मौर्य प्रशासन Mauryan Administration

मौर्य शासकों ने देवानामपिय्य की उपाधि लेकर मध्यस्थों की भूमिका कम करने की कोशिश की। धर्मशास्त्र के अनुसार राजा केवल धर्म का रक्षक होता था, प्रतिपादक नहीं। अर्थशास्त्र में राजत्व की नई अवधारणा दी गई है। अर्थशास्त्र के अनुसार राजपद व्यक्ति, चरित्र और मानवीय व्यवहार से ऊपर होता है। इसी क्रम में चक्रवतीं राजा की अवधारणा भी लोकप्रिय होने लगी। अर्थशास्त्र में पहली बार चक्रवर्ती शब्द का स्पष्ट प्रयोग हुआ है। राज्य की सप्तांग विचारधारा भी लोकप्रिय होने लगी। अर्थात् राज्य के सात अंग हैं- राजा, मंत्री, मित्र, कर या कोष, सेना, दुर्ग, भूमि या देश। अर्थशास्त्र में इसमें आठवें अंग के रूप में शत्रु को भी जोड़ा है। कौटिल्य के अनुसार इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण- राजा है। दूसरी तरफ आचार्य भारद्वाज मंत्री को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। आचार्य विशालाक्ष देश या भूमि को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। पर पराशर दुर्ग या कोष (कर) को अधिक मानते हैं।

प्रशासन

चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल एवं शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त जहाँ एक ओर अपने पराक्रम के लिए इतिहास में प्रसिद्ध हैं, दूसरी ओर सुव्यवस्थित तथा सुसंगठित शासन-प्रणाली को जन्म देने के परिणामस्वरूप भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। मौर्य प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना में चन्द्रगुप्त के सलाहकार मंत्री चाणक्य का विशेष योगदान रहा। चाणक्य के अर्थशास्त्र से हमें मौर्य प्रशासनिक व्यवस्था की विस्तृत जानकारी मिलती है।

केन्द्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था का मौर्य साम्राज्य की स्थापना के साथ आविर्भाव हुआ। अशोक के अभिलेखों से साम्राज्य के पाँच प्रान्तों में विभक्त होने का संकेत मिलता है एवं केन्द्रीय प्रशासन का प्रान्तों पर नियंत्रण होने का उल्लेख पाया जाता है। अर्थशास्त्र में लिच्छवि, वज्जि, मल्लन, कुरु, पांचाल को संघ गणराज्यों में सम्मिलित किया है। यद्यपि इन्हें राजनैतिक विशेषाधिकार दिये गये थे तथापि इनको साम्राज्य का एक अभिन्न अंग माना जाता था। सम्राट् के लिए विशाल साम्राज्य पर सीधा नियन्त्रण रखा जाना संभव नहीं था। अत: मौर्य साम्राज्य को पाँच प्रान्तों में विभक्त किया गया।

पाँच चक्र यद्यपि सम्पूर्ण मौर्य-साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी, पर वहाँ से कम्बोज, बंग और आध्र तक विस्तृत साम्राज्य का शासन सुचारू रूप से नहीं किया जा सकता था। अत: शासन की दृष्टि से मौर्यों के अधीन सम्पूर्ण विजित को पाँच भागों में बाँटा गया था, जिनकी राजधानियाँ क्रमश: पाटलिपुत्र, तोसाली, उज्जैयनी, तक्षशिला और सुवर्णगिरि थीं। इन राजधानियों को दृष्टि में रखकर हम यह सहज में अनुमान कर सकते हैं कि विशाल मौर्य साम्राज्य पाँच चक्रों में विभक्त था। ये चक्र (प्रांत या सूबे) निम्नलिखित थे-

  1. उत्तरापथ- जिसमें कम्बोज, गांधार, कश्मीर, अफगानिस्तान, पंजाब आदि के प्रदेश थे। इसकी राजधानी तक्षशिला थी।
  2. पश्चिम चक्र- इसमें काठियावाड्-गुजरात से लेकर राजपूताना, मालवा आदि के सब प्रदेश शामिल थे। इसकी राजधानी उज्जैयनी थी।
  3. दक्षिणा-पथ- विंध्याचल के दक्षिण का सारा प्रदेश इस चक्र में था, और इसकी राजधानी सुवर्णगिरि थी।
  4. कलिंग- अशोक ने अपने नये जीते हुए प्रदेश का एक ओप्रिथक चक्र बनाया था, जिसकी राजधानी तोसाली थी।
  5. मध्य देश- इसमें वर्तमान बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल सम्मिलित थे। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। इस पंचों चक्रों का शासन करने के लिए प्रायः राजकुल के व्यक्तियों को नियत किया जाता था जिन्हें कुमार कहते था। कुमार अनेक महामत्यों की सहायता से अपने-अपने चक्र का शासन करते थे। अशोक और कुणाल राजा बनने से पूर्व उज्जैयनी, तक्षशिला आदि के कुमार रह चुके थे।

