नाभिकीय भौतिकी Nuclear Physics

नाभिकीय भौतिकी में परमाणवीय नाभिक का अध्ययन किया जाता है।  नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को परमाणु क्रमांक (atomic number) कहते हैं तथा Z द्वारा प्रकट करते हैं।

नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों तथा न्युट्रानों की कुल संख्या को परमाणु की द्रव्यमान संख्या (mass number) कहते हैं और अक्षर A द्वारा प्रकट करते हैं।

उदाहरण –  _{ 92 }^{ 235 }{ U } यूरेनियम के परमाणु को दर्शाता है जिसकी द्रव्यमान संख्या 235 है तथा परमाणु क्रमांक 92 है।

मूल कणों की विशेषताएं
कणद्रव्यमान (किग्रा)आवेश (कूलॉम)
प्रोटॉन1.672×10-27+1.6×10−19
न्यूट्रॉन1.675x10-270 (आवेशहीन)
इलेक्ट्रॉन9.108×10-31– 1.6×10−19

परमाणु के संघटक Constituents of Atom

  • परमाणु भौतिकी में परमाणु तथा उसकी अन्तर्क्रियाओं (interactions) का अध्ययन किया जाता है।
  • परमाणु तत्व (element) का वह सबसे छोटा कण है, जिसका अस्तित्व हो सकता है।
  • परमाणु के केन्द्र में एक नाभिक (nucleus) होता है, जिसमें परमाणु का लगभग सम्पूर्ण द्रव्यमान, प्रोटॉन व न्यूट्रान के रूप में समाहित होता है।
  • इलेक्ट्रॉनों की संख्या, प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है।
  • प्रोटॉन पर धनात्मक आवेश तथा इलेक्ट्रॉन पर उतना ही ऋणात्मक आवेश होता है, परन्तु न्यूट्रान आवेश रहित होता है।

पदार्थ के मूल कण Elementary Particles of Matter

  1. इलेक्ट्रॉन Eelctron
  • इलेक्ट्रॉन की खोज 1897 में अंग्रेज वैज्ञानिक, जे.जे. टॉमसन ने कैथोड किरणों के रूप में की।
  • इलेक्ट्रॉन अतिसूक्ष्म कण होते हैं तथा ये परमाणु में नाभिक के बाहर चारों ओर चक्कर लगाते हैं।
  • इन पर 6 × 10-19 C ऋणात्मक आवेश होता है।
  1. प्रोटॉन Proton
  • प्रोटॉन की खोज अंग्रेज वैज्ञानिक, रदरफोर्ड ने सन् 1919 में नाइट्रोजन नाभिकों पर a-कणों का प्रहार करके की,

_{ 7 }^{ 14 }{ N }+_{ 2 }^{ 4 }{ He }\rightarrow _{ 8 }^{ 17 }{ O }+_{ 1 }^{ 1 }{ H }

  • प्रोटॉन का द्रव्यमान 67239 × 10-27 किग्रा होता है।
  • आवेश 6 × 10-19 कूलॉम धनात्मक होता है।
  • इलेक्ट्रॉन से लगभग 1838 गुणा भारी होता है।
  1. न्यूट्रॉन Neutron
  • न्यूट्रॉन की खोज अंग्रेज वैज्ञानिक, चैडविक ने सन् 1932 में बेरेलियम पर ∝-कणों का प्रहार करके की,

_{ 4 }^{ 9 }{ Be }+_{ 2 }^{ 4 }{ He }\rightarrow _{ 6 }^{ 12 }{ C }+_{ 0 }^{ 1 }{ n }


