जहाँगीर: 1605-1627 ई. Jahangir: 1605-1627 AD.

1605 अकबर की मृत्यु के एक सप्ताह के पश्चात् छत्तीस वर्ष की आयु में सलीम आगरे में राजसिंहासन पर बैठा तथा नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह गाजी की उपाधि धारण की। विषय-सुख में आसक्त होने पर भी उसमें सैनिक महत्त्वाकांक्षा का एकदम अभाव नहीं था तथा वह प्रारम्भिक तैमूरियों की राजधानी ट्रांस-औक्सियाना जीतने का स्वप्न देखा करता था। उसने सैनिकों के वेतन में 20 प्रतिशत की वृद्धि की। सिंहासन पर बैठने के शीघ्र बाद, उसने अनेक कार्यों द्वारा, असद के शब्दों में, सब लोगों के हृदयों पर विजय पाने का प्रयत्न किया। यमुना के किनारे पर खड़े किये गये पत्थर के एक खम्भे के बीच न्याय की प्रसिद्ध जंजीर लगवायी तथा बारह घोषणाएँ प्रकाशित करवायीं जिनके उसके राज्य में आचरण के नियम माने जाने की आज्ञा हुई-

  1. करों (जकात) का निषेध।
  2. आम रास्ते पर डकैती तथा चोरी के सम्बन्ध में नियम।
  3. मृत व्यक्तियों की सम्पत्ति पर निर्विघ्न उत्तराधिकार।
  4. मदिरा तथा सभी प्रकार के मादक द्रव्यों की बिक्री का निषेध।
  5. अपराधियों के घरों की कुर्की तथा उनके नाकों और कानों के काटे जाने का निषेध।
  6. सम्पत्ति (गसबी) पर बलपूर्वक अधिकार करने का निषेध।
  7. अस्पतालों का निर्माण तथा रोगियों की देखभाल के लिए वैद्यों की नियुक्ति।
  8. विशेष दिनों को पशुओं के वध का निषेध।
  9. रविवार के प्रति आदर।
  10. नसबों तथा जागीरों का सामान्य प्रमाणीकरण।
  11. ऐमा भूमि का प्रमाणीकरण।
  12. दुर्गों तथा प्रत्येक प्रकार के बंदीगृहों के सभी बंदियों को क्षमाप्रदान।

इन घोषणाओं का बहुत ज्यादा परिणाम निकला हो, ऐसा नहीं है।

जहाँगीर के प्रारम्भिक सुखकर स्वप्न उसके ज्येष्ठ पुत्र खुसरू के विद्रोह के कारण शीघ्र बुरी तरह ढह चले। खुसरू का अपने पिता के साथ सम्बन्ध अकबर के राज्यकाल के अन्तिम वर्षों से ही स्नेहहीन था। जहाँगीर के राज्याभिषेक के पाँच महीने बाद, वह आगरा छोड़ पंजाब भाग गया तथा विद्रोह कर बैठा। जहाँगीर बिना देर किये एक विशाल सेना लेकर अपने पुत्र के विरुद्ध चल पड़ा। जालंधर के निकट शाहज़ादे की सेना, शाही सेना द्वारा आसानी से परास्त कर दी गयी। काबुल जाने के अभिप्राय से चुनाव पार करने की चेष्टा करते समय वह अपने प्रमुख अनुगामियों- हुसैन बेग तथा अब्दुल अजीज-के साथ पकडा गया। उसके हाथ बाँधकर तथा उसके पैर में जंजीर लगाकर उसे अपने पिता के समक्ष खुले दरबार में लाया गया। बुरी तरह धिक्कारे जाने के बाद उसे कारावास में डाल दिये जाने की आज्ञा हुई। उसके समर्थकों को कठोर दण्ड दिये गये। बंदी शाहजादे को और भी दु:ख भोगना लिखा था। 1622 ई. में मृत्यु ने उसके दु:खों का अंत कर दिया।