चक्रों के उपविभाग- इन पाँच चक्रों के अन्तर्गत फिर अनेक छोटे शासन-केन्द्र या मण्डल भी थे, जिसमें कुमार के अधीन महामात्य शासन करते थे। उदाहरण के लिए तोसाली के अधीन समापा में, पाटलिपुत्र के अधीन कौशाम्बी में और सुवर्णगिरि के अधीन इसिला में महामात्य रहते थे। उज्जैयनी के अधीन सुराष्ट्र पृथक् देश था, जिसका शासक चन्द्रगुप्त के समय में वैश्य पुष्यगुप्त समय में वहाँ का शासन यवन तुषास्प के अधीन था। मगध सम्राट् की ओर से जो आज्ञाएँ प्रचारित की जाती थीं, वे चक्रों के कुमारों के के नाम अशोक ने जो आदेश भेजे, वे सुवर्णगिरि के कुमार या आर्यपुत्र के द्वारा भेजे। इसी प्रकार कलिंग में समापा के महामात्यों को तोसाली के कुमार की नियुक्ति नहीं होती थी, उसका शासन सीधा सम्राट् के अधीन था। अत: उसके अन्तर्गत कौशाम्बी के महामात्यों को अशोक ने सीधे ही अपने आदेश दिये थे। प्रांतीय शासक कुमार या आर्यपुत्र की सहायता के लिए प्रांतीय मंत्रीपरिषद् होता था। दिव्यावदान में इस बात का उल्लेख है कि प्रांतीय परिषद् का सम्राट से सीधे संपर्क होता था। इसके माध्यम से सम्राट प्रन्तित शासकों की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाता था। वस्तुतः पूरा मौर्य प्रशासन रोक और संतुलन की अवधारणा पर आधारित था।

चक्रों के शासन के लिए कुमार की सहायतार्थ जो महामात्य नियुक्त होते थे, उन्हें शासन-सम्बन्धी बहुत अधिकार प्राप्त थे। अतएव अशोक ने चक्रों के शासकों के नाम जो आज्ञाएँ प्रकाशित कीं, उन्हें केवल कुमार या आर्यपुत्र के नाम से नहीं भेजा गया, अपितु कुमार और महामात्य-दोनों के नाम प्रेषित किया गया। इसी प्रकार जब कुमार भी अपने अधीनस्थ महामात्यों को कोई आज्ञा भेजते थे, तो उन्हें वे अपने नाम से नहीं, अपितु महामात्य-सहित कुमार के नाम से भेजते थे।

जनपद और ग्राम- मौर्य-साम्राज्य के मुख्य पाँच चक्र या विभाग थे और चक्र अनेक मण्डलों में विभक्त थे। प्रत्येक मण्डल में बहुत-से जनपद सम्भवत:, ये जनपद प्राचीन युग के जनपदों के प्रतिनिधि थे। शासन की दृष्टि से जनपदों के भी विविध विभाग होते थे, जिन्हें कौटिल्यीय अर्थशास्त्र में स्थानीय, द्रोण मुख, खार्वटिक, संग्रहण और ग्राम कहा गया है। शासन की ग्राम थी। दस ग्रामों के समूह को संग्रहण कहते थे। बीस संग्रहुणों (या 200 ग्रामों) से एक खार्वटिक बनता था। दो खार्वटिकों (या 400 ग्रामों में से एक द्रोणमुख और खार्वटिक शासन की दृष्टि से एक ही विभाग को सूचित करते हैं। स्थानीय में लगभग 800 ग्राम हुआ करते थे। पर कुछ स्थानीय आकार में छोटे होते थे या कुछ प्रदेशों में आबादी घनी के कारण स्थानीय में गाँवों की संख्या कम रहती थी। ऐसे ही स्थानीयों को द्रोणमुख या खार्वटिक कहा जाता था।

ग्राम का शासक ग्रमिक, संग्रहण का गोप और स्थानीय का स्थानिक कहलाता था। सम्पूर्ण जनपद के शासक को समाहरत्ता कहते थे। समाहर्ता के ऊपर महामात्य होते थे, जो चक्रों के अन्तर्गत विविध मण्डलों का शासन करने के लिए केन्द्रीय सरकार की ओर से नियुक्त किये जाते थे। इन मण्डल-महामात्यों के ऊपर कुमार और उसके सहायक महामात्य रहते थे। सबसे ऊपर पाटलिपुत्र का मौर्य-सम्राट् था।

शासक-वर्ग- शासनकार्य में सम्राट् की सहायता करने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होती थी। कौटिल्य अर्थशास्त्र में इस मन्त्रिपरिषद् का विस्तार से वर्णन किया गया है। अशोक के शिलालेखों में भी उसकी परिषद् का बार-बार उल्लेख है। चक्रों के शासक कुमार भी जिन महामात्यों की सहायता से शासनकार्य करते थे, उनकी भी एक परिषद् होती थी। केन्द्रीय सरकार की ओर से जो राज-कर्मचारी साम्राज्य में शासन के विविध पदों पर नियुक्त थे, उन्हें पुरुष कहते थे। ये पुरुष उत्तम, मध्यम और हीन-दीन दजों के होते थे। जनपदों के समूहों (मण्डलों) के ऊपर शासन करने वाले महामात्यों की संज्ञा सम्भवत: प्रादेशिक या प्रदेष्टा थी। उनके अधीन जनपदों के शासक समाहर्ता कहलाते थे। नि:सन्देह, ये उत्तम पुरुष होते थे। इनके अधीन युक्त आदि विविध कर्मचारी मध्यम व हीन दजों में रखे जाते थे।

