गुप्त काल में साहित्य Literature In The Gupta Period

गुप्तकाल में ही अधिकांश पुराणों का संकलन हुआ। प्रारम्भ में पुराण रचना से चारण लोग जुड़े हुए थे। उन चारणों में लोमहर्ष और उसके पुत्र उग्रसर्व प्रमुख हैं। अधिकांश पुराणों से वे जुड़े हुए थे, किन्तु आगे चलकर पुराण रचना का कार्य ब्राह्मणों के हाथों में चला गया।

गुप्त काल में संस्कृत भाषा और साहित्य का अप्रतिम विकास हुआ। संस्कृत का प्रयोग शिलालेख, स्तम्भलेख, दान-पत्र लेख आदि में हुआ। इसी भाषा में इस युग के महान् कवियों और साहित्यकारों ने अपनी अनेक कालजयी रचनाओं का प्रणयन किया।

इस काल में एक ओर प्रतिभाशाली सम्राट् हुए, तो दूसरी ओर कवि, गद्यकार, वैज्ञानिक एवं नाट्य ग्रन्थों के प्रणेता भी आविर्भूत हुए। गुप्तकालीन साहित्य को निम्नांकित कोटियों में विभाजित किया जा सकता है प्रशस्तियाँ, काव्यग्रन्थ, नाटक, नीतिग्रन्थ, स्मृतिग्रन्थ, कोश, व्याकरण, दर्शनग्रन्थ और विज्ञान।

प्रशस्तियाँ- गुप्त सम्राटों की उपलब्धियाँ शिलाओं, स्तम्भों तथा सिक्कों से विदित होती हैं। हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की। इसमें समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का वर्णन है। हरिषेण की शैली आलंकारिक थी। उसने गद्य-पद्य दोनों को अपनाया है। इस अभिलेख की कई पंक्तियाँ खंडित हो चुकी हैं। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का परराष्ट्र मंत्री वीरसेन भी कवि था। इसने उदयगिरी के शैवलेख की रचना की थी। गिरनार पर्वत और भीतरी स्तंभ पर स्कंदगुप्त की विजय और उपलब्धियाँ अंकित हैं। मंदसौर का सूर्य मंदिर अभिलेख कुमारगुप्त द्वितीय के शासनकाल का है। इसकी रचना वत्सभट्टि ने की थीं। वेदभी रीति में निबद्ध यह शैली कहीं-कहीं कालिदास की शैली का स्मरण कराती है। अभिलेख के प्रारंभिक भाग में लाट प्रदेश (दक्षिणी गुजरात) की प्राकृतिक छटा का निरूपण है। इसमें मालवा के दशपुर नगर का भी सजीव चित्रण मिलता है। वत्सभट्टि द्वारा इस नगर में निवास करने वाली पट्टवाय श्रेणी (बुनकर समिति) के आदेश के कारण इस प्रशस्ति का निर्माण किया गया। वासुल ने मंदसौर नरेश यशोवर्मन की उपलब्धियों का वर्णन मन्दसौर के स्तम्भ लेख में किया है। इस प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि यशोवर्मन जो प्रारम्भ में गुप्तों का सामन्त था, ने अपनी शक्ति में अभिवृद्धि कर ली थी और स्वतंत्र शासक बन गया था। काव्यमय शैली सिर्फ अभिलेखों में ही दिखाई नहीं देती वरन् सिक्कों पर भी देखी जाती है।

