समाजवाद एवं क्रांतिकारी आतंकवाद Socialism And Revolutionary Terrorism

अहिंसा के सिद्धांत पर आधारित राजनीतिक संघर्ष की रणनीति से असंतुष्ट युवाओं का झुकाव धीरे-धीरे समाजवाद की ओर होने लगा। स्वराजियों एवं परिवर्तन विरोधियों के कार्यक्रमों से भी ये संतुष्ट नहीं हो सके। फलतः ये समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर इस ओर आकृष्ट होने लगे। इसके परिणामस्वरूप क्रांतिकारी आतंकवाद की दो धारायें विकसित हुयीं-

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन - पंजाब, उत्तर प्रदेश एवं बिहार में

युगान्तर, अनुशीलन समितियां तथा कालांतर में बंगाल में सूर्यसेन के नेतृत्व में चटगांव विद्रोह समूह।

19वीं शताब्दी के दूसरे एवं तीसरे दशक में क्रांतिकारी आतंकवाद

असहयोग आंदोलन के पश्चात् लोगों के क्रांतिकारी आंतकवाद की ओर आकर्षित होने  के कारण 

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान क्रांतिकारी आतंकवाद का निर्ममता से दमन किया गया। अनेक क्रांतिकारी भूमिगत हो गये, कई जेल में डाल दिये गये तथा कई इधर-उधर बिखर गये। 1920 के प्रारम्भ में सरकार ने जेल में बंद विभिन्न क्रांतिकारी आतंकवादियों को आम माफी देकर रिहा कर दिया। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि सरकार मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों को लागू करने के लिये देश में सद्भावना का वातावरण बनाना चाहती थी। शीघ्र ही गांधीजी ने असहयोग आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। इसके पश्चात् गांधीजी, सी.आर. दास तथा अन्य नेताओं की अपील पर जेल से रिहा क्रांतिकारी आतंकवादियों में से अधिकांश असहयोग आंदोलन में सम्मिलित हो गये तथा अन्य ने अहिंसक असहयोग आंदोलन को समर्थन देने के निमित्त आतंकवाद का रास्ता छोड़ दिया।

लेकिन गाँधी द्वारा असहयोग आन्दोलन को एकाएक स्थगित कर दिए जाने के कारण इनमें से अनेक अत्यधिक असंतुष्ट हो गये। जनआंदोलन की आंधी में सब कुछ छोड़कर असहयोग आंदोलन से जुड़ जाने के कारण वे महसूस करने लगे कि उनके साथ विश्वासघात किया गया है। इनमें से अधिकांश ने राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति तथा अहिंसा के सिद्धांत पर प्रश्नचिन्ह लगाना प्रारम्भ कर दिया तथा किसी विकल्प की तलाश करने लगे। स्वराजियों के संसदीय संघर्ष तथा परिवर्तन विरोधियों (नो चेंजर्स) के रचनात्मक कार्य भी इन युवाओं को आकृष्ट नहीं कर सके। इनमें से अधिकांश इस बात पर विश्वास करने लगे कि सिर्फ हिंसात्मक तरीके से ही स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है। इस प्रकार क्रांतिकारी आतंकवाद पुनर्जीवित हो उठा।

क्रांतिकारी आतंकवादी विचारधारा के सभी प्रमुख नेताओं ने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी। इनमें जोगेश चन्द्र चटर्जी, सूर्यसेन, भगत सिंह, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, शिव वर्मा, भगवती चरण वोहरा, जयदेव कपूर व जतिन दास के नाम सबसे प्रमुख हैं। इस काल में क्रांतिकारी आतंकवाद की दो विभिन्न धारायें विकसित हुयीं- एक पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा बिहार में तथा दूसरी बंगाल में।

