जैव विकास Organic Evolution

पृथ्वी पर वर्तमान जटिल प्राणियों का विकास प्रारम्भ में पाए जाने वाले सरल प्राणियों में परिस्थिति और वातावरण के अनुसार होने वाले परिवर्तनों के कारण हुआ। सजीव जगत में होने वाले इस परिवर्तन को जैव-विकास (Organic evolution) कहते हैं।

विकास या इवोल्यूशन (Evolution) शब्द का शाब्दिक अर्थ लिपटी हुई वस्तु को खोलकर उसमें समय-समय पर हुए परिवर्तनों को दर्शाना' (e-out + volvere = to roll अर्थात् Unrolling or Unfolding to reveal the changes since the start of life) है।

जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अन्तर्गत जीवों की उत्पत्ति तथा उसके पूर्वजों का इतिहास तथा उनमें समय-समय पर हुए क्रमिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है, जैव विकास या उद्विकास (Evolution) कहलाता है।

जैव विकास से सम्बंधित सिद्धांत (Theory related to organic evolution): जैव विकास की व्याख्या के लिए कई प्रकार के विचार प्रस्तुत किये गए, परन्तु उनमें से अधिकांश को उचित प्रमाण के अभाव में वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिल सकी। फ्रांसीसी वैज्ञानिक जे.बी. लैमार्क (Jean Baptiste Lamarck) के उपार्जित लक्षणों (Acquired Characters) या लैमार्कवाद (Lamarckism) तथा चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन (Charles Robert Darwin) के प्राकृतिक चुनाव द्वारा जीवों का विकास (Origin of species by naturalselection) या डार्विनवाद (Darwinism) को ही सर्वप्रथम जैव विकास के सम्बन्ध में वैज्ञानिक मान्यता मिली।

लैमार्कवाद Lamarckism

लैमार्कवाद फ्रांसीसी प्रकृति वैज्ञानिक जे.बी. लैमार्क (Jean Baptiste Lamarck) ने सर्वप्रथम 1809 ई. में जैव विकास के अपने विचारों को अपनी पुस्तक फिलॉसफिक जूलौजिक (Philosophic Zoologique) में प्रकाशित किया। इसे लैमार्कवाद (Lamarckism) या उपार्जित लक्षणों का वंशागति सिद्धान्त (Theory of inheritance of acquired characters) कहते हैं।

लैमार्क के अनुसार जीवों की संरचना, कायिकी, उनके व्यवहार पर वातावरण (Environment) के परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ता है। परिवर्तित वातावरण के कारण जीवों के अंगों का उपयोग ज्यादा अथवा कम होता है। जिन अंगों का उपयोग अधिक होता है, वे अधिक विकसित हो जाते हैं, तथा जिनका उपयोग नहीं होता है, उनका धीरे-धीरे ह्रास हो जाता है। वातावरण के सीधे प्रभाव से या अंगों के कम या अधिक उपयोग के कारण जन्तु के शरीर में जो परिवर्तन होते हैं, उन्हें उपार्जित लक्षण (Acquired characters) कहते हैं। जन्तुओं के उपार्जित लक्षण वंशागत होते हैं, अर्थात् एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रजनन के द्वारा चले जाते हैं। ऐसा लगातार होने से कुछ पीढ़ियों के पश्चात उनकी शारीरिक रचना बदल जाती है तथा एक नए प्रजाति का विकास हो जाता है।


लैमार्कवाद का बाद में कई वैज्ञानिकों ने जोरदार खंडन किया। उन वैज्ञानिकों के अनुसार उपार्जित लक्षण वंशागत नहीं होते हैं। इसकी पुष्टि के लिए जर्मन वैज्ञानिक वाईसमैन (vveismann) ने 21 पीढ़ियों तक चूहे की पूंछ काटकर यह प्रदर्शित किया कि कटे पूंछ वाले चूहे की संतानों में हर पीढ़ी में पूंछ वर्तमान रह जाता है। लोहार की हाथों की माँसपेशियाँ हथौड़ा चलाने के कारण मजबूत हो जाती है, परन्तु उसकी संतानों में ऐसी मजबूत मांसपेशियों का गुण वंशागत नहीं हो पाता है। वैसे जीव जिनमें लैंगिक जनन होता है, जनन कोशिकाओं का निर्माण उनके जनद या जनन ग्रंथि का गोनड (Gonad) में होता है। शरीर की अन्य कोशिकाएँ कायिक कोशिकाएँ (somatic cells) कहलाती हैं। वातावरण के प्रभाव के कारण कायिक कोशिकाओं में होने वाले परिवर्तन संतानों में संचरित नहीं होते हैं। इसका कारण यह है कि कायिक कोशिकाओं में होने वाले परिवर्तन उनके साथ-साथ जनन कोशिकाओं में नहीं होते हैं।

