कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन या लखनऊ समझौता Lucknow Session Of The Congress Or Lucknow Pact

अतिवादियों का कांग्रेस में पुनः प्रवेश

1916 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लखनऊ में आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता उदारवादी नेता अंबिका चरण मजुमदार ने की। इस अधिवेशन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि थी गरमदल (अतिवादियों) का कांग्रेस में पुनः प्रवेश। इसके कई कारण थे-

  1. पुराने विवाद अब अप्रासंगिक या अर्थहीन हो गये थे।
  2. उदारवादियों तथा अतिवादियों, दोनों ने यह महसूस किया कि विभाजन से राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हो रही है।
  3. ऐनी बेसेंट तथा बाल गंगाधर तिलक ने दोनों दलों में एकता के अथक एवं सराहनीय प्रयास किये थे। उदारवादियों की भावनाओं को सम्मान देते हुये तिलक ने घोषित किया कि वे भारत में प्रशासनिक सुधारों के पक्षधर हैं न कि पूरी ब्रिटिश सरकार को हटाये जाने के। उन्होंने हिंसात्मक तरीकों को न अपनाये जाने की भी वकालत की।
  4. दो प्रमुख उदारवादी नेताओं, गोपाल कृष्ण गोखले तथा फिरोजशाह मेहता की मृत्यु हो जाने से कांग्रेस के दोनों दलों में एकता का मार्ग प्रशस्त हुआ क्योंकि ये दोनों ही नेता उग्रवादियों के कट्टर विरोधी थे तथा किसी भी हालत में उग्रवादियों से एकता नहीं चाहते थे।

कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग का लखनऊ समझौता

कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि थी- कांग्रेस एवं लीग के मध्य समझौता। इस अधिवेशन में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग एक-दूसरे के करीब आ गये तथा दोनों ने सरकार के समक्ष अपनी समान मांगें प्रस्तुत कीं। कांग्रेस एवं लीग के मध्य यह समझौता और भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इस समय युवा क्रांतिकारी आतंकवादियों में मुस्लिम लीग की अच्छी पकड़ थी। फलतः लीग के कांग्रेस के समीप आने से कांग्रेस के साम्राज्यवाद विरोधी अभियान को और गति मिल गयी। मुस्लिम लीग के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समीप आने के कई कारण थे—

  1. 1912-13 के बाल्कान युद्ध में ब्रिटेन ने तुर्की की सहायता से इंकार कर दिया। इस युद्ध के कारण यूरोप में तुर्की की शक्ति क्षीण हो गयी तथा उसका सीमा क्षेत्र संकुचित हो गया। उस समय तुर्की के शासक का दावा था कि वह सभी मुसलमानों का ‘खलीफा’ या ‘प्रधान’ है। भारतीय मुसलमानों की सहानुभूति तुर्की के साथ थी। ब्रिटेन द्वारा युद्ध में तुर्की को सहयोग न दिये जाने से भारतीय मुसलमान रुष्ट हो गये। फलतः मुस्लिम लीग ने कांग्रेस से सहयोग करने का निश्चय किया, जो ब्रिटेन के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन चला रही थी।
  2. बंगाल विभाजन को रद्द किये जाने के सरकारी निर्णय से उन मुसलमानों को घोर निराशा हुयी जिन्होंने 1905 में इस विभाजन का जोरदार समर्थन किया था।
  3. ब्रिटिश सरकार द्वारा अलीगढ़ में विश्वविद्यालय की स्थापना एवं उसे सरकारी सहायता दिये जाने से इन्कार करने पर शिक्षित मुसलमान रुष्ट हो गये।
  4. मुस्लिम लीग के तरुण समर्थक धीरे-धीरे सशक्त राष्ट्रवादी राजनीति की ओर उन्मुख हो रहे थे तथा उन्होंने अलीगढ़ स्कूल के सिद्धांतों को उभारने का प्रयत्न किया। 1912 में लीग का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। इस अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने निश्चय किया कि वह भारत के अनुकूल ‘स्वशासन’ की स्थापना में किसी अन्य ग्रुप या दल को सहयोग कर सकता है बशर्ते यह भारतीय मुसलमान के हितों पर कुठाराघात न करे तथा उनके हित सुरक्षित बने रह सकें। इस प्रकार कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों की ‘स्वशासन की अवधारणा’ समान हो गयी तथा इससे उन्हें पास आने में सहायता मिली।
  5. प्रथम विरुद्ध युद्ध के दौरान सरकार की दमनकारी नीतियों से युवा मुसलमानों में भय का वातावरण व्याप्त हो गया था। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के पत्र अल हिलाल तथा मोहम्मद अली के पत्र कामरेड को सरकारी दमन का निशाना बनना पड़ा, वहीं दूसरी ओर अली बंधुओं, मौलाना आजाद तथा हसरत मोहानी को नजरबंद कर दिया गया। सरकार की इन नीतियों से युवा मुसलमानों विशेषकर लीग के युवा सदस्यों में साम्राज्यवाद विरोधी भावनायें जागृत हो गयीं तथा वे उपनिवेशी शासन को समूल नष्ट करने हेतु अवसर की तलाश करने लगे।