स्थानीय स्वशासन- जनपदों के शासन का संचालन करने के लिए जहाँ केन्द्रीय सरकार की ओर से समाहर्त्ता नियत थे, वहाँ जनपदों की अपनी आन्तरिक स्वतन्त्रता भी अक्षुण्ण रूप से कायम थी। कौटिल्य अर्थशास्त्र में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि जनपदों, नगरों व ग्रामों के धर्म, चरित्र और व्यवहार को अक्षुण्ण रखा जाय। इसका अभिप्राय यह हुआ, कि इसमें अपना स्थानीय स्वशासन पुरानी परम्परा के अनुसार जारी था। सब जनपदों में एक ही प्रकार की स्थानीय स्वतन्त्रता नहीं थी। हम जानते हैं, कि मगध-साम्राज्य के विकास से पूर्व कुछ जनपदों में गणशासन और कुछ में राजाओं का शासन था। उनके व्यवहार और धर्म अलग-अलग थे। जब वे मगध के साम्राज्यवाद के अधीन हो गये, तो भी उनमें अपनी पुरानी परम्परा के अनुसार स्थानीय शासन जारी रहा, और ग्रामों में पुरानी ग्रामसभाओं और नगरों में नगरसभाओं (पौरसभा) के अधिकार कायम रहे। ग्रामों के समूहों या जनपदों में भी जनपदसभा की सत्ता विद्यमान रही। पर साथ ही केन्द्रीय सरकार की ओर से भी विविध करों को एकत्र करने तथा शासन का संचालन करने के लिए पुरुष नियुक्त किये जाते रहे।

विजिगीषु राजर्षि सम्राट्- विविध जनपदों और गणराज्यों को जीतकर जिस विशाल मगध-साम्राज्य का निर्माण हुआ था, उसका केन्द्र राजा या सम्राट् था। चाणक्य के अनुसार राज्य के सात अंगों में केवल दो की प्रधानता है, राजा और देश की। प्राचीन परम्परा के अनुसार राज्य के सात अंग माने जाते थे- राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, सोना और मित्र पुराने युग में जब छोटे-छोटे जनपद होते थे और उनमें एक ही जन का निवास होता था, तो राजा की उनमें विशेष महत्ता नहीं होती थी। इसीलिए आचार्य भारद्वाज की दृष्टि में राजा की अपेक्षा अमात्य की अधिक महत्ता थी। अन्य आचायों की दृष्टि में अमात्य की अपेक्षा भी जनपद, दुर्ग या कोश आदि का महत्त्व अधिक था। प्राचीनकाल के ऐसे जनपदों में जिनमें एक ही जन का निवास था राजा की अपेक्षा अन्य अंगों या तत्त्वों की प्रमुखता सर्वथा स्वाभाविक थी। जनपदों को जीतकर जिन साम्राज्यों का निर्माण किया जा रहा था, उनका केन्द्र राजा ही था, वे एक महाप्रतापी महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति की ही कृति थे। उसी ने कोश, सेना, दुर्ग आदि का संगठन कर अपनी शक्ति का विस्तार किया था। कौटिल्य के शब्दों में- मन्त्री, पुरोहित आदि भृत्य वर्ग की और राज्य के विविध अध्यक्षों व अमात्यों की नियुक्ति राजा ही करता है।

जब साम्राज्य में राजा का इतना अधिक महत्त्व हो, तो राजा को भी एक आदर्श व्यक्ति होना चाहिए। कोई साधारण पुरुष राज्य में कूटस्थानीय नहीं हो सकता। चाणक्य के अनुसार राजा में निम्नलिखित गुण आवश्यक हैं- वह ऊंचे कुल का हो, उसमें दैवी बुद्धि और दैवी शक्ति हो, वह वृद्ध (Elders) जनों की बात को सुनने वाला हो, धार्मिक हो, सत्य भाषण करने वाला हो, परस्पर-विरोधी बातें न करे, कृतज्ञ हो, उसका लक्ष्य बहुत ऊँचा हो, उसमें उत्साह अत्यधिक हो, वह दीर्घसूत्री न हो, सामन्त राजाओं को अपने वश में रखने में वह समर्थ हो, उसकी बुद्धि दृढ़ हो, उसकी परिषद् छोटी न हो और वह विनय (नियन्त्रण) का पालन करने वाला हो। इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से गुणों का चाणक्य ने विस्तार से वर्णन किया है, जो राजा में अवश्य होने चाहिए।

