ब्रिटिश शासन के दौरान कृषक आन्दोलन Peasant Movement during the British rule

1857-1947

उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि व्यवस्था

अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषि व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किये जाने से देश के कृषि जगत में हलचल पैदा हो गयी तथा भारतीय कृषक निर्धनता की बेड़ियों से जकड़ गये। उपनिवेशवाद के अधीन भारतीय कृषि की निर्धनता के निम्न प्रमुख कारण थे-

⇨ उपनिवेशवादी आर्थिक नीतियां।

⇨ भारतीय हस्तशिल्प के विनाश से भूमि पर अत्यधिक दबाव।

⇨ नयी भू-राजस्व व्यवस्था। तथा

⇨ उपनिवेशवादी प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था।

भारतीय कृषक लगन की ऊँची दरों, अवैध करों, भेदभावपूर्ण बेदखली एवं जमीदारी क्षेत्रों में बेगार जैसी बुराइयों से त्रस्त थे। रैयतवाड़ी क्षेत्रों में सरकार ने स्वयं किसानों पर भारी कर आरोपित कर दिये। इन विभिन्न कठिनाइयों के बोझ से दबे किसान, अपनी जीविका के एकमात्र साधन को बचाने के लिये महाजनों से ऋण लेने हेतु विवश हो जाते थे। ये महाजन उन्हें अत्यंत ऊंची दरों पर ऋण देकर उन्हें ऋण के जाल में फांस लेते थे। अनेक अवसरों पर तो किसानों को अपनी भूमि एवं पशु भी गिरवी रखने पड़ते थे। कभी-कभी ये सूदखोर या महाजन किसानों की गिरवी रखी गयी सम्पति को भी जब्त कर लेते थे।

इन सभी कारणों से कृषक धीरे-धीरे निर्धन लगानदाता तथा मजदूर बन कर रह गये। बहुत से कृषकों ने कृषि कार्य छोड़ दिया, कृषि भूमि रिक्त पड़ी रहने लगी तथा कृषि उत्पादन कम होने लगा। यदा-कदा किसानों ने अपने अत्याचारों का विरोध भी किया तथा शीघ्र ही वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनका मुख्य शत्रु उपनिवेशवादी शासन है। कभी-कभी उत्पीड़न की पराकाष्ठा हो जाने पर किसानों ने आपराधिक कार्य भी किये। इन अपराधों में डकैती, लूट एवं हत्यायें जैसी घटनायें शामिल थीं।

प्रारंभिक कृषक आंदोलनों पर सिंहावलोकन

नील आंदोलन 1859-60 Indigo revolt 1859-60

अंग्रेजों के शासनकाल में किसानों का पहला जुझारू एवं संगठित विद्रोह नील विद्रोह था। 1859-60 ई. में बंगाल में हुये इस विद्रोह ने प्रतिरोध की एक मिसाल ही स्थापित कर दी। यूरोपीय बाजारों की मांग की पूर्ति के लिये नील उत्पादकों ने किसानों को नील की अलाभकर खेती के लिये बाध्य किया। जिस उपजाऊ जमीन पर चावल की अच्छी खेती हो सकती थी, उस पर किसानों की निरक्षरता का लाभ उठाकर झूठे करार द्वारा नील की खेती करवायी जाती थी। करार के वक्त मामूली सी रकम अग्रिम के रूप में दी जाती थी और धोखा देकर उसकी कीमत बाजार भाव से कम आंकी जाती थी। और, यदि किसान अग्रिम वापस करके शोषण से मुक्ति पाने का प्रयास भी करता था तो उसे ऐसा नहीं करने दिया जाता था।

कालांतर में सत्ता के संरक्षण में पल रहे नील उत्पादकों ने तो करार लिखवाना भी छोड़ दिया और लटैतों को पालकर उनके माध्यम से बलात नील की खेती शुरू कर दी। वे किसानों का अपहरण, अवैध बेदखली, लाठियों से पीटना, उनकी एवं फसलों को जलाने जैसे क्रूर हथकंडे अपनाने लगे।

नील आंदोलन की शुरुआत 1859 के मध्य में बड़े नाटकीय ढंग से हुयी। एक सरकारी आदेश को समझने में भूलकर कलारोवा के डिप्टी मैजिस्ट्रेट ने पुलिस विभाग को यह सुनिश्चित करने का यह आदेश दिया, जिससे किसान अपनी इच्छानुसार भूमि पर उत्पादन कर सकें। बस, शीघ्र ही किसानों ने नील उत्पादन के खिलाफ अर्जियां देनी शुरू कर दी। पर, जब क्रियान्वयन नहीं हुआ तो दिगम्बर विश्वास एवं विष्णु विश्वास के नेतृत्व में नादिया जिले के गोविंदपुर गांव के किसानों ने विद्रोह कर दिया। जब सरकार ने बलपूर्वक युक्तियां अपनाने का प्रयास किया तो किसान भी हिंसा पर उतर आये। इस घटना से प्रेरित होकर आसपास के क्षेत्रों के किसानों ने भी उत्पादकों से अग्रिम लेने, करार करने तथा नील की खेती करने से इंकार कर दिया।

बाद में किसानों ने जमींदारों के अधिकारों को चुनौती देते हुये उन्हें लगान अदा करना भी बंद कर दिया। यह स्थिति पैदा होने के पश्चात नील उत्पादकों ने किसानों के खिलाफ मुकदमे दायर करना शुरू कर दिये तथा मुकदमे लड़ने के लिये धन एकत्र करना प्रारंभ कर दिया। बदले में किसानों ने भी नील उत्पादकों की सेवा में लगे लोगों का सामाजिक बहिष्कार प्रारंभ कर दिया। इससे किसान शक्तिशाली होते गये तथा नील उत्पादक अकेले पड़ते गये।

