मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था Mauryan Economy

आर्थिक दृष्टि से मौर्य काल को बहुमुखी प्रगति का युग कह सकते हैं। इस काल में न केवल कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई बल्कि उद्योग, पशुपालन व्यवसाय, खनिज उत्खनन एवं व्यापार में भी अतीव प्रगति हुई। लोहे के अधिक उपयोग के कारण तकनीकी आधार मिला। मगध साम्राज्य के आसपास लोहे की खाने थीं (वर्तमान दक्षिण बिहार क्षेत्र में) और महत्त्वपूर्ण जल और स्थल मार्ग पर उसका नियन्त्रण था। कहा गया है- दक्षिण बिहार के समृद्ध लौह अयस्क तक आसानी से पहुँच होने की वजह से लोग लोहे के औजारों का अधिकाधिक प्रयोग करते थे। हमें मौर्यकालीन सकोटर कुल्हाड़ियाँ, हँसिए और साथ ही हल की फाल मिली हैं। हालाँकि अस्त्र-शस्त्रों पर मौर्य-राज्य का एकाधिकार था,किन्तु अन्य  लौह उपकरणों का इस्तेमाल किसी वर्ग तक सीमित नहीं था। उसका निर्माण और उपयोग गंगा द्रोणी से साम्राज्य के दूरवर्ती भागों में फैला होगा। इन औजारों की सहायता से पूर्वी गंगा घाटी के घने जंगलों को काटने में आसानी हुई होगी और कृषि के क्षेत्र में कुशलता बढ़ी होगी। दक्षिणी बिहार के पूरे लौह क्षेत्र में लोहे के छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे मिले हैं। गंगा घाटी की मिट्टी भारी दुम्मटी होने के कारण हल में भारी लोहे की जरूरत पड़ती थी।

आर्थिक व्यवस्था का आधार कृषि था। धीरे-धीरे व्यापार का महत्त्व बढ़ने लगा। बुद्ध युग में ही द्वितीय नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी थी। इस काल में पक्के ईंटों का प्रयोग होने कागा और नगरीय संरचना व्यवस्थित हुई।

अर्थशास्त्र में नई भूमि पर कृषि के विकास को प्रोत्साहन देने की बात की गयी ताकि राजस्व में वृद्धि हो। घने बसे हुए क्षेत्रों में बसने के लिए प्रोत्साहन दिया गया। राजकीय भूमि सीता कहलाती थी और इस भूमि पर उत्पादन कार्य के लिए सीताध्यक्ष नामक अधिकारी को नियुक्त किया जाता था। सीताध्यक्ष नामक अधिकारी निम्नलिखित प्रकार के मजदूरों की सहायता से यथा, दास, कर्मकार (मजदूरी पर कार्य करने वाले मजदूर) और दंड प्रतिकर्ता (अपराधी) की मदद से खेती का काम करते थे। पहली बार मौर्य काल में ही बहुत बड़ी संख्या में शूद्रों को कृषि में लगाया गया। सीता भूमि पर कर बहुत बड़ी मात्रा में लिया जाता था। सीता भूमि लोगों को केवल जीवन भर के लिए दी जाती थी, किन्तु अगर जिस किसी ने स्वयं उसे बसाया है तो वह उसके उत्तराधिकारियों को भी मिल सकती थी। सीता गाँव में नट, नर्तक (Dancer), गायक, वादक और कथावाचक का प्रवेश वर्जित था।