 

डार्विनवाद (Darwinism)

जैव विकास परिकल्पना के संदर्भ में दूसरा सिद्धांत डार्विनवाद (Darwinism) के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धान्त को दो अंग्रेज वैज्ञानिकों आल्फ्रेड रसेल वैलेस (Alfred Russel Wallace) तथा चार्ल्स रॉबर्ट (Charles Robert Darwin) ने मिलकर प्रतिपादित किया था। दोनों वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से कार्य कर समान निष्कर्षों को निकाला था।

चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन नामक प्रसिद्ध अंग्रेज वैज्ञानिक ने जैव विकास की व्याख्या अपनी पुस्तक The Origin of species में व्यक्त की। जैव विकास का उनका सिद्धान्त प्राकृतिक चुनाव द्वारा प्राणियों का विकास (Origin of species by natural selection) या डार्विनवाद (Darwinism) कहलाता है। उनका यह सिद्धान्त उनके प्रसिद्ध समुद्री यात्रा के दौरान किए गए रोचक अवलोकनों पर आधारित है। उन्होंने यह समुद्री यात्रा 1831 ई. से 1836 ई. तक दक्षिण अमेरिका जाने वाले एक ब्रिटिश जहाज एच.एम.एस. बीगल (H.M.S. Beagle) से किया था। डार्विन के मतानुसार जीवों में प्रजनन के द्वारा अधिक-से-अधिक संतान उत्पन्न करने की क्षमता होती है। प्रत्येक जीव में अत्यधिक प्रजनन दर की तुलना में इस पृथ्वी पर जीवों के लिए भोजन तथा आवास नियत है। अतः जीवों में अपने अस्तित्व के लिए आपस में संघर्ष होने लगता है। अस्तित्व के लिए संघर्ष दूसरे प्रजातियों के साथ-साथ प्रकृति या वातावरण के साथ भी होता है।

प्रकृति में कोई दो जीव बिल्कुल एक समान नहीं होते हैं। उनमें कुछ-न-कुछ असमानताएँ अवश्य होती हैं। जीवों में विभिन्नताओं की अधिकता के फलस्वरूप जीवन के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। जीवन के लिए संघर्ष में वही जीव योग्यतम होते हैं, जो सबसे अधिक योग्य गुणों वाले होते हैं। अयोग्य गुण वाले जीव नष्ट हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में प्रकृति योग्यतम तथा अनुकूल विभिन्नताओं वाले जीवों को चुन लेती है तथा अयोग्य एवं प्रतिकूल विभिन्नता वाले जीवों को नष्ट कर देती है। जीवन संघर्ष में सफल सदस्य अधिक समय तक जीवित रहते हैं और अपनी वंशानुक्रम (Inheritance) को जारी रखने में योगदान देते हैं। इसी को एक अंग्रेज दार्शनिक हरबर्ट स्पेन्सर (Herbert spencer) ने सामाजिक विकास के सन्दर्भ में योग्यतम की अतिजीविता (survival of fittest) तथा इसी को जैव विकास के संदर्भ में डार्विन ने प्राकृतिक चयन (Natural selection) कहा।

जीवन संघर्ष में सफल सदस्यों की वंशागति बढ़ने से प्रत्येक पीढ़ी के सदस्य अपने पूर्वजों से भिन्न हो जाते हैं। यही विभिन्नता हजारों लाखों वर्षों के बाद नई जातियों का निर्माण करती है। उन्होंने कहा कि प्रकृति भी इसी प्रकार चुनाव के द्वारा सफल सदस्यों को प्रोत्साहित कर नई जातियों की उत्पत्ति करती है। इसीलिए डार्विनवाद प्राकृतिक चयनवाद (Theory of natural selection) कहलाता है। सन् 1858 में डार्विन और वैलेस ने अपने कार्यों को संयुक्त रूप से प्राकृतिक चयनवाद के नाम से प्रकाशित किया।