बंगाल के बुद्धिजीवियों ने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उन्होंने किसानों के समर्थन में समाचार-पत्रों में लेख लिखे, जनसभाओं का आयोजन किया तथा उनकी मांगों के संबंध में सरकार को ज्ञापन सौंपे। हरीशचंद्र मुखर्जी के पत्र हिन्दू पैट्रियट ने किसानों का पूर्ण समर्थन किया। दीनबंधु मित्र से नील दर्पण द्वारा गरीब किसानों की दयनीय स्थिति का मार्मिक प्रस्तुतीकरण किया।

स्थिति को देखते हुये सरकार ने नील उत्पादन की समस्याओं पर सुझाव देने के लिये नील आयोग का गठन किया। इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने एक अधिसूचना जारी की, जिसमें किसानों को यह आश्वासन दिया गया किउन्हें निल उत्पादन के लिए विवश नहीं किया जाएगा तथा सभी सम्बंधित विवादों को वैधानिक तरीकों से हल किया जायेगा। कोई चारा न देखकर नील उत्पादकों ने बंगाल से अपने कारखाने बंद करने प्रारम्भ कर दिये तथा 1860 तक यह विवाद समाप्त हो गया।

पाबना विद्रोह 1873-76 Pabna Peasant Uprisings 1873-76

बंगाल में 1870 और 1880 के दशक में जमींदारों द्वारा किसानों पर कानूनी सीमा से बहुत अधिक करारोपण तथा उनकी मनमानी कारगुजारियां बड़े पैमाने पर हुयीं। इन कारगुजारियों के खिलाफ बंगाल में 1873-76 के बीच एक सफल किसान आंदोलन हुआ, जिसे पाबना विद्रोह के नाम से जाना जाता है।

पाबना जिले के यूसुफशाही परगने में 1873 में जमीदारों की मनमानी के प्रतिकार के लिये किसान-संघ की स्थापना की गयी। इस संघ के अधीन किसान संगठित हुये और उन्होंने लगान-हड़ताल कर दी और बढ़ी हुयी दर पर लगान देने से इन्कार कर दिया। संघ ने जमींदारों के खिलाफ मुकदमे दायर किये तथा इसके लिये कोष भी स्थापित किये गये। शीघ्र ही इस प्रकार के संघ पाबना के अन्य भागों एवं पूर्वी बंगाल के दूसरे जिलों में भी स्थापित हो गये और जमींदारों के खिलाफ तेजी से मुकद्दमें दायर किये जाने लगे।

किसानों की यह लड़ाई मुख्यतः कानूनी मोर्चे पर ही लड़ी गयी थी। दरअसल, तब तक किसान अपने कानूनी अधिकारों के प्रति काफी जागरुक हो चुके थे और कानूनी लड़ाई लड़ना सीख गये थे। एकता, संगठन और शांतिपूर्ण संघर्ष के द्वारा अधिकारों की बहाली का तरीका उन्हें ज्ञात हो चुका था। इतने बड़े पैमाने पर चले हिंसक आंदोलन के दौरान हिंसक वारदातें नाममात्र की हुयीं। प्रायः जब अदालती फैसलों के लागू करने में बाधा पहुंचायी गयी तभी किसानों ने लाठी आदि का सहारा लिया।

यद्यपि कृषक विद्रोह का यह चरण 1885 तक चला, जब गाल काश्तकारी कानून बना, तथापि अधिकांश विवाद इससे बहुत पहले ही निपटा लिये गये थे, और किसानों को उनकी जमीन वापस मिल चुकी थी। कई विवाद सरकारी दबाव और बीच-बचाव से हल कराये गये और कई जमींदारों ने तो स्वयं ही डर के कारण समझौते की पेशकश की। इन जमींदारों को किसानों की संगठित शक्ति से भय लगने लगा। था, साथ ही मुकदमों के चक्कर में फसने में वे अपनी हानि देख रहे थे।

जिन मामलों में हिंसक वारदातें हुयीं, वहां सरकार ने जमींदारों का पक्ष लिया  और किसानों की गिरफ्तारियां बड़े पैमाने पर की गयीं। परंतु, जहां आंदोलन शांतिपूर्ण रहा तथा किसानों ने सिर्फ कानूनी मोर्चे पर लड़ाई लड़ी वहां सरकार ने तटस्थ रुख अपनाया। यह आंदोलन न तो जमींदारी प्रथा के खिलाफ था और न ही किसी भी स्तर पर यह उपनिवेशवाद विरोधी राजनीति से जुड़ा था।

इस आंदोलन में भी बंगाल के बुद्धिजीवियों ने आंदोलनकारियों का भरपूर समर्थन किया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, आनन्द मोहन बोस और द्वारकानाथ गांगुली ने इण्डियन एसोसिएशन के मंच से आंदोलनकारियों की मांगों का समर्थन किया। बंकिमचंद्र चटर्जी ने भी आंदोलन का समर्थन किया। राष्ट्रवादी अखबारों ने भी करों की वृद्धि को अनुचित बताते हुये स्थायी रूप से लगान निर्धारण का सुझाव दिया। इस आंदोलन में भी हिन्दू तथा मुसलमानों ने मिलकर संघर्ष किया यद्यपि अधिकांश किसान मुसलमान थे और अधिकांश जमीदार हिन्दू।