मेगस्थनीज ने लिखा है कि कृषक संख्या में सबसे अधिक हैं। भारतीय समाज के विभाजन में किसानों को मेगस्थनीज ने तीसरे स्थान पर रखा है। यद्यपि भारतीय समाज का विभाजन सम्बन्धी उसका दृष्टिकोण ठीक नहीं था परन्तु यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि खेती में लगे किसानों की बड़ी संख्या ने उसका ध्यान आकृष्ट किया। यूनानी स्रोत यह भी हमारी जानकारी में लाते हैं कि खेतिहरों के पास अस्त्र-शस्त्र नहीं होते थे। कृषकों को पवित्र एवं अवध्य समझा जाता था। युद्ध के दौरान भी खेती करने वाले लोगों को पूर्णतया बिना किसी बाधा के कार्य करने की स्वतन्त्रता थी। कौटिल्य कृषि, पशुपालन तथा व्यापार के लिए वार्ता शब्द का प्रयोग करता है। ये तीनों वैश्यों के व्यवसाय बताये गये। लोग टिल, जौ, मुंग, उड़द, गेंहूं, चावल, प्रियंगु चावल, कोड़ों आदि का उत्पादन करते थे। चावल की दो नई किस्मों दारक एवं वरक का उल्लेख मिलता है। अन्य विक्रय योग्य उत्पादों में गोल मिर्च, जीरक, सरसों, धनिया प्रमुख थे। फलाम्ल वर्ग में आम, अनार, आवला, नींबू, इमली, करोंदा, बेर का विवरण आया है।

कृषि- क्षेत्र में मौर्यकाल की महत्त्वपूर्ण देन सिंचाई साधनों का विकास था। अर्थशास्त्र में अच्छा प्रशासन उसे कहा गया है जिसमें किसान खेती के लिए केवल वर्षा के पानी पर निर्भर न रहे। अतः सिंचाई के लिए अनेक साधन जुटाए जाने चाहिए एवं किसानों को सिंचाई साधनों का उपयोग करने में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। यह भी कहा जा सकता है की यदि कोई व्यक्ति तलब को तोड़ दे तो उसे तालाब में डुबो दिया जाये। मेगस्थनीज का क कि का अधिकांश क्षेत्र सिंचाई के अन्तर्गत है जिससे वर्ष में दो-दो फसलें तैयार हो जाती हैं। अन्यत्र उल्लेख किया है कि कुछ लोगों को यह कार्य सौंप दिया गया गया है कि वे नदियों की देखभाल करें, भूमि की जाँच करें, जैसी की मिस्र में व्यवस्था है। उन नालियों का निरीक्षण करते रहें जिनके द्वारा बड़ी नहरों से पानी दूसरी शाखाओं में लाकर सिंचाई के लिए चारों ओर बार-बार पानी मिल सके। इससे स्पष्ट होता है कि खेतिहरों की भलाई के लिए जल आपूर्ति सम्बन्धी कुछ नियम थे। अर्थशास्त्र से सिंचाई साधनों की जानकारी मिलती है। जो किसान नदी, सरोवर, तड़ाग या कुएं से सिंचाई करते थे उपज का चतुर्थाश देना होता था। यह कर केवल सिंचित भूमि पर लगाया जाता था, अतः इस निष्कर्ष पर पहुँच जा सकता है की राज्य कम वर्षा वाले क्षेत्र में ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाता था। ताकि उन इलाकों में सिंचाई की नियमित आपूर्ति से अच्छी फसल प्राप्त की जा सके। नहरों द्वारा सिंचाई का एक मात्र अभिलेखीय प्रमाण रूद्रदामन का जूनागढ़ लेख है जिसमे यह वर्णन आया है की पुष्यगुप्त ने एक दुर्ग और एक चट्टान के मध्य प्रवाहित जल-स्रोत को बंधकर सुदर्शन नामक झील बनवाई। परन्तु उसे पूरा तुषाष्प ने करवाया था। यह झील 800 वर्षों अर्थात 5वीं शताब्दी ई. तक सिंचाई का स्रोत बनी रही। जूनागढ़ सौराष्ट्र प्रांत के अंतर्गत था और पुष्यगुप्त चन्द्रगुप्त के काल में तथा तुषाष्प अशोक के समय गवर्नर थे। सिंचाई की व्यवस्था को सेतुबंध कहा गया है। सिंचाई पर अलग कर लिया जाता था। इसे उदायभाग कहा जाता था। इसकी दर उपज की ⅕ से ⅓ भाग तक होती थीं। वर्षा के मापने के उपकरण को अरत्नी कहते हैं। एक अरत्नी 24 अंगुल के बराबर होती थी।

