रक्षा मंत्रालय Ministry of Defence

रक्षा मंत्रालय की स्थापना ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल में 1776 में सैनिक विभाग के रूप में हुई थी। 1938 में इसका नाम परिवर्तित करके रक्षा विभाग का तथा स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् 1947 में इसे रक्षा मंत्रालय नाम प्रदान किया गया। रक्षा उत्पादन विभाग की स्थापना 1962 तथा रक्षा आपूर्ति विभाग की स्थापना 1965 में की गई।

मंत्रालय का प्रधान कैबिनेट स्तर का एक वरिष्ठ मंत्री होता है, जिसकी सहायतार्थ एक राज्य मंत्री होता है। रक्षा मंत्रालय का सचिव मंत्रालय के विभिन्न विभागों के कार्यों में समन्वय बनाए रखने के अतिरिक्त रक्षा विभाग का कार्य भी देखता है।

रक्षा मंत्रालय के विभाग

रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत प्रमुखतः निम्नलिखित तीन विभाग आते हैं:

रक्षा विभाग: इस विभाग द्वारा प्रमुख रूप से भारत की सुरक्षा, सशस्त्र सेनाओं एवं अंतरसेवा संगठनों के कार्यों का पर्यवेक्षण किया जाता है। इस विभाग द्वारा वहन किए जाने वाले महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों में से प्रमुख हैं-

  1. भारत एवं उसके प्रत्येक क्षेत्र की रक्षा करना;
  2. सशस्त्र सेनाओं एवं लोक अधिकारियों के मध्य सहयोग का विकास करना;
  3. संघ की सशस्त्र सेनाओं (थल सेना, नौ सेना तथा वायु सेना) से सम्बन्धित नीतियों, योजनाओं एवं सेवा शर्तों का निर्धारण करना;
  4. तट रक्षक संगठन;
  5. थल सेना, नौसेना एवं वायु सेना के रिजर्व;
  6. प्रादेशिक सेना एवं सहायक वायु सेना;
  7. राष्ट्रीय कैडेट कोर;
  8. थल सेना, नौसेना एवं वायु सेना से सम्बन्धित निर्माण कार्यों की देख-रेख करना
  9. सैन्य फार्म संगठन,
  10. कैण्टीन-स्टोर विभाग,
  11. रक्षा सम्बन्धी कार्यों हेतु भूमि एवं सम्पति अर्जित करना;
  12. भूतपूर्व सैनिकों (पेंशनभोगी भूतपूर्व सैनिकों सहित) का यथोचित पुनर्वास एवं कल्याण करना।

रक्षा उत्पादन एवं आपूर्ति विभाग: इस विभाग द्वारा प्रमुख कार्य किए जाते हैं-

  1. आयुध निर्माण सम्बन्धी इकाइयों में रक्षा उत्पादन की नीति एवं आयोजन को क्रियान्वित करना;
  2. आयुध निर्माण इकाइयों का अपर महानिदेशक;
  3. आयुध निर्माण इकाइयों में निर्मित सामान का महानिदेशक निरीक्षक द्वारा निरीक्षण को सुनिश्चित करना;
  4. तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशक (वायु) द्वारा भारत में निर्मित समस्त वैमानिकी भण्डारों के निरीक्षण को सुनिश्चित करना;
  5. तीनों सशस्त्र सेनाओं एवं मानकीकरण निदेशालय द्वारा देश में बनाए गए समस्त रक्षा भण्डारों का मानकीकरण;
  6. रक्षा प्रदर्शनी से सम्बन्धित विषय;
  7. रक्षा में सरकारी उपक्रमों से सम्बन्धित योजना एवं योजना सम्बन्धी मामलों का पर्यवेक्षण करना।

इस विभाग द्वारा रक्षा आपूर्ति से सम्बन्धित निम्नलिखित कार्य भी सम्पन्न किए जाते हैं:

