भारतीय प्रेस परिषद् Press Council of India

भारतीय प्रेस परिषद् संसद के अधिनियम द्वारा सृजित एक कानूनी अर्ध न्यायिक निकाय है। इसे प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने और भारत में समाचार-पत्रों तथा समाचार अभिकरणों के मानकों की बनाए रखने तथा उनमें सुधार लाने के दोहरे उद्देश्य से प्रथम प्रेस आयोग की सिफारिशीं पर भारतीय प्रेस परिषद् अधिनियम, 1965 के अधीन पहले 1966 में स्थापित किया गया था। 1965 के अधिनियम को 1975 में निरस्त कर दिया गया था और आपातकाल के दौरान प्रेस परिषद् को समाप्त कर दिया गया था। 1965 के अधिनियम की भांति 1978 में लगभग उन्हीं आधारों पर एक नया अधिनियम बनाया गया था और 1979 में इस अधिनियम के तहत प्रेस परिषद् की पुनःस्थापना की गई।

प्रेस परिषद् के माध्यम से प्रेस स्वयं पर नियंत्रण रखती है। इस अद्वितीय संस्थान के अस्तित्व का कारण इस संकल्पना में है कि एक लोकतांत्रिक समाज में प्रेस को एकदम स्वतंत्र और जिम्मेदार होने की आवश्यकता है।

यदि प्रेस की जनहित के हितप्रहरी के रूप में कार्य करना है, तो इसके पास सुरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए जोकि किसी उन्मुक्त हो। परंतु प्रेस स्वतंत्रता का यह दावा तभी वैध होगा जब इसका निर्वाह दायित्व की समुचित भावना के साथ किया जाये। अतः प्रेस को पत्रकारिता नीति के स्वीकृत मानकों का पालन करना चाहिए और व्यावसायिक आचरण के उच्च स्तरों को बनाये रखना चाहिए।

जहाँ मानकों का उल्लंघन किया जाता है और व्यवसायिक आचरण द्वारा स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया जाता है तब इसकी जाँच और इसके नियंत्रण के लिए कोई रास्ता अवश्य होना चाहिए परंतु सरकार अथवा शासकीय प्राधिकारियों द्वारा नियंत्रण इसे स्वतंत्रता का विनाशक सिद्ध हो सकता है। अतः सर्वोत्तम रास्ता यही है कि इस व्यवसाय के सभी साथी कुछ विवेकपूर्ण लोगों की सहायता से समुचित संरचनात्मक मशीनरी के माध्यम से इस पर नियंत्रण रखें। अतः प्रेस परिषद् का निर्माण किया गया।

संरचना एवं उद्देश्य

प्रेस परिषद् का प्रमुख अध्यक्ष होता है, जो परिपाटी के अनुसार, भारत के उच्चतम न्यायालय का आसीन/सेवानिवृत्त न्यायाधीश रहा हो। परिषद् में 28 अन्य सदस्य होते हैं जिनमें से 20 प्रेस के प्रतिनिधि होते हैं। पांच सदस्य संसद के दोनों सदनों से होते हैं, जो पाठकों के हित का प्रतिनिधित्व करते हैं और तीन सदस्य सांस्कृतिक, साहित्य और विधि के क्षेत्र से होते हैं जिन्हें क्रमशः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग; साहित्य अकादमी, और भारतीय विधि परिषद द्वारा नामित किया जाता है। अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। प्रेस परिषद् अधिनियम में समाचार-पत्रों या प्रेस के व्यक्तियों की व्यक्तिगत सदस्यता का प्रावधान नहीं है। लेकिन देश के समाचार-पत्रों तक पहुंचने और अपनी न्यायनिर्णायक तथा सलाहकारी भूमिका प्रदान करने के लिए, प्रेस परिषद् उन समाचार-पत्रों/समाचार अभिकरणों/पत्रिकाओं पर वार्षिक शुल्क लगाता है जिनका परिषद् के राजस्व में योगदान होता है।

1978 के अधिनियम की धारा 13 में किए गए प्रावधान के अनुसार, भारतीय प्रेस परिषद् का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखना और भारत में समाचार-पत्रों तथा समाचार अभिकरणों के मानकों की बनाए रखना तथा उनमें सुधार लाना है। अधिनियम के अनुसार, परिषद् को सलाहकार की भूमिका भी सौंपी गई है। इसके अनुसार, परिषद स्वप्रेरणा से या अधिनियम की धारा 13(2) के अंतर्गत सरकार द्वारा भेजे गए मामलों का अध्ययन कर सकता है और किसी विधयक, विधान, विधि या प्रेस से संबंधित अन्य विषयों के संबंध में अपनी राय व्यक्त कर सकती है तथा सरकार और संबद्ध व्यक्तियों को अपनी राय दे सकती है। लोक महत्व के लिए उसकी कानूनी जिम्मेदारियों से संबंधित मामले में परिषद् स्वप्रेरणा से संज्ञान ले सकती है और तत्काल जांच करने के लिए विशेष समिति का गठन कर सकती है।