कहा गया है कि शास्त्रों ने राजा को ही पृथ्वी एवं जल का स्वामी माना है। अत: वह भूमि-कर के अतिरिक्त जल-कर लेने का भी अधिकारी है। अपने कुएं से सिंचाई करने वाले किसान फसल का पाँचवाँ हिस्सा अन्न राजा को जलकर के रूप में दें। स्वयं कन्धे पर रखकर घड़े द्वारा सिंचाई करने वाला चतुर्थांश और नहर आदि के जल से सिंचाई करने वाला तृतीयांश दें। आपत्तिकाल में भूमिकर बढ़ाकर एक-तिहाई या एक-चौथाई किया जा सकता था, जिसे रायचौधरी अधिक मानते हैं। इस सन्दर्भ में लिखा है यूनानी इतिहासकारों के अनुसार, कभी-कभी किसान पैदावार का चतुर्थांश देने के बाद भी कुछ भूमि त्याग देते थे। कौटिल्य ने भूमिछिद्र विधानम् शीर्षक अध्याय में कृषि योग्य भूमि के अतिरिक्त अन्य भूमि का उल्लेख किया है। उस पर पशुओं के लिए तृण-जल आदि का क्षेत्र बनवा दिये जाने का विवरण मिलता है। सम्भवत: भूमिछिद्र से अभिप्राय ऐसी भूमि से होगा जो कृषि योग्य न हो।

भूमि का स्वामित्व- मेगस्थनीज यह कहता है कि राजा भूमि का मालिक होता था। परन्तु यह विवादास्पद है। साम्राज्य में भूमि मिल्कियत की पाँच संभावनाएँ हैं- (1) राजा, (2) राज्य या सरकार, (3) बड़े जमींदार, (4) सामूहिक मिल्कियत, (5) किसान।

अर्थशास्त्र में क्षेत्रक (भू-स्वामी) और उपवास (कास्तकार) में स्पष्ट भेद किया गया है।

कर निर्धारण- भू-राजस्व के आकलन में भूमि का प्रकार भी निर्धारित किया जाता था। भू-राजस्व के अनुसार गाँवों को भी श्रेणीबद्ध किया गया था।

  1. वैसे गाँव जो कर से मुक्त थे परिहारिक कहलाते थे।
  2. सैनिक प्रदान करने वाले गाँव आयुधीय कहलाते थे।
  3. अनाज-पशु एवं सोने के रूप में कर देने वाले गाँव हिरण्य कहलाते थे।
  4. कच्चा माल देने वाले गाँव कुप्य कहलाते थे।
  5. बेगार देने वाले गाँव विष्टि कहलाते थे।

मेगस्थनीज का मानना है कि भूमि राजस्व की राशि कुल उत्पादन का ¼ थी। किन्तु अधिकांश संस्कृत ग्रन्थों में इसकी दर कुल उत्पादन का ⅙ निर्धारित की गई है। इसलिए राजा को षड्भागी कहा जाता था। अर्थशास्त्र का कहना है कि कर की मात्रा सिंचाई सुविधा पर निर्भर करती थी। यह उपज के पाँचवें भाग की एक तिहाई होती थी। केवल रूस्मिन्दड़ शिलालख से अशोक काल के करारोपण का विवरण मिलता है। इसके अनुसार कर की राशि कुल उत्पादन का ⅛ कर दी गई थी एवं बलि को माफ कर दिया गया था। भू-राजस्व को भाग कहा जाता था।

बलि- अर्थशास्त्र में बलि का अर्थ वह उप कर प्रतीत होता है जो राजा उपज के भाग के अतिरिक्त प्रजा से लेता था।

पिंडकर- कुछ गाँवों को जो कर, इकट्ठा देना होता था उसे पिंड कर कहा जाता था।

सेनाभक्त- संभवत: गाँव वालों को सेना को भोजन व्यवस्था के लिए जो धन देना होता था उसे सेनाभक्त कहा जाता था।

