संविधान का निर्माण Making of Constitution

किसी भी स्वाधीन राष्ट्र की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए उपयुक्त दिशा-निर्देशों की आवश्यकता होती है और इन दिशा-निर्देशों का एकमात्र स्रोत उस देश का संविधान होता है, जो कि उस देश की सर्वोच्च मौलिक विधि भी होती है। अतः एक अच्छा संविधान ही राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास में भरपूर सहायता एवं योगदान दे सकता है, जिसे उस देश की जनता ने स्वयं बनाया हो अथवा उक्त देश की संविधान-निर्मात्री सभा द्वारा बनाया गया हो। संविधान-निर्मात्री सभा द्वारा संविधान का निर्माण स्वाधीन राष्ट्र का लक्षण है। निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संविधान के निर्माण सम्बन्धी अधिकार की मांग का प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्वाधीनता की मांग से है।

संविधान सभा की पृष्ठभूमि

पजब किसी प्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक राष्ट्र द्वारा संविधान की रचना का कार्य उसकी जनता के प्रतिनिधि निकाय द्वारा किया जाता है, तो संविधान पर विचार करने तथा उसे स्वीकार करने के लिए जनता द्वारा चुने गए इस प्रकार के निकाय को संविधान सभा कहा जाता है। पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न राष्ट्रों में जहां कहीं भी लिखित संविधान है, उनका निर्माण जनता ने प्रायः संविधान सभाओं के माध्यम से ही किया है। संविधान सभा की प्रेरणा का स्रोत 17वीं और 18वीं शताब्दी की लोकतांत्रिक क्रांतियां हैं। इन क्रांतियों ने इस विचार को जन्म दिया कि शासन के मूलभूत कानूनों का निरमं नागरिकों की एक विशिष्ट प्रतिनिधि सभा द्वारा किया जाना चाहिए।

भारत में संविधान सभा की परिकल्पना सदैव राष्ट्रीय आंदोलन के विकास के साथ जुड़ी रही। भारत की संविधान सभा का निश्चित उल्लेख, भले ही इन शब्दों में न किया गया हो किंतु भारत शासन अधिनियम, 1919 के लागू होने के पश्चात् 1922 में महात्मा गांधी ने इस तथ्य का उल्लेख किया था।

जनवरी 1925 में दिल्ली में हुए सर्वदलीय सम्मेलन के समक्ष कॉमनवेल्थ ऑफ़ इण्डिया बिल को प्रस्तुत किया गया, जिसकी अध्यक्षता महात्मा गाँधी ने की थी। उल्लेखनीय है कि, भारत के लिए एक संवैधानिक प्रणाली की रूपरेखा प्रस्तुत करने का यह प्रथम प्रमुख प्रयास था।

19 मई, 1928 को बंबई में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन में भारत के संविधान के सिद्धांत निर्धारित करने के लिए मोतीलाल नेहरु के सभापतित्व में एक समिति गठित की गई। 10 अगस्त, 1928 को प्रस्तुत की गई इस समिति की रिपोर्ट की नेहरू रिपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि, संसद के प्रति उत्तरदायी सरकार, न्यायपालिका द्वारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकार सहित मोटे तौर पर जिस संसदीय व्यवस्था की संकल्पना 1928 की नेहरू रिपोर्ट में व्यक्त की गई थी। इसे लगभग ज्यों-का-त्यों 21 वर्ष बाद 20 नवंबर, 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकृत स्वाधीन भारत के संविधान में समाविष्ट कर लिया गया।

जून 1934 में कांग्रेस कार्यकारिणी ने घोषणा की कि श्वेत-पत्र का एकमात्र विकल्प यह है कि वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संविधान सभा द्वारा एक संविधान तैयार किया जाए। यह पहला अवसर था जब संविधान सभा के लिए औपचारिक रूप से एक निश्चित मांग प्रस्तुत की गयी।

1940 के अगस्त प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार ने संविधान सभा की मांग को पहली बार अधिकारिक रूप से स्वीकार किया, भले ही स्वीकृति अप्रत्यक्ष तथा महत्वपूर्ण शर्तो के साथ थी। यद्यपि 1942 का क्रिप्स मिशन पूर्णतः असफल सिद्ध हुआ, फिर भी उसमें संविधान सभा बनाने की बात को स्वीकार कर लिया गया था।

अंततः कैबिनेट मिशन, 1946 द्वारा संविधान निर्माण के लिए एक बुनियादी ढांचे का प्रारूप प्रस्तुत किया गया। कैबिनेट मिशन ने संविधान-निर्माण निकाय द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को कुछ विस्तारपूर्वक निर्धारित किया जो इस प्रकार है-