प्रेस परिषद् के उद्देश्यों का विस्तार करते हुए, ऐसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य हैं जिनके संबंध में प्रेस परिषद् से अपेक्षा की जाती है कि वह इन्हें करे यथा समाचार-पत्रों, समाचार अभिकरणों की स्वतंत्रता को बनाए रखने में सहायता करना; उच्च व्यावसायिक मानकों के अनुसार, समाचार पत्रों, समाचार अभिकरणों और पत्रकारों के लिए आचार संहिता तैयार करना; समाचार-पत्रों, समाचार अभिकरणों तथा पत्रकारों की ओर से जनता की अभिरुचि के उच्च मानकों तथा अधिकारों एवं जिम्मेदारियों दोनों की उचित भावना के प्रसार को बनाए रखना, लोकहित तथा महत्व के समाचारों के प्रसार की निर्बाधित करने की संभावना वाले किसी विकास की समीक्षा करना; समाचार-पत्रों के उत्पादन या प्रकाशन में या समाचार अभिकरणों में लगे सभी वर्गों के लोगों में उचित कार्यात्मक संबंध का संवर्धन करना, और समाचार-पत्रों के स्वामित्व के संकेद्रण या उसके अन्य पहलुओं, जिनसे प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हो, जैसे विकासों से स्वयं को जोड़ना।

भारतीय प्रेस परिषद् की अत्यधिक स्वस्थ और अनोखी विशेषता यह है कि संसद के अधिनियम के अधीन स्थापित किए गए कुछ ऐसे निकायों में से यह भी एक निकाय है। विश्व के अधिकांश देशों में ठीक ऐसी ही संस्थाएं या ऐसे निकाय, स्वैच्छिक संस्थाएं हैं अथवा भारतीय प्रेस परिषद् के पश्चात् अस्तित्व में आई हैं। इस तथ्य के बावजूद कि उसकी निधियों का एक बड़ा भाग सरकार का सहायता अनुदान है फिर भी इसे सरकारी नियंत्रण से अपने कानूनी उत्तरदायित्वों के निर्वहन में कार्यात्मक स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता प्राप्त है।

जन प्राधिकरण के कर्तव्य

  • प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण
  • भारत में समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों के स्तरों की बनाए रखना और उनमें सुधार करना
  • प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम, 1867 की धारा 8 ख के अंतर्गत विद्यमान घोषणा-पत्र को रद्द करने अथवा धारा 6 के अंतर्गत घोषणा-पत्र को अधिप्रमाणित करने से मना करने, मजिस्ट्रेट के आदेश से व्यथित व्यक्ति की शिकायत का निवारण करने के लिए 1867 के कथित अधिनियम के अंतर्गत अपील प्राधिकरण का इसे अतिरिक्त कार्य सौंपा गया है।
  • समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों की स्वतंत्रता बनाए रखने में उनकी सहायता करना।
  • उच्च व्यावसायिक स्तरों के अनुरूप समाचार-पत्रों, समाचार एजेंसियों और पत्रकारों के लिए आचार संहिता का निर्माण करना।
  • समाचार-पत्रों, समाचार एजेंसियों और पत्रकारों की ओर से जनरुचिके उच्च स्तरों को बनाये रखना सुनिश्चित करना और अधिकारों तथा दायित्व दोनों की समुचित भावना को बढ़ावा देना।
  • ऐसी किसी भी घटना पर नजर रखना जिससे जनरुचि और जनसमूह के समाचार के प्रचार-प्रसार पर रोक की संभावना हो।
  • समाचार-पत्रों अथवा समाचार एजेंसियों के उत्पादन अथवा प्रकाशन में लगे व्यक्तियों के सभी वर्गों के बीच समुचित कार्यात्मक संबंध को बढ़ावा देना।
  • कोई घटना जैसे समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों के स्वामित्व की एकाग्रता अथवा अन्य पहलुओं, जोकी प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं, में हस्तक्षेप करना।
  • प्रेस की स्वतंत्रता अथवा पत्रकारिता के मानकों के उल्लंघन के संबंध में आम जनता, समाचार-पत्र और पत्रकारों द्वारा की गयी शिकायतों का निवारण करना।
  • मूल कार्रवाई करना अथवा सरकार द्वारा इसे भेजे गये पत्र पर अध्ययन करना और किसी विधेयक, विधान, कानून अथवा प्रेस का स्पर्श करते हुए अन्य मामलों पर राय व्यक्त करना तथा प्राधिकारियों अथवा सम्बद्ध व्यक्तियों को मत सम्प्रेषित करना।
  • इसके संविधिक दायित्वों को स्पर्श करते हुए, लोक महत्व के मामले में मूल कार्रवाई करना और घटना स्थल की जांच करना।

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