हिरण्य- संभवत: यह किसानों से नकद कर के रूप में लिया जाता था।

प्रणय कर- इस कर का उल्लेख सबसे पहले पाणिनी ने किया था। परन्तु, पहली बार विस्तार से इसका विवरण अर्थशास्त्र में है। यह एक प्रकार का युद्ध कर था। जो कुल उपज के ⅓ से ¼ भाग तक एक ही बार में लिया जाता था।

मेगस्थनीज का मानना है कि भारत में अकाल नहीं पड़ते थे, किन्तु जैन परंपरा एवं सोहगौरा और महास्थान अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि भारत में दुर्भिक्ष आते थे। कौटिल्य ने लिखा है कि दुर्भिक्ष होने पर राजा को भूराजस्व वसूल नहीं करना चाहिए। जैसा पूर्व में उल्लेख किया गया है कि गाँवों को कर मुक्त (परिहारक), सैनिक प्रदान करने वाले (आयुधीय), अनाज तथा पशु आदि रूप में कर देने वाले (हिरण्य), कच्चा माल देने वाले (कुप्प), बेगार द्वारा ऋण चुकाने वाले (विष्टि) आदि श्रेणियों में बाँटा जाता था। सैनिक नहीं होते थे। वरन उनकी स्थिति आज के आरक्षित सैनिकों की तरह थी। सैनिकों के निम्न प्रकार थे- (1) वंशानुगत सैनिक (2) भाडे पर लाये गए सैनिक (3) सैनिकों का निगम (4) जनजातियों से बनी सेना। खेती की जमीन रज्जु के पैमाने मापी जाती थी। वन दो प्रकार के होते थे हस्तिनवन और द्रव्यवन। कौटिल्य कृषि, पशुपालन और वाणिज्य व्यापार के लिए वार्ता शब्द का प्रयोग किया कौटिल्य का मानना है कि भूमि ऐसी होनी चाहिए जिसमें बिना वर्षा की होती है और ऐसी भूमि को अदेवमातृक कहा है। मौर्यकाल में वित्तीय वर्ष जुलाई (आषाढ़) से प्रारंभ होता था। वर्ष 354 दिनों का होता था।

इस काल में राज्य की आय का एक मात्र स्रोत भूराजस्व नहीं रह गया था। आय का दूसरा मुख्य साधन विक्रय सम्बन्धी कर था। व्यापार शुल्क तीन प्रकार के कहे गये हैं- स्वदेश में उत्पन्न वस्तु पर लिया जाने वाला बाह्य, राजधानी में लिया जाने वाला आभ्यन्तर एवं विदेशी माल पर वसूल किया जाने वाला आधित्य। इसी प्रकार स्वदेश से बाहर भेजे जाने वाले माल पर निष्क्रामय तथा विदेशी आयातित सामान पर लगाया गया कर प्रवेश्य कहा गया। इसके लिए यह प्रावधान कर दिया गया था कि दुर्ग वाले नगरों में विक्रय की सभी वस्तुओं को (अन्न एवं पशु आदि को छोड़कर) द्वार के पास अवस्थित चुंगीघर में लाई जाकर राजकीय मुद्रा अंकित की जाये एवं विक्रय के बाद मूल्यानुसार उन पर कर लिया जाये। वस्तुओं के मूल्य के अनुसार कर बदलता रहता था। यह सम्भवत: 10 से 15 प्रतिशत तक होता था। शराब पर चुंगी, आय का एक अन्य साधन था। इसके लिए आबापाशी (लाइसेंस) रखना होता था। विदेशी शराब के विक्रय के लिए विशेष अधिकार-पत्र रखना पड़ता था। आय के अन्य साधन थे पानी की चुंगी, खानों एवं मछलियों की मण्डी की चुंगी, जगलों एवं सरकारी भूमि की आय, अर्थदण्ड, नदी घाटों तथा पुलों पर लिया जाने वाला महसूल आदि।