  • यह एक आवेश रहित कण है। इसका द्रव्यमान 675 × 10-27 किग्रा होता है।
  • इसकी भेदन-क्षमता (penetrating power) अत्यधिक, होती है।
  1. पोजिट्रॉन Positron
  • यह एक धनावेशित मूल कण है, जिसका द्रव्यमान व आवेश (परिमाण में) इलेक्ट्रॉन के बराबर होता है।
  • इसलिए इसे इलेक्ट्रॉन का प्रतिकण या एंटी-कण (antiparticle) भी कहते हैं।
  1. न्यूट्रिनों Neutrino
  • ये लगभग द्रव्यमान रहित (अर्थात् विराम द्रव्यमान, rest mass) व आवेश रहित मूल कण हैं।
  1. पाई-मेसोन p-Meson
  • पाई-मेसोन मूल कणों की सैद्धान्तिक खोज सन् 1935 में वैज्ञानिक युकावा ने की थी।
  • ये कण तीन प्रकार के होते हैं- उदासीन (p0), धनात्मक (p) व ऋणात्मक (p- ) पाई-मेसोन।
  • ये अस्थायी कण होते हैं।
  1. फोटॉन Photon
  • फोटॉन, ऊर्जा के बण्डल (packets) होते हैं जो प्रकाश की चाल से चलते हैं।
  • सभी प्रकार की विद्युत्-चुम्बकीय किरणों का निर्माण इन्हीं मूल कणों से होता है।
  • इनका विराम द्रव्यमान (rest mass) शून्य होता है।

नाभिकीय स्थायित्व Nuclear Stability

  • जिन नाभिकों में \frac { N }{ Z } का मान लगभग 1 होता है, वे बहुत स्थायी होते हैं।
  • जब नाभिक में \frac { N }{ Z } का मान 5 से अधिक हो जाता है तो वह अस्थायी और रेडियोऐक्टिव बन जाता है।

रेडियो एक्टिव Radioactivity

  • स्थायित्व प्राप्त करने के लिए अस्थायी नाभिक स्वत: ही ऐल्फा (α), बीटा (β) तथा गामा (λ) किरणों का उत्सर्जन करने लगते हैं।
  • ऐसे नाभिक जिन तत्वों के परमाणुओं में होते हैं, उन्हें रेडियो ऐक्टिव तत्व कहते हैं तथा उपर्युक्त किरणों के उत्सर्जन की घटना को रेडियो ऐक्टिवता कहते हैं।

अर्द्ध-आयु Half-life

  • किसी रेडियो ऐक्टिव तत्व में किसी क्षण पर उपस्थित परमाणुओं के आधे परमाणु जितने समय में विघटित (disintegrate) हो जाते हैं, उस समय को उस तत्व की अर्द्ध-आयु कहते हैं।
  • प्रत्येक रेडियो ऐक्टिव तत्व की अर्द्ध-आयु निश्चित होती है।
  • माना एक तत्व की अर्द्ध-आयु 5000 वर्ष है। आज यदि उसकी मात्रा किसी पदार्थ में 100g है तो अर्द्ध-आयु अनुसार इसकी मात्रा का ह्रास इस प्रकार होगा।
अर्द्धायु चक्र संख्यापदार्थ की शेष मात्रा
प्रारम्भ100g
1 अर्द्धायु पश्चात् अर्थात् 5000 वर्षोंपरान्त50g
2 अर्द्धायु चक्रोपरान्त  i.e. 10000 वर्षोंपरान्त25g
3 अर्द्धायु चक्रोपरान्त i.e. 15000 वर्षोंपरान्त12.5g

 

तत्वान्तरण Transmutation

  • एक रेडियो ऐक्टिव तत्व का दूसरे तत्व में परिवर्तित हो जाना तत्वान्तरण कहलाता है।

रेडियोऐक्टिव समस्थानिक Radioactive Isotope

  • रेडियो ऐक्टिव समस्थानिक बनाने के लिए पदार्थों को नाभिकीय रिएक्टर में न्यूट्रॉनों द्वारा किरणित (irradiated) किया जाता है अथवा उन पर त्वरक (accelerator) से प्राप्त उच्च ऊर्जा कणों द्वारा बमबारी की जाती है।
  • आजकल रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उपयोग वैज्ञानिक शोध कार्य, चिकित्सा, कृषि एवं उद्योगों में लगातार बढ़ता जा रहा है।

