मौर्यकालीन सामाजिक व्यवस्था Mauryan Social System

वस्तुत: बुद्ध युग में पशुचारण अर्थव्यवस्था एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ढल चुकी थी। इस काल में वाणिज्य और व्यापार का भी विकास हुआ था। परिणामस्वरूप एक व्यापारी वर्ग का उदय हुआ। बौद्ध साहित्य में चतुर्वर्ग में व्यवस्था को इस तरह प्रस्तुत किया गया है- खतिय (क्षत्रिय), बाम्हन (ब्राह्मण), वेस्सा (वैश्य), सूदा (शूद्र)। यह इस बात का द्योतक था कि ब्राह्मण का स्थान समाज में द्वितीयक था। किन्तु कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पुन: ब्राह्मणों को प्रतिष्ठित किया गया है। मेगस्थनीज ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को सात जातियों में विभाजित किया है- (1) दार्शनिक (2) किसान (3) शिकारी एवं पशुपालक (4) शिल्पी एवं कारीगर (5) योद्धा (6) निरीक्षक एवं गुप्तचर (7) अमात्य एवं सभासद (पार्षद; सलाहकार)।

इसमें सबसे अधिक जनसंख्या किसानों की थी। वस्तुत: पेशों के आधार पर समाज का विभाजन कर दिया गया था। कुछ इसी तरह की बात हरोडोटस ने मिस्री समाज का विभाजन किया है। मेगस्थनीज का यह भी मानना है कि कोई भी अपनी जाति से बाहर विवाह नहीं कर सकता था और न ही अपना पेशा बदल सकता था। इसके अपवाद दार्शनिक या ब्राह्मण थे। उन्हें यह अधिकार प्राप्त था। यह वक्तव्य आगे की मनु संहिता से मिलता-जुलता है, जिसमें ब्राह्मणों को नीची जाति के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने की छूट दी गई।

ब्राह्मण- फिक महोदय का मानना है कि ब्राह्मण दो वर्गों में विभाजित थे और समकालीन साहित्य में भी इस बात पर प्रकाश पड़ता है। उदीची ब्राह्मण शिक्षित एवं रूढ़िवादी थे और शिक्षक एवं पुरोहित का काम करते थे।

सतक्लखन- ये ब्राह्मण सांसारिक और अज्ञानी थे। ये ब्राह्मण भविष्य वक्ता की भूमिका भी निभाते थे।

मेगस्थनीज ने दार्शनिकों को दो भागों में बाँटा है- (1) ब्राह्मण तथा (2) श्रमण। ब्राह्मणों के बारे में उन्होंने कहा है ब्राह्मण गृह त्याग करके विद्या अध्ययन करते थे जो 37 वर्षों का होता था। यह बात मनुस्मृति से भी मिलती-जुलती प्रतीत होती है, इसके अनुसार कोई भी ब्राह्मण 36 वर्षों तक ब्रह्मचर्य-काल में रहता था। मेगस्थनीज के अनुसार वह 36 वर्षों के पश्चात् ब्राह्मण गृहस्थ जीवन में लौट आते थे। वे माँस खाते थे परन्तु उन पशुओं का नहीं जिनका प्रयोग श्रम कायों में होता था। ब्राह्मणों को कई पत्नियाँ रखने का अधिकार था। परिणामत: वे बहुत से बच्चे पैदा करते थे। स्त्रियों को दर्शन के ज्ञान से वंचित रखा जाता था। फिक्क ने श्रमणों को कई छोटी श्रेणियों में बाँटा है। इनमें हिलाबोई सबसे आदरणीय थे और तपस्वी जीवन व्यतीत करते थे। दूसरी श्रेणी में चिकित्सक थे और तीसरी श्रेणी में जादूगर थे। मेगस्थनीज के अनुसार दार्शनिक कर से मुक्त थे। डायडोरस के अनुसार दार्शनिक किसी भी प्रकार की सेवा से मुक्त थे। मेगस्थनीज का कहना है कि गलत भविष्यवाणी करने पर दार्शनिकों को जीवन भर मौन रहना पड़ता था।

