मराठा साम्राज्य: शिवाजी Maratha Empire: Shivaji

मराठा साम्राज्य

मराठा राज्य का निर्माण एक क्रान्तिकारी घटना है। विजयनगर के उत्थान से भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण तत्व आया था, वैसे ही सत्रहवीं सदी के उत्तराद्ध में मराठा शक्ति के उत्थान से हुआ। भारतीय इतिहास के पूर्व मध्य काल में मराठों की राजनैतिक एवं सांस्कृतिक कार्यों में उज्जवल परम्पराएँ थीं। उस समय उन्होंने देवगिरी के यादवों के अधीन राष्ट्रीय पक्ष का समर्थन किया था। अलाउद्दीन के समय में यादव रामचन्द्रदेव के पतन के साथ उनकी स्वतंत्रता नष्ट हो गयी, परन्तु चालीस वर्षों में वे पुन: बहमनी राज्य में तथा आगे चलकर उत्तरगामी सल्तनतों में महत्वपूर्ण भाग लेने लगे। सत्रहवीं सदी में वे एक राष्ट्रीय राज्य के रूप में संगठित हो गये। इसमें सन्देह नहीं कि शिवाजी इस मराठा राष्ट्रीय एकता का नायक था, परन्तु यह मानना पड़ेगा कि अन्य अनेक कारण थे जिन्होंने मराठा शक्ति के उत्कर्ष और शिवाओं की गौरवशाली उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त किया। इन कारणों में से मुख्य संक्षेप में इस प्रकार हैं।

शिवाजी

प्रथमत: महाराष्ट्र के लोगों के चरित्र तथा इतिहास को ढालने में वहाँ के भूगोल का गहरा प्रभाव पड़ा। मराठा देश दो तरफ से पहाड़ की श्रेणियों से घिरा है-सह्यद्रि उत्तर से दक्षिण तक फैला हुआ है तथा सतपुड़ा एवं विंध्य पूर्व से पश्चिम तक फैले हुए हैं। यह नर्मदा एवं ताप्ती नदियों द्वारा रक्षित है। इसमें आसानी से प्रतिरक्षित हो सकने वाले बहुत से पहाड़ी दुर्ग थे। यही कारण था कि मराठा देश अश्वारोहियों के एक धक्के से अथवा यहाँ तक कि एक वर्ष तक आक्रमण करने पर भी नहीं मिलाया जा सकता अथवा न जीता जा सकता था। देश की ऊबड़खाबड़ एवं अनुर्वर भूमि, इसकी अनिश्चित एवं कम वर्षा और कृषि-सम्बन्धी इसके अल्प साधनों के कारण मराठे विषयसुख एवं आलस्य के दोषों से बचे रहे तथा उन्हें अपने में आत्मनिर्भरता, साहस, अध्यवसाय, कठोर सरलता, रुक्ष खरापन, सामाजिक समानता की भावना एवं इसके फलस्वरूप मनुष्य के रूप में मनुष्य की प्रतिष्ठा में गर्व का विकास करने में सहायता मिली।

दूसरे, एकनाथ, तुकाराम, रामदास और वामन पंडित इन मराठा धर्म-सुधारकों के क्रमानुसार सदियों से ईश्वर-भक्ति, ईश्वर के सामने सब मनुष्यों की समानता जिसमें जाति अथवा पद का कोई भेद नहीं था तथा कार्य की प्रतिष्ठा-इन सिद्धान्तों का प्रचार कर रखा था। इस प्रकार उन्होंने अपने देश में पुनर्जागरण अथवा आत्म-जागरण के बीजों का रोपण कर दिया था, जो सामान्यतया किसी राजनैतिक क्रान्ति की पृष्ठभूमि प्रस्तुत कर उसके आगमन का पूर्वा-मास प्रस्तुत करते हैं। शिवाजी के गुरु रामदास समर्थ ने स्वदेशवासियों के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला था। उसने मठों के अपने शिष्यों एवं अपनी प्रसिद्ध कृति दासबोध के द्वारा उन्हें समाज सुधार तथा राष्ट्रीय पुनर्जीवन के आदशों से प्रेरित किया।