चिकित्सा में उययोग

  • कोबाल्ट-60 एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक है, जो उच्च ऊर्जा की गामा किरणे उत्सर्जित करता है।
  • इन गामा किरणों का उपयोग कैंसर के इलाज में किया जाता है।
  • थॉयराइड ग्रन्थि के कैंसर की चिकित्सा के लिए शरीर में रेडियोऐक्टिव आयोडीन समस्थानिक (1-131) की पर्याप्त मात्रा प्रविष्ट कराई जाती है।

कृषि में उपयोग

  • पौधे ने कितना उर्वरक (fertilizer) ग्रहण किया है, इसका पता रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों की विधि से लगाया जाता है। इसे ट्रेसर विधि (tracer technique) कहते हैं।

उद्योग में उययोग

  • ऑटोमोबाइल के इंजन के क्षयन का पता लगाने के लिए ट्रेसर विधि का उपयोग किया जाता है।

कार्बान काल-निधारण Carbon dating

  • इस विधि द्वारा जीव के अवशेषों की आयु का पता लगाया जाता है।
  • जीवित अवस्था में प्रत्येक जीव (पौधे या जन्तु) कार्बन-14 (एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक) तत्व को ग्रहण करता रहता है और मृत्यु के बाद उसका ग्रहण करना बंद हो जाता है।
  • अत: किसी मृत जीव में कार्बन-14 की सक्रियता को माप करके उसकी मृत्यु से वर्तमान तक के समय की गणना की जा सकती है।

नाभिकीय उर्जा Neclear Energy

द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता Mass-energy Equipvalence

  • सम्पूर्ण नाभिकीय ऊर्जा का मूल स्रोत है: द्रव्यमान का ऊर्जा में परिवर्तन।
  • आइन्सटीन ने बताया कि प्रत्येक द्रव्यमान (m), ऊर्जा (E) के समतुल्य ề : E = mc2, जहाँ c, निर्वात (vaccum) में प्रकाश की चाल है।

परमाणु द्रव्यमान मात्रक Atomic mass unit, amu

1 amu = 1.66033 x 10-27 kg

बन्धन ऊर्जां Binding energy

  • न्यूट्रॉन व प्रोटॉन के संयोग से किसी नाभिक के बनने में जो ऊर्जा विमुक्त होती है, उसे नाभिक की बन्धन ऊर्जा कहते हैं।

नाभिकीय विखण्डन Nuclear fission

  • भारी नाभिक कम स्थायी होते हैं, अत: पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त करने पर वे लगभग बराबर के दो खण्डों में विभक्त हो जाते हैं।
  • इस प्रक्रिया को नाभिकीय विखण्डन कहते हैं।

_{ 92 }^{ 235 }{ U }+_{ 0 }^{ 1 }{ n }\rightarrow _{ 56 }^{ 92 }{ Ba }+_{ 36 }^{ 92 }{ Kr }+3_{ 0 }^{ 1 }{ n }+ उर्जा (200MeV)

परमाणु बम Atom bomb

  • नाभिकीय विखण्डन क्रिया पर जब किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं होता है तो विखण्डन क्रिया की दर बहुत तीव्र होती है, जिस कारण कुछ ही क्षणों में प्रचण्ड विस्फोट हो जाता है।
  • परमाणु बम में अनियंत्रित विखण्डन क्रिया होती है। प्रथम परमाणु बम सन् 1945 में प्रयुक्त किया गया था।