काव्यग्रन्थ और नाटक- संस्कृत साहित्य में ही नहीं, अपितु समस्त भारतीय साहित्य में कालिदास का सर्वाधिक महत्त्व है। कालिदास के स्थान, काल एवं वंश की जानकारी नहीं मिलती लेकिन उसकी रचनाओं को विद्वानों ने भास के बाद की रचना माना है। उसने सम्भवत: अपनी कृतियों का सृजन चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) की राजधानी (उज्जैन) में किया होगा। कालिदास का उज्जैन के प्रति लगाव यह सूचित करता है कि चन्द्रगुप्त के संरक्षण में उन्होंने अपना काफी समय व्यतीत किया था। कालिदास एक कवि और नाटककार दोनों दृष्टियों से सफल और बेजोड़ हैं। कालिदास के चार काव्य (ऋतुसंहार, मेघदूत, कुमारसंभव एवं रघुवंश) तथा तीन नाटक (मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीय, अभिज्ञानशकुन्तलम्) अब तक प्राप्त हुए हैं। ऋतुसंहार उनकी प्रथम रचना लगती है जिसे उन्होंने यौवनावस्था में लिखा होगा। कुछ विद्वान् ऋतुसंहार को अत्यन्त सामान्य और नैतिक गुणों से रहित रचना मानते हैं। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि युवावस्था एवं प्रौढ़ावस्था की रचनाओं में अन्तर होना स्वाभाविक था। पाश्चात्य साहित्यकार जैसे वर्जिल, गेटे, टेनिसन की रचनाओं में यह बात देखी जाती है। इससे छ: ऋतुओं का वर्णन मिलता है और कवि ने इसके द्वारा प्रकृति का श्रृंगारिक, सहज एवं स्वाभाविक वर्णन किया है। सम्पूर्ण काल में युवक-युवतियों के प्रेम के साथ, ऋतुओं के परिवर्तन के सम्बन्धों को दर्शाया गया है।

मेघदूत- एक गीतिकाव्य है, जो अपनी कोटि की सर्वोत्तम रचना मानी जाती है। यह कालिदास की काव्य कला का सुन्दर उदाहरण है, जिसमें प्रकृति के सौंदर्य का भी चित्रण किया गया है। हिमालय की सुन्दर छटा व बसन्त ऋतु का वर्णन मिलता है। ऋतुसंहार की तुलना में मेघदूत निसन्देह प्रौढ़कालीन रचना है। कर्त्तव्य से च्युत होने पर स्वामी (शिव) द्वारा एक वर्ष के लिए निर्वासित यक्ष को वर्षा काल में अपनी पत्नी का स्मरण आता है और वह जाते हुए मेघ से अपनी भार्या के पास समाचार ले जाने का अनुरोध करता है। कुमारसंभव के बारे में इतिहासकार अनुमान लगाते हैं कि इसका प्रणयन संभवत: कुमारगुप्त के जन्म के अवसर पर हुआ था। कुमारसंभव में 17 सर्ग हैं जिनमें शिवपार्वती के विवाह, कार्तिकेय के जन्म तथा उसके द्वारा तारकासुर के वध की कथा का वर्णन है।