दक्कन विद्रोह,  1875 The Deccan Peasants’ Uprising, 1875

पश्चिमी भारत के दक्कन क्षेत्र में होने वाले विभिन्न कृषक विद्रोहों का मुख्य कारण रैयतवाड़ी बंदोबस्त के अंतर्गत किसानों पर आरोपित किये गये भारी कर थे। इन क्षेत्रों में भी किसान, करों के भारी बोझ से दबे हुये थे तथा साहूकारों के कुचक्र में फंसने को विवश थे। ये महाजन अधिकांशतया बाहरी लोग थे, जिनमें मारवाड़ी या गुजराती प्रमुख थे। 1864 में अमेरिकी गृह युद्ध के समाप्त हो जाने पर कपास की कीमतों में भारी गिरावट आ गयी, जिससे महाराष्ट्र के किसान बुरी तरह प्रभावित हुये। 1867 में सरकार द्वारा भू-राजस्व की दरों में 50 प्रतिशत वृद्धि का निर्णय तथा लगातार फसलों की बर्बादी से कृषकों की समस्यायें चरम स्थिति में पहुंच गयीं।

महाजनों-सूदखोरों एवं किसानों के मध्य धीरे-धीरे तनाव बढ़ने लगा, जिसके फलस्वरूप 1874 में किसानों ने बाह्य महाजनों के विरुद्ध सामाजिक बहिष्कार आंदोलन प्रारंभ कर दिया। इस आंदोलन के तहत किसानों ने महाजनों की दुकानों से खरीददारी करने तथा उनके खेतों में मजदूरी करने से इंकार कर दिया। नाइयों, धोबियों तथा चर्मकारों ने भी महाजनों की किसी प्रकार की सेवा करने से इंकार कर दिया।

किसानों का यह सामाजिक बहिष्कार शीघ्र ही पूना, अहमदनगर, शोलापुर एवं सतारा के गांवों में भी फैल गया। लेकिन यह सामाजिक बहिष्कार शीघ्र ही कृषि दंगों में परिवर्तित हो गया, जिसके फलस्वरूप किसानों ने महाजनों एवं सूदखोरों के घरों एवं व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हमले किये। उनके ऋण संबंधी कागजात तथा करारनामे लूट लिये गये तथा सार्वजनिक तौर पर उनको आग लगा दी गयी।

सरकार ने आन्दोलनकारियों के पाती दमनकारी नीतियां अपनायीं तथा आन्दोलन को कुचल दिया। 1879 में दक्कन कृषक राहत अधिनियम बनने से आंदोलन पूर्णतया समाप्त हो गया।

इस आंदोलन के समय भी महाराष्ट्र के आधुनिक विचारों से प्रभावित बुद्धिजीवी वर्ग ने सराहनीय भूमिका निभायी तथा तर्कपूर्ण ढंग से किसानों की मांगों की सरकार के सम्मुख उठाया।

1857 के पश्चात किसान आंदोलनों का परिवर्तित चरित्र

⇨ किसान आंदोलनों में किसान मुख्य शक्ति बनकर उभरे तथा अब उन्होंने अपनी मांगों के लिये सीधे लड़ना प्रारंभ कर दिया।

⇨ उनकी मांगें मुख्यतया आर्थिक समस्याओं से सम्बद्ध थीं।

⇨ किसानों के मुख्य दुश्मन विदेशी बागान मालिक, देशी जमीदार, महाजन एवं सूदखोर थे।

⇨ इनके आंदोलन विशिष्ट तथा सीमित उद्देश्यों एवं उनकी व्यक्तिगत समस्याओं से सम्बद्ध होते थे।

⇨ इन आंदोलनों में उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज नहीं उठायी गयी।

⇨ इन आंदोलनों में निरंतरता एवं दीर्घकालीन संगठन का अभाव था।

⇨ इन आंदोलनों का प्रसार क्षेत्र सीमित था।

⇨ इन आन्दोलनों का उद्देश्य अधीनस्थ व्यवस्था (System of subordination) को समाप्त करना नहीं था अपितु ये किसानों की तात्कालिक समस्याओं से सम्बद्ध थे।

⇨ किसान अब अपने विधिक अधिकारों से परिचित हो गये थे तथा वे कानूनी तरीके से संघर्ष करने के पक्षधर थे।

दुर्बलतायें

⇨ इन आंदोलनकारियों में उपनिवेशवाद के चरित्र को समझने का अभाव था।

⇨ 19वीं शताब्दी के किसानों में नयी विचारधारा का अभाव था तथा उन्होंने अपने आदोलनों में नये सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक कार्यक्रम सम्मिलित नहीं किये।

⇨ इन संघर्षों का स्वरूप यद्यपि उग्रवादी था किंतु ये परम्परागत ढांचों पर ही अवलंबित थे।

⇨ इनमें सकारात्मक दृष्टिकोण का अभाव था।

बीसवीं शताब्दी के कृषक आंदोलन

बीसवीं शताब्दी के कृषक विद्रोह, पिछली शताब्दी के विद्रोहों से अधिक व्यापक, प्रभावी, संगठित व सफल थे। इस परिवर्तन के सूत्र, कृषक आंदोलन एवं भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष के अन्योनाश्रय संबंधों में थे। राष्ट्रीय आंदोलन ने अपना संघर्ष तीव्र करने के लिये सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश के क्रम में किसानों से नजदीकियां स्थापित कीं और दूसरी ओर किसानों ने राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने के लाभों को देखकर तन-मन-धन से उसे समर्थन देना प्रारंभ कर दिया।

