जम्मू-कश्मीर: विशेष दर्जा प्राप्त राज्य Jammu and Kashmir: Special Category status

भारतीय संविधान के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर, विशेष दर्जा प्राप्त राज्य है। जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान की संशोधित पहली अनुसूची में सम्मिलित 15वां राज्य है परंतु पहली अनुसूची के राज्यों से संबंधित सभी उपबंध जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होते। इस राज्य हेतु विधि निर्माण सम्बन्धी संसद की शक्ति संघ सूची एवं समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी जिन्हें राष्ट्रपति उक्त राज्य की सरकार से परामर्श करके, उन विषयों के समान विषय घोषित कर दें जो भारत डोमिनियम में जम्मू-कश्मीर राज्य के अधिमिलन को शासित करने वाले अधिमिलन पत्र (Instrument of Accession)में उन विषयों के रूप में विनिर्दिष्ट हैं, जिनके सम्बन्ध में डोमिनियन व्यवस्थापिका उस राज्य के लिए कानून बना सकती है तथा उक्त सूचियों के उन अन्य विषयों तक सिमित रहेगी जो राष्ट्रपति, जम्मू-कश्मीर राज्य की सरकार की सहमति से, आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करें। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद-1 के समस्त उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू होते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 द्वारा जम्मू-कश्मीर की जो विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त था वह अभी भी अस्तित्व में है। भारत में जम्मू-कश्मीर एकमात्र राज्य है, जिसका अपना अलग संविधान है।


अनुच्छेद - 370

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करता है। विशेष दर्जा प्रदान करना, विलय के समय की विशेष परिस्थितियों की वजह से हुआ था जिसका ऐतिहासिक कारण है। ब्रिटिश शासन में जम्मू-कश्मीर राज्य एक देशी रियासत थी जिस पर डोगरा वंश का शासन था। 26 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तानी सेना तया पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के कबायलियों ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण करके तत्कालीन महाराजा हरीसिंह को भारत से सैनिक सहायता मांगने के लिए विवश कर दिया। अतः अन्य देशी रियासतों की तरह जम्मू-कश्मीर ने भी इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेसन को स्वीकार करके अपनी अस्मिता की रक्षा की। फलस्वरूप भारत का उस रियासत के प्रतिरक्षा, विदेश तथा संचार संबंधी मामलों पर अधिकार हो गया। इस प्रकार, जम्मू-कश्मीर राज्य को संविधान की पहली अनुसूची में भाग-ख के राज्यों में सम्मिलित कर लिया गया किंतु पहली अनुसूची के सभी उपबंध उस राज्य पर लागू नहीं होते हैं।

ऐसा नहीं होने का कारण यह है कि भारत ने उसी समय घोषणा की थी कि राज्य के लोग अपने संविधान का निर्माण अपनी संविधान-सभा द्वारा स्वयं करेंगे और यह भी तय करेंगे कि उनके संविधान का स्वरूप क्या होगा और भारत के साथ कैसे सम्बन्ध होंगे। यही कारण है कि भारतीय संविधान ने जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिया हुआ है और इसकी विस्तृत व्याख्या संवैधानिक अनुच्छेद 370 और इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेसन में की गई है। अनुच्छेद 370 के अनुसार, भारतीय संसद जम्मू-कश्मीर पर ही कानून बना सकती है जो कि इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेसन में उल्लिखित हैं। इसके अतिरिक्त अन्य विषयों पर राष्ट्रपति विचार कर सकते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370(3) का कहना है कि राष्ट्रपति आम विज्ञप्ति के द्वारा इस अनुच्छेद (370) को समाप्त कर सकते हैं। बशर्ते कि जम्मू-कश्मीर राज्य की संविधान सभा राष्ट्रपति से ऐसा करने के लिए कहे। ज्ञातव्य है कि हाल के वर्षों में,राजनीतिक हल्कों में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की मांग जोर पकड़ रही है। कारण यह दिया जा रहा है कि राज्य की संविधान सभा अस्तित्वहीन हो चुकी है इसलिए राष्ट्रपति को इसे समाप्त करने में कोई कठिनाई भी नहीं होगी। संवैधानिक तौर पर, जम्मू-कश्मीर की संविधान-सभा 1954 में ही विलय को अपना अनुमोदन दे चुकी है इसीलिए भारतीय संविधान के संघ-सूची में अंकित विषयों का कार्यक्षेत्र जम्मू-कश्मीर राज्य पर भी लागू होता है, जबकि पहले यह केवल तीन क्षेत्रों प्रतिरक्षा, विदेश तथा संचार तक ही सीमित था।


विशेष संबंध

जम्मू-कश्मीर राज्य के भारतीय संघ के साथ विशेष संबंधों की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