रघुवंश- कालिदास का सर्वोत्तम महाकाव्य है जिसमें इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं का वर्णन है। इसमें 19 सर्ग हैं-राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम के वंशजों के चरित्र का वर्णन किया गया है। रघुवंश में सभी प्रधान रसों (शांत, वीर, श्रृंगार आदि) का समावेश है। मालविकाग्निमित्रम् को ऐतिहासिक नाटक कहा जा सकता है। इसमें शुंगवंशीय राजा अग्निमित्र तथा मालविका की प्रेम कथा का वर्णन है। प्रसंगवंश पुष्यमित्र शुंग के यवन युद्ध एवं उर्वशी की प्रणय कथा का वर्णन मिलता है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् समस्त संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक है। समस्त संस्कृत साहित्य ही नहीं, यदि इसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ रचना कहा जाय तो असंगत न होगा। इस प्रसंग में एक विद्वान् के यह विचार उल्लेखनीय हैं कि काव्य में नाटक मनोरम होते हैं और नाटकों में सर्वाधिक मनोरम अभिज्ञानशकुन्तलम् है। इसमें सात अंक हैं जिनमें दुष्यंत व शकुन्तला की प्रणय कथा का चित्रण है। इसमें प्रेम, करुणा, सहिष्णुता जैसे मानवीय गुणों पर अधिक जोर दिया गया है। कुछ इतिहासकार यह मानते हैं कि कालिदास ने कुन्तलेश्वर दौत्य नामक ग्रन्थ की भी रचना की। परन्तु दुर्भाग्यवश इसकी कोई भी कृति अभी प्राप्त नहीं हुई है। यह भी कहा गया है कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने कालिदास को अपने नाती प्रवरसेन द्वितीय का शिक्षक नियुक्त किया था। इसी वाकाटक नरेश ने सेतुबंध की रचना की। भास संस्कृत नाट्य परम्परा के प्रथम नाटककार हैं। भास के रचना-काल के विषय में मत-भेद है किन्तु अधिकांश विद्वान् उन्हें इसी युग से सम्बन्धित मानते हैं। स्वप्नवासवदत्ता भास की अनुपम रचना है। इसके अतिरिक्त प्रतिभा नाटक, पञ्चरात्र,  प्रतिज्ञा सौगंधरायण उसकी अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। महा महोपाध्याय गणपति शास्त्री ने 1912 में भास के 12 नाटकों का प्रकाशन किया था। शूद्रक का मृच्छकटिकम् भी गुप्त युग का प्रमुख नाटक है। इसका नायक चारूदत्त एक युवा ब्राह्मण है जो सार्थवाह है और उज्जैयनी की वेश्या बसन्तसेना पर आसक्त है। इस नाटक में समकालीन समाज एवं संस्कृति का यथार्थ चित्रण मिलता है। इस ग्रन्थ में तत्कालीन न्यायिक प्रक्रिया का भी चित्रण हुआ है। शूद्रक की लेखनी यथार्थवादी व चित्रात्मक है। उसने राज, किया है। मुद्राराक्षस व देवीचन्द्रगुप्तम् का लेखक विशाखदत्त भी गुप्तकाल से सम्बद्ध है। इसे चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन माना गया है। देवीचन्द्रगुप्तम की मूल पांडुलिपि उपलब्ध नहीं हुई है। इसके कुछ अंश नाट्य दर्पण में व श्रृंगारप्रकाश में मिलते हैं। इसमें रामगुप्त नामक गुप्त नरेश का शक शासक द्वारा पराजित होना, अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को समर्पित करने के लिए बाध्य होना, चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा शकराज की हत्या करना, रामगुप्त का वध कर ध्रुवदेवी के साथ विवाह आदि घटनाओं का वर्णन मिलता है। इस प्रकार देवीचन्द्रगुप्त एक ऐतिहासिक नाटक है। मुद्राराक्षस   भी ऐतिहासिक नाटक है। इसमें चाणक्य का कूटनीतिक कौशल दिखाई देता है।

स्मृति ग्रन्थ- गुप्त काल में मनुस्मृति के आधार पर बाद की प्रमुख स्मृतियों (याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति और कात्यायन) का निर्माण हुआ। यद्यपि इन स्मृतियों का काल निर्धारण कठिन है, फिर भी अधिकतर इतिहासकारों की यही मान्यता है कि इनको इसी काल में लेखबद्ध किया गया। मनुस्मृति का महत्त्व स्मृति साहित्य में सर्वाधिक है। अन्य स्मृतियों की रचना इसी को आधार बनाकर की गई। याज्ञवल्क्य स्मृति का महत्त्व व्यवहारिक दृष्टि से अधिक है। इसमें कहीं कहीं मनुस्मृति से साम्य और कहीं-कहीं विरोध भी मिलता है। मनु के समय की सामाजिक अवस्था में इस समय तक काफी परिवर्तन आ गये थे। इन परिवर्तनों को पुन: संगठित रूप प्रदान करने के लिए याज्ञवल्क्य स्मृति का प्रणयन किया गया। याज्ञवल्क्य स्मृति में धर्म, वर्ण, आश्रम, विधि, समाज, प्रायश्चित, राज्यशास्त्र भ्रूण विज्ञान आदि सभी पक्षों से संबंधित विवरण मिलता है। इस ग्रन्थ की वैज्ञानिकता व पक्षपात रहित दृष्टिकोण के कारण इस ग्रन्थ को संपूर्ण भारत में मान्यता प्राप्त हुई। हिन्दू विधि का दायभाग तो आज भी इसकी प्रमुख टीका मिताक्षरा पर आधारित है। नारद, बृहस्पति व कात्यायन की स्मृतियों में नारद स्मृति ही पूर्ण रूप से प्राप्त हुई है। इसे जाली ने संपादित किया। बृहस्पति व कात्यायन की स्मृतियाँ, स्मृतियों के टीकाकारों व निबन्धकारों के उद्धरणों के रूप में थी।