वाणिज्य व्यापार- मौर्य प्रशासन ने उद्योग एवं व्यापार के विकास हेतु समुचित प्रयास किये। इस दृष्टि से अनेक नियमों का प्रावधान किया गया। इस काल में विविध शिल्प अलग-अलग गाँवों अथवा मोहल्लों में विकसित हो रहे थे। उत्तर भारत में हस्तशिल्प उद्योग श्रेणियों के आधार पर संगठित था। यह व्यवस्था मौर्य काल के पहले से चली आ रही थी। मौयों के अधीन शिल्पियों की संख्या में वृद्धि हुई। प्रत्येक श्रेणी नगर के एक भाग में बसी हुई थी जिससे एक श्रेणी के सदस्य एक साथ रहकर कार्य कर सकते थे एवं अपने माल को बेच सकते थे। सामान्यत: उनमें पारिवारिक सम्बन्ध पाया जाता था। अधिकांश पुत्र अपने पिता के व्यवसाय को अपनाते थे और इस तरह हस्तशिल्प वंशानुगत होता था। इस काल की श्रेणियों में बढ़ई (काष्ठकार), कुंभकार, धातुकर्मी, चर्मकार, बुनकर, चित्रकार आदि प्रमुख थीं। जहाँ तक व्यापारिक संगठनों का प्रश्न है, सार्थवाहों का उल्लेख है जिनके नेतृत्व को मागों के विषय में सार्थ (कारवां) मानते थे। सार्थवोहों के अतिरिक्त अलग-अलग उद्योगों के प्रमुख और जेठ्ठ होते थे। यह भी उल्लेख है कि व्यापारिक श्रेणियों के झगड़े महासेट्ठि (महाश्रेष्ठी) निपटाता था। यह महासेट्ठि वस्तुतः शिल्पियों की श्रेणियों के चौधरियों के ऊपर बड़ा चौधरी जैसा होता था। कौटिल्य ने अन्यत्र (II, 7; III, 1; 4 आदि) श्रेणियों की चर्चा की है जिनके प्रधान मुख्य कहलाते थे। इन श्रेणियों का इतना महत्त्व होता था कि सरकारी रजिस्टर में इनके रीतिरिवाजों का निबन्धन होता था। शासन के कायों में उनका विशेष ध्यान रखा जाता था।