  1. प्रत्येक प्रांत को और प्रत्येक देशी रियासत या रियासतों के समूह को अपनी जनसंख्या के अनुपात में कुल स्थान आवंटित किये गए। स्थूल रूप से 10 लाख के लिए एक स्थान का अनुपात निर्धारित किया गया। इसके परिणामस्वरूप प्रांतों की 292 सदस्य निर्वाचित करने थे और देशी रियासतों को कम से कम 93 स्थान दिए गए।
  2. प्रत्येक प्रांत के स्थानों को जनसंख्या के अनुपात के आधार पर तीन प्रमुख समुदायों में बांटा गया। ये समुदाय थे-मुस्लिम, सिख और साधारण।
  3. प्रांतीय विधान सभा में प्रत्येक समुदाय के सदस्यों को एकल संक्रमणीय मत से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करना था।
  4. देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन की पद्धति परामर्श से तय की जानी थी।
जनवरी 1925 में ‘कॉमनवेल्थ ऑफ इण्डिया बिल' के रूप में एक संवैधानिक प्रणाली की रूपरेखा के प्रस्तुतीकरण का भारत द्वारा प्रथम प्रयास।
जून 1934 में कांग्रेस द्वारा पहली बार संविधान सभा हेतु औपचारिक रूप से एक निश्चित मांग प्रस्तुत की गई।

3 जून 1947 की योजना के अंतर्गत विभाजन के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के लिए एक पृथक् संविधान सभा गठित की गई। बंगाल, पंजाब, सिंध, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, बलूचिस्तान और असम के सिलहट जिले (जो जनमत संग्रह द्वारा पाकिस्तान में सम्मिलित हुए थे) के प्रतिनिधि भारत की संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे। पश्चिमी बंगाल और पूर्वी पंजाब के प्रांतों में नए निर्वाचन किए गए। परिणामस्वरूप जब संविधान सभा 31 अक्टूबर, 1947 को पुनः समवेत हुई तो सदन की सदस्यता घटकर 299 ही गई। इसमें से 284 सदस्य 26 नवंबर, 1949 की वास्तव में उपस्थित थे और उन्होंने अंतिम रूप से पारित संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए।

संविधान सभा की रचना

संविधान सभा सदस्य-संख्या की दृष्टि से एक काफी बड़ी सभा थी। कैबिनेट मिशन ने उसके सदस्यों की कोई अधिकतम संख्या निर्धारित नहीं की थी। कैबिनेट मिशन का प्रस्ताव था कि हर दस लाख की आबादी के लिए एक प्रतिनिधि होना चाहिए। एक फॉर्मूले के अनुसार संविधान सभा में प्रांतों के अधिक-से-अधिक 296 सदस्य हो सकते थे और देशी राज्यों के 93।

चुनावों के पश्चात् संविधान सभा में उत्पन्न दलीय स्थिति इस प्रकार थी-

कांग्रेस 208
मुस्लिम लीग 73
यूनियनिस्ट 1
यूनियनिस्ट मुस्लिम 1
यूनियनिस्ट अनुसूचित जातियां 1
कृषक प्रजा 1
अनुसूचित जाति परिसंघ 1
सिख (गैर-कांग्रेसी) 1
साम्यवादी 1
स्वतंत्र 8
कुल 296

चुनावों के पश्चात् अपनी निर्बल स्थिति देखकर मुस्लिम लीग ने संविधान सभा के बहिष्कार का निश्चय किया तथा 9 दिसम्बर, 1946 को आहूत संविधान सभा के प्रथम अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने भाग नहीं लिया। लीग ने अब पाकिस्तान के लिए बिल्कुल पृथक् संविधान सभा की मांग करनी आरम्भ कर दी। कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार द्वारा लीग को अपनी हठधर्मिता त्यागने हेतु किए गए सभी प्रयास निरर्थक सिद्ध हुए।

संविधान सभा में अंतिम रूप से प्रांतों के केवल 285 और देशी रियासतों के 78 प्रतिनिधि थे तथा संविधान के अंतिम मूल मसौदे पर इन्हीं 808 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए गए।

पाकिस्तान के निर्माण और मुस्लिम लीग द्वारा संविधान सभा के बहिष्कार के कारण सदस्य-संख्या गिर गई। उसमें प्रांतों के केवल 235 और देशी रियासतों के 73 प्रतिनिधि रह गए। संविधान के अंतिम मूल मसौदे पर इन्हीं 308 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे।