डार्विनवाद की आलोचना-

  1. डार्विन ने विकासवाद को आनुवंशिकता के आधार पर नहीं समझाया था।
  2. डार्विन के अनुसार नई जातियों की उत्पत्ति के लिए विभिन्नताएँ उत्तरदायी थीं लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार छोटी-छोटी भिन्नताओं से नई जातियों की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।
  3. वैज्ञानिकों ने डार्विन के लिंग चयनवाद को भी गलत ठहराया है।
  4. वंशागत लक्षणों वाले जीव जब एक-दूसरे जीवों के साथ मैथून करते हैं, जिनमें ये लक्षण नहीं होते, तो इन दोनों के मिलन से लक्षणों का प्रभाव कम नहीं होता है। डार्विन इसकी व्याख्या नहीं कर सके।
  5. प्रकृति वरणवाद ने किसी अंग के विशिष्टिकरण को नहीं बताया जिसके कारण कुछ जातियाँ नष्ट हो गई।

 

 

नवडार्विनवाद

नवडार्विनवाद को आधुनिक सांश्लेषिकवाद परिकल्पना (Modern synthetic theory) भी कहते हैं। नव डार्विनवाद निम्नलिखित प्रक्रमों की पारस्परिक क्रियाओं का परिणाम है।

  1. जीन उत्परिवर्तन (Gene mutation): जीन के DNA अणु में न्यूक्लियोटाइड्स (Nucleotides) की संख्या अथवा विन्यास के क्रम में आनेवाले उन परिवर्तनों को जीन उत्परिवर्तन कहते हैं जो सामान्य जीन की अभिव्यक्ति में परिवर्तन करते हैं।
  2. गुणसूत्रों की संरचना एवं संख्या में परिवर्तन द्वारा विभिन्नताएँ (variation due to change instructure and number of chromosome): गुणसूत्रों पर आलग्न जीनों की संख्या अथवा विन्यास के परिवर्तन के द्वारा गुणसूत्रों की संरचना में परिवर्तन आ जाता है जिसे गुणसूत्र विपथन (chromosomal aberration) कहते हैं।
  3. आनुवंशिक पुनर्योजन (Genetic recombination): लैंगिक जनन की क्रिया में युग्मक निर्माण के समय अर्द्धसूत्री विभाजन होता है। अलग होते समय गुणसूत्रों में पारस्परिक जीन विनिमय (Crossing over) के फलस्वरूप नए जीन विन्यास बनते हैं, जिनसे जीवों में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती हैं। संकरण (Hybridization) द्वारा भी जीनों का पुनर्योजन होता है।
  4. पृथक्करण (Isolation): एक ही जाति की विभिन्न समष्टियाँ (Population) जब भौगोलिक कारणों से पृथक हो जाती हैं तो उनकी जीनी संरचना में पर्यावरण के अनुरूप तथा जीन उत्परिवर्तन, गुणसूत्र विपथन तथा बहुगुणिता द्वारा नई विभिन्नताएँ संकलित होने लगती हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती ही जाती हैं।

उत्परिवर्तनवाद (Mutation theory): हॉलैण्ड के पादपशास्त्री ह्यूगोडीब्रीज (Hugo de-vries) ने 1901 ई. में नई जीव-जातियों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में एक नया उत्परिवर्तन सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसे नव-डार्विनवाद (Neo Darwinism) के रूप में भी जाना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार नई जीव-जातियों की उत्पत्ति जातीय लक्षणों में क्रमिक विकास व अस्थिर विभिन्नता के कारण नहीं होती बल्कि एक ही बार में स्पष्ट एवं स्थायी आकस्मिक परिवर्तनों के फलस्वरूप होती है। जाति का वह सदस्य जिसमें पहली बार उत्परिवर्तित लक्षण दृष्टिगोचर होता है, उत्परिवर्तक (Mutant) कहलाता है। उत्परिवर्तन में अनिश्चितता होने के कारण यह उत्परिवर्तन के लिए लाभदायक, निरर्थक या हानिकारक हो सकते हैं। जाति के विभिन्न सदस्यों में विभिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन संभव हैं। फलस्वरूप एक पूर्वज जाति से एक साथ नई जातियों की उत्पत्ति हो जाती है।