प्रभावकारी कारक

  1. युद्ध के पश्चात् मजदूर तथा श्रमिक संघवाद का उदय;  क्रांतिकारी आतंकवादी नए उभरते हुए वर्ग की क्रांतिकारी उर्जा को राष्ट्रवादी क्रांति में लगाना चाहते थे।
  2. 1917 की रूसी क्रांति तथा युवा सोवियत राज्य का गठन।
  3. नये साम्यवादी समूहों का उदय; ये मार्क्सवाद, समाजवाद एवं दरिद्रतम श्रमिक वर्ग के हितों के पक्षधर थे।
  4. क्रांतिकारियों द्वारा प्रकाशित विभिन्न पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकायें, इनमें विभिन्न क्रांतिकारियों के त्याग एवं बलिदान का गुणगान किया गया। इनमें आत्मशक्ति, सारथी एवं बिजली का नाम उल्लेखनीय है।
  5. उपन्यास एवं पुस्तकें, जैसे- सचिन सान्याल की दी जीवन तथा शरदचन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित पाथेर दाबी प्रमुख थीं। (बाद में अत्यधिक लोकप्रिय होने के कारण सरकार ने पाथेर दाबी प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया)।

पंजाब, उत्तर प्रदेश एवं बिहार में क्रांतिकारी आतंकवादी गतिविधियों का संचालन मुख्य रूप हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन या आर्मी ने किया। (कालांतर में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया गया)। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए.) की स्थापना अक्टूबर 1924 में कानपुर में की गयी। कानपुर में क्रांतिकारी युवकों के एक अधिवेशन में रामप्रसाद बिस्मिल, योगेश चन्द्र चटर्जी एवं सचीन्द्रनाथ सान्याल (सचिन सान्याल) ने अन्य क्रांतिकारियों के सहयोग से इसकी स्थापना की। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकना तथा संघीय गणतंत्र संयुक्त राज्य भारत (यूनाइटेड स्टेट्स आफ इंडिया) की स्थापना करना था। जिसका मुख्य आधार वयस्क मताधिकार हो।

काकोरी कांड अगस्त 1925

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का सबसे प्रमुख कार्य ‘काकोरी डकैती’ था। 9 अगस्त 1925 को एसोसिएशन के सदस्यों ने सहारनपुर-लखनऊ लाइन पर 8 डाउन रेलगाड़ी को काकोरी नामक गांव में रोककर रेल विभाग के खजाने को लूट लिया। सरकार इस घटना से अत्यन्त क्रोधित हो। गयी। उसने भारी संख्या में आतंकवादियों को गिरफ्तार कर उन पर काकोरी षड़यंत्र का मुकदमा चलाया। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, राजेन्द्र लाहिड़ी तथा रोशन सिंह को फांसी दे दी गयी, चार को आजीवन कारावास की सजा देकर अंडमान भेज दिया गया तथा 17 अन्य लोगों को लंबी सजायें सुनायी गयीं। चन्द्रशेखर आजाद फरार हो गये। काकोरी षड़यंत्र कांड से उत्तर भारत के पूर्णतया दमन नहीं हो सका।

काकोरी षड़यंत्र केस से क्रांतिकारी और भड़क उठे तथा कई और युवा क्रांतिकारी संघर्ष के लिये तैयार हो गये। उत्तर प्रदेश में शिव वर्मा, जयदेव कपूर तथा विजय कुमार सिन्हा तथा पंजाब में भगत सिंह, सुखदेव तथा भगवती चरण वोहरा ने चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की पुनः संगठित करने का काम प्रारम्भ कर दिया। इन युवा क्रांतिकारियों पर धीरे-धीरे समाजवादी विचारधारा का प्रभाव भी पड़ने लगा। दिसम्बर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में युवा क्रांतिकारियों की एक बैठक आयोजित की गयी, जिसमें युवा क्रांतिकारियों ने सामूहिक नेतृत्व को स्वीकारा तथा समाजवाद की स्थापना को अपना लक्ष्य निर्धारित किया। बैठक में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (एच.एस.आर.ए.) रख दिया गया।

