अकार्बनिक रसायन की प्रमुख घटनाएँ Major Process of Inorganic Chemistry

  1. अपरूपता (Allotropy): किसी तत्व के दो या दो से अधिक रूप उस तत्व के अपरूप (Allotrops) कहलाते हैं तथा किसी तत्व का एक से अधिक रूपों में विद्यमान होना अपरूपता कहलाता है।
कुछ प्रमुख तत्व एवं उनके अपरूप
कार्बनहीरा, ग्रेफाइट, काष्ठ चारकोल, बोन चारकोल, रक्त चारकोल आदि।
फॉस्फोरसपीला फॉस्फोरस, लाल फॉस्फोरस, काला फॉस्फोरस, स्कालेंट फॉस्फोरस आदि।
ऑक्सीजनऑक्सीजन एवं ओजोन
सल्फररॉम्बिक सल्फर, मोनोक्लाइनिक सल्फर, एमारफस सल्फर, कोलाइडी सल्फर, प्लास्टिक सल्फर आदि।
  1. स्फुरण (Phosphorescence): कुछ पदार्थों को सूर्य के प्रकाश में रखने के बाद तथा प्रकाश से हटाये जाने के बाद भी उससे विकिरण उत्सर्जित होती रहती है। इस घटना को स्फुरण कहते हैं। जैसे- कैल्सियम सल्फाइड।
  2. प्रतिदीप्ति (Flourescence): कुछ पदार्थों में दृश्य प्रकाश को अवशोषित करने से उनके इलेक्ट्रॉन उत्तेजित अवस्था में आ जाते हैं। कुछ समय पश्चात जब इलेक्टॉन मूल अवस्था में आते हैं, तो विभिन्न तरंगदैर्ध्य के विकिरण उत्सर्जित होते हैं। इस क्रिया को प्रतिदीप्ति कहते हैं।
  3. उत्फुल्लन (Efflorescence): कुछ लवणों में क्रिस्टलन जल अधिक होता है और जब इन्हें वायु में रख दिया जाता है, तो क्रिस्टल में से जलवाष्प बनकर उड़ जाता है और वह क्रि स्टल चूर्ण में परिणत हो जाता है। इसी क्रिया को उत्फुल्लन कहते हैं, जैसे- Na2SO4.10H2O, Na,CO3.10H2O, CuSO4.5H2O, FeSO4.7H2O, ZnSO47H2O, MgSO4.7H2O, CaSO4.H2O इत्यादि।
  4. उर्ध्वपातन (sublimation): उर्ध्वपातन वह क्रिया है, जिसमें ठोस पदार्थ गर्म किये जाने पर बिना द्रव अवस्था में बदले गैसीय अवस्था में परिणत हो जाते हैं और फिर ठंडा किये जाने पर गैसीय अवस्था से बिना द्रव अवस्था में बदले ठोस अवस्था में परिणत हो जाते हैं। बेंजोइक अम्ल, ऐन्थ्रासीन, नेप्थलीन, ऐन्थ्राक्वीनोन, कपूर, अमोनियम क्लोराइड इत्यादि का शुद्धीकरण इसी विधि द्वारा होता है।
  5. समस्थानिक (isotopes): वैसे तत्व जिनकी परमाणु संख्या समान, परन्तु परमाणु भार भिन्न-भिन्न होती है, समस्थानिक कहलाते हैं, जैसे- हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक हैं-

प्रोटियम (1H1) ड्यूटेरियम (1H2) ट्राइटियम (1H3)