पुनरावर्तन सिद्धांत (Recapitulation theory): जर्मन वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैकल (Ernst Heckel) ने उच्च प्राणियों के भ्रूणीय परिवर्द्धन एवं उनके पूर्वजों के विकासीय इतिहास में समानता के आधार पर पुनरावर्तन सिद्धांत या जाति-आावर्तन सिद्धान्त (Biogeneticlaw) प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक जीव अपने भ्रूणीय परिवर्द्धन में अपनी जाति के जातीय विकास की इतिहास की पुनरावृत्ति करता है। (Ontogeny recapitulates phylogeny) इस सिद्धान्त की मुख्य विशेषता यह है कि किसी जीव की भ्रूणीय अवस्थाएँ उनके पूर्वजों की वयस्क अवस्थाओं के समान होती है। इसी प्रकार विभिन्न कशेरुकियों (vertebrates) के भ्रूणों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उच्च कशेरुकियों के भ्रूण निम्न वर्गों के वयस्क जन्तुओं के समान होते हैं।

जीवों की तुलनात्मक रचना (Comparative anatomy of organisms):

  1. समजातता (Homology): ऐसे अंग जो विभिन्न कार्यों में उपयोग होने के कारण काफी असमान हो सकते हैं लेकिन उसकी मूल संरचना एवं भ्रूणीय प्रक्रिया में समानता होती है, समजात अंग (Homologous Organs) कहलाते हैं। इसी को अंगों की समजातता कहते हैं। समजात अंगों की रक्त एवं तंत्रिकीय संरचना में भी समजातता होती है। यह समजातता अपसारी जैव विकास (Divergent evolution) अर्थात् पूर्वज से विभिन्न दिशाओं में हुए जैव विकास को प्रमाणित करती है।
  2. समरूपता (Analogy): ऐसे अंग जो समान कार्यों में उपयोग होने के कारण समान दिखाई पड़ते हैं, लेकिन उनकी मूल संरचना एवं भ्रूणीय प्रक्रिया में भिन्नता पायी जाती है, समरूप अंग (Analogous organ) कहलाते हैं। यह समरूपता अभिसारी जैव विकास (Convergent evolution) अर्थात् भिन्न पूर्वजों से एक ही दिशा में हुए जैव विकास को प्रमाणित करती है।
  3. अवशेषी अंग (vestigial organs): विकसित जन्तुओं में पाए जाने वाले कुछ स्पष्ट किन्तु अद्धविकसित एवं निष्क्रिय अनुपयोगी अंग या अंगों के भाग अवशेषी अंग (vestigial organs) कहलाते हैं। जैसे- शुतुर्मुर्ग के पंख, आस्ट्रेलिया के एमू (Emu) एवं केसीवरी के पंख, न्यूजीलैंड के कीवी के पंख, डोडो (वर्तमान में विलुप्त) के पंख आदि। इनके पूर्वजों में पंख पूर्ण विकसित थे लेकिन वातावरणीय प्रभाव के कारण एवं उनकी उपयोगिता समाप्त हो जाने के कारण उद्विकास के क्रम में क्रमिक लोप की दिशा में अवशेषी अंगों के रूप में है। मनुष्य में एपेन्डिक्स (Apendix) भी अवशेषी अंग का उदाहरण है।
  4. संयोजक कड़ी (Connecting link): वे जीव जातियाँ जो अपने से कम विकसित जातियों तथा अपने से अधिक विकसित उच्च कोटि की जातियों की सीमा रेखा अर्थात् दोनों ही (निम्न एवं उच्च) जातियों के लक्षण का सम्मिश्रण होता है, संयोजक जातियाँ कहलाती हैं। इनके द्वारा जैव विकास का ठोस प्रमाण मिलता है।

उदाहरण:

(i) यूग्लीना: संघ प्रोटोजोआ, क्लोरोफिल युक्त पादपों एवं जन्तुओं के संयोजक के रूप में होते हैं।

(ii) प्रोटीरोस्पंजिया (Proterospongia): संघ प्रोटोजोआ, एककोशिकीय सदस्य, इन्हीं के पूर्वजों से स्पंज (sponge) की उत्पत्ति।

(iii) निओपिलाइना (Neopilina): संघ मोलस्का, ऐनीलिडा के सदस्यों से अधिक विकसित अकशेरुकी जन्तु, मोलस्का एवं एनीलिडा के संयोजक के रूप में।

(iv) पैरीपेटस (Peripatus): संघ आश्रोपोडा, यह एनीलिडा एवं आश्रोपोडा के बीच का संयोजक है तथा एनीलिडा से आश्रोपोडा के उद्विकास को प्रमाणित करता है।