राजस्व का अन्य स्रोत व्यापार था। मौर्यकाल में व्यापार उन्नत अवस्था में था। मौर्य काल में ही महत्त्वपूर्ण राजमार्गों का विकास हुआ। उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है उत्तरापथ, जिसकी चर्चा मेगस्थनीज करता है। उत्तरापथ मथुरा हजारा और तक्षशिला होते हुए पेशावर जाता था। मेगस्थनीज के अनुसार यह 1300 मील लंबा था। एक मार्ग कौशांबी होते हुए उज्जैन जाता था और फिर वह नर्मदा के दक्षिण पश्चिम में मुड़ जाता था। पूरब में एक मार्ग पाटलिपुत्र को मगध से जोड़ता था और यही मार्ग दक्षिण में कलिंग से जुड़ जाता था। यह मार्ग दक्षिण में आंध्र और कर्नाटक क्षेत्र से भी जुड़ता था। यह पूर्वी मार्ग ही पाटलिपुत्र से ताम्रलिप्ति तक चला जाता था। ताम्रलिप्ति एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था जहाँ से श्रीलंका के लिए जहाज खुलते थे। कौटिल्य स्थल मार्ग की अपेक्षा नदी मार्ग को अधिक महत्त्वपूर्ण मानता है। जल यात्रा में गहरे समुद्र की तुलना में तटीय क्षेत्रों को अधिक महत्त्व दिया गया क्योंकि इस क्षेत्र में ही महत्त्वपूर्ण बंदरगाह थे। जलयात्रा में समुद्रों की तुलना में नदियों को ज्यादा महत्त्व दिया गया है क्योंकि नदियों में सुरक्षा का कोई खतरा नहीं था। कौटिल्य के अनुसार उत्तर के मागों की तुलना में दक्षिण के मार्ग ज्यादा महत्त्वपूर्ण थे क्योंकि दक्षिण में सोना एवं कीमती धातुएँ मिलती थीं। मार्ग-निर्माण मौर्य साम्राज्य का एक महत्त्वपूर्ण कार्य था और इसके लिए एक विशेष अधिकारी एग्रोनोइमोई जो प्रत्येक 10 स्टेडिया पर मील का पत्थर लगाता था। मौर्य काल में शिल्पों का अत्यधिक विकास हुआ। इसके दो कारण थे, प्रथम, इस काल में वाणिज्य और व्यापार में अत्यधिक वृद्धि हुई। वाणिज्य व्यापार में राज्य स्वयं हिस्सा लेता था। वे वस्तुएँ जिनका राज्य स्वयं व्यापार करता था, वह राज्यपण्य कहलाती थी। राज्य स्वतंत्र रूप से भी वस्तुओं का आयात-निर्यात करता था और निजी व्यापारियों के हाथों में भी वस्तुओं को बेचता था। द्वितीय, स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए शिल्पियों ने अपने-अपने गिल्ड में स्थापित कर लिए थे। व्यापार के नियंत्रण के लिए राज्य का एक पृथक विभाग था जो व्यापारियों एवं दुकानदारों के कार्यों की देखभाल करता था। इस विभाग के अध्यक्ष संस्थाध्यक्ष कहलाते थे। वह पण्याध्यक्ष की अधीनता में कार्यों का संपादन कहलाते थे। तुलाओं तथा बाटों पर राज्य का नियंत्रण होता था। इनका निर्माण भी राज्य द्वारा ही कराया जाता था और इसके लिए पौतवाध्यक्ष नामक अधिकारी उत्तरदायी था। तौल की इकाई- आढ़क > प्रस्थ > कुडुम्ब > पल > सुवर्णमाष (घटते क्रम में)। माप के मानों को भी राज्य द्वारा नियंत्रण किया जाता था। इसके लिए मानाध्यक्ष नामक अधिकारी नियुक्त किया जाता था। मान का इकाई (बढ़ते क्रम में)- परमाणु-रथचक्र विपुतयूकामध्य-यवमध्य-अंगुल-धनुग्रह-वितरित। शिल्पों की श्रेणियाँ स्थापित होने लगीं। जातक कथाओं में 18 प्रकार के शिल्पों की चर्चा मिलती है। शिल्पों की श्रेणियाँ अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए स्वतंत्र मजदूरों को नियुक्त करने लगी। मजदूरों के भी दो प्रकार थे। (1) स्वतंत्र मजदूर और (2) दास। स्वतंत्र मजदूर दो प्रकार के थे- (1) कर्मकार और (2) भृतिक। इनके अतिरिक्त दासों की भी नियुक्ति होती थी। अशोक के अभिलेखों में भृतिका एवं दास दोनों की चर्चा है। सरकारी अधिकारियों के द्वारा श्रेणियों का पंजीकरण किया जाता था। क्षेत्रीय सहकारी श्रेणियों को छोड़कर दूसरे प्रकार की श्रेणियों पर यह नियंत्रण लगाया गया कि वे गाँव में प्रवेश नहीं करे। यह इस बात का द्योतक था कि बिना सरकार (अधिकारी) की स्वीकृति से कोई भी श्रेणी एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जा सकती थी।

शिल्पियों की श्रेणी के अतिरिक्त, सैनिकों का भी अपना एक निगम होता था। ये सैनिक नियमित सैनिक नहीं होते थे। वरन उनकी स्थिति आज के आरक्षित सैनिकों की तरह थी। सैनिकों के निम्न प्रकार थे (1) वंशानुगत सैनिक (2) भाड़े पर लाये गए सैनिक (3) सैनिकों का निगम (4) जनजातिय लोगों से बनी सेना।

