भारत में स्थानीय स्वशासन: नगर प्रशासन Local Self-Government In India: Municipal Administration

प्राचीन भारत में नगरीय प्रशासन के विद्यमान होने का भी उल्लेख मिलता है। मैगस्थनीज ने ईस्वी पूर्व तीसरी शताब्दी के भारत में एक नगर के शासन का अपने विवरण में उल्लेख किया है। उस विवरण से पता चलता है कि प्राचीन काल के नगरीय शासन की 5-5 सदस्यों की 6 समितियों में विभाजित किया हुआ था। इससे यह विदित होता है कि प्राचीन भारत में आज की भांति ही स्थानीय शासन की नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में विभाजित किया हुआ था।

ब्रिटिश भारत में 1687 में अंग्रेजों के द्वारा मद्रास नगर की स्थापना की गई थी, जिसे स्वायत्त शासन का श्रीगणेश माना जाता है। इस समय बम्बई एवं कलकत्ता नगर में नगरपालिका की स्थापना की गई। सन् 1840 और 1850 के मध्य प्रेसीडेन्सी शहरों में नगरीय स्थानीय प्रशासन के संगठन और कार्यों का विस्तार ही नहीं किया गया अपितु कुछ सीमा तक निर्वाचन का सिद्धांत इन संस्थाओं के लिए अपनाया गया।

1935 के भारत सरकार अधिनियम के पारित होने के पश्चात् प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना हुई। नगरपालिकाओं के विचार-विमर्शकारी और कार्यकारी निकायों को पृथक्-पृथक् किया गया। मध्य प्रदेश, बम्बई तथा उत्तर प्रदेश में नगरपालिकाओं की समस्याओं पर विचार करने तथा उनमें सुधार के लिए सुझाव देने के लिए समितियां नियुक्त की गई। इस काल में मद्रास में 1930 और 1933 में दो महत्वपूर्ण अधिनियम बनाए गए। जिला बोडों के कार्य क्षेत्र का विस्तार किया गया तथा जिलाधीश को जिला बोर्ड का प्रमुख कार्याधिकारी नियुक्त किया गया।

1935-1949 के बीच के समय में नगरपालिकाओं और पंचायतों के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया गया। नगरपालिकाओं की विधायनी और कार्यकारी शक्तियों का पृथक्करण किया गया।

स्वतंत्रता के प्रथम दशक में नगरीय स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं को एक प्रकार से पृष्ठभूमि में डाल दिया गया किंतु इसका अर्थ कदापि नहीं कि नवीन भारत के निर्माण में नगरीय स्थानीय संस्थाओं का योगदान कम है। नगरीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति ने 1961 के दशक में नगरीय स्थानीय संस्थाओं को एक नया महत्व प्रदान किया।

1950-1992 के बीच नगरीय शासन के क्षेत्र में महानगरों में नगर निगम और उनसे छोटे नगरों में प्रायः नगर परिषद् या नगरपालिकाएं जैसी संस्थाएं पूर्व की भांति निरंतर क्रियाशील रहीं। पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा अन्य राज्यों ने नगरपालिकाओं की दशा का अध्ययन कर, उनमें प्रशासकीय सुधारों के लिए सुझाव देने के लिए समिति नियुक्त की। राज्य सूची का विषय होते हुए भी भारत सरकार ने नगरीय स्वायत्त शासन की संस्थाओं की समस्याओं के अध्ययन के लिए 1951 में स्थानीय वित्त जांच समिति, 1968 में नगरपालिका कर्मचारी प्रशिक्षण समिति, 1963 में ही नगरीय स्वायत्त संस्थाओं के वित्तीय विकास के लिए मंत्रियों की समिति, 1966 में ग्रामीण नगरीय संबंध समिति और 1968 में नगरीय कर्मचारियों की सेवा शर्तों से संबंधित समिति नियुक्त की।