साण्डर्स हत्याकांड लाहौर, दिसम्बर 1928

धीरे-धीरे जब हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारी विध्वंसक तथा क्रांतिकारी गतिविधियों से दूर होते जा रहे थे, उसी समय नवम्बर 1928 में शेर-ए-पंजाब लाला लाजपत राय की लाठी चार्ज से हुयी मृत्यु से वे पुनः भड़क उठे।

1928 में लाहौर में साइमन कमीशन के भारत दौरे का विरोध करने हेतु एक प्रदर्शन आयोजित किया गया। प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। लाहौर में सहायक पुलिस कप्तान साण्डर्स ने साइमन कमीशन के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर लाठी चार्ज का आदेश दे दिया। इसके परिणामस्वरूप लाला लाजपत राय को संघातिक चोट लगी तथा 15 नवम्बर 1928 को उनकी मृत्यु हो गयी। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के तीन प्रमुख सदस्यों भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद तथा राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मौत के लिये साण्डर्स को दोषी मानते हुए 17 दिसम्बर 1928 को साण्डर्स की हत्या कर दी। साण्डर्स की हत्या को इन शब्दों द्वारा न्यायोचित करार दिया गया- “देश के करोड़ों लोगों के सम्माननीय नेता की एक साधारण पुलिस अधिकारी के क्रूर हाथों द्वारा की गयी हत्या..... राष्ट्र का घोर अपमान है। भारत के देशभक्त युवाओं का यह कर्तव्य है कि वे इस कायरतापूर्ण हत्या का बदला लें..... हमें साण्डर्स की हत्या का अफसोस है किन्तु वह उस अमानवीय व्यवस्था का एक अंग था, जिसे नष्ट करने के लिये हम संघर्ष कर रहे हैं।”

केंद्रीय विधानसभा में बम विस्फोट अंग्रैल 1929

इसके पश्चात् हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के नेतृत्व में जनता को यह समझाने का निर्णय किया गया की उसका उद्देश्य अब परिवर्तित हो गया है तथा वह जनक्रांति में विश्वास रखता है। इसी समय ब्रिटिश सरकार भारतीयों, विशेषकर मजदूरों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ तथा ‘पब्लिक सेफ्टी विल' पास करने की योजना बना रही थी। इसके प्रति विरोध प्रदर्शित करते हेतु भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त को केंद्रीय विधान सभा में बम फेंकने का उत्तरदायित्व सौंपा गया। बम फेंकने का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं अपितु सरकार को विरोध से अवगत कराना तथा ‘बहरे को सुनाना’ था। इसलिये जानबूझ कर मामूली बम बनाया गया तथा 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा के कक्ष में खाली बेंचों में इस बम को फेंका, बम फेंकने का मुख्य उद्देश्य अपनी गिरफ्तारी देकर अदालत को अपनी विचारधारा के प्रचार का माध्यम बनाना था जिससे जनता उनके विचारों तथा राजनीतिक दर्शन से परिचित हो सके।

बम फेंकने के उपरांत मची भगदड़ में भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त आसानी से भाग सकते थे किन्तु वे इन्कलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते रहे। भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने जानबूझ कर स्वयं को गिरफ्तार कराया था क्योंकि वे जनता को यह संदेश देना चाहते थे कि क्रांतिकारी गतिविधियों की सजा क्रांतिकारी स्वयं भुगतने को तैयार हैं। क्योंकि उस समय जनता में यह धारणा बनती जा रही थी कि आतंकवादी गतिविधियों के पश्चात् क्रांतिकारी बचकर निकल जाते हैं तथा सरकारी दमन की सजा जनता को भुगतनी पड़ती है। सरकार ने चन्द्रशेखर आजाद के अतिरिक्त सभी प्रमुख क्रांतिकारियों को पकड़ लिया। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु पर लाहौर षड़यत्र केस के तहत मुकदमा चलाया गया। अन्य क्रातिकारियों को कड़ी सजायें हो गयीं। जेल में इन क्रांतिकारियों ने जेल की अमानवीय परिस्थितियों के विरोध में भूख हड़ताल कर दी तथा मांग की कि राजनैतिक बंदियों के साथ हिरासत के दौरान सम्माननीय तथा न्यायोचित व्यवहार किया जाये।