संसद का अधिकार

जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना एक अलग संविधान है जो कि उस राज्य की संविधान सभा द्वारा बनाया गया था। केंद्र सरकार समवर्ती-सूची में से कुछ विषयों पर ही कानून बना. सकती है, जिसका उल्लेख इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेसन में किया गया है। भारतीय संसद को राज्यों के संबंध में कानून बनाने की अवशिष्ट शक्तियां प्राप्त हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में ये शक्तियां राज्य विधान मंडल को प्राप्त हैं। संवैधानिक आदेश 1986 द्वारा अनुच्छेद 249 को जम्मू-कश्मीर राज्य पर भी लागू कर दिया गया है, जिसमें राष्ट्रीय हित से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान अथवा चीन द्वारा आक्रमण के समय सेनाओं की रक्षा के किए भारतीय संसद राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखते हुए कोई भी कानून बना सकती है लेकिन संविधान के अनुच्छेद 22(7) के अनुसार, निवारक निरोध से संबंधित विधान बनाने की शक्तियां संसद के स्थान पर जम्मू-कश्मीर विधान मंडल को दी गई हैं अर्थात् संसद द्वारा बनाई गई निवारक निरोध की विधि का अधिकार-क्षेत्र जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राज्य से संबंधित कुछ मामलों को छोड़कर, भारतीय संसद विधायी शक्तियों के सम्बन्ध में सर्वोपरि है।

राज्य की स्वायत्तता

भारतीय संसद जम्मू-कश्मीर के विधान मंडल की सहमति के बिना निम्नलिखित कार्य नहीं कर सकती है। विशेष रूप से ऐसे विधान जिनसे राज्य प्रभावित होता हो-

  1. राज्य के नाम या राज्यक्षेत्र में परिवर्तन (अनुच्छेद 3), तथा;
  2. राज्य के राज्यक्षेत्र के किसी भाग को प्रभावित करने वाली कोई अंतरराष्ट्रीय संधि (अनुच्छेद 253)।

इसी प्रकार जम्मू-कश्मीर राज्य को कुछ विशेषाधिकार दिये गये हैं, जो की भारत के अन्य राज्यों को प्राप्त नहीं हैं-

  1. संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा आंतरिक अशांति के आधार पर आपातकाल की घोषणा जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार की सहमति के बिना नहीं की जा सकती है।
  2. भारत सरकार राज्य सरकार की सहमति के बिना राज्य की प्रभावित करने वाला कोई निर्णय नहीं ले सकती है।
  3. संविधान के अनुच्छेद 365 के अंतर्गत केंद्र सरकार अपने आदेशों के पालन न होने की जिम्मेदारी के आधार पर राज्य के संविधान की निलंबित नहीं कर सकती है।
  4. संवैधानिक तंत्र के निलंबन से सम्बन्धित अनुच्छेद-356-357 को संशोधन आदेश, 1964 के द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य तक विस्तृत किया गया है; किंतु, यहां विफलता का अर्थ है- जम्मू-कश्मीर के संविधान के भाग-VI के अधीन स्थापित तंत्र की।

जम्मू-कश्मीर राज्य में दो प्रकार की उद्घोषणाएं होती हैं-

  • जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा-92 के अधीन राज्यपाल का शासन, एवं;
  • भारत के संविधान के अनुच्छेद-356 के अधीन राष्ट्रपति शासन, जैसा कि अन्य राज्यों के सम्बन्ध में प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि, जम्मू-कश्मीर में सर्वप्रथम राज्यपाल का शासन 27 मार्च, 1977 को तथा बाद में 19 जनवरी, 1990 को लागू हुआ था, जबकि राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन 7 सितम्बर, 1986 को लागू हुआ था।
  • संविधान के अनुच्छेद 360 के अधीन केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य में वित्तीय आपातकाल की घोषणा नहीं कर सकती है।

इस प्रकार अन्य राज्यों की अपेक्षा जम्मू-कश्मीर राज्य की अधिक स्वायत्तता दी गई है।

जम्मू-कश्मीर: विशेष संवैधानिक दर्जा
∎ संविधान की प्रथम अनुसूची में 15वें राज्य के रूप में सम्मिलित जम्मू-कश्मीर की अनुच्छेद-370 के अंतर्गत विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त है।
∎ जम्मू-कश्मीर ही भारत संघ का एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसका अपना पृथक् संविधान है और जहां सम्पति का अधिकार वहां के स्थायी नागरिकों को मूलाधिकार के रूप में प्राप्त है।
∎ संविधान के भाग-IV के अंतर्गत उल्लिखित नीति-निदेशक तत्व जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होते।

मूल अधिकार और नीति-निदेशक तत्व

नौकरी, संपत्ति और निवास के विशेष अधिकार राज्य के स्थायी निवासियों की प्रदान किए गए हैं अर्थात् संपत्ति का अधिकार इस राज्य में अभी भी अस्तित्व में है। राज्य के नीति-निदेशक तत्वों से संबंधित भारत के संविधान के भाग-4 के उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होते हैं।

राज्य के लिए पृथक् संविधान

जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना एक अलग संविधान है, जो इसे भारत के अन्य राज्यों से अलग श्रेणी में रखता है।