(v) आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx): वर्तमान में विलुप्त, यह सरीसृपों एवं पक्षियों के बीच का संयोजक था। यह पक्षी वर्ग का जन्तु था क्योंकि इसके पंख अधिक विकसित थे।

(vi) प्रोटीथीरिया (Prototheria): निम्नकोटि के स्तनधारियों का उपवर्ग, वर्तमान में इसकी तीन श्रेणियाँ हैं- एकिडना (Echidina), जैग्लोसस (zaglossus), एवं आर्निथोरिंकस (Ornithorhynchus) ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूगिनी में पाये जाने वाले ये सरीसृपों एवं स्तनधारियों के संयोजक जन्तु हैं।

जैव विकास से सम्बंधित नियम (Law related to organic evolution):

  1. ऐलेन का नियम (AIlen's law): अत्यधिक ठण्डे प्रदेशों में रहने वाली जन्तु जातियों में शरीर के खुले भाग जैसे-पूंछ, कान, पाद आदि क्रमशः छोटे होते जाते हैं ताकि इनके माध्यम से ताप हानि कम हो।
  2. बर्जमान का नियम (Bergmann's law): नियत्तापी (warm Blooded) जंतुओं में ठण्डे प्रदेशों में रहने वाले सदस्यों का शरीर अधिकाधिक बड़ा होता जाता है।
  3. कोप का नियम (Cope's law): जैव विकास के लम्बे इतिहास में जन्तुओं में शरीर के अधिकाधिक बड़े होते रहने की प्रवृति रही है।
  4. ग्लोगर का नियम (Gloger's law): गर्म व नम प्रदेशों के नियततापी जन्तुओं में मिलेनिन रंग अधिक होती है।
  5. गॉसी का नियम (Gouse's law): ऐसी दो जीव जातियाँ जिनकी वातावरणीय आवश्यकताएँ बिल्कुल समान होती हैं अनिश्चित काल तक एक ही स्थान पर नहीं बनी रह सकती।

आनुवंशिकी एवं जैव विकास से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण शब्दावलियाँ:

