भारत के द्वीप समूह Islands of India

पश्चिम में अरंब सागर में तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी में अनेक द्वीप हैं। बंगाल की खाड़ी के द्वीप अरब सागर के द्वीपों से अपेक्षाकृत बहुत बड़े हैं। वस्तुतः इसका कारण अरब सागर के द्वीपों का मुंगे के निक्षेपों से निर्माण होना तथा बंगाल की खाड़ी के द्वीपों का समुद्री पर्वतों के पानी से बाहर निकले शिखरों से निर्माण होना है।

तट के निकटवर्ती द्वीप अधिकांशतः गंगा के डेल्टा में पाये जाते हैं। हुगली के निकट सागर द्वीप 24 किमी. लम्बा है। महानदी-ब्राह्मणी के डेल्टा में शौर्ट द्वीप तथा नदी के मुहाने पर व्हीलर द्वीप स्थित है। चिल्का झील के उत्तर-पश्चिम में स्थित भासरा-मांडला एक चट्टानी द्वीप है। मन्नार की खाड़ी के निकट भी क्रोकोडाइल अंडा तथा कोटा नामक चट्टानी द्वीप पाये जाते हैं।

पश्चिमी तट पर भटकल के निकट पिजन द्वीप, हरनोई के निकट जंजीरा तथा मुंबई के निकट हैजरे, कैनरे, बुचर, एलीफेंटा एवं अरनाला आदि द्वीप स्थित हैं। काठियावाड़ तट पर घोघा के पास पीरम तथा दक्षिण की ओर भैंसला द्वीप स्थित है। नर्मदा व ताप्ती के चौड़े भुहानों के निकट खड़ियाबेट, अलियाबेट जैसे कई छोटे-छोटे द्वीप पाये जाते हैं। खंभात की खाड़ी के निकट दीव तथा कच्छ की खाड़ी में वैद, नोरा, पिरटान तथा कारम्भर आदि द्वीप स्थित हैं।

भारत के सीमा क्षेत्र के भीतर कुल 247 द्वीप समूह शामिल हैं जिनमें 204 बंगाल की खाड़ी तथा शेष अरब सागर एवं मन्नार की खाड़ी (भारत व श्रीलंका के मध्य) में फैले हुए हैं। संरचना की दृष्टि से खाड़ी के द्वीप सागरीय द्वीपों से भिन्न हैं। अरब सागरीय द्वीप प्रवाल निर्मित हैं जबकि बंगाल की खाड़ी के द्वीप टर्शियरी पर्वतीकरण से सम्बद्ध हैं। कुल द्वीपों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है- निकटवर्ती द्वीप (Offshore islands) जो तट से 1 से 5 किमी. दूर स्थित हैं तथा सुदूरवतीं द्वीप जो तट से 5 किमी. से अधिक दूर स्थित हैं।

अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह Andaman and Nicobar Islands

ये द्वीप समूह एक संकरी श्रृंखला के रूप में उत्तर से दक्षिण दिशा में फैले हैं। ये 6°89’ तथा 13°34' उत्तरी अक्षांशों के मध्य स्थित हैं। द्वीप समूह का क्षेत्रफल 8249 वर्ग किमी. है। इस द्वीप समूह का उत्तरी छोर मुख्य भूमि से 901 किमी. दूर है, जबकि दक्षिणी छोर सुमात्रा (इंडोनेशिया) से मात्र 146.5 किमी. की दूरी पर स्थित है।

अंडमान एवं निकोबार दो मुख्य समूहों से बना है। अंडमान के अंतर्गत उत्तरी, मध्य तथा दक्षिणी अंडमान तीन द्वीप समूह शामिल हैं, जो निकोबार से 121 किमी. चौड़े दस डिग्री चैनल द्वारा पृथक् किये जाते हैं। निकोबार समूह में 19 द्वीप शामिल हैं, जिनमें ग्रेट निकोबार सबसे बड़ा है।