मन्त्रिपरिषद्- इसका उल्लेख चौथे और छठे शिलालेख में मिलता है। पतंजलि द्वारा महाभाष्य में चंद्रगुप्तसभा का उल्लेख किया गया है। आचार्य चाणक्य के अनुसार राजवृत्ति तीन प्रकार की होती है- प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमेय। जो अपने सामने हो, वह प्रत्यक्ष है। जो दूसरे बताएं, वह परोक्ष है। किये हुए कर्म के बिना किये का अनुमान लगाना अनुमेय कहलाता है। सब काम एक साथ नहीं होते। राजकर्म बहुत-से स्थानों पर होते है। अत: एक राजा सारे राजकर्म अपने आप नहीं कर सकता। इसलिए उसे अमात्यों की नियुक्ति करने की आवश्यकता होती है। मंत्रियों और पुरोहितों का चुनाव एक विस्तृत प्रक्रिया के अनुसार किया जाता था। चारित्रिक जाँच की यह प्रक्रिया उपधापरीक्षण कहलाती थी। इसीलिए यह भी आवश्यक है, कि मन्त्री नियत किये जाएँ, जो परोक्ष और अनुमेय राजकमों के सम्बन्ध में राजाओं को परामर्श देते रहें। राज्यकार्य सहायता के बिना सिद्ध नहीं हो सकता। एक पहिये से राज्य की गाड़ी नहीं चल सकती, इसलिए राजा सचिवों की नियुक्ति करे और उनकी सम्मति को सुने। अच्छी बड़ी मंत्रिपरिषद को रखना राजा के अपने लाभ के लिए है, इससे उसकी अपनी मंत्रशक्ति बढ़ती है। परिषद् में कितने मंत्री हों, इस विषय में विविध आचार्यों के विविध मत थे। मानव बार्हस्पतय, औशनस आदि संप्रदायों के मत में मंत्रीपरिषद् में क्रमशः बारह, सोलह और बीस मंत्री होने चाहिए। परन्तु चाणक्य किसी निश्चित संख्या के पक्ष में नहीं थे। उनका मत था कि जितनी सामर्थ्य हो, जितनी आवश्यकता हो, उतने ही मन्त्री, मन्त्रिपरिषद् में रख लिए जाए।

अत्यधिक गुप्त बातों पर राजा मन्त्रिपरिषद् में सलाह नहीं करते थे। वे एक-एक मन्त्री से अलग-अलग परामर्श करते थे, और इस सम्बन्ध में चाणक्य का यह आदेश था, कि जिस बात पर सलाह लेनी हो, उससे उलटी बात इशारे से पूछी जाय, ताकि किसी मन्त्री को यह न मालूम पड़े कि राजा के मन में क्या योजना है, और वह वस्तुत: किस बात पर सलाह लेना चाहता है।

बड़ी मन्त्रिपरिषद् के अतिरिक्त एक छोटी उपसमिति भी होती थी, जिसमें तीन या चार खास मन्त्री रहते थे। इसे मन्त्रिण कहा जाता था। जरूरी मामलों पर इसकी सलाह ली जाती थी। राजा प्राय: अपने मन्त्रियों और मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से ही राजकार्य का संचालन करता था। वह भली-भाँति समझता था, कि मन्त्रसिद्धि अकेले कभी नहीं हो सकती। जो बात मालूम नहीं है उसे मालूम करना; जो मालूम है उसका निश्चय करना; जिस बात में दुविधा है, उसके संशय को नष्ट करना; और जो बात केवल आंशिक रूप से ज्ञात है, उसे पूर्णांश में जानना, यह सब कुछ मन्त्रिपरिषद् के मन्त्र द्वारा ही हो सकता है। अत: जो लोग बुद्धिवृद्ध हों, उन्हें सचिव या मन्त्री बनाकर उनसे सलाह लेनी चाहिए। मन्त्रिपरिषद् में जो बात भूयिष्ठ (अधिक संख्या के) कहें, उसी के अनुसार कार्य करना उचित है। पर यदि राजा को भूयिष्ठ की बात कारयसिद्धिकर प्रतीत न हो, तो उसे उचित है कि वह उसी सलाह को माने, जो उसकी दृष्टि कार्यसिद्धिकर हो। जो मन्त्री उपस्थित न हों, उनकी सम्मति पत्र द्वारा मंगा ली जाय। मन्त्रिपरिषद् में केवल ऐसे ही व्यक्तियों को नियत किया जाय, जो सर्वोपधाशुद्ध हों, अर्थात् सब प्रकार से परीक्षा करके जिनके विषय में यह निश्चय हो जाये, कि वे सब प्रकार के दोषों व निर्बलताओं से विरहित हैं।

मंत्रिपरिषद के अमात्य राजा की स्वेच्छाचारिता पर पर्याप्त नियंत्रण रख सकते थे, यह बात दिव्यादान की इस कथा से भलीभांति सूचित होती है। जिन अमात्यों ने राधागुप्त के नेतृत्व में अशोक की स्वेच्छाचारिता को नियंत्रित किया था, सम्भवत: वे मन्त्रिपरिषद् के ही सदस्य थे, जो कूटस्थानीय राजा पर भी अंकुश रखने की शक्ति रखते थे। पर, यह कार्य उन्होंने युवराज की सहायता लेकर ही किया था, क्योंकि राजा के समान ही युवराज की स्थिति भी राज्य में प्रधान थी।