किसान सभा आंदोलन Kisan Sabha Movement

1857 के विद्रोह के पश्चात अवध के तालुकदारों को उनकी भूमि लौटा दी गयी। इससे प्रांतों में कृषि व्यवस्था पर तालुकदारों या बड़े जमींदारों का नियंत्रण और बढ़ गया। कृषकों का एक बड़ा वर्ग इन तालुकदारों या जमींदार के मनमाने अत्याचारों से पीड़ित था, जिनमें- लगान की ऊंची दरें, भूमि से बेदखली, अवैध कर तथा नजराना इत्यादि सम्मिलित थे। प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत अनाज तथा अन्य आवश्यक चीजों के दाम अत्यधिक बढ़ गये। इससे उत्तर प्रदेश के किसानों की दशा अत्यंत दयनीय हो गयी।

मुख्यतया होमरूल लीग की गतिविधियों के कारण उत्तर प्रदेश में किसान सभाओं का गठन किया गया। फरवरी 1918 में गौरीशंकर मिश्र तथा इंद्रनारायण द्विवेदी ने उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन किया। इस कार्य में मदन मोहन मालवीय ने इन्हें सराहनीय योगदान प्रदान किया। 1919 के मध्य तक इसकी लगभग 500 शाखायें गठित की जा चुकी थीं। किसान सभाओं के गठन से सम्बद्ध प्रमुख नेताओं में झिगुरी सिंह, दुर्गापाल सिंह एव बाबा रामचंद्र का नाम भी सम्मिलित है। जून 1920 में बाबा रामचंद्र ने जवाहर लाल नेहरू से इन गांवों का दौरा करने त्सा आग्रह किया। तत्पश्चात नेहरू ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुये इन गांवों का दौरा किया तथा गांववासियों से गहन सम्पर्क स्थापित किया।

राष्ट्रवादी नेताओं में मतभेद के कारण अक्टूबर 1920 में अवध किसान सभा का गठन किया गया। अवध किसान सभा ने किसानों से बेदखल जमीन न जोतने और बेगार न करने की अपील की। सभा ने इन नियमों का पालन न करने वाले किसानों का सामाजिक बहिष्कार करने तथा अपने विवादों की पंचायत के माध्यम से हल करने का आग्रह किसानों से किया।

जनवरी 1921 में कुछ क्षेत्रों में स्थानीय नेताओं की गलतफहमी एवं आक्रोश के कारण किसान सभा आंदोलन ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया। इस दौरान किसानों ने बाजारों, घरों एवं अनाज की दुकानों पर धावा बोलकर उन्हें लूटा तथा पुलिस के साथ उनकी हिंसक झडपे हुयीं। रायबरेली, फ़ैजाबाद एवं सुल्तानपुर इन गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे।

धीरे-धीरे सरकारी दमन के कारण आंदोलन कमजोर पड़ने लगा। इसी बीच सरकार ने अवध मालगुजारी रेंट संशोधन अधिनियम पारित कर दिया। इसने भी आंदोलन की कमजोर किया। मार्च 1921 तक आंदोलन समाप्त हो गया।

एका आंदोलन Eka Movement or Unity Movement

1921 के अंत में, उत्तर प्रदेश के उत्तरी जिलों हरदोई, बहराइच तथा सीतापुर में किसान पुनः संगठित होकर आंदोलन पर उतर आये। इस बार आंदोलन से निम्न मुद्दे सम्बद्ध थे-

1. लगान की उच्च दरें-लगान की दरें लगभग 50 प्रतिशत से भी अधिक थीं।

2. राजस्व वसूली के कार्य में जमींदारों द्वारा अपनायी गयीं दमनकारी नीतियां। तथा

3. बेगार की प्रथा।

इस एका या एकता आदोलन में प्रतीकात्मक धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता था तथा एकत्र किसानों को शपथ दिलायी जाती थी कि वे-

⇨ केवल उचित लगान ही अदा करेंगे तथा लगान अदायगी में समय सीमा का पालन करेंगे।

⇨ यदि उन्हें भूमि से बेदखल किया जायेगा तो वे भूमि नहीं छोड़ेंगे।

⇨ बेगार करने से इंकार कर देंगे।

⇨ अपराधियों से सम्बंध नहीं रखेंगे। तथा

⇨ पंचायत के निर्णय स्वीकार करेंगे।

एका आंदोलन का मुख्य नेतृत्व समाज के निचले तबके के किसानों- मदारी पासी एवं अन्य पिछड़ी जातियों के किसानों तथा कई छोटे जमींदारों ने किया।

मार्च 1922 के अंत तक सरकार ने इस आंदोलन को दमन का सहारा लेकर कुचल दिया।

मोपला विद्रोह, 1921 Moplah Rebellion 1921

केरल में मालाबार तट पर अगस्त 1921 में अवध जैसे कारणों से ही प्रेरित होकर स्थानीय मोपला किसानों ने जब जबर्दस्त विद्रोह किया। मोपला, केरल के मालाबार तट के मुस्लिम किसान थे, जहां जमीदारी के अधिकार मुख्यतः हिन्दुओं के हाथों में थे। 19वीं शताब्दी में भी जमीदारों के अत्याचारों से पीड़ित होकर मोपलाओं ने कई बार विद्रोह किये थे। मोपलाओं के विद्रोह का प्रमुख कारण-लगान की उच्च दरें, नजराना एवं अन्य दमनकारी तौर-तरीके थे। किंतु इस बार के आंदोलन की विशेषता थी इसका राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ संबंध स्थापित होना। खिलाफत आंदोलन ने किसानों की मांग का समर्थन किया बदले में किसानों ने आंदोलन में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। यहां भी अवध के समान किसानों की बैठक ओर खिलाफत की बैठक में फर्क कर पाना कठिन था। गांधी जी, शौकत अली, मौलाना आजाद आदि राष्ट्रीय नेताओं ने इन क्षेत्रों का दौरा कर इनमें और भी सक्रियता ला दी। अंत में सरकार ने फरवरी 1921 में निषेधाज्ञा लागू कर खिलाफत के साथ किसानों की सभाओं पर रोक लगा दी और इसके सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय मोपला नेताओं के हाथों में आ गया और आंदोलन ने हिंसक रूप अपना लिया। हिंसक चरण की शुरुआत 20 अगस्त 1921 को खिलाफत के एक प्रमुख नेता मुदलियार की गिरफ्तारी के लिये सेना के मस्जिद में प्रवेश करने के मुद्दे को लेकर हुयी। इसे मोपलाओं ने अपने धर्म का अपमान समझा।