इन सभी कारणों ने  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग में एकीकरण को संभव बना दिया। कांग्रेस एवं लीग में इस समझौते को लखनऊ समझौते  के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के मुख्य प्रावधान निम्नानुसार थे-

  1. कांग्रेस द्वारा उत्तरदायी शासन की मांग को लीग ने स्वीकार कर लिया।
  2. कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिये पृथक निर्वाचन व्यवस्था की मांग को स्वीकार कर लिया।
  3. प्रांतीय व्यवस्थापिका सभाओं में निर्वाचित भारतीय सदस्यों की संख्या का एक निश्चित भाग मुसलमानों के लिये आरक्षित कर दिया गया। पंजाब में 50 प्रतिशत, बंगाल में 40 प्रतिशत, बम्बई सहित सिंध में 33 प्रतिशत, यू.पी. में 30 प्रतिशत, बिहार में 25 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 15 प्रतिशत तथा मद्रास में भी 15 प्रतिशत सीटें मुस्लिम लीग को दी गयीं।
  4. केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा में कुल निर्वाचित भारतीय सदस्यों का 1/9 भाग मुसलमानों के लिये आरक्षित किया गया तथा इनके निर्वाचन हेतु साम्प्रदायिक चुनाव व्यवस्था स्वीकार की गयी।
  5. यह निश्चित किया गया कि यदि किसी सभा में कोई प्रस्ताव किसी सम्प्रदाय के हितों के विरुद्ध हो तथा 3/4 सदस्य उस आधार पर उसका विरोध करें तो उसे पास नहीं किया जायेगा।

एकीकरण के फलस्वरूप जहां एक ओर मुस्लिम लीग, कांग्रेस के साथ सरकार को संयुक्त संवैधानिक मांगों का प्रस्ताव पेश करने पर सहमत हो गयी वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की पृथक निर्वाचन व्यवस्था की मांग को स्वीकार कर लिया। समझौते के पश्चात् कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने सरकार के समक्ष अपनी संयुक्त मांगे पेश कीं, जो इस प्रकार थीं-

  1. सरकार, भारत को उत्तरदायित्वपूर्ण शासन देने की शीघ्र घोषणा करे।
  2. प्रांतीय व्यवस्थापिका सभाओं में निर्वाचित भारतीयों की संख्या बढ़ाई जाये तथा उन्हें और अधिक अधिकार प्रदान किये जायें।
  3. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में आधे से ज्यादा सदस्य भारतीय हों। 

समझौते के नकारात्मक पहलू

लखनऊ के ऐतिहासिक समझौते के फलस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने एक संयुक्त मंच का गठन तो कर लिया किन्तु इसके समझौता प्रावधानों के निर्धारण में दूरदर्शिता का पूर्ण अभाव परिलक्षित हुआ। कांग्रेस द्वारा लीग की प्रस्तावित साम्प्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था को स्वीकार कर लिये जाने से एकसमान मंच तथा राजनीति की दो अलग-अलग दिशाओं का युग प्रारम्भ हुआ। यह प्रावधान द्विराष्ट्र - सिद्धांत की अवधारणा का अंकुर था। इसके अतिरिक्त लखनऊ समझौते में कांग्रेस तथा लीग के नेताओं ने आपस में एकता की व्यवस्था तो कर ली किन्तु हिन्दू तथा मुसलमान दोनों सम्प्रदाय के लोगों को आपस में लाने के कोई प्रयास नहीं किये गये।

समझौते के सकारात्मक पहलू

साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति के विवादास्पद प्रावधानों को छोड़ दिया जाये तो इस व्यवस्था से यह लाभ हुआ कि अल्पसंख्यकों के मन से बहुसंख्यक हिन्दुओं का भय दूर हो गया। समझौते के पश्चात् मुसलमान यह मानने लगे कि उनके हितों को अब हिन्दुओं से कोई खतरा नहीं रहा। दूसरा, समझौते से भारतीयों में एकता की नयी भावना का विकास हुआ। इससे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को नयी ताकत मिली। समझौते के पश्चात् स्थापित हुयी एकता को सरकार ने भी महसूस किया तथा उसने भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना हेतु प्रयास किये। इसी के फलस्वरूप अगस्त 1917 में ‘मांटेग्यू घोषणायें’ सार्वजनिक की गयीं ।

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