वस्त्र उद्योग- मौर्य युग का प्रधान उद्योग सूत कातने एवं बुनने का था। सबसे अच्छा सूती कपडा मदुरा उपरान्त (कोंकण), कलिंग, काशी, बंग, वत्स, महिष (महिष्मति) आदि क्षेत्रों में मिलता था। बाद में निर्मित सूती वस्त्र सबसे अच्छे किस्म के होते थे। उनको भडौंच बंदरगाह से पश्चिम की ओर निर्यात किया जाता था। सूती वस्त्र में अन्य प्रकार के वस्त्र भी होते थे जिन्हें दुकुला और कसौम कहा जाता था। बंग क्षेत्र से दुकुला आता था। पुंडू से पोण्ड्रक नामक वस्त्र आता था। असम में सुवर्णकुंड नामक स्थान रेशमी वस्त्र के लिए प्रसिद्ध था। चीनपट रेशमी वस्त्र था जो चीन से मॅगाया जाता था।

मौर्य काल में मोतियों का बहुत बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था और मोतियों का नाम उनके स्थान के नाम पर होता था।

  1. ताम्रपर्णिक- यह पांडय देश से मंगाया जाता था।
  2. पांडयकवाटक- यह पांडय देश में मलयकोटि पर्वत से मंगाया जाता था।
  3. पाश्विकय- जो पाटलिपुत्र के निकट पाशिकया नदी से निकाला जाता था।
  4. कौलेय- जो सिंघल द्वीप से मंगाया जाता था।
  5. चर्णेय- जो केरल देश में पाया जाता था।
  6. महेन्द्र जो महेन्द्र पर्वत पर पाया जाता था।
  7. कादर्मिक- फारस की खाड़ी में कदरमा नदी से।
  8. स्रौतसीय
  9. हयादीय
  10. हैमवत- हिमालय पर्वत से निकाला जाता था।

शुल्क एवं मुनाफा- किसी भी वस्तु की कीमत लगाते समय प्रबंधक, यातायात के साधनों एवं कीमतों के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखता था। जल परिवहन, भूमि परिवहन से सस्ता था और इससे कीमतों में फर्क पड़ता था। विदेश से माल मंगवाने वाले व्यापारियों पर कर नहीं लगता था ताकि वे उससे मुनाफा कमा सके। संभवत: व्यापारिक कर सरकारी शुल्क के बराबर था। यह महसूल का पाँचवा भाग होता था। महसूल वस्तु के मूल्य के पाँचवें भाग के बराबर था। मुनाफे का कुछ प्रतिशत व्यापारी को मिलता था और शेष भाग सरकारी कोष में जाता था। यह राशि स्थानीय वस्तु का 5 प्रतिशत एवं विदेशी वस्तुओं का 10 प्रतिशत थी। महसूल नकद में लिया जाता था। विदेशी व्यापारी का स्वागत नहीं किया जाता था।

महाजनी व्यवस्था- मेगस्थनीज ने लिखा है कि भारतवासी न तो सूद पर धन लेते थे और न देते थे और न उधार लेना जानते थे। परन्तु कौटिल्य ने महाजनी व्यवस्था का विस्तृत विवरण दिया है। उसके अनुसार इस काम पर कोई प्रतिबंध नहीं था, क्योंकि विशेष परिस्थितियों में सरकारी कोष से भी कर्ज लिया जा सकता था। संभवत: ब्याज की राशि 15 प्रतिशत वार्षिक थी। परन्तु कुछ परिस्थितियों में यह 60 प्रतिशत वार्षिक थी और इसे व्यवहारिकी कहा जाता था। यह समुद्री जहाज पर लदे हुए समानों पर लिया जाता था क्योंकि इसके डूबने का भी खतरा था। ग्रीक इतिहासकारों का मानना है कि भारत में कर वंचकों को मृत्यु दंड दिया जाता था। पर यह सही प्रतीत नहीं होता है।