जहां तक प्रांतों का प्रश्न है, उनके प्रतिनिधियों का चुनाव जुलाई 1946 में प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा हुआ। देशी राज्यों के आधे प्रतिनिधि राजाओं द्वारा मनोनीत किए गए और आधे जनता द्वारा चुने गये। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भारत के वयस्क स्त्री-पुरुषों ने प्रत्यक्ष रूप से सदस्यों को नहीं चुना।

संविधान सभा में अल्पसंख्यक वगों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त था, यह निम्न तालिका से स्पष्ट हो जाता है, जिसमें वर्गीय आधार पर संविधान सभा का गठन बताया गया है:-

नेपाली 1 (बंगाल से निर्वाचित)
सिख 5 (कैबिनेट योजना में दिए गए प्रतिनिधित्व से एक अधिक)
पारसी 3
ईसाई 7
आंग्ल-भारतीय 3
पिछड़ी हुई जनजातियां 5
अनुसूचित जातियां 33
मुस्लिम 31 (कैबिनेट योजना के अनुसार भारत में रह रहे क्षेत्रों में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या 28 ही होनी थी)

इस प्रकार विभाजन के बाद जबकि देशी रियासतों के प्रतिनिधित्व के अतिरिक्त संविधान सभा का गठन हो चुका था, अल्पसंख्यकों को 235 में से 88 अर्थात् 36 प्रतिशत प्रतिनिधित्व प्राप्त था, अनुसूचित जातियों के भी 33 सदस्य थे।

संविधान सभा के सर्वाधिक प्रभावशाली सदस्य थे- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आज़ाद, जवाहरलाल नेहरु, वल्लभ भाई पटेल, डॉ. अम्बेडकर, गोविंद वल्लभ पंत, एन.जी.आयंगर, कृष्णास्वामी अय्यर, के. एम. मुंशी, आचार्य कृपलानी तथा श्यामाप्रसाद मुखर्जी।

संविधान सभा की प्रकृति

संविधान सभा की प्रभुसत्ता का प्रश्न: संविधान सभा के गठन और उसके द्वारा अपना कार्य प्रारंभ किए जाने के तुरंत बाद संविधान सभा की स्थिति के संबंध में एक विवाद प्रारंभ हो गया। विंस्टन चर्चिल ने संविधान सभा की वैधता को ही चुनौती दे दी। संविधान सभा के ही एक सदस्य एम.आर. जयकर ने भी विचार व्यक्त किया कि- संविधान सभा एक सम्प्रभु संस्था नहीं है और उसकी शक्तियां मूलभूत सिद्धांतों एवं प्रक्रियाओं दोनों ही दृष्टियों से मर्यादित है। उनके विचार का आधार यह था कि संविधान सभा कैबिनेट योजना के अधीन अस्तित्व में आई और यह ब्रिटिश संसद की सत्ता के ही अधीन है। वह कैबिनेट मिशन योजना में वर्णित संविधान की मूल रूपरेखा में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती है। सभा का आह्वान ब्रिटिश सम्राट के अधिकार पर गवर्नर जनरल द्वारा किया गया था और यह अपेक्षित था कि संविधान सभा जो संविधान बनाएगी उसे ब्रिटिश संसद के पास अनुमोदन के लिए भेजा जाएगा, लेकिन संविधान सभा के अधिकांश सदस्यों ने इन प्रतिबंधों को अस्वीकार करते हुए संविधान सभा की सम्प्रभुसत्ता पर बल दिया। इस अवसर पर बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा था- आजादी और ताकत के मिलते ही हमारी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। संविधान सभा इन जिम्मेदारियों को निभायेगी। संविधान सभा एक पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न संस्था है, वह देश के स्वतंत्र नागरिकों का प्रतिनिधित्व करती है

इस विचार के अनुसार ही संविधान सभा ने अपनी पूर्ण प्रभुता को प्रदर्शित भी किया - प्रथम, यह प्रस्ताव पारित किया गया कि ब्रिटिश सरकार या अन्य किसी भी सत्ता के आदेश से सभा का विघटन नहीं होगा। संविधान सभा की उसी समय भंग किया जाएगा, जबकि सभा स्वयं दो-तिहाई बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पारित कर दे। द्वितीय, संविधान सभा ने सभा के संचालन की पूर्ण शक्ति अपने निर्वाचित सभापति की दे दी।

संविधान सभा का प्रतिनिधिक स्वरूप: आलोचकों का कहना है कि संविधान सभा में जन-साधारण के प्रतिनिधि नहीं थे यानी उसके सदस्यों का चुनाव देश के सभी वयस्क नागरिकों ने नहीं किया था।