जनता का शासन- यदि मगध-साम्राज्य के शासन में कूटस्थानीय राजा का इतना महत्त्वपूर्ण स्थान था, और उसकी मन्त्रिपरिषद् उसकी अपनी नियत की हुई सभा होती थी तो क्या मगध-राजाओं का शासन सर्वथा निरंकुश और स्वेच्छाचारी था ? क्या उस समय की जनता शासन में जरा भी हाथ नहीं रखती थी? यह ठीक है, कि अपने बाहुबल और सैन्य-शक्ति से विशाल साम्राज्य का निर्माण करने वाले मगध-सम्राटों पर अंकुश रखने वाली कोई अन्य सर्वोच्च सत्ता नहीं थी, और यह कि राजा ठीक प्रकार से प्रजा का पालन करें, इस बात की प्रेरणा प्रदान करने वाली शक्ति उनकी अपनी योग्यता, अपनी महानुभवता और अपनी सर्वगुणसम्पन्नता के अतिरिक्त और कोई नहीं थी, पर मगध-साम्राज्य के शासन में जनता का बहुत बड़ा हाथ था। मगध-साम्राज्य ने जिन विविध जनपदों को अपने अधीन किया था, उनके व्यवहार, धर्म और चरित्र अभी अक्षुण्ण थे। वे अपना शासन बहुत कुछ स्वयं ही करते थे। उस युग के शिल्पी और व्यवसायी जिन श्रेणियों में संगठित थे, वे अपना शासन स्वयं करती थीं। नगरों की पौरसभाएँ, व्यापारियों के पूरा और निगम तथा ग्रामों की ग्रामसभाएँ अपने आन्तरिक मामलों में अब भी पूर्ण स्वतन्त्र थी। राजा लोग देश के प्राचीन परम्परागत राजधर्म का पालन करते थे, और अपने व्यवहार का निर्धारण उसी के अनुसार करते थे। यह धर्म और व्यवहार सनातन थे, राजा की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं थे। इन्हीं सबका परिणाम था, कि पाटलिपुत्र में विजिगीषु राजर्षि राजाओं के रहते हुए भी जनता अपना शासन अपने आप किया करती थी।

जनपदों का शासन- मगध के साम्राज्यवाद ने धीरे-धीरे भारत के सभी पुराने जनपदों को अपने अधीन कर लिया था। परन्तु इन जनपदों की अपनी भाषाएँ होती थीं। जनपद की राजधानी या पुर की सभा को पौर और शेष प्रदेश की सीमा को जनपद कहा जाता था। प्रत्येक जनपद के अपने धर्म, व्यवहार और चरित्र भी होते थे। मगध के सम्राटों ने इन विविध जनपदों को जीतकर इनकी आन्तरिक स्वतन्त्रता को कायम रखा। कौटलीय अर्थशास्त्र में एक प्रकरण है, जिसका शीर्षक लब्धप्रशमनम् है। इसमें यह निरूपित किया गया है कि नये जीते हुए प्रदेश के साथ क्या व्यवहार किया जाय और उसमें किस प्रकार शान्ति स्थापित की जाय। इसके अनुसार नये जीते हुए प्रदेश में राजा को चाहिए कि वह अपने को जनता का प्रिय बनाने का प्रयत्न करे। जनता के विरुद्ध आचरण करने वाले का विश्वास नहीं जम सकता, अत: राजा जनता के समान ही अपना विहारों का आदर करे, और वहाँ के धर्म, व्यवहार आदि का उल्लंघन न करे।

जनपदों का शासन करने के लिए सम्राट् की ओर से समाहर्त्ता नामक राजपुरुष की नियुक्ति की जाती थी। पर, वह जनपद के आन्तरिक शासन में हस्तक्षेप नहीं करता था। स्वशासन की दृष्टि से सब जनपदों की स्थिति एक समान नहीं थी। मौयों से पहले भी अवन्ति, कौशल, वत्स आदि के राजाओं ने बहुत-से जनपदों को जीतकर अपने अधीन कर लिया था। शिशुनाग, नन्द आदि मगध-राजा भी अपने साम्राज्य का बहुत कुछ विस्तार करने में सफल हुए थे। इनमें से अनेक राजा अधार्मिक भी थे, और उन्होंने प्राचीन आर्य-मर्यादा के विपरीत अपने जीते हुए जनपदों की आन्तरिक स्वतन्त्रता का भी विनाश किया था। जो जनपद देर से मागध साम्राज्य के अधीन थे, उनकी अपेक्षा नये जीते हुए जनपदों की पृथक् सत्ता अधिक सुरक्षित थी। अशोक के अभिलेख में जिला स्तर के अधिकारियों का क्रम इस प्रकार है: युक्त, रज्जुक और प्रादेशिक। प्रादेशिक अपने जिले से होने वाली आय की देखरेख करता था तथा कानून-व्यवस्था को बनाए रखना उसका उत्तरदायित्व था। अभिलेखों से इस बात के संकेत मिलते हैं कि अशोक ने प्रति पाँचवें वर्ष इन्हें निरीक्षण पर जाने का निर्देश दिया। रज्जु राजस्व प्रशासक था तथा इसका काम ग्रामीण क्षेत्र तक सीमित था। यह भूमि का सर्वेक्षण करता था तथा उसकी कीमत निर्धारण करता था। अपने शासनकाल के सत्ताइसवें वर्ष में अशोक ने रज्जुकों को दण्ड और अभिहार की स्वतंत्रता देते हुए न्यायिक कार्य भी सौंपा। चौथे स्तंभ अभिलेख में इसका उल्लेख मिलता है तथा तीसरे शिलालेख में इनको निरीक्षाटन पर जाने का आदेश दिया गया। प्रादेशिक रज्जुक के प्रशासनिक और अदालती कार्य का निरीक्षण करेगा तथा युक्त उसकी रिपोर्ट तैयार करेगा।

