राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विकास नीति National Biotechnology Development Strategy

13 नवम्बर, 2007 को केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विकास नीतिको अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी गई। यह नीति सम्बन्धित मंत्रालयों, उपभोक्ता समूहों, गैर-सरकारी और स्वैच्छिक संगठनों तथा अंतरराष्ट्रीय निकायों सहित विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ दो वर्ष चले राष्ट्रव्यापी परामर्श प्रक्रिया का परिणाम है। इस नीति के अंतर्गत एक राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विनियामक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा। राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी नीति के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं-

  • एक राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विनियमन प्राधिकरण गठित किया जायेगा, जो कि एक स्वतंत्र, स्वायत्त एवं व्यावसायिकता पर आधारित निकाय होगा।
  • जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव के नेतृत्व में एक उच्चाधिकार प्राप्त अंतर-मंत्रालयी समिति की स्थापना की जाएगी।
  • जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के बजट का 30 प्रतिशत भाग सार्वजनिक निजी भागीदारी कार्यक्रमों पर व्यय किए जाएंगे।
  • जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थानों के लिए अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में उत्कृष्टता को बढ़ावा देने हेतु नई भूमिका दर्शाना।
  • फरीदाबाद (हरियाणा) में विज्ञान, शिक्षा एवं जैव-प्रद्योगिकी क्षेत्र में नवीनता के लिए यूनेस्को क्षेत्रीय केंद्र स्थापित करना।
  • छात्रवृतियों, सदस्यता तथा अनुसंधान एवं विकासकी सहायता के रूप में अभिनव पुनर्प्रवेश पैकेज।
  • प्रौद्योगिकी का व्यापक इस्तेमाल बढ़ाने के लिए अनुवाद संबंधी नई पहल करना।
  • अंतरराष्ट्रीय भागीदारी बढ़ाना।
  • 11वीं योजना के दौरान जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विश्वस्तरीय संस्थागत अनुसंधान क्षमता की दृढ़ता हेतु 50 विशिष्ट केंद्रों की स्थापना करना।
  • वैज्ञानिक खोजों को उपयोगी उत्पादों के रूप में परिवर्तित करने हेतु नवीन राष्ट्रीय पहल करना।
  • एक विश्वस्तरीय मानव राजधानी बनाने के उद्देश्य से एशियाई क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ स्तर तक पहुंच बनाने के क्रम में उन्नत एवं विस्तृत पी.एच.डी. एवं शोधोतर (Post Doctoral) कार्यक्रम संचालित करना।
  • नए कानूनों के रूप में सार्वजनिक वित्त पोषित अनुसंधान और विकास (बौद्धिक सम्पदा का संरक्षण, प्रयोग एवं विनियमन) विधेयक, 2007 का प्रारूप विधेयक तैयार करना।
  • जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के प्रस्ताव के अनुसार नए संस्थागत ढांचे की स्थापना करना।
  • कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा एवं पर्यावरण के क्षेत्र में प्रमुख चुनौतियों की पहचान करना।
  • अभिनव एवं त्वरित प्रौद्योगिकी तथा उत्पाद विकास को प्रोत्साहित करने हेतु मुख्य रणनीति के रूप में क्लस्टर के विकास पर बल देना।

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