स्वतंत्र भारत में स्थानीय संस्थाओं के विकास के 1992 तक के काल में इन संस्थाओं के कार्यकरण में अनेक कमियों और न्यूनताओं का अनुभव किया गया। इनमें प्रमुखतः इन संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता का आभाव, इनके अनियमित चुनाव, दीर्घकाल तक इस संस्थाओं के अधिक्रमित अर्थात राज्य सरकारों द्वारा इन्हें अकारण भंग रखे जाने, इनकी दयनीय आर्थिक दशा, इन्हें पर्याप्त शक्तियों व अधिकारों का अभाव, इन संस्थाओं के चुनावों के आयोजन के लिए प्रभावी संरचना के आभाव तथा इन संस्थाओं में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति और महिलाओं को अपर्याप्त प्रतिनिधित्व आदि ऐसी प्रमुख स्थितियां थीं, जिनके निराकरण की मांग विभिन्न अवसरों पर भिन्न मंचों से निरंतर उठती रही थीं।

इन संस्थाओं के कार्यकरण में उपर्युक्त इंगित इन्हीं न्यूनताओं के परिष्कार के लिए भारत सरकार ने संविधान में दो व्यापक संशोधन किए जिन्हें क्रमशः पंचायती राज संस्थाओं के लिए 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, और नगरीय संस्थाओं के लिए 74वां संविधान संशोधन अधिनियम, के नाम से जाना जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के स्तर पर इस प्रकार का प्रयास पूर्व में 64वां संविधान संशोधन पारित कराए जाने के रूप में 1989 में भी हुआ था। किंतु यह संशोधन राज्य सभा में अपेक्षित बहुमत के अभाव में पारित नहीं हो सका था। इसके पश्चात् 1991 में संपन्न आम चुनावों के पश्चात् पदासीन राष्ट्रीय सरकार ने दिसंबर 1992 में संविधान में उपर्युक्त दोनों महत्वपूर्ण संशोधन पारित कराए।

अधिकांश राज्यों के बड़े शहरों में नगर निगमों की स्थापना विशेष नगर निगम विधान अधिनियमों के अधीन हुई है। किंतु, 74वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से स्थानीय स्वायत्त शासन को संवैधानिक आधार प्रदान कर दिया गया है। यह अधिनियम आधे से अधिक राज्यों के अनुसमर्थन के पश्चात् 1 जून, 1993 से प्रभावी हुआ।

नगर प्रशासन की संवैधानिक व्यवस्था

राजीव गांधी सरकार ने 1988 में संसद में 65वां संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया था किंतु यह विधेयक राज्यसभा में पारित नहीं हो सका। 1990 में तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार ने एक संशोधित विधेयक (64वां संशोधन विधेयक) प्रस्तुत किया। इस विधेयक में पंचायतों एवं नगरपालिकाओं से संबंधित अनेक प्रावधान थे। यद्यपि यह विधेयक भी पारित नहीं हो सका। अंततः तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने 74वां संशोधन विधेयक पारित किया, जो अप्रैल 1993 से अपने अस्तित्व में आया। इस विधेयक के पारित होने के उपरांत संविधान में एक नया भाग IX(ए) जोड़ा गया, जिसमें शहरी शासन (नगरपालिका शासन) से संबंधित विषयों का उल्लेख किया गया था। नगरीय शासन से संबंधित अनुच्छेदों का वर्णन संविधान की 12वीं अनुसूची में अनुच्छेद-243(पी) से 243(जेडजी) तक किया गया है। नगरीय शासन से संबंधित संस्थाओं के तीन प्रकार हैं- नगर पंचायत, नगरपालिकाएं एवं नगर निगम।

  1. नगर पंचायत ऐसे क्षेत्र के लिए जो ग्रामीण क्षेत्र से नगर क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है,
  2. नगर परिषद, छोटे नगर क्षेत्र के लिए, तथा;
  3. नगर निगम बड़े नगर क्षेत्र के लिए।

अनुच्छेद 243 (थ) ने प्रत्येक राज्य के लिए ऐसी इकाइयां गठित करना अनिवार्य कर दिया है। किंतु यदि कोई ऐसा नगर क्षेत्र है जहां कोई औद्योगिक स्थापन नगरपालिका सेवाएं प्रदान कर रहा है या इस प्रकार प्रदान किए जाने का प्रस्ताव है तो क्षेत्र का विस्तार और तथ्यों पर विचार करने के पश्चात् राज्यपाल उसे औद्योगिक नगर घोषित कर सकेगा।

