विदेश मंत्रालय Ministry of External Affairs

स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन में 1878 संचालन गोपनीयता विभाग द्वारा किया जाता था। 1946 में अंतरिम सरकार के गठन के समय तक भारत के वैदेशिक सम्बन्धों का उत्तरदायित्व संयुक्त रूप से दो विभागों- विदेश विभाग एवं राष्ट्रमण्डलीय सम्बन्ध विभाग; पर था।

स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् इस विभाग को विदेश एवं राष्ट्रमण्डलीय सम्बन्ध मंत्रालय के नाम से एक नवीन स्वरूप प्रदान किया गया है। मार्च 1949 में इस मंत्रालय के नाम से  राष्ट्रमण्डलीय सम्बन्ध शब्द हटा दिया गया और यह स्वतन्त्र भारत का केवल विदेश मंत्रालय बनकर एक सुगठित प्रशासनिक इकाई के रूप में सामने आया।

भारत के विदेश मंत्रालय का प्रधान भारत सरकार के कैबिनेट स्तर का एक मंत्री होता है। इसकी सहायता के लिए विदेश राज्य मंत्री एवं उप-मंत्री होते हैं और इनकी सहायतार्थ प्रशासनिक स्तर पर तीन सचिव होते हैं। पहले इन तीनों सचिवों के कार्यों में समन्वय स्थापित करने के लिए एक सेक्रेटरी जनरल भी होता था। अब यह पद समाप्त कर दिया गया है। वर्तमान में तीनों सचिव अपने-अपने क्षेत्रों में सीधे मंत्री के पास अपनी-अपनी फाइलें भेजते हैं।

विदेश मंत्रालय में एक सचिवालय तथा दो अधीनस्थ कार्यालय हैं। वर्तमान समय तक मंत्रालय का कोई संलग्न कार्यालय नहीं है। इन दो कार्यालयों के अतिरिक्त सम्पूर्ण विश्व में भारत सरकार के राजदूत फैले हुए हैं। किंतु, ये दूतावास स्वयं में विलक्षण हैं तथा इन्हें इस मंत्रालय का अधीनस्थ अथवा संलग्न कार्यालय नहीं कहा जा सकता।

विदेश मंत्रालय के प्रभाग

विदेश मंत्रालय के 19 प्रभाग हैं। इन प्रभागों में से 9 प्रादेशिक प्रभाग, 6 विशेषज्ञ प्रभाग एवं 4 विविध विषयों से सम्बन्धित प्रभाग हैं।

विश्व के विभिन्न देशों के साथ अपने सम्बन्धों का नियमन करने हेतु भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा सम्पूर्ण विश्व की उनकी भौगोलिक स्थिति के आधार पर 9 प्रभागों में बांटा गया है। ये 9 प्रभाग हैं- अमेरिकी प्रभाग; यूरोपीय प्रभाग; पश्चिमी एशियाईएवंउत्तरी अफ्रीका प्रभाग, अफ्रीका प्रभाग, पाकिस्तान प्रभाग, बांग्लादेश प्रभाग, उत्तरी एशिया प्रभाग; पूर्वी एशिया प्रभाग; दक्षिणी एशिया प्रभाग।

इस प्रकार इस मंत्रालय के प्रत्येक प्रभाग में अनेक देश हैं, जो भौगोलिकं आधार पर सम्मिलित किए गए हैं। प्रत्येक प्रभाग अपने क्षेत्र में अवस्थित देशों के साथ भारत के वैदेशिक सम्बन्धों के प्रचालन हेतु उत्तरदायी है।

उल्लिखित नौ प्रादेशिक प्रभागों के अतिरिक्त, दस अन्य प्रभाग भी हैं, जो कि विभिन्न प्रकार के कार्यों का सम्पादन करते हैं। ये दस प्रभाग हैं:

