सीमा में किसी वस्तु में उत्पन्न विकृति उस पर लगाए गए प्रतिबल के अनुक्रमानुपाती होती है।

प्रतिबल/विकृति = एक नियतांक E

= प्रस्यास्थता का गुणांक

प्रत्यास्थता गुणांक E का मान भिन्न-भिन्न पदार्थों के लिए भिन्न-भिन्न होता है। यदि विकृति लम्बाई में हुई है तो प्रत्यास्थता गुणांक को यंग मापांक कहते हैं। प्रत्यास्थता गुणांक का SI मात्रक न्यूटन मीटर2 या पास्कल होता है।

बॉयल का नियम

  • दबाव α x 1/आयतन
  • अर्थात दबाव बढ़ेगा तो आयतन घटेगा या आयतन बढ़ेगा तो दबाव घटेगा।

Р1V1= P2 V2

  • छेद से होकर पानी की गति = \sqrt { 2gh }
  • अर्थात् अगर छेद ऊपर हो तो पानी का वेग शून्य होगा एवं पेंदी पर अधिकतम होगा।

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