सिक्खों के पंचम गुरु अर्जुन को मृत्यु-दण्ड दिया गया तथा बादशाह ने उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली। ऊपरी तौर से उन पर यह अभियोग लगाया गया था कि उन्होंने विद्रोही शाहज़ादा खुसरू की कुछ रुपये-पैसे से सहायता की थी। वर्द्धमान के गवर्नर को मरवाकर जहाँगीर ने उसकी पत्नी नूरजहाँ को अपनी पत्नी सलीमा बानू बेगम की परिचारिका के रूप में नियुक्त किया।

मई, 1611 ई. में जहाँगीर ने नूरजहाँ के साथ विवाह किया। नूरजहाँ का मूल नाम मेहरुन्निसा था। उसने उसके जीवन तथा राज्य-काल को बहुत प्रभावित किया। 1613 में उसे पदशाह बेगम की उपाधि मिली।

नूरजहाँ वास्तव में अत्यन्त सुन्दरी थी। उसकी फारसी साहित्य, काव्य तथा कलाओं में अच्छी रुचि थी। वह तीक्ष्ण विचार-शक्ति, सुगमता से मुड़ने वाले स्वभाव तथा परिपक्व सामान्य बुद्धि से संपन्न थी। पर उसके चरित्र का सबसे प्रमुख लक्षण था उसकी अपरिमित महत्त्वाकांक्षा, जिसके कारण उसने अपने पति पर असीम प्रभुत्व स्थापित कर लिया। उसके पिता इतिमादुद्दौला और भाई आसफ़ खाँ दरबार के प्रमुख सरदार बन गये। जहाँगीर के साथ नूरजहाँ के नाम भी सिक्के पर खुदवाये गए। नूरजहाँ के पिता को एतमादुद्दौला की उपाधि मिली और उन्हें वजीर के पद पर नियुक्त किया गया। नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ को खान-ए-समा के पद पर नियुक्त किया गया। आसफ खाँ ने अपनी पुत्री अर्जुमंद बानों बेगम का विवाह जहाँगीर के सबसे योग्य पुत्र शाहजादा खुर्रम के साथ किया। माना जाता है कि इसके बाद इन चार व्यक्तियों का एक गुट कायम हो गया जो प्रशासन को प्रभावित करने लगा। उसने अपने प्रथम पति से उत्पन्न पुत्री का विवाह जहाँगीर के कनिष्ठ पुत्र शाहजादा शहरयार से कर दिया और इस प्रकार अपनी स्थिति को और भी मजबूत बना लिया।

जहाँगीर को अपने राज्य-काल के प्रारम्भिक भाग में कुछ महत्त्वपूर्ण सैनिक सफलताएँ मिलीं। पहले बंगाल की ओर ध्यान दिया गया, जिसके राज्य में मिलाये जाने पर भी वहाँ अफ़गान विरोध का अन्त नहीं हुआ था। बंगाल में सूबेदारों के बहुधा परिवर्तन से प्रोत्साहन प्राप्त कर स्थानीय अफ़गानों ने उसमान खाँ के अधीन विद्रोह कर दिया। इस समय सूबेदार इस्लाम खाँ था। वह योग्य व्यक्ति था। उसने विद्रोह का दमन करने के लिए तुरंत कार्रवाई की। शाही दल ने उस्मान खाँ एवं मूसा खाँ को 12 मार्च, 1612 ई. को परास्त कर दिया। ये दोनों बारहभुईयाँ के नाम से भी जाने जाते थे। उनके नेता उसमान खाँ के सिर में गम्भीर घाव लगने के फलस्वरूप मृत्यु हो गयी। अफ़गानों की, जो अब तक मुगलों के विरुद्ध थे, राजनैतिक शक्ति का अन्त हो गया तथा जहाँगीर की मेलवाली नीति से वे अब से साम्राज्य के मित्र बन गये। जहाँगीर प्रथम मुग़ल शासक था जिसने अफगानों को मनसबदारी पद्धति में शामिल किया