तीसरे शिलालेख में जिला स्तर के एक और अधिकारी युक्त का जिक्र आता है जो न केवल शीर्ष स्तर पर न्याय का काम देखता था, वरन् सचिव और लेखाकार्य भी सम्पन्न करता था। यहाँ समाहता, प्रादेशिक और स्थानिक के अन्तसम्बन्ध को लेकर होने वाले भ्रम का निराकरण जरूरी है। समाहर्ता को अगर हम चीफ कलक्टर मानें, तो प्रादेशिक कलक्टर होता था और स्थानिक डिप्टी कलक्टर। स्थानिक प्रादेशिक के अधीन काम करता था तथा उसका प्रमुख काम करवसूली था।

मौर्य प्रशासन में स्थानीय स्तर के उन अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण थी जो केन्द्रीय प्रशासन और स्थानीय प्रशासन के बीच की कड़ी का काम करता थे। पुलिसानी युक्त की तरह का निम्न अधिकारी होता था तथा वह जनमत की सूचना राजा को देता था। छठे वृहत शिलालेख में प्रतिवेदिका का उल्लेख मिलता है जो कानून-व्यवस्था से संबंधित विशेष रिपोर्टर होता था। अर्थशास्त्र में प्रतिवेदिका की तुलना चर्चित गुप्तचरों से की गई है तथा इन्हें इस बात की छूट होती थी कि ये बेधड़क राजा से कहीं भी मिल सकते थे। एक अन्य कनिष्ठ अधिकारी होता था जो राजा के फरमानों को जनता के समक्ष पढ़ता था। इसी प्रकार आयुक्तिक राजा द्वारा नियुक्त विशिष्ट अधिकारी था और इसका काम महामायों की सहायता करना था।

सैन्य प्रशासन-यह प्रशासन कौटिल्य सेना के तीन भागों का उल्लेख करता है- पुस्तैनी सेना, किराए की सेना और नगरपालिका से संबंधित सेना। प्लिनी ने मौर्य सैनिकों की संख्या छह लाख, मेगस्थनीज ने चार लाख तथा प्लुटार्क ने दो लाख बतलाया है। मेगस्थनीज पाँच-पाँच सदस्यों वाली छह समिति का उल्लेख करता है जिसके माध्यम से सैन्य प्रशासन को विनियमित किया जाता था। ये समितियाँ पैदल, घुड़सवार, हाथी, रथ, नौ तथा रसद विभाग से संबंधित थी। कौटिल्य नावाध्यक्ष का उल्लेख करता है जो नौसेना विभाग का अधिकारी था और इसे युद्ध से संबंधित समस्याओं पर विचार करना था। सिकंदर के अभियान के क्रम में सर्वप्रथम जहाज का का प्रयोग किया गया। एरियन उत्तर-पश्चिम में जथ्रोई जाति के पास जहाज का उल्लेख करता है। स्ट्रैबो के अनुसार पोत-निर्माण पर राज्य का एकाधिकार था।

नगरों का शासन- मौर्यकाल में नगरों के स्थानीय स्वशासन की क्या दशा थी, इसका सबसे अच्छा परिचय मेगस्थनीज के यात्रा-विवरण से मिलता है। मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र के नगर-शासन का विस्तार में वर्णन किया है। उसके अनुसार पाटलिपुत्र की नगर सभा छः उपसमितियों में विभक्त थी, और प्रत्येक उपसमिति के पाँच-पाँच सदस्य होते थे। इन उपसमितियों के कार्य निम्नलिखित थे-

पहली उपसमिति का कार्य औद्योगिक तथा शिल्प-सम्बन्धी कायों का निरीक्षण करना था। मजदूरी की दर निश्चित करना तथा इस बात पर विशेष ध्यान देना था कि शिल्पी लोग शुद्ध तथा पक्का माल ही काम में लाते हैं। मजदूरों के कार्य का समय तय करना, इसी उपसमिति का कार्य था। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में शिल्पज्ञ लोगों का समाज में बड़ा आदर था। प्रत्येक शिल्पी राष्ट्र की सेवा में नियुक्त माना जाता था। यही कारण है, कि यदि कोई मनुष्य किसी शिल्पी के ऐसे अंग को विकल कर दे, जिससे कि उसके हस्त-कौशल में न्यूनता आ जाए, तो उसके लिए मृत्यु-दण्ड की व्यवस्था थी।

दूसरी उपसमिति का कार्य विदेशियों का सत्कार करना था। आज कल जो काम विदेशों के दूतमंडल करते हैं, उनमें से अनेक कार्य यह समिति किया करती थी। जो विदेशी पाटलिपुत्र में आते थे, उन पर यह उपसमिति भी निगाह रखती थी। साथ ही विदेशियों के निवास, सुरक्षा और समय-समय पर औषधोपचार का कार्य भी इस उपसमिति को सुपुर्द था। यदि किसी विदेशी की पाटलिपुत्र में मृत्यु हो जाय, तो उसके देश के रिवाज के अनुसार उसे दफनाने का प्रबन्ध भी इसी की ओर से किया जाता था। मृत परदेसी की जायदाद व संम्पत्ति का प्रबंध भी यह उपसमिति करती थी।