तीसरे, साहित्य एवं भाषा से महाराष्ट्र के लालों को एकता का एक अन्य बन्धन मिला। धर्म-सुधारकों के भक्ति-गीत मराठी भाषा में लिखे गये। फलस्वरूप पंद्रहवीं तथा सोलहवीं सदियों में एक सबल मराठी साहित्य का विकास हुआ, जिससे देशवासियों को श्रेष्ठ आकांक्षाओं के लिए प्रेरणा मिली। इस प्रकार सत्रहवीं सदी में महाराष्ट्र में, शिवाजी द्वारा राजनैतिक एकता प्रदान किये जाने के पहले ही, भाषा, धर्म एवं जीवन की एक विलक्षण एकता स्थापित हो गयी थी। लोगों के ऐक्य भाव में जो थोडी कमी थी, वह शिवाजी के द्वारा एक राष्ट्रीय राज्य की स्थापना, दिल्ली के आक्रमणकारियों के साथ उसके (शिवाजी के) पुत्रों के अधीन दीर्घकालीन संघर्ष एवं पेशवाओं के अधीन उस जाति के साम्राज्य के प्रसार से पूरी हो गयी।

मराठों ने दक्कन की सल्तनतों में काम करने के कारण राजनैतिक एवं सैनिक शासन का कुछ पूर्व अनुभव भी प्राप्त कर लिया था। विख्यात शिवाजी के पिता शाहजी ने अहमदनगर के सुल्तान की सेवा में एक अश्वारोही के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया। वह धीरे-धीरे प्रतिष्ठित हो गये, उसने उस राज्य में बहुत-से क्षेत्र प्राप्त कर लिये तथा निजामशाही शासन के अन्तिम वर्षों में वह राजा बनाने वाला बन गया। परन्तु उसकी सफलता से दूसरे उससे ईष्य करने लगे। शाहजहाँ के द्वारा अहमदनगर मिला लिये जाने के बाद 1636 ई. में उसने बीजापुर राज्य में नौकरी कर ली। यहाँ भी उसने काफी प्रसिद्धि प्राप्त की। पूना की उसकी पुरानी जागीर के अतिरिक्त, जिस पर अहमदनगर राज्य के सेवक के रूप में उसका अधिकार था, उसे कर्णाटक में एक विस्तृत जागीर मिली।

शिवाजी का जन्म जुन्नर के निकट शिवनेर के पहाड़ी दुर्ग में 1630 ई. में (एक विचारधारा के लेखकों के मतानुसार) अथवा 1627 ई. में (जैसा कुछ आधुनिक इतिहासकार कहते हैं) हुआ। वे भोंसले परिवार से सम्बद्ध थे। शिवाजी तथा उसकी माँ जीजाबाई को दादाजी कोणदेव नामक एक योग्य ब्राह्मण की संरक्षकता में छोड़कर शाहजी अपनी द्वितीय स्त्री के साथ अपनी जागीर में चला गया। जीजाबाई अपने पति द्वारा उपेक्षित रही। पर वह धार्मिक प्रकृति एवं असाधारण बुद्धिमत्ता वाली स्त्री थी। उसने प्राचीन युग की वीरता, परमार्थ निष्ठा एवं शूरता की कहानियाँ कहकर अपने बच्चे के मस्तिष्क में उच्च एव प्रेरणाप्रद विचार भर दिये तथा धर्म की प्रतिरक्षा के लिए उसके उत्साह को उत्तेजित किया। रानाडे ने लिखा था कि यदि कभी महापुरुषों की महत्ता माताओं की प्रेरणा के कारण हुई हो, तो शिवाजी के जीवन-निर्माण में जीजाबाई का प्रभाव अत्यन्त महत्वपूर्ण था। दादाजी कोण्डादेव के प्रभाव से भी वह वीर एवं साहसी बना। यह मालूम नहीं है कि शिवाजी को विधिवत् कोई साहित्यिक शिक्षा मिली अथवा नहीं; परन्तु वह एक वीर एवं साहसी सैनिक बन गया। केवल लूटपाट के प्रेम ने हीं नहीं, बल्कि जिसे वह विदेशी अत्याचार समझता था, उससे अपने देश को मुक्त् करने की एक वास्तविक इच्छा ने उसे प्रेरित किया।