  1. नीति नियोजन तथा पुनर्निरीक्षण प्रभाग: इस प्रभाग द्वारा विश्व की परिवर्तित होती परिस्थितियों के संदर्भ में भारत की विदेश की नीति का मूल्यांकन किया जाता है।
  2. वैधानिक एवं संधि प्रभाग: अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रश्नों तथा अंतर्राष्ट्रीय संधियों से सम्बंधित विभिन्न प्रकार के कार्यों का संचालन इसी प्रभाग द्वारा किया जाता है।
  3. प्रशासनिक प्रभाग: इस प्रभाग का मुख्य दायित्व विदेश मंत्रालय तथा इसके विदेशों में स्थित विभिन्न प्रकार के दूतावासों के कार्मिक प्रशासन की समस्याओं, जैसे-स्थापना तथा आपूर्ति, इत्यादि; के लाइन (Line) कार्यों की सम्भालना है।
  4. प्रोटोकॉल प्रभाग: इस प्रभाग का गठन विदेशों से आने वाले अतिथियों के स्वागत से सम्बन्धित समस्त औपचारिक कार्यों के सम्पादन हेतु किया गया है। विदेशी राजदूतों के भारत आने पर उनके परिचय-पत्रों के प्रस्तुतीकरण हेतु समारोह इत्यादि का आयोजन भी इसी प्रभाग के द्वारा किया जाता है।
  5. आर्थिक प्रभाग: यह प्रभाग भारत एवं अन्य देशों के मध्य आर्थिक और तकनीकी सहयोग तथा समन्वय सम्बन्धी कार्यों को प्रोत्साहित करने हेतु प्रयास करता है।
  6. विदेशों में प्रचार प्रभाग: इस प्रभाग द्वारा भारत सरकार की ओर से विदेशों की राजधानियों में प्रचार एवं तत्सम्बन्धी वे अन्य समस्त कार्य किए जाते हैं, जिनकी वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अत्यधिक उपयोगिता है।
  7. संयुक्त राष्ट्र तथा सम्मेलन प्रभाग: इस प्रभाग द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों इत्यादि से सम्बंधित कार्य संपन्न किए जाते हैं।
  8. कर्मचारी, सुरक्षा, संचार एवं नागरिक सुरक्षा प्रभाग: इस प्रभाग की स्थापना विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिकों एवं भारतीय दूतावासों के कर्मचारियों के हितों की रक्षार्थ की गई है।
  9. पासपोर्ट, एमिग्रेशन तथा काउंसलर प्रभाग: यह प्रभाग पासपोर्ट, वीजा, स्वदेश से दूसरे देश में जाकर बसने वाले भारतीयों तथा वाणिज्य सम्बन्धी मामलों की देखभाल करता है तथा उनके प्रचालन हेतु प्रशासनिक दृष्टि से उपयोगी कदम उठाता है।
  10. ऐतिहासिक प्रभाग: इस प्रभाग द्वारा विदेश मंत्रालय हेतु शोध कार्य करने के साथ-साथ मंत्रालय से सम्बन्धित विशाल पुस्तकालय का प्रबन्ध भी किया जाता है। इस विभाग द्वारा किए गए सन्धि, समझौतों इत्यादि के लिए समुचित मार्गदर्शन भी करते हैं।
  11. अधीनस्थ कार्यालय: विदेश मंत्रालय के निम्नलिखित दो अधीनस्थ कार्यालय हैं-
  • केन्द्रीय पार पत्र एवं उत्प्रवास संगठन, तथा;
  • विदेश मंत्रालय का हॉस्टल। 

विदेशों में दूतावास

विदेशों में उच्चायुक्त, दूतावास, वाणिज्य दूतावास इत्यादि विभिन्न प्रकार के उच्चायुक्त दूतावास हैं। प्रशासनिक दृष्टि से इनकी स्थिति इस प्रकार की है कि इसके कारण उन्हें पारिभाषिक रूप में संलग्न अथवा अधीनस्थ, दोनों ही प्रकार के कार्यालयों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। फिर भी, प्रशासनिक स्तर के आधार पर विदेशों में स्थित भारतीय राजनयिक एवं वाणिज्य कार्यालयों को निम्नलिखित श्रेणियों के अंतर्गत विभाजित किया जा सकता है-