समृद्धित यूरेनियम Enriched Uranium

परमाणु बम के निर्माण में पर्याप्त यूरेनियम-235 की आवश्यकता होती है, परन्तु प्राकृतिक यूरेनियम में केवल 0.7% ही यूरेनियम-235 होता है, शेष यूरेनियम-238 होता है, जिसका विखण्डन मन्द न्यूट्रॉनों द्वारा नहीं होता है। अत: प्राकृतिक यूरेनियम से यूरेनियम-235 अलग किया जाता है। वह यूरेनियम, जिसमें विखण्डनीय यूरेनियम-235 की प्रचुर मात्रा होती है, उसे समृद्धित यूरेनियम कहते हैं। परमाणु बम में आजकल प्लूटोनियम-239 का उपयोग किया जाता है।

नाभिकीय रिएक्टर Nuclear reactor

यह एक ऐसी युक्ति है जिसमें यूरेनियम-235 का नियंत्रित विखण्डन कराया जाता है।

  1. नाभिकीय ईंधन (Nuclear fuel): इसमें विखण्डनीय (fissile) पदार्थ होता है। यह प्रायः समृद्धित यूरेनियम होता है।
  2. मन्दक: यह विखण्डन अभिक्रिया में उत्पन्न तीव्र न्यूट्रॉनों को मन्दित करता है।
  • इसके लिए प्रायः ग्रेफाइट या भारी जल (heavy water) का उपयोग किया जाता है।

नियंत्रक छड़े Control Rods

  • विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया को नियंत्रण में रखने के लिए कैडमियम या बोरॉन की लम्बी छड़ों का उपयोग किया जाता है।
  • इनकी कुछ लम्बाई को रिएक्टर के विखण्डन कक्ष (fission chamber) के अन्दर तथा कुछ को बाहर रखा जाता है।
  • ये छड़ें विखण्डन में उत्पन्न होने वाले न्यूट्रॉनों को अवशोषित कर लेती हैं, अतः विखण्डन की श्रृंखला रुक जाती है।

ब्रीडर रिएक्टर Breeder Reactor

  • ऐसा रिएक्टर जो प्रयुक्त किए गए विखण्डनीय पदार्थ की तुलना में अधिक विखण्डनीय पदार्थ उत्पन्न करता है, ब्रीडर रिएक्टर कहलाता है अर्थात इसमें प्रयुक्त पदार्थ ही और अधिक मात्रा में उत्पन्न किया जाता है।

नाभिकीय संलयन Nuclear Fusion

  • जब दो या अधिक हल्के नाभिक संयुक्त होकर एक भारी नाभिक बनाते हैं तथा अत्यधिक ऊर्जा विमुक्त करते हैं तो इस अभिक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं।
  • सूर्य से प्राप्त प्रकाश और ऊष्मा ऊर्जा का स्रोत, नाभिकीय संलयन ही है। एक नाभिकीय संलयन अभिक्रिया का उदाहरण है:

^{ 2 }{ H }+_{ 1 }^{ 3 }{ H }\rightarrow _{ 2 }^{ 4 }{ He+ }_{ 0 }^{ 1 }{ n }+ उर्जा (17.6 MeV)

हाइड्रोजन बम

  • परमाणु बम, विखण्डन अभिक्रिया पर आधारित है जबकि हाइड्रोजन बम, संलयन अभिक्रिया पर आधारित होता है।
  • संलयन को लिए आवश्यक उच्च ताप (लगभग 35 x 106 केल्विन) व उच्च दाब की परिस्थितियां एक आन्तरिक विखण्डन बम (परमाणु बम) के विस्फोट द्वारा उत्पन्न की जाती हैं (इस विस्फोट को चारों ओर से संलयन करने वाले हाइड्रोजन समस्थानिक डयूटीरियम, ट्रीटियम आदि घेरे रहते हैं)।

नाभिकीय ऊर्जा के शांतिमय उपयोग Peaceful Uses of Nuclear Energy

  1. जहाज, वायुयान, पनडुब्बी (submarine) और रेलें चलाने में
  2. विद्युत् शक्ति का उत्पादन (Electric power generation) करने में
  3. रॉकेट उड़ाने में तथा
  4. रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों का उत्पादन करने में।