तीसरी उपसमिति का काम मर्दुमशुमारी करना था। मृत्यु और जन्म की सूची रखना इसी उपसमिति का कार्य था। कर लगाने के लिए यह सूची बड़ी उपयोगी होती थी।

चौथी उपसमिति क्रय- विक्रय के नियमों का निर्धारण करती थी। भार और माप के परिमाणों को निश्चित करना, व्यापारी लोग उनका शुद्धता के साथ और सही-सही उपयोग करते हैं, इसका निरीक्षण करना इस उपसमिति का कार्य था। व्यापारी लोग जब किसी वस्तु विशेष को बेचने की अनुमति प्राप्त करना चाहते थे, तो इसी उपसमिति के पास आवेदन-पत्र भेजते थे। ऐसी अनुमति देते समय यह उपसमिति अतिरिक्त कर भी वसूल करती थी।

पाँचवीं उपसमिति व्यापारियों पर इस बात के लिए कड़ा निरीक्षण रखती थी, कि वे लोग नई और पुरानी वस्तुओं को मिलाकर तो नहीं बेचते। नई और पुरानी चीजों को मिलाकर बिक्री करना कानून के विरुद्ध था। इसको भंग करने पर सजा दी जाती थी। यह कानून इसलिए बनाया गया था, क्योंकि पुरानी वस्तुओं को बाजार में बेचना कुछ विशेष अवस्थाओं को छोड़कर सर्वथा निषिद्ध था।

छठी उपसमिति का कार्य क्रय- विक्रय पर टैक्स वसूल करना होता था। उस समय यह नियम था कि जो कोई वस्तु जिस कीमत पर बेची जाए, उसका दसवाँ भाग कर-रूप में नगर-सभा को दिया जाय। इस कर को न देने पर कड़े दण्ड की व्यवस्था थी।

इस प्रकार छ: उपसमितियों के पृथक्-पृथक् कार्यों का उल्लेख कर मैगस्थनीज ने लिखा है, कि- ये कार्य हैं, जो उपसमितियाँ पृथक् रूप से करती हैं। पर पृथक् रूप में जहाँ उपसमितियों को अपने-अपने विशेष कार्यों का ख्याल करना होता है, वहाँ वे सामूहिक रूप से सर्वसामान्य या सर्वसाधारण हित के कार्यों पर भी ध्यान देती हैं; यथा सार्वजनिक इमारतों को सुरक्षित रखना, उनकी मरम्मत का प्रबन्ध करना, कीमतों को नियन्त्रित करना और बाजार, बन्दरगाह और मन्दिरों पर ध्यान देना।

मेगस्थनीज के इस विवरण से स्पष्ट है, कि मौर्य चन्द्रगुप्त के शासन में पाटलिपुत्र का शासन तीस नागरिकों की एक सभा के हाथ में था। सम्भवत: यही प्राचीन पौरसभा थी। इस प्रकार की पौरसभाएँ तक्षशिला, उज्जैयनी आदि अन्य नगरों में भी विद्यमान थीं। जब उत्तरापथ के विद्रोह को शान्त करने के लिए कुमार कुणाल तक्षशिला गया था, तो वहाँ के पौर ने उसका स्वागत किया था। अशोक के शिलालेखों में भी ऐसे निर्देश विद्यमान हैं, जिनसे सूचित होता है, कि उस समय के बड़े नगरों में पौरसभाएँ विद्यमान थीं। जिस प्रकार मगध-साम्राज्य के अन्तर्गत विविध जनपदों में अपने परम्परागत धर्म, व्यवहार और चरित्र विद्यमान थे, उसी प्रकार पुरों व नगरों में भी थे। यही कारण है कि नगरों के निवासी अपने नगरों के शासन में पर्याप्त अधिकार रखते थे।

मेगस्थनीज का यह विवरण पाटलिपुत्र-सदृश नगरों के उस स्वायत्त-शासन को सूचित करता है। जो वहाँ पारम्परिक रूप से विद्यमान था। पर मौर्य साम्राज्य जैसे विशाल साम्राज्य के विकसित हो जाने पर यह भी आवश्यक था कि सम्राट् ओर से भी नगरों के सुशासन की व्यवस्था की जाय। कौटलीय अर्थशास्त्र नगर के शासक को नागरिक कहते थे। नगर के शासन में इसकी वही स्थिति थी, जो कि जनपद के शासन में समाहर्ता की थी। शासन की सुविधा के लिए नगर को भी अनेक उपविभागों में विभक्त किया जाता था, जिनके शासक क्रमश: स्थानिक और गोप कहलाते थे। स्थानिक प्रायः नगर के चौथे भाग का शासक होता था, और गोप दस, बीस या चालीस परिवारों के छोटे उपविभाग का।

सम्राट् या केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किये गए नगर के ये शासक- नागरक, स्थानिक और गोप अपने-अपने क्षेत्र के सुशासन के लिए उत्तरदायी थे, और इनके कार्यों का कुछ परिचय अर्थशास्त्र के नागरकप्रणिधिः प्रकरण से मिलता है, जिसमें नगर की सफाई, अपरिचित यात्रियों पर नियन्त्रण, अग्नि से मकानों की रक्षा, भोजन की शुद्ध रूप से प्राप्ति अदि के सम्बन्ध में बहुत सी व्यवस्थाएं दी गयी हैं।