  1. युग्म विकल्पी (Aneles): एक ही गुण के विभिन्न विपर्यायी रूपों को प्रकट करने वाले लक्षण कारकों को एक-दूसरे का युग्म विकल्पी या एलील (Allele) या एलीलोमार्फ (Allelomorph) कहते हैं। जैसे- किसी पुष्प का रंग लाल, हरा व पीला को क्रमशः R,G,Y से प्रकट करते हैं। इसी प्रकार लम्बा (T) तथा बौना (t) भी युग्म विकल्पी है।
  2. समयुग्मजी (Homozygous): जब किसी गुण के युग्म विकल्पी या एलील समान हो, तो उसे समयुग्मजी (Homozygous) कहते हैं। जैसे- लम्बा पौधा (TT), बौना पौधा (tt) आदि।
  3. विषमयुग्मजी (Heterozygous): यदि समजातीय कारकों में दोनों कारक एक-दूसरे के विपर्यायी हों अर्थात् उनमें एक प्रभावी तथा दूसरा अप्रभावी हो, तो वह जोड़ा विषमयुग्मजी या संकर (Hybrid) कहलाता है। जैसे- संकर लम्बा पौधा (Tt) 4. समलक्षणी (Phenotype): जीवधारी के जो लक्षण प्रत्यक्ष रूप से दिखलायी पडते हैं, उसे समलक्षणी या फीनोटाइप (Phenotype) कहते हैं।
  4. समजीनी (Genotype): किसी जीव की जीनी संरचना उस जीव का समजीनी या जीन प्ररूप या जीनोटाइप (Genotype) कहलाता है।
  5. सहलग्नता (Linkage): जब दो विभिन्न लक्षण एक ही गुणसूत्र पर बँधे होते हैं, तो उनकी वंशागति स्वतंत्र न होकर एक साथ ही होती है। इस घटना को मॉर्गन (Morgan) ने सहलग्नता (Linkage) कहा। यह मेंडल के नियम का अपवाद है।
  6. जीन विनिमय (Crossing over): अर्द्धसूत्री विभाजन की प्रोफेज अवस्था की सिनेप्सिस क्रिया के दौरान समजाती गुणसूत्रों के नान-सिस्टर क्रोमेटिड (Nonsister chromatids) में संगत आनुवंशिक अण्डों का पारस्परिक विनिमय होता है जिससे सहलग्न जीनों के नये संयोजन बनते हैं। इसके द्वारा माता और पिता के गुणों का विनिमय होता है और संतान में दोनों के गुण आते हैं।
  7. गुणसूत्र (Chromosomes): केन्द्रक द्रव्य में उलझी हुई महीन धागों के समान की संरचना पायी जाती है, जिसे क्रोमेटिन जालिका (Chromatin network) कहते हैं। क्रोमेटिन की जालिका कोशिका विभाजन के समय टुकड़ों में बँटकर धागे (Thread) की तरह रचनाएँ बनती हैं जिन्हें गुणसूत्र या क्रोमोसोम (Chromosomes) कहते हैं। किसी खास जाति के जीव के लिए गुणसूत्र की संख्या निश्चित होती है। गुणसूत्र छोटे तथा मोटे छड़नुमा संरचना के रूप में होते हैं। गुणसूत्र के द्वारा आनुवंशिक गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ले जाये जाते हैं। अर्थात् गुणसूत्र आनुवंशिक गुणों के वाहक होते हैं। गुणसूत्र का निर्माण DNA तथा प्रोटीन अणुओं द्वारा होता है। युग्मकों (Gametes) में विभिन्न गुणसूत्रों का केवल एक-एक प्रतिरूप होता है जिसे अगुणित (Haploid) य जीनोम (Genorne) कहते हैं। कायिक कोशिकाओं (somatic cells) में इस तरह के दो-दो प्रतिरूप होते हैं, जिसे द्विगुणित गुणसूत्र (Diploid chromosomes) कहते हैं।
  8. सेक्स क्रोमोसोम (sex chromosome): लिंग निर्धारण में भाग लेने वाले क्रोमोसोम को सेक्स क्रोमोसोम कहते हैं। ये गुणसूत्र नर एवं मादा दोनों पौधों या जन्तुओं में अलग-अलग होते हैं।
  9. 10. ऑटोसोम्स (Autosomes): ये गुणसूत्र नर एवं मादा में समान रूप से पाये जाते हैं। ये गुणसूत्र कायिक कोशिकाओं में पाये जाते हैं।
  10. जीन (Gene): DNA का वह छोटा खण्ड जिनमें आनुवंशिक कृट निहित होता है, जीन कहलाता है। जीन शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम जोहान्सन (Johhansen) ने 1909 ई. में किया था।
  11. जीनोम (Genome): गुणसूत्र में पाये जाने वाले आनुवंशिक पदार्थ को जीनोम कहते हैं।
  12. प्लाज्माजीन (Plasmagene): क्रोमोसोम के बाहर जीन यदि कोशिका द्रव्य के कोशिकांगों में होती है, तो उन्हें प्लाज्माजीन कहते हैं।
  13. उत्परिवर्तन (Mutation): उत्परिवर्तन ऐसे असतत आनुवंशिक परिवर्तन होते हैं, जो अचानक उत्पन्न होते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनका स्थानान्तरण होता रहता है।
  14. आनुवंशिकी (Genetics): माता-पिता से संतानों में विभिन्न लक्षणों के स्थानान्तरण का विषय तथा उससे सम्बन्धित कारणों और नियमों का अध्ययन आनुवंशिकी कहलाता है। जेनेटिक्स (Genetics) शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्ल्यू वाटसन ने 1905 ई. में किया था।
  15. बैक क्रॉस (Back Cross): यदि प्रथम पीढ़ी के जीनोटाइप से पितृपीढ़ी के जीनोटाइप में शुद्ध या संकर प्रकार को संकरण कराया जाए तो यह क्रॉस बैक क्रॉस कहलाता है।