  1. समभारिक (Isobar): ऐसे परमाणु जिनके परमाणु क्रमांक भिन्न-भिन्न होते हैं, परन्तु परमाणु द्रव्यमान समान होते हैं, समभारिक कहलाते है। उदाहरणार्थ- आर्गन (20Ar40) पोटैशियम (19K40) तथा कैल्सियम (18Ca40) समभारिक हैं।
  2. धातुओं की सक्रियता श्रेणी (Activity series of Metals): धातुओं की एक ऐसी सामान्य क्रमसूची जो उनकी घटती हुई अभिक्रियाशीलताओं के आधार पर क्रमबद्धित होती है, सक्रियता श्रेणी (Activity series) कहलाती है। सक्रियता श्रेणी में हाइड्रोजन से ऊपर स्थित धातुएँ तनु अम्लों से हाइड्रोजन विस्थापित करती है। अधिक अभिक्रियाशील धातु कम अभिक्रियाशील धातु को उसके लवण विलयन से विस्थापित कर देती है।
तत्वों की अभिक्रियाशीलता- घटते क्रम में
तत्वों के संकेततत्वों के नाम
Kपोटेशियम
Naसोडियम
Caकैल्सियम
Mgमैग्नीशियम
Alऐलुमिनियम
Znजिंक
Feआयरन
Pbलेड
(H)हाइड्रोजन
Cuकॉपर
Hgमरकरी
Аgसिल्वर
Auगोल्ड
  1. संक्षारण (Corrosion): धातु-सतह जब जल, वायु अथवा आस-पास के अन्य किसी पदार्थ से प्रभावित होती है, तो इसकी धातु का संक्षारित होना कहते हैं तथा इस परिघटना को संक्षारण कहते हैं। सोना (Au) और चांदी (Ag) जैसी धातुएँ सगुगमतापूर्वक संक्षारित नहीं होती हैं, वहीं तांबा, लोहा जैसी धातुएँ आसानी से संक्षारित हो जाती हैं।
  2. आघातवर्ध्यता (Maleability): आघातवर्ध्यता से तात्पर्य धातुओं के उस गुणधर्म से है, जिसके अंतर्गत उन्हें पीट-पीट कर उनकी पतली चादरें बनायी जा सकती हों। धातुएँ आघातवर्ध्यनीयता का गुण प्रदर्शित करते हैं। (अपवाद-पारा) सोना, और चांदी सर्वाधिक आघातवर्ध्यनीय धातुएँ हैं।
  3. तन्यता (Ductility): तन्यता से तांत्पर्य धातुओं के उस गुणधर्म से है, जिसके अंतर्गत उन्हें पतले तार में परिणत किया जा सकता है। सभी धातुएँ एकसमान तन्य नहीं होती हैं। सोना और चांदी सर्वाधिक तन्य धातुएँ हैं। 1 ग्राम सोने से लगभग 2 किमी० लंबी तार बनायी जा सकती है।
  4. भौतिक परिवर्तन (Physical Change): वह परिवर्तन जो पदार्थ के अणु की रचना को बिना बदले ही पदार्थ के कुछ विशिष्ट गुणों जैसे-अवस्था, आकार, विद्युतीय गुण इत्यादि को बदल देती है, भौतिक परिवर्तन कहलाता है। दूसरे शब्दों में, भौतिक परिवर्तन में पदार्थ की आकृति एवं भौतिक अवस्था में तो परिवर्तन होता है, परन्तु कोई नया पदार्थ नहीं बनता है, जैसे-जल का जमकर बर्फ बनना, चीनी का जल में विलयन, नमक का जल में विलयन, स्प्रिग का खींचना, बादलों का बनना, बर्फ का पिघलना, जल का वाष्प में परिवर्तित होना आदि।
  5. रासायनिक परिवर्तन (Chemical Change): वह परिवर्तन जो पदार्थ के अणु की रचना को बदलकर पदार्थ के कुछ विशिष्ट गुणों को बदल देता है, रासायनिक परिवर्तन कहलाता है। रासायनिक परिवर्तन के फलस्वरूप नए अणुओं की रचना होती है। दूसरे शब्दों में, रासायनिक परिवर्तन के पश्चात एक नया पदार्थ बनता है, जिसका गुणधर्म मूल पदार्थ से पूर्णतया भिन्न होता है। रासायनिक परिवर्तन के पश्चात बने पदार्थ को मूल पदार्थ में पुनः परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, जैसे- मैग्नीशियम के तार का जलना, मोमबत्ती का जलना, दूध से दही बनना, लोहे में जंग लगना, लौह-चूर्ण को गंधक के साथ गर्म करना, जल में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का प्राप्त होना, अगरबत्ती का जलना, आटा से रोटी का बनना आदि।
  6. जस्तीकरण (Galvanization): लोहा को गलित जस्ता में डुबा देने से लोहा पर जस्ता की एक परत चढ़ जाती है। इस क्रिया को जस्तीकरण कहते हैं। जस्ते की परत लोहे की ढंककर उसे नम जल के संपर्क में नहीं आने देती है, जिस कारण लोहे पर जंग नहीं लग पाता है। यही कारण है कि लोहा का जस्तीकरण किया जाता है।
  7. परमाणुकता (Atomicity): किसी तत्व के एक अणु में उपस्थित परमाणुओं की संख्या को परमाणुकता कहते हैं। सल्फर के एक अणु में सल्फर के 8 परमाणु रहते हैं, अतः इसकी परमाणुकता 8 है।
  8. उत्प्रेरण (Catalysis): ऐसे रासायनिक पदार्थ जो अपनी उपस्थिति मात्र से किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं तथा स्वयं अभिक्रिया के अंत में रासायनिक रूप से अप्रभावित रहते हैं, उत्प्रेरक (Catalyst) कहलाते हैं तथा यह क्रिया उत्प्रेरण कहलाती है। किसी पदार्थ की उपस्थिति मात्र से रासायनिक अभिक्रिया के वेग में होने वाले परिवर्तन की पुष्टि सर्वप्रथम बर्जीलियस ने 1835 में की । अतः उत्प्रेरक की खोज का श्रेय बर्जीलियस को जाता है। उदाहरण के लिए, यदि पोटैशियम क्लोरेट (KClO3) को बहुत अधिक ताप पर गर्म किया जाए, तो इससे ऑक्सीजन गैस अत्यन्त धीरे-धीरे निकलती है। परन्तु, यदि इसके साथ थोड़ी मात्रा मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) को मिला दी जाए, तो इससे कम ताप पर ही तीव्र गति से एवं पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन गैस निकलती है। अभिक्रिया के अंत में मैंगनीज डाइऑक्साइड के रासायनिक संरचना या गुण-धर्म में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता है। अतः MnO2 इस अभिक्रिया में एक उत्प्रेरक की भाँति कार्य करता है।