मावल देश पश्चिमी घाटी के किनारे लम्बाई में नब्बे तथा चौडाई में लगभग बारह से चौदह मील है। वहाँ पहाड़ी लोगों के साथ उसकी प्रारम्भिक घनिष्ठता उसके अगले वर्षों में उसके लिए अत्यंत बहुमूल्य हो गयी, क्योंकि मावली उसके सर्वश्रेष्ठ सैनिक, उसके सबसे पहले साथी एवं उसके सबसे अनुरक्त सेनापति निकले। अपनी माँ की आोर से वह देवगिरि के यादव शासकों का वंशज था तथा पिता की ओर से वह मेवाड़ के वीर सिसोदियों का वंशज होने का दावा करता था। इस प्रकार गौरवपूर्ण वंश के होने की भावना तथा प्रारम्भिक प्रशिक्षण एवं प्रतिवेश के प्रभाव ने मिलकर उस युवक मराठा सैनिक में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना करने की आकांक्षाएँ जगा दी। उसने अपने लिए स्वतंत्रता का जीवन चुना। यह जीवन जोखिम से भरा हुआ था। परन्तु यदि वह सफल हो सका, तो इसमें उस जोखिम के बदले ऐसे लाभ थे, जिनका किसी ने स्वप्न भी नहीं देखा होगा।

दक्कन की सल्तनतों की बढ़ती हुई दुर्बलता तथा उत्तर में शाही दल के लम्बी अवधि तक युद्ध करते रहने के कारण, मराठा शक्ति के उत्थान में बड़ी सहायता मिली। 1646 ई. में शिवाजी ने तोरण के दुर्ग पर अधिकार कर लिया, जिससे पाँच मील पूर्व उसने शीघ्र राजगढ़ का किला बनवाया। दादाजी कोण्डादेव की, जो शायद इन जोखिम भरे साहसिक कामों को पसन्द नहीं करता था, मृत्यु (1647) के पश्चात् शिवाजी ने पुश्तैनी मालिकों अथवा बीजापुर के स्थानीय अफसरों से बल, रिश्वत या छल के द्वारा बहुत-से किलों पर अधिकार कर लिया। उसने नये किले भी बनवाये। इस प्रकार उसके अधिकार में काफी अचल सम्पति हो गयी, जो पहाड़ी दुर्गों की एक लम्बी श्रृंखला से सुरक्षित थी। उसे कुछ वर्षों के लिए (1649-1655 ई.) बीजापुर के विरुद्ध आक्रमणकारी कार्य स्थगित कर देने पडे, क्योंकि बीजापुर सरकार ने उसके पिता को बन्दी बना लिया तथा उसके अपने पुत्र के अच्छे आचरण की शर्त पर मुक्त किया। परन्तु उसने इस समय का उपयोग अपने जीते हुए प्रदेशों के दृढ़ीकरण में किया। जनवरी, 1656 ई. में उसने जावली नामक एक छोटे मराठा राज्य को, उसके अर्ध-स्वतंत्र मराठा राजा चन्द्रराव मोरे को अपने एक प्रतिनिधि द्वारा, मरवाकर ले लिया। इस समय तक शिवाजी की विरासत का विस्तार एवं राजस्व दूने से भी अधिक हो गया।

मुगलों के साथ उसकी सबसे पहली मुठभेड 1657 ई. में हुई। इस समय औरंगजेब तथा उसकी सेना बीजापुर पर आक्रमण करने में लगी हुई थी। इससे लाभ उठाकर शिवाजी ने अहमदनगर एवं जुन्नर के मुगल जिलों पर हमला कर दिया तथा जुन्नर नगर को लूट लिया। औरंगजेब ने शीघ्र उस भाग में अपने अफसरों को नयी सेना दी तथा शिवाजी पराजित हुआ। जब आदिलशाह ने औरंगजेब के साथ संधि कर ली, तब शिवाजी ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। औरंगजेब ने शिवाजी पर कभी विश्वास नहीं किया, परन्तु उसने संधि कर ली क्योंकि अपने पिता की अस्वस्थता के कारण उत्तर में उसकी उपस्थिति आवश्यक हो गयी थी। इसके बाद शिवाजी ने उत्तर कोंकण पर ध्यान दिया, कल्याण, भिवाणी एवं माहुली पर अधिकार कर लिया तथा दक्षिण में माहद तक बढ गया।