ये द्वीप समूह टर्शियरी सामुद्रिक वलित पर्वतों के समुद्र में उभरे हुए भाग हैं। द्वीप समूहों की ये श्रृंखला वास्तव में म्यांमार की अराकानयोमा श्रृंखला का विस्तार है, जो आगे चलकर सुमात्रा द्वीप से जुड़ जाती है। द्वीप समूह की निम्न पहाड़ियों की सबसे प्रमुख चोटियां सैडलपीक (उत्तरी अंडमान, 788 मी.) तथा माउंट थुलियर (ग्रेट निकोबार, 642 मी.) है। ये द्वीप समूह टर्शियरी युग के बालुका पत्थर, चूना-पत्थर तथा शैल चट्टानों से बने हैं। नदियों की संख्या बहुत है, किंतु ये अत्यंत छोटी होती हैं तथा शीघ्र ही संकरी खाड़ियों में लुप्त हो जाती हैं। अंडमान में स्वच्छ जल की बारहमासी धाराएं अत्यंत कम हैं। पहाड़ियों से गिरने वाली ये धाराएं गहरी बारहमासी तथा नौचालन योग्य हैं। कुछ द्वीप प्रवाल भित्तियों द्वारा आवृत्त हैं। पोर्ट ब्लेयर के उत्तर में स्थित बैरन तथा नारकोंडम द्वीप ज्वालामुखी द्वीप हैं।

द्वीप समूह कुल क्षेत्रफल का 86.4 प्रतिशत भाग सघन उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों तथा कच्छ वनस्पतियों से आवृत्त है। निकोबार की जलवायविक परिस्थितियां रबड़ की खेती के लिए उपयुक्त हैं।

लक्षद्वीप Lakshadweep

लक्षद्वीप प्रवाल द्वीपों का एक समूह है जिसमें 12 प्रवाल द्वीप, तीन प्रवाल भित्ति और 5 जलमग्न बालू के तट शामिल हैं।

1973 में लक्काद्वीप (Laccadives), मिनीकॉय (minicoy) तथा अमीन दीवी (Amindivigroup) को मिलाकर लक्षद्वीप नाम दिया गया। यह एक जिला संघीय राज्य क्षेत्र (District Union Territory) है, जिसका क्षेत्रफल 32 वर्ग किमी. है। यह द्वीप केरल तट से 220 से 440 किमी. की दूरी पर स्थित है। ये समस्त द्वीप अव्यस्थित रूप से समुद्र में फैले हुए हैं। लक्षद्वीप शब्द का अर्थ है- 1 लाख द्वीपों का समूह। लक्ष्य का आशय एक चिन्ह अथवा उद्देश्य का चिन्ह भी हो सकता है। यह द्वीप अफ्रीका तथा भारत के दक्षिणी-पश्चिमी मालाबार तट के बीच प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध व्यावसायिक मार्ग के रूप में चिन्हित है।

इन द्वीप समूहों का निर्माण वायु के कारण तटीय बालू के रूप में परिवर्तित प्रवाल बालू तथा तरंगों एवं धाराओं की गतिविधियों द्वारा हुआ है। लक्षद्वीप के प्रवाल-द्वीप (Attols) अन्य प्रवाल-द्वीपों (Corols Attols) की भांति दो महत्वपूर्ण खनिज निक्षेपों-फॉस्फेट एवं कैल्शियम कार्बोनेट-से परिपूर्ण हैं। सम्पूर्ण द्वीप समूह पर फॉस्फेट निक्षेप पक्षियों अथवा जलमुर्गों के उत्सर्जन द्वारा निर्मित हुए हैं। लैगूनों (प्रवाल वलय से घिरी हुई समुद्र तटीय झील) में बड़ी मात्रा में लगभग शुद्ध रूप में कैल्शियम कार्बोनेट बालू पाई जाती है।