मनु व याज्ञवल्क्य की तुलना में नारद स्मृति में व्यवहार (कानूनी) व न्यायिक विचारों की प्रधानता है। व्यवहार सम्बन्धी विवरण तो पूर्णता लिए दिखता है, अन्य विषयों पर नारद ने प्रसंगवश ही विचार व्यक्त किये हैं। नारद, बृहस्पति व कात्यायन तीनों स्मृतियों में कानून के दोनों पक्षों दीवानी व फौजदारी का विवेचन किया गया है। नारद स्मृति में न्यायशासन, कचहरी का संविधान, प्रमाणों का स्वरूप, गवाह, व्यवहार के अठारह शीर्षक आदि का उल्लेख है।

बृहस्पति स्मृति की रचना चौथी शताब्दी ईसवी तक हो चुकी थी। बृहस्पति मनु व याज्ञवल्क्य से परिचित थे और उनका काल 200 ई. से 400 ई. के मध्य माना जा सकता है। बृहस्पति स्मृति को सात भागों में विभाजित आपद्धर्मकाण्ड, प्रायश्चित काण्ड। स्मृति का अधिकांश भाग व्यवहार से संबधित है। बृहस्पति ही प्रथम कानून निर्माता थे जिन्होंने दीवानी व फौजदारी मुकदमों में स्पष्ट विभाजन किया। उन्होंने मुकदमों के दो प्रकार बताए हैं- अर्थसमुद्भव या दीवानी व हिंसा समुद्भव या फौजदारी। धन सम्बन्धी मुकदमों की संख्या चौदह है और हिंसा से संबंधित मुकदमों की चार। याज्ञवल्क्य व नारद की तरह बृहस्पति ने कुल, श्रेणी, गण आदि कई प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है। बृहस्पति ने चार प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है-प्रतिष्ठित, अप्रतिष्ठित, मुद्रता और शासिता। न्यायिक प्रक्रिया के प्रारम्भ से अंत तक बृहस्पति इतना विस्तार से बताते हैं कि उनकी तुलना आधुनिक न्यायशास्त्री से की जा सकती है।

कात्यायन स्मृति में व्यवहार के चार अंग- धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन, न्यायभवन, सभासद, वादी, वादी को परखने के तरीके, प्रतिवादी, गाही, प्लैन्ट की विशेषता और दोष, कानून के अठारह शीर्षकों, उत्तर के विभिन्न प्रकार, दिव्य, लिखित प्रमाण आदि का उल्लेख हुआ है। कात्यायन ने स्त्री-धन के कई प्रकार बताये हैं।

नीति ग्रन्थ- गुप्त काल में कामदक ने कामन्दकीय नीतिसार की रचना की। कामंदक के राजनैतिक विचारों का आधार कौटिलीय अर्थशास्त्र है। कामंदक के ग्रन्थ से तत्कालीन राज्य व्यवस्था व प्रशासन की रूपरेखा प्राप्त होती है। हितोपदेश पंचतंत्र की रचना भी गुप्त काल में हुई। इनमें कहानियों के माध्यम से नीति का उपदेश दिया गया है। चतत्र के लेखक विष्णु शर्मा हैं। संसार की अधिकांश भाषाओं में इस गन्थ का अनुवाद हो चुका है। पंचतत्र वर्तमान में भी एक लोकप्रिय ग्रन्थ है।