ऐसे क्षेत्र के लिए नगरपालिका गठित करना अनिवार्य नहीं होगा। नगरीय शासन से संबंधित 74वें संविंधान संशोधन अधिनियम, 1992 के अस्तित्व में आने से निचले स्तर तक अधिकारों के विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुयी है। संविधान के इस संशोधन अधिनियम से नगरीय स्वायत्त संस्थाओं को विशेष दर्जा प्राप्त हो गया है। साथ ही स्थानीय प्रशासन की प्रशासन का तीसरा स्तर माना जाने लगा है, जबकि दो अन्य स्तर हैं-केंद्र स्तर एवं राज्य स्तर। नगरीय निकाय ऐसी संस्थायें हैं, जिनकी निश्चित सेवाएं एवं नियामक कार्य हैं। इन्हें आगे अनिवार्य एवं विवेकाधीन दायित्वों में वर्गीकृत किया जा सकता है। किंतु यदि विस्तृत रूप में कहा जाये तो यह कहा जा सकता है कि नगरीय निकाय लगभग सभी कार्य करते हैं, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक संबंधित हैं। इन नगरीय निकायों की सेवायें मातृत्व सहायता से लेकर मृतक संस्कार स्थानों या विद्युत शवदाह गृहों की व्यवस्था तक विस्तृत है। नगरीय निकाय विकास एवं जन-कल्याण से संबंधित सभी कार्यक्रमों एवं योजनाओं से संबंधित हैं। इन निकायों के संबंध में इन्हें अधिकार प्रदान करने हेतु सभी आवश्यक उपबंध किये गये हैं, जिससे अब ये स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वच्छता, शिक्षा, संस्कृति, कल्याण, निवासियों के लिये प्रकाश की व्यवस्था, पेयजल आपूर्ति जैसे सभी कार्य कर सकते हैं। उदाहरणार्थ- बंगाल नगर निगम अधिनियम-1932 की धारा 108 में संविधान की राज्य सूची में उल्लिखित लगभग सभी विषय सम्मिलित हैं।

74वें संविधान संशोधन अधिनियम की बारहवीं अनुसूची [अनुच्छेद-243 (डब्ल्यू) के अंतर्गत] में नगरपालिकाओं एवं नगर निगमों के 18 बड़े कार्यों का उल्लेख किया गया है। ये कार्य इस प्रकार हैं-

  1. नगर नियोजन एवं शहरी नियोजन;
  2. भूमि के उपयोग पर नियंत्रण एवं भवनों का निर्माण;
  3. आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिये योजनाओं का निर्माण;
  4. सड़कें एवं पुल;
  5. घरेलू, वाणिज्यिक एवं औद्योगिक उद्देश्यों के लिये पानी की आपूर्ति;
  6. लोक स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन,
  7. अग्नि सेवायें;
  8. शहरी वानिकी, पर्यावरण का संरक्षण एवं पारिस्थितिकीय कारणों को प्रोत्साहन;
  9. समाज के कमजोर वर्गों के हितों को संरक्षण, जिसमें विकलांगों एवं मानसिक से रूप विक्षिप्त व्यक्तियों की सहायता भी सम्मिलित है;
  10. झुग्गी-झोंपड़ी सुधार;
  11. शहरी निर्धनता उन्मूलन;
  12. शहरी सुविधाओं में वृद्धि, जिनमें पार्को, उद्यानों एवं खेल के मैदानों की स्थापना एवं रख-रखाव भी सम्मिलित हैं;
  13. सांस्कृतिक, शैक्षिक एवं अन्य कार्यक्रमों को प्रोत्साहन;
  14. श्मशानों (दाह संस्कार स्थल) एवं विद्युत शवदाह गृहीं की उचित व्यवस्था;
  15. चारागाहों की व्यवस्था एवं आवारा पशुओं पर रोक;
  16. जन्म एवं मृत्यु का पंजीकरण;
  17. प्रकाश व्यवस्था पाकिंग स्थलों, बस स्टापों एवं जन-सुविधा परिसरों इत्यादि की स्थापना, तथा;
  18. बूचड़खानों का प्रबंधन।

74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 में नगरीय निकायों के उक्त सभी कार्यों एवं उत्तरदायित्वों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इन निकायों पर योजनाओं के निर्माण का भी उत्तरदायित्व है।

गठन

नगरपालिकाओं के सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा निर्वाचित होंगे। राज्य विधान मंडल अपनी विधि द्वारा निम्नलिखित व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व के लिए प्रावधान कर सकता है-