  16. टेस्ट क्रॉस (Test Cross): यदि प्रथम पीढ़ी (F1) के जीनोटाइप से पितृपीढ़ी (P) के जीनोटाइप में (शुद्ध या संकर =TT या Tt) संकरण कराया जाए तो यह बैक क्रॉस कहलाता है, परन्तु जब प्रथम पीढ़ी (F1) के जीनोटाइप से पितृपीढ़ी (P) के जीनोटाइप संकर (Hybrid) अप्रभावी (Recessive) जैसे- tt से संकरण कराया जाए तो यह टेस्ट क्रॉस कहलाता है।
  17. एक जीन एक एन्जाइम (One gene one enzyme theory): एक जीन के द्वारा एक एन्जाइम का संश्लेषण होता है। इस सिद्धान्त की खोज बीडल और टेटम (Beadle and Tatum) ने 1948 में की।
  18. इंडियोग्राम (Indiogram): किसी कैरियोटाइप के पहचाने गए गुणसूत्रों के समजातीय जोड़ों को जब लम्बाई के गिरते हुए क्रम में व्यवस्थित करने के बाद किसी निश्चित पैमाने पर आरेख रूप में दशयिा जाता है, तो उसे इंडियोग्राम कहते हैं।
  19. सुजननिकी (Eugenics): यह आनुवंशिकी की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत मानव जाति के समाज को आनुवंशिक नियमों के द्वारा सुधारने सम्बन्धी अध्ययन किया जाता है। सर फ्रांसिस गाल्टन (Sir Francis Galton) ने सर्वप्रथम सुजननिकी नामक नई शाखा का नाम दिया। इसीलिए गाल्टन को सुजननिकी का जनक कहा जाता है।
  20. वेसेक्टोमी (vasectomy): पुरुषों का बंध्याकरण वेसेक्टोमी कहलाता है।
  21. ट्यूबेक्टोमी (Tubectomy): महिलाओं का बंध्याकरण ट्यूबेक्टोमी कहलाता है।
  22. यूथेनिक्स (Euthenics): इसमें मानव के उच्च आनुवंशिक लक्षणों को उत्तम पालन पोषण एवं शिक्षा द्वारा विकास का अध्ययन किया जाता है।
  23. कारक (Factors): आनुवंशिक लक्षणों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी ले जाने वाले लक्षण को कारक (Factor) कहा जाता है।
  24. रंग वर्णान्धता (Colour blindness): इसे डाल्टोनिज्म (Daltonism) भि कहते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति लाल एवं हरे रंग का भेद नहीं कर पाते हैं। यह लिंग सम्बन्धित रोग है जो वंशागति के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है।
  25. हीमोफिलिया (Haemophilia): यह भी मनुष्यों में होने वाला एक लिंग सहलग्न रोग है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति में चोट के काफी समय के बाद तक भी रक्त लगातार बहता रहता है। अतः इसे रक्त स्रावण रोग (Bleeder's disease) भी कहते हैं। यह रोग प्रायः पुरुषों में पाया जाता है। यह रोग भी वंशागति द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है।
  26. हँसियाकार रक्ताणु ऐनीमिया (sickle cell anaemia): इस रोग में ऑक्सीजन की कमी की वजह से RBC के हीमोग्लोबिन सिकुड़कर हँसिया (sickle) की आकृति के हो जाते हैं। यह रोग सुप्त जीन के कारण होता है। इस रोग में ऑक्सीजन की कमी के कारण RBC हँसिया के आकार की होकर फट जाती है जिससे हीमोलिटिक एनीमिया (Haemolytic anaemia) रोग हो जाता है।
  27. डाउन्स सिंड्रोम (Down's syndrome): इसमें 21वीं जोड़ी के गुणसूत्र दी के जगह तीन होते हैं अर्थात् ऐसे व्यक्ति में गुणसूत्रों की संख्या 47 होती है। इस सिन्ड्रॉम वाला व्यक्ति छोटे कद एवं मंदबुद्धि वाला होता है। इसमें जननांग समान लेकिन पुरुष नपुंसक होते हैं। इसे मंगोली जड़ता (Mongoloid Idiocy) भी कहते हैं।
  28. क्लाइनफेल्टर्स सिन्ड्रोम (Klinefelter's syndrome): इसमें लिंग गुणसूत्र दो के स्थान पर तीन और प्रायः XXY होते हैं। इसमें एक अतिरिक्त X-गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण वृषण (Testes) होते हैं और उनमें शुक्राणु (sperms) नहीं बनते। ऐसे पुरुष नपुंसक होते हैं।
  29. टरनर्स सिन्ड्रोम (Turner's syndrome): ये ऐसी स्थितियाँ होती हैं जिनमें केवल एक X-गुणसूत्र पाया जाता है। इनका कद छोटा होता है तथा जननांग अल्पविकसित होता है। वक्ष चपटा तथा जनद अनुपस्थित या अल्पविकसित होते हैं। ये नपुंसक होती है।
  30. फीनाइल कीटोनूरिया (Phenylketonuria): बच्चों के तंत्रिका ऊतक में फीनाइल ऐलेमीन के जमाव से अल्पबुद्धिता (Mental Deficiency) आ जाती है। इस रोग में फीनाइल ऐलेमीन को टाइरोसीन नामक ऐमीनो अम्ल में बदलने वाले एन्जाइम फीनाइल ऐलेमीन हाइड्रोक्सीलेज की कमी होती है।
  31. बुद्धिलब्धि (Intelligence quotient):