जहाँगीर के राज्य-काल में मुग़ल साम्राज्यवाद की सबसे प्रसिद्ध सफलता थी मेवाड़ के राजपूतों पर विजय, जिन्होंने अब तक इसकी शक्ति की अवहेलना की थी। मेवाड़ के अमर सिंह में प्रताप के अटल निश्चय का अभाव था तथा जहाँगीर के तृतीय पुत्र खुर्रम की नीति ने उसे सुलह की बातचीत करने को विवश कर दिया। राणा और उसके पुत्र करण मुग़लों के अधीन हो गये तथा उन्होंने साम्राज्य का अधिपत्य स्वीकार कर लिया।

दक्कन में जहाँगीर ने अपने पिता की नीति का अनुसरण किया तथा उसके सम्पूर्ण राज्य काल में अहमदनगर राज्य के विरुद्ध एक अनिवार्य युद्ध किसी तरह चलता रहा। अंशत: दक्कन के इस राज्य की शक्ति के कारण तथा अशन शाही फौज द्वारा कमजोर तरीके से युद्ध संचालन के कारण, अहमदनगर की सेना पर मुग़ल सेना की पूर्ण सफलता सम्भव नहीं थी। उस समय अहमदनगर राज्य पर इसका अबिसीनियन मंत्री मलिक अम्बर योग्यतापूर्वक शासन कर रहा था। 1616 ई. में मुगलों को केवल आंशिक सफलता मिली, जबकि शाहजादा खुर्रम ने अहमदनगर तथा कुछ अन्य गढ़ों पर अधिकार कर लिया। इस विजय के लिए खुर्रम को उसके पिता ने शाहजहाँ (संसार का राजा) की उपाधि देकर पुरस्कृत किया। उसे अनेक उपहार मिले। उसे ऊँचा उठाकर तीस हजार जात और बीस हज़ार सवार का पद दिया गया। पर अहमदनगर पर मुगलों की विजय वास्तविक से अधिक दिखावा थी। दक्कन को वे पूरा-पूरा जीत नहीं सके।

जहाँगीर के राज्य-काल की एक उल्लेखनीय सैनिक सफलता थी 16 नवम्बर, 1620 ई. को उत्तर-पूर्वी पंजाब की पहाड़ियों में कांगडा के प्रबल दुर्ग पर अधिकार। परन्तु इस घटना के, जिसमें जहाँगीर को आनंदोल्लास का अवसर मिला, शीघ्र बाद में अनर्थ तथा विद्रोह होने लगे, जिनका तब तक अन्त न हुआ, जब तक कि उसने अपनी आँखे सदा के लिए न मूंद लीं।

साम्राज्य के लिए पहला भयानक अनर्थ था कंधार का हाथ से निकल जाना, जो बहुत समय से मुगलों तथा पारसियों के बीच संघर्ष का कारण था। शाह अब्बास (1587-1629 ई.) जो अपने समय में एशिया का एक सबसे बड़ा शासक था, मुग़ल अधिकारियों को भेंटे देकर तथा उनसे मित्रता का स्वांग रचकर उन्हें धोखा देता रहा। साम्राज्य की आन्तरिक अव्यवस्था से लाभ उठाकर उसने 1621 ई. में कंधार पर घेरा डाल दिया तथा अन्त में जून, 1622 ई. में इस पर अधिकार कर लिया। कधार को पुनः जीतने की जहाँगीर की विशाल तैयारी व्यर्थ गयी, क्योंकि उसका पुत्र शाहजहाँ, जिसे उसने आक्रमण का नेतृत्व करने की आज्ञा दी थी, चुपचाप बैठा रहा। कारण यह था कि उसे भय हो गया कि राजधानी से उसकी अनुपस्थिति में, नूरजहाँ राजसिंहासन पर उसके अधिकार को हानि पहुँचाकर अपने दामाद शहरयार के अधिकार को पुष्ट करेगी। नूरजहाँ के षड्यंत्रों से नाराज होकर शाहजहाँ शीघ्र अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर बैठा, क्योंकि बादशाह में साम्राज्ञी को रोकने का साहस अथवा शक्ति नहीं थी। जहाँगीर असमंजस में पड़ गया। उत्तर-पश्चिम में उसे पारसी दबाव का सामना करना था तथा साम्राज्य के अन्दर शाहजहाँ विमुख हो रहा था। जहाँगीर दारुण संकट में पड़ गया। शीघ्र ही उसे राज्य के अन्दर का खतरा दबाने में अपना ध्यान एवं प्रयत्न लगाना पड़ा।