विद्रोह के प्रथम चरण में बदनाम जमींदारों को निशाना बनाया गया । विद्रोही  मोपला किसान मुस्लमान थे परन्तु उदार जमींदार और हिन्दुओं उन्होंने परेशान नहीं किया। इसके लिये नेताओं द्वारा विद्रोहियों की विशेष हिदायत दी जाती थी। परंतु अंग्रेजी सरकार द्वारा मार्शल लॉ लागू करने की घोषणा से विद्रोह का चरित्र बदल गया। सरकार ने तमाम हिन्दुओं को जबरदस्ती अपना समर्थन करने के लिये कहा और कुछ हिन्दू स्वेच्छा से भी खुले तौर पर सरकार का समर्थन करने लगे। इसने विद्रोह को हिन्दू-विरोधी स्वरूप दे दिया तथा बड़े पैमाने पर हिन्दुओं की हत्यायें एवं धर्म परिवर्तन की घटनायें हुयीं।

मोपला विद्रोह के हिंसक रूप लेने के साथ ही राष्ट्रवादी नेता आंदोलन से अलग हो गये। आंदोलन के साम्प्रदायिक रूप ले लेने से वह और भी अलग-थलग पड़ गया। दिसम्बर 1921 तक सरकार ने पूरी तरह आंदोलन का दमन कर दिया। इससे मोपलाओं का मनोबल पूरी तरह टूट गया तथा आजादी की पूरी लड़ाई में वे फिर कभी शामिल नहीं हुये, जबकि केरल में वामपंथी नेतृत्व में बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन भी चलाया गया।

बारदोली सत्याग्रह Bardoli Satyagraha 

भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर गांधीजी के पदार्पण के पश्चात गुजरात के सूरत जिले के बारदोली तालुके में राजनीतिक गतिविधियों में तेजी से सक्रियता आयी। यहां परिस्थितियां उस समय तनावपूर्ण हो गयीं, जब जनवरी 1926 में स्थानीय प्रशासन ने भू-राजस्व की दरों में 30 प्रतिशत वृद्धि की घोषणा की। यहां के कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने इस वृद्धि का तीव्र विरोध किया। परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुये सरकार ने समस्या के समाधान हेतु बारदोली जांच आयोग का गठन किया। आयोग ने संस्तुति दी कि भू-राजस्व की दरों में की गयी वृद्धि अन्यायपूर्ण एवं अनुचित है।

फरवरी 1926 में, वल्लभभाई पटेल को आंदोलन की महिलाओं ने सरदार की उपाधि से विभूषित किया। सरदार पटेल के नेतृत्व में किसानों ने बढ़ी हुयी दरों पर भू-राजस्व अदा करने से इंकार कर दिया तथा सरकार के सम्मुख यह मांग रखी कि जब तक सरकार समस्या के समाधान हेतु किसी स्वतंत्र आयोग का गठन नहीं करती या प्रस्तावित लगान वृद्धि वापस नहीं लेती तब तक वे अपना आंदोलन जारी रखेंगे। आंदोलन को  संगठित करने के लिये सरदार पटेल ने पूरे तालुके में 13 छावनियों की स्थापना की। आांदोलनकारियों के समर्थन में जनमत का निर्माण करने के लिये बारदोली सत्याग्रह पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ किया गया। आदोलन के तरीकों का पालन सुनिश्चित करने के लिये एक बौद्धिक संगठन भी स्थापित किया गया। जिन लोगों ने आंदोलन का विरोध किया, उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया। आदोलन में महिलाओं की भागेदारी सुनिश्चित करने हेतु भी अनेक कदम उठाये गये। के.एम. मुंशी तथा लालजी नारंजी ने आंदोलन के समर्थन में बंबई विधान परिषद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया।

अगस्त 1928 तक पूरे क्षेत्र में आंदोलन पूर्णरूप से सक्रिय हो चुका था। आंदोलन के समर्थन में बंबई में रेलवे हड़ताल का आयोजन किया गया। पटेल की गिरफ्तारी की संभावना को देखते हुये 2 अगस्त 1928 को गांधीजी भी बारदोली पहुंच गये। सरकार अब आंदोलन को शांतिपूर्ण एवं सम्मानजनक ढंग से समाप्त किये जाने का प्रयास करने लगी। सरकार ने एक ‘जांच समिति' गठित करना स्वीकार कर लिया। तदुपरांत गठित ब्लूमफील्ड और मैक्सवेल समिति ने भू-राजस्व में बढ़ोतरी को गलत बताया और बढ़ोतरी 30 प्रतिशत से घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दी गयी। इस प्रकार बारदोली सत्याग्रह की सफल ऐतिहासिक परिणति हुई।