कोश और व्याकरण- प्राचीन काल से ही भारत में कोश निर्माण की परम्परा चली आ रही है। यास्ककृत निघंटु और निरुक्त से वैदिक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है। गुप्त काल में अमरसिंह ने अमरकोश की रचना की। गुप्तकाल में भट्टि, भौमक आदि व्याकरण के विद्वान् थे। भर्तृहरि भी इसी काल में हुए। नीति, श्रृंगार और वैराग्य शतक एक महत्त्वपूर्ण रचना है। चन्द्रगोमिन ने चन्द्रव्याकरण की रचना की। इसका शैली पाणिनि की अष्टाध्यायी से पृथक् है। इसका एक अनुवाद तिब्बती भाषा में प्राप्त हुआ है।

दर्शन ग्रन्थ- गुप्तकाल में दर्शन से संबंधित भी बहुत से ग्रन्थों का प्रणयन हुआ। इस समय तक ब्राह्मण व बौद्ध दर्शन का विकास हो चुका था। दोनों सम्प्रदायों के लोगों में शास्त्रार्थ होता था। सांख्य दर्शन से संबंधित ईश्वर कृष्ण की सांख्यकारिका भी गुप्त युग की रचना है। बहुत से दार्शनिक ग्रन्थों पर महाभाष्य लिखे गये हैं। पतंजलि के महाभाष्य पर भी टीका लिखी गयी। जैमिनी के पूर्व मीमांसा तथा बादरायण के उत्तरमीमांसा पर भाष्यों की रचना हुई। दिङनाग ने प्रमाणसमुच्चय और न्यायप्रवेश आदि ग्रन्थ लिखे। उद्योत्तकर ने न्यायभाष्य पर न्यायवार्तिक नामक टीका लिखी। वैषेशिक दर्शन-पद्धति पर आचार्य प्रशस्तपाद ने पदार्थ धर्मसंग्रह नामक ग्रन्थ लिखा है। चन्द्र ने दशपदार्थ शास्त्र की रचना की।

गुप्तकाल में बौद्ध धर्म की दो शाखाएँ और उनकी दो-दो उपशाखाएँ विकसित हुई। हीनयान की शाखाएँ थीं- थेरवाद (स्थविरवाद) और वैभाषिक (सर्वास्तिवाद) और महायान की थीं-माध्यमिक और योगाचार। असंग जो योगाचार से सम्बद्ध वज्रछेदिका टीका, योगाचार भूमिशास्त्र नामक ग्रन्थ लिखे थे। बसुबंधु ने अभिधर्मकोश की रचना की। बुद्धघोष ने विशुद्धिमग्ग नामक ग्रन्थ रचा जिसमें शील, समाधि आदि की विवेचना की गयी है।

बौद्ध ग्रन्थ विनयपिटक पर समतपासादिका टीका की रचना की गई। बुद्धघोष ने सुमंगलविलासिनी की भी रचना की। यह दीघनिकाय से संबंधित सुवर्णप्रमास, राष्ट्रपाल परिपृच्छा आदि बौद्ध कृतियों का भी निर्माण किया गया। बहुत से जैनग्रन्थ भी गुप्तकाल में लिखे गये। जैनाचार्य सिद्धसेन ने तत्त्वानुसारिणी तत्त्वार्थटीका नामक ग्रन्थ की रचना की। गुप्त काल में शैव नाय्यारों और वैष्णव आलवारों ने तमिल भाषा में बहुत से भक्ति से संबंधित-पदों की रचना की। तमिल के साथ-साथ अपभ्रंश व प्राकृत भाषा का भी विकास हुआ। प्राकृत भाषा के सेतुबंधगौडवहों भी गुप्तकालीन ग्रन्थ है। सेतुबंध प्रवरसेन का लिखा हुआ है, गौड्वहो का लेखक वाक्पनतिराज है।

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