हुमायूं: 1530-1540 ई. एवं 1555-1556 ई. Humayun: AD 1530-1540. And 1555-1556 AD.

बाबर की मृत्यु के तीन दिनों के पश्चात् हुमायूँ तेईस वर्षों की आयु में हिन्दुस्तान के राजसिंहासन पर बैठा। उसके सिंहासन पर बैठने के समय परिस्थिति वास्तव में बहुत आसान नहीं थी। उसे सब ओर से अनेक विरोधी शक्तियाँ घेरे हुए थीं, जो छिपे रूप में थीं, अत: अधिक खतरनाक थीं। राजपरिवार में लेशमात्र एकता नहीं थी तथा उसके चचेरे भाई मुहम्मद जहाँ एवं मुहम्मद सुल्तान गद्दी के हकदार थे। साथ-साथ मुसलमानों में राजसिंहासन सबसे बड़े लड़के के मिलने के नियम का कड़ाई से पालन नहीं होने से, उसके तीनों भाईयों-कामरान, हिन्दाल तथा अस्करी की भी लोलुप दृष्टि राजसिंहासन पर थी। दरबार भी ऐसे सरदारों से भरा था, जो गद्दी प्राप्त करने के लिए योजनाएँ रचते रहते थे। उसके पास जी सेना थी वह एक म्मिलिजुली संस्था थी, जिसमें विभिन्न जातियों के साहसिक थे, जिनके हित आपस में एक-दूसरे से टकराते थे। इस प्रकार वह अपने सम्बन्धियों, अपने दरबार अथवा अपनी सेना के समर्थन का निश्चित होकर भरोसा नहीं कर सकता था। फिर हुमायूँ को बाबर की देन अनिश्चित किस्म की थी। राजपूत केवल कुछ काल के लिए दबा दिये गये थे। यद्यपि अफगान पराजित कर दिये गये थे पर वे सदा के लिए कुचले नहीं गये थे। अनेक तितर-बितर अफगान सरदारों को, जो सर्वदा विद्रोह के लिए तैयार रहते थे, केवल एक प्रबल एवं योग्य नेता की जरूरत थी, जो उनमें जीवन डाल दे और यह उन्हें शेरशाह में मिल गया। बहादुर शाह के अधीन गुजरात की बढ़ती हुई शक्ति भी हुमायूँ के लिए एक भयंकर संकट थी।

उसके समय एक ऐसे शासक की आवश्यकता थी, जिसमें सैनिक प्रतिभा, कूटनीतिक कौशल तथा राजनैतिक विवेक हो। पर हुमायूँ में इन सबका अभाव था। यद्यपि वह बौद्धिक रुचि एवं संस्कृति-प्रेम से सम्पन्न था, पर अपने पिता के विवेक, कार्य-स्वातंत्र्य, दृढ़ निश्चय एवं अध्यवसाय से वंचित था। विजय के क्षण भर बाद वह अपने अन्त:पुर में जाकर लिप्त हो जाता था तथा अपने बहुमूल्य समय को अफीमखोरों के स्वर्ग में, सपने में, व्यतीत कर देता था, जबकि उसके शत्रु द्वार पर गर्जन करते रहते थे। प्रकृति से दयालु रहने के कारण, जब उसे दण्ड देना चाहिए था उस समय वह क्षमा प्रदान कर देता था। प्रसन्नचित्त एवं मिलनसार होने के कारण, जब उसे जीन पर होना चाहिए था उस समय वह मेज पर भोजनोत्सव मनाता रहता था। उसके चरित्र में आकर्षण है, पर रोब नहीं। व्यक्तिगत जीवन में वह आनन्ददायक साथी एवं पक्का मित्र रहा होगा। पर राजा के रूप में वह असफल रहा।

हुमायूँ की पहली गलती यह थी कि सम्भवत: अपने पिता की मृत्युकालीन आज्ञा के अनुसार, उसने पूर्ण नियंत्रण में रखने के बदले अपने भाईयों के प्रति विवेक रहित कोमलता प्रदर्शित की, जो उसके ईर्ष्यालु प्रतिद्वन्द्वी थे। अस्करी को सम्भल की जागीर दी गयी। हिन्दाल को अलवर की जागीर मिली। इन तीनों में सबसे बड़े कामरान का न केवल काबुल एवं कान्धार पर ही अधिकार स्वीकार किया गया, बल्कि लाहौर में हुमायूँ के सेनापति मीर युनूस अली के विरुद्ध सैनिक प्रदर्शन करने के बाद उसे पंजाब तथा टैठ पंजाब के पूर्व का हिसार फीरोजा का जिला भी मिले। इस प्रकार हुमायूँ ने बाबर के साम्राज्य की अखण्डता की जड़ पर आघात किया। और भी, सिंधु नदी के क्षेत्र एवं उसके आगे के भागों को कामरान को दे देने के कारण सेना भतीं करने व सर्वश्रेष्ठ स्थान से हुमायूँ वंचित हो गया, यद्यपि भारत में सद्योजात मुग़ल-राज्य की रक्षा के लिए सेना की शक्ति नितान्त आवश्यक थी। हिसार फिरोजा मिल जाने से पंजाब तथा दिल्ली के बीच के मुख्य मार्ग पर कामरान का अधिकार हो गया।