जतिन दास पहले शहीद बने। जेल में 64 दिनों की भूख हड़ताल के कारण उनकी मृत्यु हो गयी। कांग्रेस के नेताओं ने इन युवा क्रांतिकारियों का जोरदार समर्थन किया। भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनायी गयी तथा 23 मार्च 1931 को उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। इस खबर से पूरा देश स्तब्ध रह गया। हर जुबान पर भगत सिंह का नाम आ गया। पूरे राष्ट्र ने इन महान देशभक्तों की कुर्बानी को सरकार की कायरतापूर्ण कार्यवाई की संज्ञा दी।

दिसम्बर 1929 में चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने दिल्ली के निकट वायसराय लार्ड इर्विन की ट्रेन को जलाने का प्रयास किया। 1930 में पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में अनेक आतंकवादी घटनायें हुयीं। अकेले पंजाब में एक वर्ष में आतंकवाद की 26 घटनायें दर्ज की गयीं।

फरवरी 1931 में इलाहाबाद में एक पार्क में चन्द्रशेखर आजाद पुलिस के साथ हुयी मुठभेड़ में गोलियों के शिकार हो गये।

बंगाल में 1920 के दशक में कई क्रांतिकारी समूहों को पुनर्गठित किया गया। इन्होंने अपनी गतिविधियां पुनः प्रारम्भ कर दी तथा भूमिगत कार्यवाइयां करने लगे। कई अन्य समूह कांग्रेस के अधीन ही कार्य करते रहे। इस प्रकार उन्होंने जनता में अपनी पैठ और व्यापक की तथा कांग्रेस को सांगठनिक आधार प्रदान किया। कस्बों तथा गांवों में सी.आर. दास के स्वराजवादी कार्यक्रम में इन युवा क्रांतिकारियों ने सक्रिय भूमिका निभायी तथा उसे व्यापक सहयोग प्रदान किया। 1925 में सी.आर. दास की मृत्यु के पश्चात् बंगाल में कांग्रेस दो धड़ों में विभक्त हो गयी- एक धड़े का नेतृत्व अनुशीलन समिति से सम्बद्ध जे.एम. सेनगुप्ता ने किया, जबकि दूसरे धड़े का नेतृत्व युगान्तर समूह से सम्बद्ध सुभाष चन्द्र बोस के हाथों में था।

इन पुनर्गठित क्रांतिकारी समूहों ने कई आतंकवादी गतिविधियां संपन्न कीं।

1924 में कलकत्ता के बदनाम पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट की गोपीनाथ साहा ने हत्या करने की चेष्टा की। इसके पश्चात् सरकार ने कड़ाई से क्रांतिकारियों को कुचलना प्रारम्भ कर दिया। सुभाषचन्द्र बोस सहित अनेक क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिये गये तथा गोपीनाथ साहा को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

सरकारी दमन तथा आपसी फूट के कारण क्रांतिकारी गतिविधियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगीं। किन्तु शीघ्र ही प्रमुख क्रांतिकारी पुनः सक्रिय हो गये तथा उन्होंने नये विद्रोही संगठनों की स्थापना कर ली। इन पुनर्गठित या नवगठित क्रांतिकारी समूहों ने भी अनेक आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया। इन नये विद्रोही संगठनों में सबसे सक्रिय संगठन था चटगांव क्रांतिकारियों का गुट, जिसके नेता सूर्यसेन थे।