यह सत्य है की संविधान सभा के सदस्य वयस्य मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गये थे, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि हम इसे प्रतिनिधिक संस्था न मानें। संविधान सभा में लगभग सभी संप्रदायों के व्यक्ति थे।

कांग्रेस की प्रधानता: तत्कालीन भारतीय राजनीति के सर्वाधिक प्रमुख दल कांग्रेस ने संविधान सभा को अधिकाधिक प्रतिनिधि स्वरूप प्रदान करने की प्रत्येक संभव चेष्टा की थी। कांग्रेस के तो प्रायः सभी चोटी के नेता पं. नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, पं. गोविन्द वल्लभ पंत, बाल गोविन्द खेर,बाबू पुरुषोत्तमदास टण्डन, श्री. के.एम. मुंशी और आचार्य जे.बी. कृपलानी इसके सदस्य थे। कांग्रेस के ही प्रयत्नों से वैधानिक और प्रशासनिक योग्यता की दृष्टि से ख्याति प्राप्त अनेक ऐसे व्यक्तियों का संविधान सभा में निर्वाचन हुआ था, जो कांग्रेस से सम्बद्ध नहीं थे। इनमें से कुछ थे- प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर, ए.के. अय्यर, एन.जी. आयंगर, संथानम्, एम.आर. जयकर, सच्चिदानन्द सिन्हा, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बी. शिवराव, डॉ. राधाकृष्णन, के.टी. शाह, एम.सी. मुखर्जी और हृदयनाथ कुंजरू आदि। इन्हीं व्यक्तियों ने सभा को तकनीकी आधार दिया। संविधान के मूलस्वरूप का निर्माण करने, उसको दार्शनिक आधार देने तथा उसे उद्देश्यपूर्ण बनाने में इन व्यक्तियों तथा इनकी सामाजिक एवं व्यावसायिक पृष्ठभूमि की निर्णायक भूमिका रही। तेजबहादुर सपू और जयप्रकाश नारायण को भी संविधान सभा की सदस्यता के लिए आमंत्रित किया गया था, किन्तु सप्रू स्वास्थ्य संबंधी कारणों के आधार पर इसे स्वीकार न कर सके और जयप्रकाश नारायण ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इस संबंध में सभा की सद्इच्छा का प्रमाण यह है कि संविधान सभा के जो सदस्य लीग के टिकट पर निर्वाचित हुए थे, उनमें से जिन्होंने भारत के विभाजन के बाद भारत में ही रहना पसंद किया उन्हें भी संविधान सभा की सदस्यता प्रदान की गई। लीग के एक प्रतिनिधि मोहम्मद सादुल्ला प्रारूप समिति के भी सदस्य थे।

कानून के प्रकाण्ड विद्वानों का बोलबाला: संविधान सभा में कानून के बहुत बड़े-बड़े पंडित विद्यमान थे, जैसे - कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी और ठाकुरदास भार्गव। ये सभी व्यक्ति ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। साथ ही वे न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत में भी आस्था रखते थे। वे मौलिक अधिकारों के भी जबर्दस्त समर्थक थे। अनुच्छेद 19 में दिए गए मौलिक अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं। उचित शब्द का सुझाव ठाकुरदास भार्गव की ओर से आया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि अकेले इस शब्द से प्रतिबंधों के स्वरूप में महत्वपूर्ण अंतर आ गया है। इसमें न्यायालयों की शक्ति का विस्तार हुआ है, क्योंकि न्यायालय यह निर्णय दे सकते हैं कि सरकार द्वारा लगाया गया अमुख प्रतिबन्ध उचित नहीं है।

संविधान सभा की समितियां
संविधान को सफलतापूर्वक निर्मित करने के उद्देश्य हेतु संविधान सभा ने कुल 22 समितियों का गठन किया, जिसमें 10 कार्यविधिक मामलों संबंधी एवं 12 तात्विक मामलों की समितियां थीं-कार्यविधिक मामलों संबंधी समिति
  1. परिचालन समिति
  2. नियम-निर्माण समिति
  3. सदन समिति
  4. उर्दू अनुवाद समिति
  5. हिंदी अनुवाद समिति
  6. भारतीय स्वाधीनता अधिनियम, 1947 के प्रभाव संबंधी समिति
  7. कार्य संचालन समिति
  8. वित्त एवं कार्मिक समिति
  9. प्रमाण समिति
  10. प्रेस गैलरी समिति