बीजापुर का सुल्तान आन्तरिक कलह एवं तात्कालिक मुगल आक्रमण से कुछ समय के लिए मुक्त हो गया। अत: उसने शिवाजी की शक्ति का सदा के लिए नाश करने का निर्णय किया। 1659 ई. के प्रारम्भ में उसके विरुद्ध राज्य के एक प्रमुख सरदार एवं सेनापति अफजल खाँ के अधीन एक विशाल सेना भेजी गयी। इसका उद्देश्य था विद्रोही (शिवाजी) को जीवित अथवा मृत रूप में पकड़कर लाना। अफजल खाँ एक पखवारे के अन्दर वाई पहुँच गया, जो सतारा से बीस मील उत्तर है। बीजापुर का सेनापति शिवाजी को उसके प्रतापगढ़ के दुर्ग से निकालने में असफल हुआ। तब उसने कृष्णजी भास्कर नामक एक मराठा ब्राह्मण की मध्यस्थता से उसके साथ संधि की बातचीत शुरू कर दी तथा उसे एक सम्मेलन में आने को आमंत्रित किया। शिवाजी ने उस दूत का सम्मान के साथ स्वागत किया तथा उससे धर्म के नाम पर अफजल खाँ का वास्तविक अभिप्राय बतलाने की अपील की। इससे द्रवित होकर कृष्णजी भास्कर ने संकेत किया कि बीजापुर के सेनापति के मन में छल है। इसकी पुष्टि अफजल के पास भेजे गये शिवाजी के अपने दूत गोपीनाथ से मिली खबर द्वारा हो गयी। इससे शिवाजी सावधान हो गया। वह अपने शत्रु से सम्मलेन में मिलने चला। उपरी तौर पर वह निःशस्त्र थ, किन्तु उसने अपने पास हथियार छिपा लिए और झिलम पहन ली। ऐसा उसने इसलिए किया था की वह जरुरत पड़ने पर मक्कारी का जवाब मक्कारी से देना चाहता था। सभी मराठे एकमत होकर कहते हैं की जब दोनों ने एक दूसरे का आलिंगन किया, तब मजबूत और हट्टे-कट्टे मुस्लिम सेनापति ने नाटे और दुबले मराठा नायक की गर्दन को एक फौलादी पकड़ के साथ अपनी बायीं बाहु में दबा लिया तथा अपने दाहिने हाथ से शिवाजी के शरीर में छुरा भोंकने का प्रयत्न किया। परन्तु शिवाजी ने छिपे शास्त्रों ने उसकी हानि से रक्षा की। उसने झट अपने बघनखे से अफज़ल के शरीर को चीरकर उसे मार डाला। अपनी सेना की मदद से, जो छिपकर बैठी थी, उसने बीजापुर की नेतृत्वविहीन सेना को हरा दिया तथा उसके पड़ाव को लूट लिया। खाफी खां तथा डफ शिवाजी पर अफज़ल की चल्पुर्वक हत्या करने का अभियोग लगते हैं। उनके विचार में अफज़ल ने पहले शिवाजी पर आघात करने की कोशिश नहीं की थी। परन्तु मराठा लेखकों ने अफजल के प्रति किये गये शिवाजी के व्यवहार को न्यायोचित ठहराया है। उनके विचार में यह बीजापुर के सेनापिति के आक्रमण के विरुद्ध आत्मरक्षा का कार्य था। समकालीन कारखानों (फैक्ट्रियों) के प्रमाण मराठा इतिहासकारों के कथन से मेल खाते हैं।