किसान- इनकी जनसंख्या सबसे अधिक थी। इनमें विशाल संख्या में शूद्र भी शामिल थे।

शिकारी एवं पशुपालक- अशोक ने अपने पाँचवें स्तंभ शिलालेख में उन पशुओं का नाम गिनाया है जिनका वध नहीं किया जा सकता था। साधारणत: मछली के शिकार पर प्रतिबंध था। कुछ खास दिन पर मछली की बिक्री पर भी रोक लगायी जाती थी। कभी-कभी मछलियों को जहर देकर छोड़ दिया जाता और उन्हें शत्रु देश की ओर भेज दिया जाता था। शिकारी और मछुआरे की चर्चा कंधार अभिलेख में हुई है।

कौटिल्य द्वारा चारों वर्णों का व्यवसाय निर्धारित किया गया है। अर्थशास्त्र के अनुसार शूद्रों को शिल्पकला एवं सेवावृत्ति के अतिरिक्त कृषि, पशुपालन एवं वाणिज्य की अनुमति दी गई है। अर्थशास्त्र में शूद्रों को आर्य कहा गया है और उन्हें म्लेच्छों से भिन्न बताया गया है। यह भी कहा गया है कि आर्य शूद्र को दास नहीं बनाया जा सकता था, जबकि म्लेच्छों की संतान को दास रूप में बेचना या खरीदना गलत नहीं था। ब्राह्मण आदि चार वर्णों के अतिरिक्त कौटिल्य ने अनेक वर्णसंकर का उल्लेख किया है। इस प्रकार के लोगों में अम्बष्ट, निषाद, पार्शव, उग्र अन्य मागध, वैदेहक, सूत, कूटक, पुक्कुस, वेन चंडाल, स्वापक आदि थे। चंडाल, स्वापक और म्लेच्छों को छोड़कर सबों को शूद्र माना गया है। एक वर्ण ऐसा भी था जिसकी स्थिति शूद्रों की तुलना में भी हीन थी। इस वर्ण को अन्तावसायी कहते थे, इसमें चण्डाल, स्वापक आदि थे। मौर्य युग में अनेक ऐसी जातियों का विकास हो चुका था जिनका आधार कोई विशेष शिल्प या पेशा था। उदाहरण के लिए तन्तुबाय (जुलाहा), रजकर (धोबी), सुवर्णकार (सोनार), चर्मकार (चमार), चर्मकार (चमार), कर्मार (लोहार) और कुट्टक (बढ़ई) आदि इसी प्रकार की जातियां थी। इन सबका समावेश शूद्र वर्ण में कर लिया गया और इसे आर्य जनता का अंग मान लिया गया। अर्थशास्त्र के अनुसार न्याय संहिता में भी वर्णभेद विद्यमान था। मेगस्थनीज का मानना था कि भारत में दास प्रथा प्रचलित नहीं थी, किन्तु बौद्ध ग्रन्थ में त्रिपिटक में चार प्रकार के दासों की चर्चा की गई है। दूसरी तरफ कौटिल्य के अर्थशास्त्र में नौ प्रकार के दासों की चर्चा की गई है। कौटिल्य ने अस्थायी दास को अहितकर कहा है।