मुद्रा प्रणाली- मौर्यकाल में आहत मुद्राएँ प्रचलित थीं। गोरखपुर में जहाँ पर प्राचीन पाटलिपुत्र नगर बसा है, सिक्कों का एक ढेर पाया गया है। यह आहत सिक्कों का प्रारंभिक ढेर है। इन्हें नंद वंश की मुद्राएँ बतायी जाती हैं क्योंकि इन पर मौर्यकाल से पहले का एक प्रतीक चिह्न (एक पहाड़ी पर खरगोश तथा कुत्ते की आकृति) मिलती है। यह नंदवंशीय राजाओं का प्रतीक चिह्न है। इन सिक्कों में सामान्यत: पाँच आकृतियाँ अंकित हैं: (1) सूर्य (2) षडभुजी एक वृत (3) तीर की नोक, कृषराशि के चिह्न, पर्वत (4) पहाड़ी पर मोर, कुत्ता या वृक्ष (5) हाथी, बैल, खरगोश को पकड़े हुए कुत्ता, गैंडा आदि।

चाँदी के सिक्के- कार्षापण, पण और धरण।

सोने का सिक्का- सुवर्ण, पाद, (1 सुवर्ण = 4 पाद)।

तांबे का सिक्का- माषक, काकिणी तथा अर्द्धकाकणी कौटिल्य के अनुसार 1 सुवर्ण = 16 मास। कात्यायन तथा पतंजलि ने भी काकिणी तथा अर्द्धकाकिणी का उल्लेख किया है। अर्थशास्त्र में सिक्के के लिए रूप शब्द का प्रयोग हुआ है। मुद्राशास्त्र के प्राचीन ग्रन्थ का नाम रूपसूत्र है।

शहरी अर्थव्यवस्था का विकास- मौयों से पूर्व जो शहरीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई थी, उसका इस काल में विकास हुआ। शहरों में अधिकांशत: व्यापारी, शिल्पी, सरकारी कर्मचारी, पुजारी, सैनिक और अन्य लोग रहते थे। जैसा की पूर्व में चर्चा की गयी है शहरी अर्थव्यवस्था का निर्माण सामग्री निर्माताओं एवं व्यापारियों की गतिविधियों पर आधारित होता था। इस प्रकार की लेन-देन भी बढ़ता था। इस काल में यह लेन-देन एवं मध्य भारत, दक्कन तथा दक्षिणी भारत तक फैल गया की वृद्धि और गहपतियों, ग्राम भोजकों को समृद्धि ने शहरी प्रसार के लिए सामाजिक आधार-प्रदान किया। अर्थशास्त्र में दुर्गनिवेश या दुएग्विधन का जिक्र आया है जो यह इंगित करता है की शहरों को दीवार से घेरा जाता था। इसमें शहर की रक्षा के बारे में विस्तार से चर्चा की गयी है। शहरों की बनावट एवं व्यवस्था का भी उल्लेख आया है। अर्थशास्त्र शहरों (दुर्गों) को राज्य का महत्वपूर्ण आधार मानता है। स्मरणीय है की केवल दुर्ग या राजधानी में स्थित श्रेणियों पर कर लगाने का उल्लेख हुआ है। दूसरे शब्दों में ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित श्रेणियां करों से मुक्त थीं। इसका कारण यह हो सकता है कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरों में रहने वाले लोगों को नियंत्रित एवं व्यवस्थित करना अधिक सरल होता है। इस तरह शहरों से प्राप्त कर से राज्य एवं व्यवस्थित करना अधिक सरल होता है। इस तरह शहरों से प्राप्त कर से कर से राज्य को अच्छी आमदनी होती थी, अतः मौर्यों ने शहरों के उत्थान एवं प्रशासन पर विशेष ध्यान दिया। मौर्यकाल विस्तारशील अर्थतंत्र का काल था। विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्पों का बहुत विकास हुआ, जिससे व्यापार बढ़े और इससे सम्बंधित कई लाभ हुए। कृषि व्यवस्था के लाभ पहली बार बड़े पैमाने पर सामने आए और इस प्रकार की अर्थव्यवस्था से कुछ हद तक स्थायित्व आया। आर्थिक परिवर्तन के साथ ही सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन में भी एक विशेषत ढंग से हुआ जो कई शताब्दियों तक बना रहा।

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