{ 2KCLO }_{ 3 }\xrightarrow [ { MnO }_{ 2 } ]{ } 2KCL+{ 3O }_{ 2 }\uparrow +\left[ { MnO }_{ 2 } \right]

कुछ प्रदार्थ ऐसे होते हैं, जिनकी उपस्थिति मात्र से किसी उत्प्रेरक की उत्प्रेरण शक्ति बढ़ जाती है, परन्तु ऐसे पदार्थ स्वयं उत्प्रेरक का कार्य नहीं करते। ऐसे पदार्थ को उत्प्रेरकवर्द्धक कहते हैं।

उत्प्रेरक के प्रकार: उत्प्रेरक निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(a) धनात्मक उत्प्रेरक (Positive catalyst): ऐसे उत्प्रेरक, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को बढ़ाते हैं, धनात्मक उत्प्रेरक कहलाते हैं।

(b) ऋणात्मक उत्प्रेरक (Negative Catalyst): ऐसे उत्प्रेरक, जो किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को घटाते हैं, ऋणात्मक उत्प्रेरक कहलाते हैं।

(c) स्व-उत्प्रेरक (Auto Catalyst): जब किसी रासायनिक अभिक्रिया के दौरान बना कोई उत्पाद उसी रासायनिक अभिक्रिया के लिए उत्प्रेरक का कार्य करने लगता है, तो उसे स्व-उत्प्रेरक कहते हैं।


2KMnO4 + 3H2SO4 + 5H2C2O4 → K2SO4 2MnSO4 + 10CO2 + 8H2O

यहाँ MnSO4 का Mn2+ आयन स्व-उत्प्रेरक का कार्य करता है।

(d) प्रेरित उत्प्रेरक (Induced Catalyst): जब एक रासायनिक अभिक्रिया का उत्पादक दूसरी रासायनिक अभिक्रिया के लिए उत्प्रेरक का कार्य करता है, तो ऐसे उत्प्रेरक को प्रेरित उत्प्रेरक कहते हैं।

उत्प्रेरण के प्रकार- उत्प्रेरण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-