शाहजहाँ ने वयोवृद्ध अधिकारी अब्दुर्रहीम खान-खाना के साथ मिलकर पहले आगरे की ओर सेना लेकर बढ़ना चाहा। परन्तु एक शाही फौज ने, जिसका नाममात्र का नेतृत्व शाहजादा परवेज़ के हाथ में था पर वास्तविक नेतृत्व महाबत खाँ कर रहा था, 1623 ई. में दिल्ली के दक्षिण बलोचपुर में उसे पूरी तरह हरा दिया। एक के बाद दूसरे प्रान्त में उसका पीछा किया गया तथा वह बार-बार परास्त हुआ। वह पहले दक्कन गया, जहाँ से बंगाल की ओर भगा दिया गया।

परन्तु वहाँ अपना अधिकार बनाये रखने में असमर्थ होकर वह दक्कन लौट गया तथा कुछ वर्षों तक मलिक अम्बर तथा अन्य लोगों से संधि करने के प्रयत्न में इधर-उधर भटकता रहा। मलिक अम्बर को दक्षिण का टोडरमल भी कहा जाता है। अन्त में 1625 ई. में उसका अपने पिता से मेल हो गया। उसके पुत्र दारा शुकोह तथा औरंगजेब, शायद उसके अच्छे आचरण के लिए, बन्धक के रूप में शाही दरबार में भेज दिये गये। वह अपनी स्त्री मुमताज महल, जो नूरजहाँ की भतीजी थी तथा अपने कनिष्ठ पुत्र मुराद के साथ नासिक चला गया। इस प्रकार शाहजहाँ के निरर्थक विद्रोह का अन्त हुआ, जिससे उसे कोई लाभ न हुआ पर साम्राज्य को काफी क्षति पहुँची।

महाबत खाँ को- जो जन्म से अफ़गान था और जहाँगीर के राज्यकाल के प्रारम्भ में केवल पाँच सौ का मनसब था पर शीघ्रता से ऊँचे पदों पर नियुक्त किये जाने के कारण उसने बादशाह की उत्कृष्ट सेवा की- विशेष रूप से शाहजहाँ के विद्रोह का दमन करने में सफलता मिली। पर उसकी सफलता से नूरजहाँ तथा उसके भाई आसफ खाँ की ईर्ष्या भड़क उठी तथा बेगम की शत्रुता के कारण उसने विद्रोह कर दिया। जब जहाँगीर काबुल जा रहा था, तब उसने राह में एक आकस्मिक साहसपूर्ण आक्रमण कर झेलम नदी के तट पर बादशाह को बन्दी बना लिया। नूरजहाँ भाग निकली। पर बलपूर्वक अपने पति को छुड़ाने के उसके सभी प्रयत्न विफल हो गये। तब वह कारावास में उसके साथ ही गयी। अन्त में वह और उसके पति महाबत खाँ को छकाकर रोहतास भागने में समर्थ हुए, जहाँ जहाँगीर के पक्षवालों ने एक विशाल सेना इकट्ठी कर रखी थी। महाबत खाँ अंत में भागकर शाहजहाँ के यहाँ पहुँचा और उससे संधि कर ली। पर नूरजहाँ की विजय क्षणिक थी, क्योंकि 28 अक्टूबर, 1627 ई. को जहाँगीर की मृत्यु हो गयी। रावी के तट पर शाहदरा में उसका शरीर एक सुन्दर कब्र में गाड़ दिया गया।

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