इसके बाद शिवाजी दक्षिण कोंकण तथा कोल्हापुर जिले में घुसा। परन्तु जुलाई, 1660 ई. में पनहाला दुर्ग में उसे सीदी जौहर के अधीन बीजापुर की एक सेना ने घेर लिया तथा उसे विवश होकर इसे खाली करना पड़ा। शीघ्र उसे एक नये खतरे का सामना करना पड़ा। दक्कन के नये मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ को औरंगजेब ने मराठा नायक की हरकतों को दबाने का काम सौंपा। शाइस्ता खाँ ने पूना जीता, चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया तथा मराठों को कल्याण जिले से खदेड़ भगाया। परन्तु शिवाजी ने शीघ्र अपने पिता की मध्यस्थता से, जो अब भी बीजापुर राज्य में एक महत्वपूर्ण पद पर था, उस राज्य के साथ एक अल्पकालीन संधि कर ली। इस प्रकार वह अपना पूरा ध्यान मुगलों की ओर देने को स्वतंत्र हो गया। लगभग दो वर्षों तक अनियमित रूप से युद्ध करने के पश्चात् 15 अप्रैल, 1663 ई. को वह कुछ नौकरों के साथ चुपके से पूना में शाइस्ता खाँ के कमरे में घुस पड़ा। उसने दक्कन के मुगल सूबेदार पर अचानक हमला करके उसे उसकी छावनी के भीतर, उसके सोने के कमरे में ही घायल कर डाला। यह घटना उसके अंगरक्षकों एवं दासियों के भीतरी घेरे के बीच हुई। शिवाजी ने उसके पुत्र अबुल फतह, एक कप्तान, चालीस नौकरों एवं उसके अन्त:पुर की छ: स्त्रियों को कत्ल कर डाला तथा सकुशल सिंहगढ़ के पार्श्ववर्ती दुर्ग में चला गया। मुगल सूबेदार का अंगूठा कट गया तथा वह किसी प्रकार अपनी जान लेकर भाग निकला। इस साहसपूर्ण एवं अद्भुत कार्य से शिवाजी की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी। शीघ्र ही उसने एक दूसरा वीरतापूर्ण कार्य किया, जो पूर्व वर्णित कार्य से कम साहसपूर्ण न था। 16 से लेकर 20 जनवरी, 1664 ई. के बीच उसने पश्चिमी समुद्रतट के सबसे समृद्ध बन्दरगाह सूरत पर आक्रमण कर उसे लूट लिया। इसमें कोई बाधा नहीं हुई क्योंकि उस स्थान का शासक उसका विरोध करने के बदले अपने पैर सिर पर रखकर चम्पत हो गया था। मराठा नायक अत्याधिक माल लूटकर भाग गया, जिसका मूल्य एक करोड़ रुपये से अधिक था। केवल स्थानीय अंग्रेजी और डच फैक्ट्रियों ने सफलतापूर्वक उसका प्रतिरोध किया तथा लूटे जाने से बच गयीं।

बार-बार की इन पराजयों से दक्क्न में मुगलों की प्रतिष्ठा और प्रभाव पर बहुत असर पड़ा। औरंगजेब इससे कुपित हुआ। उसने शिवाजी को दण्ड देने के लिए 1665 ई. के प्रारम्भ में अम्बर के राजा जयसिंह तथा दिलेर खाँ की एक भारी फौज के साथ दक्कन भेजा। जयसिंह एक चतुर एवं साहसी सेनापति था। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों में आक्रमणों के समय तरह-तरह के सैनिक अनुभव प्राप्त किये थे। इसके साथ उसमें बहुत कूटनीतिक कुशलता तथा दूरदर्शिता भी थी। वह चतुर मराठा नायक के विरुद्ध सावधानी से आगे बढ़ा।

शिवाजी के चारों ओर शत्रुओं का एक घेरा बनाकर उसने पुरंदर के गढ़ पर घेरा डाल दिया। गढ़ के अन्दर की घिरी हुई सेना ने कुछ काल तक वीरतापूर्ण प्रतिरोध किया। इसमें इसका प्रभु सेनापति माहद का मुनर वाजी देशपांडे सौ मावलियों के साथ लड़ता रहा। मुगलों ने शिवाजी की राजधानी राजगढ़ भी घेर लिया और अधिक प्रतिरोध करने के मूल्य का विचार कर शिवाजी ने 22 जून, 1665 ई. को जयसिंह के साथ पुरन्दर की संधि कर ली। इसके अनुसार उसने मुगलों को अपने तेईस किले दे दिये तथा सिर्फ बारह अपने लिए रखे। उसने दक्कन में मुगल सेना के साथ काम करने के लिए पाँच हजार घुड़सवार देने का वादा किया। राज्य के घाटे की पूर्ति के लिए उसे बीजापुर राज्य के कुछ जिलों में चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने की अनुमति मिल गयी। शीघ्र बीजापुर के विरुद्ध एक युद्ध हुआ, जिसमें उसने शाही दल का दिया। परन्तु बीजापुर के विरुद्ध जयसिंह का आक्रमण असफल रहा। फिर भी उसने शिवाजी को ऊँची आशाएँ दिलायीं तथा हजार उपायों का उपयोग कर उसेआगरे में शाही दरबार जाने को राजी कर लिया। औरंगजेब ने शिवाजीको राजा की उपाधि दी।