फिर भी, विरोधी शक्तियों के अनियंत्रित होने के पहले प्रारम्भिक लड़ाईयों में भाग्य ने हुमायूँ का साथ दिया। गद्दी पर बैठने के पाँच या छः महीनों के बाद वह बुंदेलखंड में कालिंजर के दुर्ग पर घेरा डालने के लिए सेना लेकर चला। उसे यह सन्देह था कि इसका राजा अफगानों के साथ सहानुभूति रखता था। पर राजा से कुछ रकम वसूल करने के बाद, पूर्व में अफगानों के संकट का सामना करने के लिए, उसे लौट आना पड़ा। 1532 ई. में दौरा (दौहरुआ) में अफगानों पर निर्णयात्मक रूप से उसकी विजय हुई तथा उसने जौनपुर से सुल्तान महमूद लोदी को खदेड़ भगाया। उसने चुनार को घेर लिया, जो उस समय अफगान नायक शेर खाँ के अधीन था। परन्तु शीघ्र उसने उसे छोड़ दिया तथा बिना उस बढ़ते हुए अफगान नायक का पूर्ण दमन किये, उसने उसके (अफगान नायक के) द्वारा दिखलायी हुई बिलकुल बे-मन की अधीनता स्वीकार कर ली। इस प्रकार उसने उसे स्वच्छन्दता से अपने साधन एवं शक्ति बढ़ाने का अवसर दे दिया, क्योंकि उसे गुजरात के बहादुरशाह के बढ़ते हुए दावे को रोकने के लिए पश्चिम की ओर जाना आवश्यक था।

बहादुरशाह ने निश्चित रूप से कुपित होने का कारण प्रस्तुत किया था। उसने खुल्लमखुल्ला बहुत-से अफगान शरणार्थियों तथा हुमायूँ के शत्रुओं को आश्रय और सहायता दी थी। मेवाड़ के पतन के कारण उसे अपना राज्य-विस्तार करने का अवसर मिल गया। मालवा को अपने राज्य में मिलाकर उसने चित्तौड़ के राजपूतों के प्रसिद्ध दुर्ग पर घेरा डाल दिया। उसी समय हुमायूँ 1535 ई. के अन्त में, अफगानों पर अपनी विजय का पूरा लाभ उठाये बिना ही, मालवा पहुँचा। गुजरातियों द्वारा बुरी तरह हैरान किये जाने पर मेवाड़ की रानी कर्णावती ने बहादुरशाह के विरुद्ध हुमायूँ से सहायता की प्रार्थना की। पर मुग़ल बादशाह ने इस पर कोई ध्यान न दिया और न अपने लिए ही बहादुरशाह पर शीघ्र आक्रमण किया। उलटे वह प्रतीक्षा करता रहा। इधर बहादुरशाह ने राजपूतों को पराजित कर दिया तथा तुर्की अभियंता (कुस्तुनतुनिया के) रूमी खाँ तथा पुर्तगीजों एवं अन्य यूरोपीय गोलंदाजों की सहायता से चित्तौड़ को तबाह कर डाला। हुमायूँ ने राजपूतों की अपील पर ध्यान न देकर प्राणघाती भूल की। वास्तव में उसने अपने लिए उनकी सहानुभूति एवं समर्थन पाने का स्वर्ण सुयोग खो दिया, जिसके अमूल्य महत्त्व का उसके पुत्र अकबर ने अनुभव किया। तत्काल युद्ध के लिए उसने बहादुरशाह की सेना को मंदसोर के निकट एक कृत्रिम झील के किनारे युद्ध में पराजित कर उसे मांडू से चम्पानेर एवं अहमदाबाद तथा वहाँ से खभात तक खदेड़ दिया। अंत में वह दीव द्वीप में शरण लेने को विवश हो गया। पर गुजरात के शासक पर हुमायूँ की यह विजय क्षणिक थी।

उसके जीवन की अन्य घटनाओं की तरह यहाँ भी उसके चरित्र की दुर्बलता परिलक्षित हुई। विजय की उमंग में वह, उसका भाई अस्करी तथा उसके अधिकतर सैनिक भोज एवं आमोद-प्रमोद में लिप्त हो गये, जिसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि उसके (राज्य के) सारे काम अव्यवस्थित हो गये तथा उसकी अपनी छावनी तक शोरगुल एवं अवज्ञा का रंगमंच बन गयी। गुजरात के सुल्तान ने इससे लाभ उठाकर मुगलों से अपने खोये हुए प्रदेश फिर ले लिये। हुमायूँ पुन: उसे अधीन करने की सोच भी न सका क्योंकि उसका ध्यान पूर्व की ओर आकृष्ट हो गया, जहाँ अफगान अत्यन्त शक्तिशाली बन बैठे थे। ज्यों ही वह लौटने के लिए मुड़ा कि मालवा भी उसके हाथों से निकल गया। इस प्रकार एक वर्ष में दो बड़े प्रान्तों की शीघ्रता से विजय हुई; अगले वर्ष वे तुरंत खो गये। हुमायूँ के जीवन के अगले चरण में अफगान पुनर्जागरण के नेता शेर के साथ उसके दुर्भाग्यपूर्ण संघर्ष हुए।

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