  1. दूतावास (आवासीय): विश्व में जो देश महत्वपूर्ण हैं उन देशों में भारत का राजदूत स्थायी रूप से निवास करता है। अमेरिका, रूस, चीन, जापान, फ्रांस इत्यादि में भारत के आवासीय राजदूत हैं।
  2. दूतावास (गैर-आवासीय): जो देश भारत के लिए अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण हैं वहां के लिए गैर-आवासीय राजदूतों की व्यवस्था की गई है। उदाहरणार्थ- रूस में भारत का आवासीय राजदूत मंगोलिया का गैर-आवासीय दूतावास भी सम्भालता है।
  3. उच्चायुक्त (आवासीय): राष्ट्रमण्डलीय देशों में भारत सरकार के उच्चायुक्त निवास करते हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों में भारत के आवासीय उच्चायुक्त हैं।
  4. उच्चायुक्त (गैर-आवासीय): भारत के हितों की दृष्टि से छोटे अथवा कम महत्वपूर्ण राष्ट्रमण्डलीय देशों में भारत सरकार के गैर-आवासीय उच्चायुक्त कार्यालय हैं।
  5. उप-उच्चायुक्त अथवा सहायक उच्चायुक्त: कुछ राष्ट्रमंडलीय देशों में उच्चायुक्तों के अतिरिक्त उप अथवा सहायक उच्चायुक्त भी नियुक्त किए गए हैं। आस्ट्रेलिया में भारत सरकार के उच्चायुक्त एवं उप-उच्चायुक्त दोनों ही कार्य करते हैं।
  6. आयुक्त (आवासीय): ये छोटे स्तर के दूतावास हैं, जहां भारत सरकार का प्रतिनिधि आयुक्त कहलाता है।
  7. आयुक्त (गैर-आवासीय): इस प्रकार के गैर-आवासीय आयुक्त कार्यालय केवल आठ देशों में कार्य कर रहे हैं।
  8. लिगेशन (गैर-आवसीय): यह नाम प्राचीन समय से ही प्रचलित है और विश्व के केवल चार देशों में ही भारत सरकार के लिगेशन्स कार्य कर रहे हैं।
  9. कौंसुलेट्स जनरल (आवासीय): वाणिज्यिक सम्बन्धों के प्रोत्साहन हेतु विश्व के अनेक देशों में भारत सरकार के कौंसुलेट्स जनरल कार्य कर रहे हैं। कुछ देशों में एक से अधिक कौंसुलेट्स जनरल भी है।
  10. कौंसुलेट्स जनरल (गैर-आवासीय): वाणिज्यिक महत्व के अनुसार विश्व के चार देशों में भारत सरकार की ओर से गैर-आवासीय कौंसुलेट्स जनरल की व्यवस्था है।
  11. वाइज कौंसुलेट्स (आवासीय): भारत सरकार द्वारा आवासीय वाइज कौंसुलेट्स स्तर के कार्यालय की स्थापना केवल ईरान (जहीदीन में) में की गई है।
  12. वाणिज्यिक कमीशन एवं ऑफिस (आवासीय): इस प्रकार के आवासीय वाणिज्यिक कमीशन केवल तीन ही हैं।
  13. विशेष कमीशन (आवासीय): इस प्रकार के कमिशन भी तीन छोटे-छोटे प्रदेशों में हैं।

उल्लिखित विभिन्न प्रकार के राजनयिक एवं वाणिज्यिक कार्यालय विदेश मंत्रालय के क्षेत्रीय संस्थान अथवा अभिकरण हैं। इन्हीं के माध्यम से यह मंत्रालय भारत सरकार की विदेश नीति की क्रियान्वित करता है।

विदेश मंत्रालय के कार्य

भारत का विदेश मंत्रालय विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करता है। यह मंत्रालय प्रमुख रूप से-

  1. विदेशों से भारत के मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना हेतु उत्तरदायी है।
  2. संयुक्त राष्ट्र संघ में देश का प्रतिनिधित्व करने की व्यवस्था करता है।
  3. भारत से आव्रजन, पासपोर्ट एवं वीजा इत्यादि से सम्बन्धित प्रशासन, भारत में विदेशी राजनयिक तथा काउंसिल अधिकारियों को प्रभावित करने वाले विभिन्न प्रकार के प्रश्नों का समाधान करता है।
  4. भारत से विदेशों एवं राष्ट्रमंडलीय देशों को तथा वहां से भारत को अपराधियों के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया का संचालन करता है।
  5. प्रशासनिक दृष्टिकोण से विदेशी सरकारों तथा राष्ट्रमंडल के देशों के साथ भारत के दिन-प्रतिदिन के सम्बन्धों का संचालन करता है।
  6. भारतीय विदेश सेवा से सम्बन्धित विषय, अन्य देशों के साथ युद्ध की घोषणा अथवा युद्ध-विराम के पश्चात् आवश्यक निर्णय इत्यादि लेने सम्बन्धी अपने महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करता है।
  7. भारत की भू-सीमा का मूल्यांकन करता है।
  8. संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के अंतर्गत उठाए जाने वाले भारत सरकार तथा अन्य संस्थाओं से सम्बन्धित मामलों का निर्णयन करता है।
  9. समस्त वाणिज्यिक दूत विषयक कार्यों को सम्पन्न करता है।
  10. उत्तर-पूर्वी सीमान्त अभिकरण तथा नागा-पहाड़ी-त्येनसांग; क्षेत्र के प्रशासन का उत्तरदायित्व वहन करता है।
  11. विदेशी सरकारों के साथ की जाने वाली समस्त राजनीतिक संधियों एवं समझौतों का प्रारूप तैयार करता है।
  12. खुले समुद्र एवं आकाश में किए गए अपराधों एवं डकैतियों के समाधान के संदर्भ में समुचित उपाय करता है।
  13. कुछ महत्वपूर्ण विधियों का प्रशासन करना, जैसे- भारतीय देशान्तरवास अधिनियम (1922), भारतीय तीर्थ यात्रा जलयान अधिनियम, इत्यादि।

इस प्रकार, विदेश मंत्रालय के संगठन एवं कार्यों के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि विदेशों से सम्बन्धित भारत सरकार के जितने भी विषय अथवा कार्य हैं उन सबका नियमित निर्वाह ईसिस मंत्रालय के द्वारा किया जाता है।

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