  1. नगरपालिका प्रशासन में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्ति,
  2. लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा और विधान परिषद के सदस्य, तथा;
  3. संविधान के अनुच्छेद 243-ध के अंतर्गत गठित वार्ड समितियों के अध्यक्ष।

अध्यक्षों को निर्वाचन विधानमंडल द्वारा निर्मित उपबंध के अनुसार किया जायेगा।

तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरपालिका क्षेत्र में आने वाले दो या अधिक वाडों के लिए वार्ड समितियां बनाना आवश्यक है। विधान मंडल वाडों का गठन, क्षेत्र तथा सदस्यों के चुनाव की विधि तय करेगा। विधान मंडल अन्य समितियों का भी गठन कर सकता है।

आरक्षण

पंचायत की तरह नगरपालिका में भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। महिलाओं के लिए ⅓ स्थानों की आरक्षण की व्यवस्था है। इसमें अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं का आरक्षण भी शामिल है। नगरपालिकाओं के अध्यक्ष पद के आरक्षण का निर्णय राज्य विधान मंडल को लेना है। विधान मंडल अध्यक्ष पदों को पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित कर सकता है।

कार्यकाल

नगरपालिकाओं का कार्यकाल 5 वर्ष है। इसका विघटन अवधि से पूर्व भी किया जा सकता है। साथ ही, नगरपालिकाओं की तय अवधि से पूर्व ही नये चुनाव हो जाने चाहिए। विघटन की स्थिति में विघटन की तिथि से 6 मास के अंदर ही चुनाव हो जाने चाहिए। यदि शेष अवधि 6 मास से कम है तो चुनाव कराना आवश्यक नहीं होता है।

योग्यताएं

संविधान के अनुच्छेद 243-फ के अनुसार राज्यों के विधान मंडल के सदस्यों के लिए निर्धारित योग्यताएं ही नगरपालिकाओं के सदस्यों के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित की गयी हैं। परन्तु इसमें एक महत्वपूर्ण भिन्नता है। जो व्यक्ति 21 वर्ष के हैं वे भी सदस्यता के लिए अर्ह होंगे, जबकि संविधान में यह उल्लिखित है कि विधान मंडल के निर्वाचन के लिए वे ही व्यक्ति अर्ह होंगे जो 25 वर्ष के हो चुके हैं (अनुच्छेद-178)।

शक्तियां, अधिकार और उत्तरदायित्व

संविधान के अनुच्छेद 243-ब द्वारा विधान मंडलों को यह शक्ति दी गई है कि वे नगरपालिकाओं को ऐसी शक्तियां और अधिकार दे सकते हैं,

जो स्वायत्त शासन की संस्थाओं के लिए आवश्यक है। इन संस्थाओं को निम्नलिखित उत्तरदायित्व सोपे जा सकते हैं:

  1. आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं तैयार करना,
  2. इन योजनाओं का कार्यान्वयन, तथा;
  3. 12वीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों के संबंध में। इस अनुसूची में 18 विषय हैं।

कर लगाने की शक्ति

राज्य विधानमंडल नगरपालिकाओं को कर, शुल्क, पथकर, आदि वसूलने या संग्रह करने तथा उन्हें निवेश करने का अधिकार दे सकता है। राज्य की संचित निधि से नगरपालिकाओं को-अनुदान दिया जा सकता है [अनुच्छेद-243(भ)]।

वित्त आयोग

संविधान के अनुच्छेद 243(म) के अनुसार गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और निम्नलिखित के बारे में सिफारिश करेगाः

  1. राज्य और नगरपालिकाओं के बीच, राज्य द्वारा वसूले और उनके बीच बंटने वाले कर, शुल्क, पथकर और फ़ीस की शुद्ध आमदनी का वितरण और नगरपालिकाओं के विभिन्न स्तरों में उनका आबंटन,
  2. नगरपालिकाओं की सहायता अनुदान,
  3. नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक उपाय, तथा;
  4. कोई अन्य विषय जो राज्यपाल तय करे।

संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा गठित वित्त आयोग के कर्तव्यों में एक और कर्तव्य की जोड़ा गया है। यह इस प्रकार है- राज्य वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य की नगरपालिकाओं के साधन स्रोतों की पूर्ति के लिए राज्य की संचित निधि में वृद्धि करने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए, इस पर भी राष्ट्रपति द्वारा गठित वित आयोग अपनी सिफारिश देगा।