आधुनिकी भोतिकी Modern Physics

एक्स-किरणे X-ray

  • इन किरणों को उनके अन्वेषक के नाम पर रौंट्जन किरणे भी कहते हैं।
  • इनका तरंग-दैर्घ्य 10-10 मीटर से 10-8 मीटर तक होता है।
  • ये तीव्रगामी इलेक्ट्रॉनों के किसी भारी लक्ष्य वस्तु पर टकराने से उत्पन्न होती हैं।
  • चिकित्सा में इनका उपयोग टूटी हड्डी तथा फेफड़ों के रोगों का पता लगाने में किया जाता है।

रडार Radar

  • Radio Detection and Ranging का संक्षिप्त रूप है।
  • रडार में सूक्ष्म तरंगों का उपयोग करके दुश्मन के जलयानों व वायुयानों का पता लगाया जाता है।
  • एक घूमते हुए एरियल द्वारा तरंगें प्रेषित की जाती हैं और वे वायुयान, जलयान आदि लक्ष्य से परावर्तित होकर रडार पर लौट आती हैं।
  • प्रेषित और अभिग्रहीत तरंगों के समयान्तर को ज्ञात करके जलयान (या वायुमान) की दूरी ज्ञात की जा सकती है।
  • तरंगें जितने क्षेत्र की स्कैनिंग करती हैं, उसका चित्र भी रडार के पर्दे पर आ जाता है।

अर्द्धचालक Semiconductors

  • इनका उपयोग डायोडों, ट्रांजिस्टरों तथा समेकित परिपथों (integrated circuits) आदि के निर्माण में किया जा सकता है।
  • दो प्रकार के अर्द्धचालक बनाए जाते हैं- n प्रकार के तथा p प्रकार के।
  • n प्रकार के अर्द्धचालकों में सिलिकन (SI) को फॉस्फोरस (P) द्वारा डोप किया गया होता है- अर्थात् फॉस्फोरस को अशुद्धि के रूप में मिलाया जाता है।
  • इससे अर्द्धचालक में ऋणायनों या इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ जाती है, जो पदार्थ में मुक्त रूप से गतिशील होते हैं।
  • p प्रकार के अर्द्धचालकों की डोपिंग बोरॉन (B) द्वारा की जाती है। इनसे रिक्तियों का निर्माण अर्द्धचालक पदार्थ में होता है, जिसे छिद्र (hole) कहते हैं। इस प्रकार के अर्द्धचालक में इलेक्ट्रॉनों का संवहन एक होल से दूसरे होल में कूदने से होता है।
  • डायोड बनाने के लिए शुद्ध सिलिकन (या जर्मेनियम) में अशुद्धियां मिलाकर p- प्रकार का क्षेत्र उत्पन्न किया जाता है, जो n प्रकार के पदार्थ के सम्पर्क में रहता है।
  • p- और n प्रकार के पदार्थ के बीच की सीमा को ‘जंक्शन' कहा जाता है।
  • डायोड के p- भाग वाले संबंधन को एनोड तथा n भाग वाले संबंधन को कैथोड कहा जाता है।
  • यदि उनके बीच विभवांतर इस प्रकार उत्पन्न किया जाये कि p प्रकार का क्षेत्र धनात्मक और n प्रकार का क्षेत्र ऋणात्मक हो तो इस स्थिति में डायोड का प्रतिरोध निम्न होता है और यह स्थिति अग्रअभिनति (forward biased) कहलाती है।
  • यदि विभवांतर इससे उल्टी दिशा में उत्पन्न किया जाये तो इलेक्ट्रॉनों तथा होलों (रिक्तियों) का आकर्षण विपरीत छोरों की ओर होता है और ऐसी स्थिति में आवेश का कोई प्रवाह नहीं होता है।
  • इसका प्रतिरोध उच्च होता है और इसे पश्च अभिनत (reverse biased) कहा जाता है।

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