चटगांव शस्त्रागार लूट अप्रैल 1930

सूर्यसेन ने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी तथा चटगांव के राष्ट्रीय विद्यालय में शिक्षक के रूप में कार्य कर रहे थे। लोग उन्हें प्यार से मास्टर दा के नाम से पुकारते थे। क्रांतिकारी गतिविधियों से संलग्न होने के कारण 1926 से 1928 तक उन्हें दो साल की सजा हुई थी। जेल से रिहा होने के पश्चात् वे कांग्रेस में काम करते रहे। वे चटगांव जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव थे। वे कहा करते थे ‘सहृदयता क्रांतिकारी का विशेष गुण है’। सूर्यसेन मृदुभाषी, शांत तथा लगनशील व्यक्ति थे तथा कविताओं से उन्हें बहुत लगाव था। रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा काजी नजरुल इसलाम के वे बहुत बड़े प्रशंसक थे।

सूर्यसेन ने अपने सहयोगियों अनन्त सिंह, गणेश घोष तथा लोकीनाथ बाउल के साथ मिलकर सशस्त्र विद्रोह की योजना बनायी। इसका उद्देश्य जनता को यह बताना था कि सशस्त्र विद्रोह से शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ से उखाड़ फेंका जा सकता है। विद्रोह की प्रस्तावित कार्रवाई में चटगांव के दो शस्त्रागारों पर कब्जा कर युवा क्रांतिकरियों को हथियारबंद करने के निमित्त हथियारों को लूटना, नगर की टेलीफोन और टेलीग्राफ संचार व्यवस्था को नष्ट करना तथा चटगांव और शेष बंगाल के बीच रेल सम्पर्क को भंग करना था।

इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की चटगांव शाखा के तले 65 युवा क्रांतिकारियों द्वारा अप्रैल 1930 में शस्त्रागारों पर धावा बोल दिया गया। पुलिस शस्त्रागार पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया गया, सूर्यसेन ने शस्त्रागार के बाहर राष्ट्रीय झंडा फहराया, क्रांतिकारी युवकों ने उन्हें सलामी दी तथा कामचलाऊ क्रांतिकारी सरकार के गठन की घोषणा की गयी। बाद में ये समीपवर्ती गावों में फैल गये तथा सरकारी दफ्तरों एवं सरकारी सम्पति पर छापे मारे।

किन्तु शीघ्र ही सेना चटगांव पहुंच गयी तथा उसने मोर्चा संभाल लिया। सेना तथा क्रांतिकारियों में सशस्त्र संघर्ष हुआ। कई युवा क्रांतिकारी बहादुरीपूर्वक संघर्ष करते हुए शहीद हो गये। फरवरी 1933 में सूर्यसेन गिरफ्तार कर लिये गये। उन पर मुकदमा चलाया गया तथा जनवरी 1934 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। किन्तु चटगांव कांड से जनता अत्यन्त प्रभावित हुई। इस घटना से क्रांतिकारी विचारों वाले युवकों का उत्साह बहुत बढ़ गया तथा बड़ी तादात में युवक विभिन्न आतंकवादी गुटों में शामिल होने लगे। 1930 में क्रांतिकारी गतिविधियों ने पुनः जोर पकड़ा तथा यह क्रम 1932 तक चलता रहा।

सरकारी प्रतिक्रिया

शस्त्रागारों की लूट से सरकार पहले तो घबराई लेकिन बाद में वह बर्बर दमन पर उतर आयी। सरकार ने 20 दमनकारी कानून जारी किये तथा क्रांतिकारियों को कुचलने हेतु पुलिस को पूरी छूट दे दी। चटगांव में पुलिस ने  अनेक गांवों को जलाकर भस्म कर दिया तथा अनेक ग्रामीणों पर भारी जुर्माना लगाया। देशद्रोह के आरोप में 1933 में जवाहरलाल नेहरू को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन्हें दो वर्ष की सजा दी गयी। उन पर साम्राज्यवाद तथा पुलिस के दमन की निंदा करने तथा क्रांतिकारी युवकों के सहस और वीरता की प्रशंसा करने का आरोप था।

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