निर्वाचन

संविधान के अनुच्छेद 243-य(क) के अनुसार गठित राज्य चुनाव आयोग को

  1. मतदाता सूची तैयारी कराने, और;
  2. नगरपालिकाओं के चुनाव सम्पन्न कराने के संबंध में कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है।

निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप निषिद्ध: अनुच्छेद-243य (छ) के प्रावधानों के अनुसार, न्यायालयों को इस बात की अधिकारिता नहीं होगी कि वे अनुच्छेद-243य(क) के अधीन निर्वाचन क्षेत्रो के परिसीमन अथवा स्थानों के आवंटन से सम्बंधित किसी विधि की वैधानिक की जांच करें। नगरपालिका के निर्वाचन, निर्वाचन-याचिका पर ही प्रश्नगत किए जा सकेंगे, जो ऐसे प्राधिकारी को एवं ऐसी रीति से प्रस्तुत की जाएगी जो राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाई गई विधि अथवा उसके अधीन विहित की जाए।

जिला योजना समिति और महानगर योजना समिति

संविधान के 74वें संशोधन के अनुसार, प्रत्येक राज्य में दो समितियां गठित की जाएंगी-

  1. जिला स्तर पर जिला योजना समिति [अनु.248य(घ)],और;
  2. प्रत्येक महानगर क्षेत्र में महानगर योजना समिति [अनुच्छेद 243-(य)]।

राज्य विधान मंडल समिति के गठन तथा सदस्यों के चुनाव के बारे में प्रावधान तय करेगा तथापि इस अनुच्छेद के प्रावधानों के अनुसार-

  1. जिला योजना समिति की स्थिति में कम से कम ⅘ सदस्य जिला स्तर की पंचायत और नगर पालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे। उनका अनुपात जिले में नगर और ग्राम की जनसंख्या के आधार पर होगा।
  2. महानगर योजना समिति की स्थिति में कम से कम ⅔ सदस्य नगरपालिका के सदस्यों और नगरपालिका क्षेत्र में पंचायतों के अध्यक्षों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे। स्थानों का विभाजन उस क्षेत्र में नगरपालिकाओं और पंचायतों की जनसंख्या के अनुपात में होगा।

राज्य विधान मंडल कानून द्वारा निम्नलिखित के बारे में प्रावधान करेगा-

  1. जिला योजना समिति के संबंध में कौन-सेकार्य जिला समितियों को सौंपे जा सकते हैं, तथा;
  2. जिला समिति के अध्यक्ष के चुने जाने की विधि, जिला योजना समिति, विकास योजना बनाकर राज्य सरकार को भेजेगी।

महानगर योजना समिति महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना तैयार करेगी। राज्य विधान मंडल कानून द्वारा निम्नलिखित के बारे में प्रावधान करेगा-

  1. केंद्र, राज्य तथा विभिन्न संस्थाओं के आवश्यक प्रतिनिधित्व संबंध में;
  2. महानगर क्षेत्र के लिए योजना और सहकारिता से संबंधित कार्य, तथा;
  3. इन समितियों के अध्यक्षों के चुने जाने की विधि।

इस प्रकार, जो विकास योजनाएं बनाई जाती हैं वे राज्य सरकार को भेजी जायेंगी। अतः शहरी स्थानीय स्वशासन संस्थाओं पर अत्यधिक उत्तरदायित्व हैं। साथ ही उन्हें अनेक कठिनाइयों का भी सामना करना पद रहा है, जैसे वित्तीय संकट, अनावश्यक राजनितिक हस्तक्षेप, बढ़ती हुई जनसंख्या विशेषतः शहरों में झुग्गी-झोंपड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी आदि। ये विभिन्न समस्याएं इन संस्थाओं के कार्य में अनेक तरह की बाधाएं डाल रही हैं। इन्हीं सब कठिनाइयों को देखते हुए संविधान के 74वें संशोधन को इलाज के रूप में देखा जा सकता है। इलाज का परिणाम क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है किंतु सकारात्मक आशाएं होनी आवश्यक हैं।

∎ 3 लाख अथवा उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरपालिका क्षेत्र में दी अथवा दो से अधिक वाडों हेतु वार्ड समितियों की स्थापना अनिवार्य है।

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