1930-40 के दशक के किसान आंदोलन

1930 और 1940 के दशक में भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के साथ-साथ किसान आंदोलनों की आवृति भी बहुत बढ़ गयी। इस चरण के आंदोलनों को उत्प्रेरित करने वाले तात्कालिक घटनाक्रम थे- 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का निर्धन कृषक वर्ग पर अत्यंत बुरा प्रभाव पड़ना तथा कांग्रेस द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन' के साथ एक बार फिर व्यापक जनाधार का आंदोलन छेड़ना। इस आंदोलन ने देश के बहुत बड़े हिस्से में टैक्स और लगान न देने के अभियान का रूप लिया।

इस चरण के किसान संघर्षों ने यद्यपि तात्कालिक तौर पर कुछ ज्यादा प्राप्त नहीं किया, तथापिउन्होंने एक ऐसा वातावरण तैयार किया, जिसके फलस्वरूप स्वतंत्रता के पश्चात अनेक कृषि सुधार हुये। यथा-जमीदारी उन्मूलन की जो मांग इस दौर में उठी वह स्वतंत्रता के पश्चात कार्यान्वित हुयी। इसी प्रकार, ट्रावनकोर राज्य के भारत में विलय के लिये पुनप्रवायलार के आंदोलन ने ऐतिहासिक भूमिका निभायी।

इस चरण में किसानों की जो तात्कालिक मांगें थीं, उनमें-टैक्सों में कटौती, सामंतों की गैर-कानूनी वसूलियां और बेगार की समाप्ति, जमींदारों के अत्याचारों से मुक्ति, ऋण बोझ में कमी, गैरकानूनी तरीकों से ली गयी भूमि की वापसी तथा किसानों की सुरक्षा आदि प्रमुख थीं। खेतिहर मजदूरों की मांगे आंध्रप्रदेश और गुजरात के अतिरिक्त अन्य प्रदेशों के किसान आंदोलनों में गौण ही रहीं। वास्तव में ये आंदोलन, कृषि ढांचे में आमूल परिवर्तन के लिये नहीं हुये बल्कि इनका उद्देश्य इस व्यवस्था के कुछ अत्यंत पीड़ादायक पहलुओं का अंत करना था।

इस काल में किसान आंदोलनों के अभ्युदय के कुछ महत्वपूर्ण कारण थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन ने युवा एवं जुझारू राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक पूरी पीढ़ी पैदा की। जब सविनय अवज्ञा आदोलन में ठहराव आया तब इन कार्यकर्ताओं ने अपनी राजनीतिक उर्जा, किसान एवं मजदूर आंदोलनों में लगा दी। फिर, 1937 के चुनावों में अधिकांश प्रांतों में कांग्रेस की सरकार बनी। 1937-39 के बीच 28 महीनों का कांग्रेसी शासनकाल किसान आंदोलनों का उत्कर्ष काल था। एक, तो इस काल में आंदोलनों के लिये नागरिक स्वतंत्रतायें अधिक मिलीं दूसरे, कांग्रेसी सरकारों ने कृषि-कानूनों में सुधार के लिये कुछ ठोस कदम भी उठाये।

अखिल भारतीय किसान कांग्रेस सभा All India Kisan Sabha

इस सभा की स्थापना अप्रैल 1936 में लखनऊ में की गयी। स्वामी सहजानंद सरस्वती इस सभा के अध्यक्ष तथा एन.जी. रंगा सचिव चुने गये। इस सभा ने किसान घोषणा-पत्र जारी किया तथा इंदुलाल याज्ञिक के निर्देशन में एक पत्र का प्रकाशन भी प्रारंभ किया। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का सम्मेलन फैजपुर में आयोजित किया गया। 1937 के प्रांतीय चुनावों हेतु जारी किए गए कांग्रेसी घोषणा-पत्र के अनेक प्रावधान अखिल भारतीय किसान सभा के एजेंडे से प्रभावित थे।

कांग्रेसी सरकारों के अंतर्गत किसान आन्दोलन

1937-39 के मध्य किसान आंदोलनों की आवृति बहुत बढ़ गयी। कांग्रेसी सरकारों के सहयोगात्मक रवैये के कारण किसानों ने तेजी से अपनी मांगे उठानी प्रारंभ कर दीं। इस अवधि में जनसभायें, प्रदर्शन, धरने आदि आयोजित किये गये तथा गांवों में भी किसान आंदोलनों का प्रसार किया गया।

प्रांतों में किसानों की गतिविधियां

केरल: केरल के मालाबार क्षेत्र में वामपंथियो के नेतृत्व में ‘कर्षक संघमों में संगठित होकर किसानों ने सामंती वसूलियों, अग्रिम लगन वसूली तथा बेदखली इत्यादि के विरुद्ध जबरदस्त अभियान छेड़ा। उनका एक तरीका अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावी सिद्ध हुआ, जिसमें वे जत्थे बनाकर जमींदारों के घर जाते थे और उनके सामने अपनी मांगे रखकर तत्काल समाधान प्राप्त करते थे। 1938 में किसानों ने मालाबार टेनेंसी एक्ट 1929 में संशोधन के लिये एक महत्वपूर्ण आंदोलन चलाया।

आंध्र प्रदेश

यहां 1937 के चुनावों में जमीदारों तथा उनके समर्थक उम्मीदवारों की पराजय के कारण किसानों का मनोबल बहुत बढ़ गया था तथा उन्होंने जमींदारों के विशेषाधिकारों और ज्यादतियों के विरुद्ध विद्रोह प्रारंभ कर दिया। ऋण में राहत की मांग भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण थी। इस समय प्रदेश में कई कृषक संगठन सक्रिय थे। 1933 में एन.जी. रंगा ने भारतीय कृषक संस्थान की स्थापना की। आंध्र के किसान आंदोलनों की एक उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि किसान कार्यकर्ताओं को अर्थशास्त्र एवं राजनीतिशास्त्र में प्रशिक्षित करने के लिये प्रसिद्ध वामपंथी नेता ग्रीष्मकालीन स्कूलों में व्याख्यान देने आते थे, जिनकी व्यवस्था किसानों के द्वारा दिये गये चंदे से होती थी। इन नेताओं में पी.सी. जोशी, अजय घोष एवं आर.दी. भारद्वाज प्रमुख थे।