  • रक्षा प्रयोजन हेतु बाहर से आयातित सामान एवं वस्तुओं के प्रतिस्थापन्न हेतु आयोजन करना तथा इस संदर्भ में विस्तृत योजनाओं का निर्माण करना।
  • देश की औद्योगिक क्षमता का निर्मित उल्लिखित योजनाओं के अनुसंधान, विकास एवं निर्माण में उपयोग करना।
रक्षा मंत्रालय से सम्बन्धित प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान
  • राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (खड़कवासला, महाराष्ट्र)।
  • भारतीय सैन्य अकादमी (देहरादून)।
  • अफसर ट्रेनिंग स्कूल (चेन्नई)।
  • आर्मी कैडेट कॉलेज विंग।
  • नई नौसेना अकादमी।
  • एम्फिबिअस वॉरफेयर स्कूल।
  • कैडेट प्रशिक्षण पोत।
  • जल सर्वेक्षण स्कूल (गोवा)।

वस्तुतः इस विभाग द्वारा आयातित उपस्करों एवं व्यर्थ के पुजों का देश में ही निर्माण करने सम्बन्धी कार्यों का संचालन एवं पर्यवेक्षण किया जाता है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग: रक्षा मंत्रालय का यह विभाग समस्त प्रकार की सैन्य वस्तुओं से सम्बन्धित वैज्ञानिक पक्षों पर परामर्श देने के अतिरिक्त सेना द्वारा प्रयुक्त किए जाने वाले साज-सामान से सम्बन्धित अनुसंधान, डिजायन एवं विकास सम्बन्धी योजनाओं का निर्माण करता है। इसके अतिरिक्त विदेशों में अनुसंधान एवं विकास संगठनों (विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र से सम्बन्धित पक्ष) में कार्य करने वालों के साथ सम्पर्क बनाए रखना भी इसी विभाग का एक अन्य प्रमुख उत्तरदायित्व है।

रक्षा मंत्रालय की समितियां

रक्षा मंत्रालय में प्रभावी समन्वय बनाए रखने, विचारों का आदान-प्रदान सुगम बनाने तथा शीघ्रता से निर्णयन हेतु विभिन्न समितियां कार्यरत हैं।

रक्षा मंत्री द्वारा नियमित रूप से तीनों सेनाओं के अध्यक्षों, रक्षा मंत्रालय के राज्य मंत्री तथा रक्षा मंत्रालय के सभी सचिवों को आमन्त्रित करके बैठकें आयोजित की जाती हैं, जिन्हें रक्षामंत्री की प्रातःकालीन बैठकों के नाम से जाना जाता है। इन बैठकों में उच्चस्तरीय विचार-विमर्श की आवश्यकता वाले विषयों अथवा मुद्दों पर चर्चा की जाती है।

सेनाध्यक्षों की समिति: रक्षा मंत्री की सहायता हेतु इस महत्वपूर्णं समिति में थल सेनाध्यक्ष, नौसेना अध्यक्ष एवं वायु सेनाध्यक्ष होते हैं। समिति में सर्वाधिक समय से कार्य कर रहे सदस्य को समिति का अध्यक्ष बनाया जाता है। सेनाध्यक्षों की समिति की मदद हेतु अनेक उप-समितियां हैं, जो योजना, प्रशासन, संचार इत्यादि जैसे विशिष्ट विषयों पर विचार-विमर्श करती है।

अंतर-सेवा संगठन

थलसेना, नौसेना एवं वायुसेना के कुछ समान हितोंसे सम्बन्धित मामलों, जैसे- चिकित्सा सेवा,जन-सम्पर्क, खेलकूद, आवास, विदेशी भाषाओं की पढ़ी के कार्य आदि को रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्यरत अंतर सेवा संगठनों द्वारा देखा जाता है, जो इस प्रकार हैं-मुख्य प्रशासन अधिकारी कार्यालय, सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा, रक्षा भूमि एवं छावनी, राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज; जन-सम्पर्क निदेशालय; सेना चित्रप्रभाग; इतिहास अनुभाग; सेना खेलकूद नियंत्रण बोर्ड; विदेशी भाषा विद्यालय; रक्षा मंत्रालय पुस्तकालय।

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