स्त्रियों की दशा- बौद्ध युग की तुलना में इस युग में स्त्रियों की स्थिति कुछ अच्छी हुई क्योंकि इस युग में स्त्रियों को पुनर्विवाह या विधवा विवाह एवं नियोग की अनुमति दे दी गई थी। किन्तु कुल मिलाकर स्त्रियों की दशा विशेष अच्छी नहीं थी। मेगस्थनीज के अनुसार भारत में बहुपत्नीत्व की प्रथा प्रचलित थी। मौर्य युग में आठ प्रकार के विवाह प्रचलित थे। दहेज देकर विवाह की प्रथा उस काल में बहुत लोकप्रिय थी। नियार्क्रस के अनुसार भारतीय लोग दहेज़ लिए या दिए गए बिना विवाह नहीं करते थे। कौटिल्य के अनुसार पहले चार प्रकार के विवाह धर्मे होते थे- ब्रह्म, प्रजापत्य, आर्ष, दैवी, साथ ही ये विवाह पितृ प्रमाण भी होते थे। पितृ परमन का अभिप्राय यह है की उनके लिए पिता की अनुमति (स्वीकृति) ही पर्याप्त है। पिछले 4 प्रकार के विवाहों के लिए माता-पिता दोनों की अनुमति आवश्यक थी। विवाह के संबंध में कौटिल्य का मत है कि सभी प्रकार के विवाह नियमानुकूल तथा स्वीकार्य हैं। पुनर्विवाह की प्रथा मौर्यकाल में प्रचलित थी। पुरुष और स्त्री दोनों को ही पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त था। कौटिल्य ने तलाक की अनुमति भी दी है किंतु पहले चार प्रकार के धर्म विवाहों में तलाक की अनुमति नहीं थी। पुनर्विवाह की व्यवस्था के बावजूद ऐसी विधवाओं का अस्तित्व था जो पुनर्विवाह न करके स्वतंत्र रूप से जीवन बिताया करती थीं। कौटिल्य ने ऐसी स्त्री को स्व छन्दवासिनी (स्वतंत्र रूप से रहने वाली) कहा है। संभवत: ऐसी स्त्रियाँ भी पुनर्विवाह न करके स्वतंत्र रूप से जीवन बिताना चाहती थीं जो धनी होती थीं। कौटिल्य ने इनके लिए आढ़यविधवा का प्रयोग किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में परिव्राजिकाओं (सन्यासिनी) का भी उल्लेख किया गया है। जिन्हें समाज में सम्मानित स्थान प्राप्त था। कौटिल्य ने इनके लिए कृत्सकारा शब्द का प्रयोग किया है। अर्थशास्त्र के अनुसार विवाह के लिए स्त्री की उम्र 12 साल एवं पुरुष की उम्र 16 साल होनी चाहिए। स्त्रियाँ प्राय: विभिन्न पेशे से दूर रहती थीं। केवल बुनाई के पेशे में ही स्त्रियों की भागीदारी अधिक थी। सम्भ्रान्त घर की स्त्रियाँ प्राय: घर के अन्दर ही रहती थीं और कौटिल्य ने ऐसी स्त्रियों को अनिष्कासिनी कहा है। सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी। किन्तु जैसा कि यूनानी इतिहासकारों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सैनिकों की स्त्रियों में सती प्रथा का प्रचलन था। परन्तु, तत्कालीन ब्राह्मण बौद्ध एवं जैन ग्रन्थों से इसकी पुष्टि नहीं होती।

स्वतंत्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियाँ रूपजीवा कहलाती थी। इनसे राज्य की आय प्राप्त होती थी। राज्य गणिकाओं के प्रशिक्षण पर खर्च करता था। और इस प्रकार की गणिकाएँ राज्य के नियंत्रण में कार्य करती थीं। यदि कोई वेश्या मुक्त होना चाहती थी तो उसे राज्य द्वारा खर्च की गई राशि का 24 गुणा चुकाना पड़ता था। गणिकाओं का निरीक्षण गणिकाध्यक्ष नामक अधिकारी करता था। नगरों में नाट्य संस्थाएँ भी सक्रिय थीं। स्त्री एवं पुरुष दोनों कलाकार रंगोपजीवी तथा रंगोपजीवनी कहलाते थे।

संन्यासी- वैदिक काल में घूमने फिरने वाले संन्यासी को चरक कहा जाता था। उनके बाद संन्यासियों को परिव्राजक, निग्रन्थ तथा जटलिक भी कहा गया है। इन विभिन्न संप्रदायों के संन्यासियों को श्रमण-ब्राह्मण कहा गया है। अंगुत्तर निकाय में परिव्राजकों के दो वर्गों का उल्लेख है (1) ब्राह्मण (2) आन्तित्थिय (अन्य वेदेतर सन्यासी)। ब्राह्मण परिव्राजकों को वादशील, वितण्ड एवं लोकायत कहा जाता था। स्ट्रेबो ने दार्शनिकों की एक श्रेणी को प्रमोनोई अर्थात् प्रमाणिक कहा है। वे ऐसे दार्शनिक होते थे जिन्हें शास्त्रार्थ से प्रेम होता था। गौतम ने चौथे आश्रम में जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति को वैरवानस कहा है।

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