सम्भवत: मेगस्थनीज द्वारा वर्णित नगर-सभा, नागरक के कर्मचारियों से स्वतन्त्र होकर ही अपने कायों को सम्पादित किया करती थी।

ग्रामों का शासन- जनपदों में बहुत-से ग्राम सम्मिलित होते थे, और प्रत्येक ग्राम शासन की दृष्टि से अपनी पृथक व स्वतन्त्र सत्ता रखता था। प्रत्येक ग्राम का शासक पृथक्-पृथक् होता था, जिसे ग्रामिक कहते थे। ग्रामिक ग्राम के अन्य निवासियों के साथ मिलकर अपराधियों को दण्ड देता था, और किसी व्यक्ति को ग्राम से बहिष्कृत भी कर सकता था। ग्राम की अपनी सार्वजनिक निधि होती थी, जो जुरमाने ग्रामिक द्वारा वसूल किए जाते थे, वे इसी निधि में जमा होते थे। ग्राम की ओर से सार्वजनिक हित के अनेक कायों की व्यवस्था की जाती थी। लोगों के मनोरंजन के लिए विविध तमाशों (प्रेक्षाओं) की व्यवस्था की जाती थी, जिनमें सब ग्रामवासियों को भाग लेना होता था। जो लोग अपने सार्वजनिक कर्तव्य की उपेक्षा करते थे, उन पर जुरमाना किया जाता था। इससे यह सूचित होता है कि ग्राम का अपना एक पृथक् संगठन भी उस युग में विद्यमान था। यह ग्रामसंस्था न्याय का भी कार्य करती थी। ग्रामसभाओं से बनाये गए नियम साम्राज्य के न्यायालयों में मान्य होते थे। अक्षपटल के अध्यक्ष के कायों में एक यह भी था, कि वह ग्रामसंघ के धर्म, व्यवहार, चरित्र, संस्थान आदि को (ऊहपटलाध्यक्ष) पंजीकृत करें।

मौर्य साम्राज्य के ग्रामों में स्वायत्त संस्थाओं की सत्ता थी। इस संस्था को ग्राम-संघ कहते थे, और इसी के धर्म, व्यवहार, चरित्र आदि को अक्षपटलाध्यक्ष द्वारा किया जाता था। इस ग्रामसंघ के सदस्यों को ग्रामवृद्ध कहा जाता था। सम्भवत: ग्राम में निवास करने वाले सब कुलों या परिवारों के मुखियाओं (वृद्धों) द्वारा ही ग्रामसंघ का निर्माण होता था। ये ग्रामवृद्ध जहाँ अपराधियों को दण्ड देते थे, उनसे जुरमाने वसूल करते थे, ग्राम-विषयक सार्वजनिक हित के कायों का सम्पादन करते थे, और लोगों के मनोरंजन की व्यवस्था करते थे, वहाँ ग्राम की शोभा को बनाए रखना आोर नाबालिगों की सम्पत्ति का प्रबन्ध करने का भी कार्य करते थे। ग्राम में विद्यमान मन्दिरों और अन्य देवस्थानों की सम्पत्ति का प्रबन्ध भी इन्हीं के हाथों में था। ये अपने क्षेत्र में सड़क और पुल आदि बनवाने का भी कार्य करते थे।

इस ग्रामसंघ या ग्रामसंस्था का मुखिया जहाँ ग्रामिक कहलाता था, वहां केन्द्रीय सरकार की ओर से भी ग्राम के शासन के लिए एक कर्मचारी नियत किया जाता था, जिसे गोप कहते थे। ग्राम के शासन में गोप की वही स्थिति थी, जो नगर के शासन में नागरक की थी। केन्द्रीय सरकार की ओर से गोप के मुख्य कार्य निम्नलिखित थे- ग्रामों की सीमाओं को निर्धारित करना, जनगणना करना और भूमि का विभाजन करना। ग्राम स्तर के अधिकारी गोप के प्रति जिम्मेदार होते थे। लेखपाल और लिपिक ग्राम प्रशासन के सहायक के रूप में काम करते थे तथा इन्हें करों में छूट के रूप में वेतन प्राप्त होता था।

राजा द्वारा नियुक्त पूर्ण अधिकारियों को भी भूमि अनुदान दिया जाता था, किन्तु वे भूमि के मालिक नहीं थे तथा उन्हें उसके क्रय-विक्रय का अधिकार नहीं था। वे केवल उपज के अधिकारी होते थे। केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त गोप की सत्ता के रहते हुए भी ग्रामिक और ग्रामस का ग्राम के शासन में बहुत महत्त्व था।

व्यवसायियों की श्रेणियाँ- मौर्यकाल के व्यवसायी और शिल्पी श्रेणियों (Guilds) में संगठित थे। ये श्रेणियाँ अपने नियम स्वयं बनाती थी, और अपने संघ में सम्मिलित शिल्पियों के जीवन और कार्य पर पूरा नियन्त्रण रखती थी। इनके नियम, व्यवहार और चरित्र आदि को भी राजा द्वारा स्वीकृत किया जाता था।

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