(i) समांगी उत्प्रेरण (Homogeneous Catalysis)

(ii) विषमांगी उत्प्रेरण (Heterogeneous Catalysis)

समांगी उत्प्रेरण में उत्प्रेरक तथा अभिकारक एक ही प्रावस्था में रहते हैं, जबकि विषमांगी उत्प्रेरण में उत्प्रेरक तथा अभिकारक भिन्न-भिन्न प्रावस्था में रहते हैं।

2SO2 (गैस) + O2 (गैस) + [NO] (गैस)  → 2SO3 + [NO] समांगी उत्प्रेरण

N2 (गैस) + 3H2 (गैस) + [Fe] (ठोस) → 2NH3 + [Fe] (विषमांगी उत्प्रेरण)

उत्प्रेरक विष (Catalytic poison): जो पदार्थ स्वयं किसी उत्प्रेरक की उत्प्रेरण क्षमता को कम या नष्ट कर देते हैं, उन्हें उत्प्रेरक विष कहते हैं।

संदमक (Inhibitors): वे पदार्थ जो किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को कम कर देते हैं, संदमक कहलाते हैं।

उत्प्रेरकों के उपयोग
उत्प्रेरकउपयोग
लौह-चूर्णअमोनिया गैस बनाने की हैबर विधि में
प्लेटिनम चूर्णसल्फ्यूरिक अम्ल बनाने की सम्पर्क विधि में
नाइट्रोजन के ऑक्साइडसल्फ्यूरिक अम्ल बनाने की सीस-कक्ष विधि में
निकिलवनस्पति तेलों से कृत्रिम घी बनाने में
गर्म ऐलुमिनाऐल्कोहॉल से ईथर बनाने की विधि में
क्यूप्रिक क्लोराइडक्लोरीन गैस बनाने की डीकान विधि में
पेप्सिन एन्जाइमअमाशय में प्रोटीन को पेप्टाइड में अपघटित करने में
इरेप्सिन एन्जाइमआंतों में प्रोटीनों को अमीनो अम्ल में अपघटित करने में
ट्रिप्सिन एन्जाइमअग्न्याशय में प्रोटीन की अमीनो अम्ल में अपघटित करने में
टायलिन एन्जाइममानव-लार में स्टार्च को ग्लूकोज में परिवर्तित करने में
जाइमेज एन्जाइमग्लूकोज से एथिल ऐल्कोहॉल बनाने में
डाइस्टेज एन्जाइमस्टार्च से माल्टोस के बनने में
माइकोडर्मी एसिटीगन्ने की शक्कर से सिरक के निर्माण में
इन्वर्टेज एन्जाइमगन्ने की शक्कर से ग्लूकोज व फ्रक्टोज बनाने में
लेक्टिक वैसिलीदूध से लैक्टिक अम्ल बनने में

एन्जाइम (Enzymes): अणु जीवों (किण्वों) में संकीर्ण नाइट्रोजनयुक्त पदार्थ, जो किण्वन की क्रिया सम्पादित करते हैं, एन्जाइम कहलाते हैं। एन्जाइम प्रत्येक जीवित प्राणी को कोशिकाओं में उपस्थित होते हैं और जीवित शरीर में होने वाली विभिन्न अभिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एन्जाइम को जीव रासायनिक उत्प्रेरक भी कहते हैं।

एन्जाइम के गुण:

(i) ये प्रोटीन के समान संकीर्ण पदार्थ होते हैं। ये सम्पर्क उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं और उच्च कार्बनिक पदार्थों की सरलतम पदार्थों में अपघटन क्रिया को उत्प्रेरित करते हैं। (ii) ये अत्यंत ही विशिष्ट होते हैं और एक एन्जाइम केवल एक ही क्रिया को संपादित करता है। (iii) इनकी क्रियाशीलता अधिक ताप (79°C) तथा विषैले पदार्थ की उपस्थिति में कम होती है या नष्ट हो जाती है। शरीर के ताप पर (20°C से 39°C) यह सबसे अच्छा काम करता है। (iv) अभिक्रियास्वरूप पदार्थों के एकत्रित हो जाने की क्रिया धीमी पड़ जाती है या नष्ट हो जाती है।

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