शिवाजी को शाही दरबार ए भेजने का अभिप्राय था, उसे दक्कन के उपद्रवपूर्ण प्रदेश से हटाना। परन्तु यह समझना बहुत कठिन है कि शिवाजी ने उसके प्रस्ताव को क्यों स्वीकार कर लिया। श्री सरदेसाई लिखते हैं कि जिस विचार से शिवाजी शाही दरबार गया वह यह था कि- शिवाजी का उद्देश्य मुग़ल बादशाह और उसके दरबार का पर्यवेक्षण करके यह ज्ञात करना था कि मुग़ल शक्ति के स्रोत क्या हैं, कहाँ उसका संवेदनशील मर्म है और कहाँ एवं किस प्रकार चोट करना या न करना उपयुक्त होगा।

जयसिंह ने शिवाजी से पुरस्कार एवं प्रतिष्ठा की प्रतिज्ञा की, आगरे में उसकी सुरक्षा के उत्तरदायित्व की भड़कदार शपथे खायीं तथा इस प्रकार उसे ऐसा जोखिम वाला कदम उठाने को राजी कराया। मराठा नायक का एक यह ध्येय भी रहा होगा कि बादशाह से मिलकर जंजीरा द्वीप पर, जो उस समय सीदी नामक एक शाही नौकर के अधीन था, अधिकार कर लेने के लिए उसकी स्वीकृति ले ली जाये। ज्योतिषियों से आश्वासन तथा अपने निकटस्थ पदाधिकारियों की सहमति लेकर वह अपने पुत्र शम्भूजी के साथ आगरे के लिए चल पड़ा तथा 9 मई, 1666 ई. को वहाँ पहुँच गया।

परन्तु औरंगजेब ने शिवाजी का स्वागत रुखाई के साथ किया तथा उसे पाँच हजारी सरदार की श्रेणी दी। इससे उसके सम्मान की भावना को इतना अधिक धक्का लगा कि वहाँ हगामा पैदा हो गया और वह मूर्छित हो गया। होश में आने पर उसने बादशाह पर वचन-भंग करने का आरोप लगाया। इस पर उसे नजरबंद कर लिया गया। इस प्रकार शिवाजी की ऊँची आशाएँ चकनाचूर हो गयीं और उलटे उसने अपने को बंदी पाया। इन कठिन परिस्थितियों में कोई साधारण व्यक्ति निराश हो जाता परन्तु उसे असाधारण बुद्धिमत्ता का वरदान मिला था। इस कारण उसने निकल भागने की एक युक्ति का सहारा लिया। उसने अपनी बनावटी बीमारी से स्वस्थ होने का बहाना किया तथा ब्राह्मणों, भिखारियों और सरदारों के बीच अपनी काल्पनिक स्वस्थता के लिए धर्मदान के रूप में प्रत्येक संध्या को अपने घर से फलों एवं मिठाइयों से भरी टोकरियाँ भेजने लगा। कुछ दिनों के बाद जब पहरेदारों की सजगता में शिथिलता आ गयी तथा टोकरियों को बिना जाँचे ही जाने देने लगे, तब शिवाजी तथा उसका पुत्र दो खाली टोकरियों में छिपकर बैठ गये और मुगल बादशाह के सभी गुप्तचरों की आँखें बचाकर आगरे से बाहर भाग निकल गए। शम्भूजी के साथ वह शीघ्रता से मथुरा पहुँचा। वहाँ उसने अपने थके हुए पुत्र को एक मराठा ब्राह्मण के संरक्षण में छोड़ दिया। वह स्वयं एक भिखारी के वेश में इलाहाबाद, बनारस, गया एवं तेलगाना के चक्करदार रास्ते से होता हुआ 30 नवम्बर, 1666 ई. को घर पहुँच गया।