बुद्धिलब्धि (IQ) = मानसिक आयु / वास्तविक आयु × 100

  1. आनुवंशिक लक्षण (Hereditary characters) वैसे लक्षण जो माता-पिता से सन्तान में पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचते रहते हैं, आनुवंशिक लक्षण कहलाते हैं।
  2. ट्रांसक्रिप्शन (Transcription): DNA से RNA के संश्लेषण को ट्रांसक्रिप्शन जाता है।
  3. ट्रांसलेशन (Translation): प्रोटीन बनने की अन्तिम क्रिया को ट्रान्सलेशन कहते हैं।
  4. विभिन्नता (variation): विभिन्नता जीव के ऐसे गुण हैं जो उसे अपने जनकों अथवा अपनी ही जाति के अन्य सदस्यों के उसी गुण के मूल स्वरूप से भिन्नता दर्शाते हों।
  5. जननिक विभिन्नता (Germinal variation): जनन कोशिकाओं के क्रोमोसोम या जीन की संरचना या संख्या में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली विभिन्नता को जननिक विभिन्नता कहते हैं। इसे आनुवंशिक विभिन्नता भी कहा जाता है, क्योंकि ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संचरित होती है।
  6. कायिक विभिन्नता (somatic variation): जलवायु एवं वातावरण का प्रभाव उपलब्ध भोजन के प्रकार, अन्य उपस्थित जीवों के साथ परस्पर व्यवहार इत्यादि के कारण उत्पन्न होने वाली विभिन्नता कायिक विभिन्नता कहलाती है। इस प्रकार की विभिन्नता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत नहीं होती है। ऐसी विभिन्नताएँ उपार्जित (acquired) होती हैं।
  7. इमैसकुलेशन (Emasculation): पुष्प की परिपक्वता के पहले परागकोष को हटा दिए जाने की क्रिया को इमैसकुलेशन कहते हैं।
  8. एकसंकरण क्रॉस (Monohybrid cross): जब दो पौधों के बीच एक इकाई लक्षण के आधार पर संकरण कराया जाता है, तो उसे एकसंकरण क्रॉस कहते हैं।
  9. दिसंकरण क्रॉस (Dihybrid cross): जब दो पौधों के बीच दो जोड़े विपरीत लक्षण के आधार पर संकरण कराया जाता है, तो उसे द्विसंकरण क्रॉस कहते हैं।
  10. लिंग निर्धारण (sex determination): व्यक्तियों में लिंग निर्धारित होने की प्रक्रिया को लिंग निर्धारण कहते हैं। व्यक्ति के लिंग निर्धारण में आनुवंशिकी का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
  11. जैव विकास (Organic evolution): जैव विकास जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत जीवों की उत्पत्ति तथा उनके पूर्वजों का इतिहास एवं उनमें समय-समय पर हुए क्रमिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।
  12. उपार्जित लक्षण (Acquired character): वातावरण के सीधे प्रभाव से या अंगों के कम या अधिक उपयोग के कारण जन्तु के शरीर में जो परिवर्तन होते हैं, उन्हें उपार्जित लक्षण कहते हैं।
  13. समजात अंग (Hornologous organ): भिन्न-भिन्न वातावरण में रहनेवाले जन्तुओं के ऐसे अंग जो संरचना एवं उत्पत्ति की दृष्टिकोण से एकसमान होते हैं परन्तु अपने वातावरण के अनुसार वे भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करते हैं, समजात अंग कहलाते हैं।
  14. असमजात अंग (Analogous organ): भिन्न-भिन्न जन्तुओं में पाये जाने वाले वैसे अंग जो संरचना एवं उत्पत्ति की दृष्टिकोण से एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, परन्तु एक ही प्रकार का कार्य करते हैं, असमजात अंग कहलाते हैं।
  15. जीवाश्म विज्ञान (Palaeontology): जीवाश्मों का अध्ययन जीवाश्म विज्ञान कहलाता है।

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