लॉर्ड विलियम बेंटिक Lord William Bentinck

1803 से 1808 तक मद्रास के गवर्नर और 1828 से 1835 तक भारत के गवर्नर जनरल Governor of Madras (18031808) and Governor-General of India (18281835)

लेफ्टिनेंट-जनरल लॉर्ड विलियम हेनरी कैवेंडिश बेंटिक (Lieutenant-General Lord William Henry Cavendish-Bentinck)  का जन्म 14 सितम्बर 1774 को, ड्यूक ऑफ़ पोर्टलैंड, विलियम कैवेंडिश बेंटिक के दुसरे पुत्र के रूप में पैदा हुआ था। वह एक ब्रिटिश सैनिक और राजनेता भी था। बेंटिक ने 17 साल की उम्र में कोल्डस्ट्रीम गार्ड में कमीशन प्राप्त किया, और 1794 तक वह लेफ्टिनेंट कर्नल बन गया था। नेपोलियन के साथ चल रहे युद्ध में, उसे सिसिली में ब्रिटिश सैनिकों का कमांडर नियुक्त किया गया था। इटली नेपोलियन के हाथों में तो था, लेकिन सिसिली में नेपल्स के बोरबॉन सम्राट अभी भी ब्रिटिश बेड़े की सुरक्षा के तहत राज्य कर रहे थे। वह आखिर में 1814 में जेनोआ,  इटली में आया तो उसकी उदार घोषणाओं से उनकी सरकार को शर्मिंदा होना पड़ा  और उसे 1815 में इंग्लैंड के लिए वापस बुला लिया गया। अपनी वापसी पर वह ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए निर्वाचित हुआ।

29 वर्ष से कम उम्र में 1803 में मद्रास (अब चेन्नई) के गवर्नर के रूप में उनकी नियुक्ति  आश्चर्य का कारण भी बनी, परन्तु 1808 में उन्हें कम्पनी की सेना में भारतीय सैनिकों द्वारा वेल्लोर में सिपाही विद्रोह को उचित रूप से न निपटा पाने के कारण वापस बुला लिया गया। हालांकि, इक्कीस वर्षों के बाद लॉर्ड एमहर्स्ट द्वारा त्यागपत्र दे देने पर उन्हें 1828 में,  गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्त किया गया। उनके प्रशासन के दौरान,  सेना में वित्तीय छंटनी और एक आधुनिक सरकार के लिए सिविल सेवा को भारत लाया गया। न्यायिक सुधारों के रूप में उसने इस बात को संभव बनाया की, कि ज्यादा भारतीय मजिस्ट्रेटों और न्यायाधीशों के रूप में सेवा कर सकें। उसने इस बात को एक "राक्षसी मूर्खता (monstrous absurdity)" के रूप में माना की केवल गोरे ही भारत में उच्च पद धारण कर सकते हैं।

उसके प्रशासन में दो सबसे मशहूर और विवादास्पद अधिनियम भी हुए, जिसमे से पहला था सती प्रथा का उन्मूल- इस प्रथा में अपने पति की मौत के बाद उनकी विधवाओं को उनके अंतिम संस्कार के समय उनकी चिता पर बैठ कर खुद को भी जला देना होता था, इसे बेंटिक द्वारा भारतीय बर्बरता का एक चिह्न के रूप में मन गया। दूसरा अंग्रेजी को उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में शुरूआत करना। सती प्रथा के उन्मूलन के लिए वह ब्रिटिश सरकार और इसाई कार्यकर्ताओं के दबाव में था कि वे भारतीय प्रशासन में इसाई और ब्रिटिश मूल्यों को प्रतिविम्बित करें। सती प्रथा केवल उत्तर भारत में उच्च जातियों में पाई जाती थी, और बेंटिक किसी भी कार्रवाई को करने के लिए शुरू में अनिच्छुक था। हालाँकि वह व्यक्तिगत रूप से इस प्रथा के उन्मूलन के पक्ष में था, परन्तु उसने ब्रिटिश सरकार यह भी कहा की हिन्दू धर्म की प्रथाओं में हस्तक्षेप हिन्दुओं के प्रतिरोध को भड़काने वाला होगा। भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा इस बात पर आश्वस्त किये जाने पर की इस प्रथा का भारतीय हिन्दू ग्रंथों में कहीं भी किसी प्रकार का आदेश नहीं है, सन 1829 में इस प्रथा की रोक के लिए सम्पूर्ण बिटिश भारत में एक विनियमन जारी किया गया। उसे इसके लिए भारतीय जनता में कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया भी नहीं मिली।

बेंटिक के प्रशासन में एक और महत्वपूर्ण फैसला 1835 में किया गया की ब्रिटिश सरकार केवल उन उच्च शिक्षा के संस्थानों को समर्थन देगी, शिक्षा के माध्यम के रूप में केवल अंग्रेजी का इस्तेमाल किया है। बेंटिक ने निर्णय किया की अंग्रेजी के उपयोग से ब्रिटिश सरकार के अनुकूल सुधार संभव हो सकेगा। इसके लिए उसे उस समय के सबसे प्रमुख भारतीय बौद्धिक राम मोहन रॉय और कलकत्ता के व्यवसायीयों द्वारा समर्थन भी मिला।

लॉर्ड विलियम बेंटिक  ने ज़िला मजिस्ट्रेट तथा ज़िला कलेक्टर के पद को मिलाकर एक कर दिया, प्रादेशिक अदालतों को समाप्त कर दिया, भारतीयों की नियुक्तियाँ अच्छे वेतन पर डिप्टी मजिस्ट्रेट जैसे प्राशासकीय पदों पर की तथा 'डिवीजनल कमिश्नरों (मंडल आयुक्त)' के पदों की स्थापना की। 1835 ई. में ही बेंटिक  ने कलकत्ता में ‘कलकत्ता मेडिकल कॉलेज’ की नींव रखी। लॉर्ड विलियम बेंटिक  ने लॉर्ड कॉर्नवॉलिस द्वारा स्थापित प्रान्तीय, अपीलीय तथा सर्किट न्यायालयों को बन्द करवाकर, इसका कार्य मजिस्ट्रेट तथा कलेक्टरों में बांट दिया। न्यायलयों की भाषा फ़ारसी के स्थान पर विकल्प के रूप में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग की अनुमति दी गई। ऊंचे स्तर के न्यायलयों में अंग्रेज़ी का प्रयोग होता था। बेंटिक ने भारतीय सेना में जिस्मानी सज़ा जिसे ब्रिटिश सेना में काफी पहले समाप्त समाप्त कर दिया गया था, उसे भी बंद करा कराया। बेंटिक ने अवांछित बच्चों, मानव बलि और ठगों को रोकने के लिए भी उपाय किये। उस समय ठग और लुटेरे शपथ और अनुष्ठान से बनते होते थे जो, यात्रियों की देवी काली के सामने बलि चढ़ा देते थे।

बेंटिक 1835 में सेवानिवृत्त हुआ और 1839 में पेरिस में उसकी मृत्यु हो गयी। 1835 में इंग्लैंड लौटने पर वह पुनः हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए निर्वाचित हुआ। उसके प्रशासन में जैसी उसने आशा व्यक्त की थी, बहुत बड़ा सुधार नहीं आया था, परन्तु इसने भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की शुरुआत कर दी थी।

1833 ई. के चार्टर एक्ट द्वारा बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर-जनरल बना दिया गया और लॉर्ड विलियम बेंटिक  1833 से 20 मार्च 1835 तक भारत का पहला गवर्नर जनरल भी रहा।

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