राज्य के संविधान संशोधन की प्रक्रिया

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होते हैं। जम्मू-कश्मीर राज्य के संविधान के उपबंध (जम्मू-कश्मीर तथा भारत के बीच संबंधों से संबंधित उपबंधों को छोड़कर) राज्य की विधान सभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित करके संशोधित किए जा सकते हैं परंतु ऐसे संशोधन जिससे राज्यपाल या निर्वाचन आयुक्त की शक्तियों पर प्रभाव पड़ता हो तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति की अनुमति की आवश्यकता होती है।

संविधान के अनुच्छेद 370(1) के अंतर्गत राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा भारत के संविधान संशोधन को जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू किया जा सकता है।

अन्य विषय

संवैधानिक आदेश का संशोधन करके नियंत्रक महालेखा परीक्षक, निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति के अधिकार-क्षेत्र को जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू कर दिया गया है।


जम्मू-कश्मीर का संविधान

उल्लेखनीय है कि, जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के समय भारत सरकार ने यह घोषणा की थी कि, राज्य का भावी संविधान एवं राज्य के भारत संघ से सम्बन्धों का निर्धारण राज्य की संविधान सभा द्वारा किया जाएगा। इन उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए राज्य की जनता द्वारा प्रभुत्व सम्पन्न संविधान सभा का निर्वाचन किया गया, जिसका प्रथम अधिवेशन 31 अक्टूबर, 1951 को हुआ। जम्मू-कश्मीर के संविधान को 11 नवंबर, 1957 की अंतिम रूप से स्वीकार किया गया तथा इसे 26 नवंबर, 1957 से कानूनी रूप में लागू कर दिया गया। यह संविधान जम्मू-कश्मीर राज्य को भारत का अविभाज्य अंग घोषित करता है। इस राज्य का राज्य क्षेत्र उन सभी प्रदेशों से मिलकर बनता है जो 15 अगस्त, 1947 को उस रियासत के शासक के अधीन था। इस राज्य में वे क्षेत्र भी शामिल हैं जो पाकिस्तान के क्षेत्र में हैं तथा जिन पर पाकिस्तान ने जबरन कब्जा किया हुआ है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है की इस उपबंध का संशोधन नहीं किया जा सकता है। जम्मू-कश्मीर के विधान मंडल का राज्य की कार्यपालिका तथा विधायी शक्ति का अधिकार क्षेत्र सभी विषयों पर है लेकिन राज्य विधान मंडल का उन विषयों पर, जिन पर भारत के संविधान के उपबंधों के अधीन संसद को राज्य के लिए कानून बनाने की शक्ति है, कोई अधिकार नहीं है।

जम्मू-कश्मीर राज्य की कार्यपालिका के प्रधान को सदर-ए-रियासत कहा जाता था और वह राज्य की विधान सभा द्वारा निर्वाचित होता था। इस विषमता को जम्मू-कश्मीर संविधान (छठा संशोधन) अधिनियम, 1965 द्वारा हटा दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप कार्यपालिका प्रधान का नाम सदर-ए-रियासत के स्थान पर राज्यपाल हो गया है और वह अन्य राज्यों की भांति राष्ट्रपति की अपनी मुद्रा एवं हस्ताक्षर द्वारा नियुक्त होता है। अन्य राज्यों की तरह ही राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है और वह मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार उसका उपयोग करता है। राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्षों का होता है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

राज्य का विधान मंडल राज्यपाल और दो सदनों से मिलकर बनता है जिसमें एक को विधान सभा तथा दूसरे को विधान परिषद कहते हैं।

विधान सभा में 100 सदस्य हैं जो राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष मतदान द्वारा चुने जाते हैं। विधान सभा में 24 स्थान राज्य के उन क्षेत्रों के लोगों द्वारा भरे जाने के लिए रिक्त रहते हैं, जो पाकिस्तान के अधिकार-क्षेत्र में है। राज्यपाल दो महिला सदस्यों को भी मनोनीत करते हैं। विधान परिषद 36 सदस्यों से मिलकर बनती है, जिनमें से 11 सदस्य कश्मीर तथा 11 सदस्य जम्मू क्षेत्र के निवासियों में से विधान सभा सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। शेष 14 व्यक्ति विभिन्न निर्वाचक मंडलों द्वारा चुने जाते हैं, जैसे-नगरपालिका और अन्य स्थानीय निकाय। चुने हुए सदस्यों में से एक सदस्य लद्दाख तथा एक सदस्य कारगिल तहसील से होना आवश्यक है।

राज्य के उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और दो या दो से अधिक अन्य न्यायाधीश होते हैं। राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल तथा मुख्य न्यायाधीश की सहमति से करता है।

राज्य की राजभाषा उर्दू है और परंतु जब तक विधान मंडल विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित नहीं करती है तब तक राज्य के शासकीय कार्यों के लिए अंग्रेजी का उपयोग होता रहेगा।

राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग है, जिसके अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है। राज्य में संविधान संशोधन दोनों सदनों की कुल सदस्यता के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा किया जा सकता है। किंतु जम्मू-कश्मीर राज्य तथा भारतीय संघ के संबंधों से संबंधित विषयों पर संशोधन नहीं किया जा सकता है।

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