बिहार

यहां सहजानंद सरस्वती, कार्यानंद शर्मा, यदुनंदन शर्मा, राहुल सांस्कृत्यानन, पंचानन शर्मा एवं जामुन कार्जीति इत्यादि नेताओं ने किसान आंदोलनों को योग्य नेतृत्व प्रदान किया। 1935 में प्रांतीय किसान सभा ने जमींदारों के उन्मूलन का प्रस्ताव पारित किया। बकाश्त जमीन की वापसी के लिये जब इन्होंने आंदोलन तेज किया, तब कांग्रेस सरकार से इस आंदोलन के मतभेद भी हो गये क्योंकि वह उस दौर में जमींदारों को नाराज कर राष्ट्रीय आंदोलन में बाधायें नहीं खड़ी करना चाहती थी। आंदोलन का मुख्य स्वरूप था- सत्याग्रह तथा जबरदस्त बुआई और फसल कटाई। इस दौरान किसानों के जमीदारों के साथ बड़े पैमाने पर संघर्ष भी हुये। 1939 में कुछ सुविधायें मिल जाने के कारण तथा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के कारण यह आंदोलन कुछ समय के लिये स्थगित हो गया।

1945 में यह पुनः प्रारंभ हुआ और स्वाधीनता के बाद भी चलता रहा, जब तक जमीदारी प्रथा समाप्त नहीं हो गयी।

पंजाब

पंजाब में हुये प्रारंभिक किसान आंदोलनों में पंजाब नौजवान भारत सभा, कीर्ति किसान दल, कांग्रेस एवं अकाली दल की मुख्य भूमिका थी। 1937 में पंजाब किसान समिति ने किसान आन्दोलन के संबंध में नये दिशा-निर्देश जारी किये। इस आंदोलन का मुख्य निशाना पश्चिमी पंजाब के जमींदार थे, जिनकी शक्ति यूनियनवादी सरकार के गठन के बाद काफी बढ़ गयी थी। इस आंदोलन का प्रमुख कारण अमृतसर एवं लाहौर में भू-राजस्व में वृद्धि, मुल्तान एवं मांटगोमरी में सिंचाई कर में वृद्धि तथा निजी ठेकेदारों द्वारा नये टैक्स लगाया जाना था। यहां किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में हड़तालें कीं तथा अंत में वे रियायत प्राप्त करने में सफल रहे।

पंजाब में किसानों की गतिविधियों के मुख्य केंद्र थे- जालंधर, अमृतसर, होशियारपुर, लैलपुरा एवं शेखुपुरा। पश्चिमी पंजाब के मुस्लिम किसान तथा दक्षिण-पूर्वी पंजाब के हिन्दू किसान इन आंदोलनों के प्रभाव से सामान्यतया अछूते ही रहे।

इन प्रान्तों के अतिरिक्त बंगाल, उड़ीसा, पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत राज्यों और त्रावनकोर तथा हैदराबाद जैसी देशी रियासतों में भी इस चरण में प्रभावी कृषक आंदोलन हुये।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वामपंथियों की विपरीत धारा की राजनीति के कारण कृषक आंदोलन में कुछ ठहराव सा आ गया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान किसान सभा के साम्यवादियों और गैर साम्यवादियों के बीच मतभेद बहुत गहरे हो गये। इसके परिणामस्वरूप कई प्रमुख नेता यथा- सहजानंद, इंदुलाल याज्ञिक तथा एन.जी. रंगा सभा से अलग हो गये तथा 1943 में किसान सभा में विभाजन हो गया।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात

तेभागा आंदोलन Tebhaga movement

यह आंदोलन बंगाल के सबसे प्रमुख कृषक आंदोलनों में से एक था। 1940 के लगान आयोग द्वारा की गयी सिफारिश के अनुसार, इस आंदोलन में मांग की गयी कि फसल का दो-तिहाई हिस्सा बर्गदारों (किसानों) की दिया जाये। यह आंदोलन बटाईदारों द्वारा जोतदारों के विरुद्ध चलाया गया था। इस आंदोलन में सबसे मुख्य भूमिका बंगाल किसान सभा की थी। इस सभा के नेतृत्व में सभाओं एवं प्रदर्शनों का आयोजन किया गया तथा तिभागा चाई (हमें दो-तिहाई भाग चाहिये) एवं इकलाब जिंदाबाद जैसे नारे लगाये गये।

शीघ्र ही तिभागा आंदोलन जलपाईगुड़ी, मिदनापुर एवं रंगपुर जिलों में भी फैल गया। इस आंदोलन में सभी स्थानों पर बटाईदारों ने एक जैसी पद्धति अपनायी। वे लाठी लेकर प्रदर्शन करते थे तथा नारे लगाते थे एवं उपज को जोतदार के घर ले जाने की बजाय अपने घर ले जाते थे। बर्गदारों ने आंदोलनकारी किसानों को भरपूर समर्थन दिया। बंगाल की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों- मुफ्फर अहमद, सुनील सेन तथा मोनी सिंह ने इस आंदोलन में मुख्य भूमिका निभायी।