तात्विक मामलों संबंधी समिति

  1. प्रारूप समिति (अध्यक्ष-बी.आर. अम्बेडकर)
  2. प्रारूप समीक्षा समिति (अध्यक्ष-सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर)
  3. समझौता समिति (अध्यक्ष-राजेंद्र प्रसाद)
  4. संघ संविधान समिति (अध्यक्ष-जवाहरलाल नेहरू)
  5. प्रांतीय संविधान समिति (अध्यक्ष-सरदार वल्लभ भाई पटेल)
  6. मुख्य आयुक्त (प्रांत) समिति
  7. मूल अधिकार एवं अल्पसंख्यक समिति (अध्यक्ष-सरदार वल्लभ भाई पटेल)
  8. भाषायी प्रांत समिति
  9. संघ शक्ति समिति (अध्यक्ष–जवाहरलाल नेहरू)
  10. वित्तीय प्रावधानों संबंधी समिति
  11. सर्वोच्च न्यायालय संबंधी तदर्थ समिति
  12. राष्ट्रीय ध्वज संबंधी तदर्थ समिति

भारत की संविधान सभा एक पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न संस्था थी। संविधान सभा में लगभग सभी सम्प्रदायों के व्यक्ति सम्मिलित थे।

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संविधान सभा का कार्य

संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 को संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में संपन्न हुआ। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को सर्वसम्मति से संविधान सभा का अस्थायी अध्यक्ष चुन लिया गया। इसके पश्चात् 11 दिसम्बर, 1946 को कांग्रेस के नेता डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। 13 दिसम्बर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा उद्देश्य-प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। इस प्रस्ताव में भारत के भावी प्रभुसत्तासंपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की रुपरेखा प्रस्तुत की गई थी। इस प्रस्ताव में एक ऐसी संघीय राज्य व्यवस्था की परिकल्पना की गई थी, जिसमें अवशिष्ट शक्तियां स्वायत्त इकाइयों के पास होतीं और प्रभुसत्ता जनता के हाथों में। प्रस्ताव में सभी नागरिकों को सामाजिक और राजनितिक, न्याय परिस्थिति की, अवसर की और कानून के समक्ष समानता, विचारधारा, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था, पूजा और व्यवसाय, संगम और कार्य की स्वतंत्रता की गारण्टी प्रदान की गई थी। इसके साथ ही प्रस्ताव में अल्पसंख्यकों, पिचादे एवं जनजातीय क्षेत्रों तथा दलितों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए भी पर्याप्त रक्षोपाय रखे गए थे। विचार-विमर्श के बाद 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा के सदस्यों ने इसे सर्वसम्मति से पास कर दिया।

उद्देश्य प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद संविधान सभा ने संविधान निर्माण की समस्या के विभिन्न पहलुओं के सम्बन्ध में अनेक समितियां नियुक्त की।

सम्पूर्ण संविधान निर्माण में 2 वर्ष, 11 मास और 18 दिन लगे। इस कार्य पर लगभग 64 लाख रुपये व्यय हुए। संविधान के प्रारूप पर 114 दिन तक चर्चा चली। अंतिम रूप में संविधान में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां कायम की गईं।

वास्तव में संविधान के प्रारूप में 7000 संशोधनों के लिए नोटिस मिले थे, लेकिन 2473 संशोधन ही प्रस्तुत किए गए थे। सभा की संपूर्ण कार्यवाही लोकतांत्रिक थी, सक्रियवाद-विवाद के उपरांत ही इसकी प्रक्रिया पूरी की गई। संविधान की स्वीकृति के बाद संविधान के कुछ अनुच्छेद 26 नवंबर, 1949 के दिन से ही लागू कर दिए गए, जैसे- नागरिकता, निर्वाचन, अंतरिम संसद, अल्पकालिक एवं परवर्ती उपबंध, परन्तु शेष संविधान को 26 जनवरी, 1950 से अस्तित्व में लाया गया। 26 जनवरी, 1950 से भारत एक गणराज्य के रूप में स्थापित हो गया।

  • डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा संविधान सभा के अस्थायी तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष थे।
  • 1946 को संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
  • अंतिम रूप में स्वीकृत संविधान में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं।
  • नागरिकता, निर्बचन, अंतरिम संसद, अल्पकालिक एवं परवर्ती उपबंध जैसे संविधान के कुछ अनुच्छेद संविधान की स्वीकृति के तुरन्त पश्चात् अर्थात् 26 नवम्बर, 1946 से ही लागू कर दिए गए थे, जबकि शेष संविधान 26 जनवरी, 1950 से संपूर्ण देश में लागू हुआ।

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