इसके बाद तीन वर्षों तक शिवाजी मुगलों के साथ शान्तिपूर्वक रहा। इस समय का उपयोग उसने अपने आन्तरिक शासन का संगठन करने में किया। औरंगजेब ने उसे राजा की उपाधि और बरार में एक जागीर दी तथा उसके पुत्र शम्भूजी को पाँच हजारी सरदार के पद पर नियुक्त कर लिया। परन्तु 1670 ई. में युद्ध पुनः आरम्भ हो गया। मुगल सूबेदार शाह आलम तथा उसके सहायक दिलेर खाँ के बीच भारी झगड़ा था। इससे शाही दल की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक कमजोर हो गयी। फलत: शिवाजी ने करीब-करीब उन सभी दुर्गों पर पुन: अधिकार प्राप्त कर लिया, जिन्हें उसने 1665 ई. में मुगलों को समर्पित किया था। अक्टूबर, 1670 ई. में उसने सूरत को दूसरी बार लूटा। इसमें नगद एवं असबाब के रूप में उसे बहुत-सा माल हाथ लगा। तब वह मुगल प्रान्तों पर साहसपूर्ण आक्रमण करने लगा तथा खुले युद्ध में बार-बार मुगल सेनापतियों को परास्त किया। 1672 ई. में उसने सूरत से चौथ की माँग की।

उस समय औरंगजेब का ध्यान सबसे अधिक उत्तर-पश्चिम के कबायली विद्रोहों में लगा था। मुगल सेना के एक भाग को दक्कन से उस प्रदेश में भेज दिया गया। 1672 से लेकर 1678 ई. तक शिवाजी के विरुद्ध मुगल कप्तानों को अनियमित युद्ध में कोई सफलता नहीं मिली। उस समय मराठा वीर अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर था। 16 जून, 1674 ई. को उसने बड़े ठाट-बाट और धूम-धाम से रायगढ़ में विधिवत् अपना राज्याभिषेक कराया तथा छत्रपति की उपाधि धारण की।

मुगलों के उत्तर-पश्चिम में उलझे रहने के कारण शिवाजी उनके दबाव से मुक्त हो ही गया था। इसके अतिरिक्त उसने गोलकुंडा के सुल्तान से मैत्री कर ली। एक वर्ष के अन्दर (1677 ई.) उसने जिंजी, वेलोर तथा पार्श्ववर्ती जिले जीत लिये। इनसे उसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी। उसे मद्रास, कर्णाटक एवं मैसूर के पठार (प्लेटो) में एक विस्तृत प्रदेश मिल गया। इसकी लम्बाई तथा चौड़ाई क्रमश: साठ एवं चालीस लीग थी। उससे उसे बीस लाख हून का वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था। इसमें सौ किले थे। उसके सफल जीवन का अन्त तिरपन (कुछ के मतानुसार पचास) वर्षों की आयु में 14 अप्रैल, 1680 ई. को उसकी अकाल मृत्यु हो जाने के कारण हो गया। शिवाजी का राज्य उत्तर में रामनगर (सूरत एजेंसी में आधुनिक धरमपुर राज्य) से लेकर दक्षिण में कारवार तक मोटे तौर पर सम्पूर्ण समुद्रतट के किनारे-किनारे फैला हुआ था। इसमे दमन, साष्टी, बसाई, चोल, गोवा जंजीर तथा बम्बई की पुर्तगीज, अफ्रीकन और अंग्रेजी बस्तियां शामिल नहीं थीं। पूर्व में उसकी सीमा एक टेढ़ी-मेढ़ी पंक्ति में उत्तर के बलगाना से लेकर, नासिक एवं पुन जिले होकर और सम्पूर्ण सतारा को घेरते हुए, दक्षिण के कोल्हापुर तक जाती थीं। उसकी जीतों से उसके राज्य की सीमा के भीतर पश्चिम कर्णाटक आ गया, जो बेलगाँव से लेकर तुगभद्रा नदी के किनारे तक फैला हुआ था तथा आधुनिक कर्णाटक राज्य के बेलारी जिले (पहले यह जिला मद्रास (चेन्नई) में था) के ठीक सामने पड़ता है। इन जीतों से आधुनिक मैसूर राज्य का एक बड़ा भाग भी इसके अन्तर्गत आ गया।

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