इस आंदोलन में कई स्थानों पर महिलाओं ने न केवल सक्रियता से भाग लिया अपितु कुछ ने तो आंदोलन का नेतृत्व भी किया। काकद्वीप में इन्होंने आांदोलनकारियों के साथ मिलकर सभाओं एवं प्रदर्शनों में भाग लिया। ‘बंगीय प्रादेशिक किसान सभा' के नेतृत्व में चलाये गये इस आंदोलन के मुख्य केंद्र थ—संदेशखली, हरोआ, काकद्वीप, भंगार, सोनारपुर, कासननोंग और चौबीस परगना जिले का सुंदरवन क्षेत्र। इसके अतिरिक्त उत्तरी बंगाल के कई क्षेत्रों में भी जोरदार ढंग से आंदोलन चलाया गया। इन स्थानों में किसानों ने तिभागा का नारा बुलंद करते हुये जमींदारों एवं साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। आंदोलनकारियों की पुलिस के साथ कई स्थानों पर हिंसक झड़पें भी हुयीं।

स्वाधीनता के पश्चात भी यह आंदोलन उस समय तक जारी रहा, जब तक 1949 में बर्गदार अधिनियम नहीं बन गया।

तेलंगाना आंदोलनः यह आंदोलन, आधुनिक भारत के इतिह्रास का सबसे बड़ा कृषक गुरिल्ला युद्ध था, जिसने 3 हजार गांवों तथा 30 लाख लोगों को प्रभावित किया।

तेलंगाना क्षेत्र में स्थानीय देशमुखों ने पटेल तथा पटवारियों की मिली-भगत से स्थिति में पर्याप्त वृद्धि कर ली। इन देशमुखों को स्थानीय प्रशासन एवं पुलिस के साथ ही निजाम की सरकार का भी संरक्षण प्राप्त था।

इन देशमुखों ने किसानों तथा खेतिहर मजदूरों का भरपूर शोषण किया तथा इस क्षेत्र में इनके अत्याचारों की एक बाढ़ सी आ गयी। सामंती दमन तथा जबरन वसूली स्थानीय किसानों के भाग्य की नियति बन गये।

अपने प्रति किये जा रहे अत्याचारों से तंग आकर किसानों एवं खेतिहर मजदूरों ने शोषकों के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। कुछ समय पश्चात स्थानीय कम्युनिस्ट, मझोले कृषक तथा कांग्रेस संगठन भी इस अभियान में शामिल हो गये। इस आंदोलन में विद्रोहियों ने शोषकों के विरुद्ध गुरिल्ला आक्रमण की नीति अपनायी। युद्ध के दौरान कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले गुरिल्ला छापामारों ने आंध्र महासभा के सहयोग से पूरे तेलंगाना क्षेत्र के गांवों में अपनी अच्छी पैठ बना ली।

विद्रोह की शुरुआत जुलाई 1946 में तब हुयी, जब नालगोंडा के जंगांव तालुका में एक देशमुख की गांव के उग्रवादियों ने हत्या कर दी। शीघ्र ही विद्रोह वारंगल एवं कम्मम में भी फैल गया। किसानों ने संघम  के रूप में संगठित होकर देशमुखों पर आक्रमण प्रारंभ कर दिये। इन्होंने हथियारों के रूप में लाठियों, पत्थर के टुकड़ों एवं मिर्च के पाउडर का उपयोग किया। किंतु सरकार ने आंदोलनकारियों के प्रति अत्यंत निर्दयतापूर्ण रुख अपनाया। अगस्त 1947 से सितम्बर 1948 के मध्य आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था। हैदराबाद विलय के संदर्भ में भारतीय सेना ने जब हैदराबाद की विजित कर लिया तो यह आंदोलन अपने आप समाप्त हो गया।

तेलंगाना आंदोलन की कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां थीं, जो निम्नानुसार हैं-

⇨ गुरिल्ला छापामारों (वेठियों) ने गांवों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा बेगार प्रथा बिल्कुल समाप्त हो गयी।

⇨ खेतिहर किसानों की मजदूरियां बढ़ा दी गयीं।

⇨ अवैध रूप से कब्जा की गयी जमीन किसानों को वापस लौटा दी गयी।

⇨ लगान की दरों को तय करने तथा भूमि के पुनर्वितरण हेतु अनेक कदम उठाए गये।

⇨ सिंचाई-सुविधाओं में वृद्धि के लिये अनेक कदम उठाये गये तथा हैजे पर नियंत्रण के लिये प्रयास किये गये।

⇨ महिलाओं की दशा में उल्लेखनीय सुधार आया।

⇨ भारत की सबसे बड़ी देशी रियासत से अर्द्ध-सामंती व्यवस्था का उन्मूलन कर दिया गया।

⇨ आंदोलन ने भाषायी आधार पर आंध्र प्रदेश के गठन की भूमिका तैयार की।

किसान आंदोलन की उपलब्धियां

⇨ इन आंदोलनों ने स्वाधीनता के उपरांत किये गये विभिन्न कृषि सुधारों के लिये एक अनुकूल वातावरण का निर्माण किया। उदाहरणार्थ-जमीदारी प्रथा का उन्मूलन।

⇨ इन्होंने भूस्वामियों अर्थात किसानों को उनके वास्तविक अधिकारों से अवगत कराया तथा कृषि व्यवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ की।

⇨ ये आंदोलन राष्ट्रवादी विचारधारा पर अवलवित थे।

⇨ लगभग सभी क्षेत्रों में इन किसान आंदोलनों की प्रकृति समान थी।

⇨ इनसे किसानों में अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता बढ़ी।

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