लक्षद्वीप भारत के वृहद भू-भाग वाले संघ राज्य क्षेत्रों में से एक है। भारतीय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से लक्षद्वीप का महत्व है, लेकिन सामरिक महत्व का होने के कारण इसकी सुरक्षा भी आवश्यक है। यहां कोई भी क्षेत्र वनस्पतियों या सब्जियों आदि के लिए चिन्हित क्षेत्र नहीं है। इसका कारण यहां अधिक मात्रा में पाई जाने वाली रन्ध्रधुक्त मिट्टी है। यहां की महत्वपूर्ण वाणिज्यिक फसल नारियल है, जो पिटी (Pitti) द्वीप को छोड़कर प्रायः सभी द्वीपों पर पाये जाते हैं। लक्षद्वीप के नारियल में विश्व में सबसे अधिक मात्रा में तेल (लगभग 72 प्रतिशत) पाया जाता है। लैगूनों के नितल में समुद्री घास काफी अधिक होती है, जिनमें थैलासिया हैम्पप्रिचिया (Thalassia Hemprichiia) एवं केमोडोसिया आइसोटिफोलिया) सर्वाधिक सामान्य हैं, जिन्हें समुद्री कछुओं एवं सूस (डॉल्फिन की प्रकार का एक समुद्री जानवर) द्वारा खाया जाता है। मैग्रोव वन मिनिकॉय द्वीप के दक्षिणी भाग में पाए जाते हैं। यहां की प्रवाल भितियों में प्रायः वनस्पतियों की अधिकता है, जहां मछलियों की लगभग 300 प्रजातियां पाई जाती हैं। टूना (Tuna) यहां की सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यावसायिक मछली है। मत्स्य उद्योग ही यहां के लोगों के आय का मुख्य स्रोत है। राष्ट्रीय सामुद्रिक तकनीकी संस्थान एनआईओटी द्वारा लक्षद्वीप के चारों ओर 12 द्वीप समूहों में 500 मी. से 1200 मी. की गहराई पर 28 मत्स्य एकत्रण उपकरण (Fish Aggregating Devices- FADs) का सफलतापूर्वक डिजायन एवं विकास किया गया है। लक्षद्वीप में समुद्री मत्स्यपालन तथा समुद्री भोजन प्राप्त करने की अपार संभावनाएं विद्यमान हैं। मिनीकॉय, अगाती, सुहेली तथा बित्रा द्वीप टूना मछली के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण द्वीप है।

पामबन द्वीप Pamban Island

चट्टानी सतह वाला पामबन द्वीप भारत व श्रीलंका के बीच स्थित है। यह तमिलनाडु के रामनाङ जिले में प्रायद्वीपीय सतह का एक विस्तार है।

लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के मध्य भौगोलिक एवं स्थलाकृतिक अंतर

अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह वलित पर्वत के पनडुब्बी क्षेत्र का हिस्सा हैं जो समुद्र से बाहर निकले हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के अधिकतर द्वीप कठोर चट्टान के बने हैं। द्वीपों की स्थलाकृति पर्वतीय एवं ऊबड़-खाबड़ है। कुछ पर्वत शिखर बेहद ऊंचाई वाले हैं। इन द्वीपों का तटीय क्षेत्र सामान्यतः ढलवां है, लेकिन चुना पत्थर और सिलिका पत्थर की चट्टानों के कुछ भाग सीधे तौर पर समुद्र में हैं। तटों की सीमा-रेखा बेहद चौड़ी है। धाराएं छोटी हैं तथा उनमें मृदुल बहाव है।

लक्षद्वीप समूह के द्वीप प्रवालों के बने हैं तथा समुद्र से महज पांच मीटर से भी कम ऊंचे हैं। यहां की स्थलाकृति एक-दो पहाड़ियों या धाराओं को छोड़कर समतल है। संकुचित लैगून द्वीप के पवनभिमुखी दिशा में हैं, जबकि पूर्वी समुद्री किनारे पर ढाल बेहद तीव्र हैं। द्वीप की ऊपरी भूपर्पटी प्रवाल बालू की बनी है तथा इसके नीचे की परत कायांतरित चट्टानों की है।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का भू-राजनीतिक महत्व Geo-Political Importance of the Andaman and Nicobar Islands

हिंद महासागर की कोई औपचारिक सीमा नहीं है। इसमें प्रवेश के बिंदु, हालांकि, अच्छी प्रकार विकेन्द्रित हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह एक ऐसा ही बिंदु है। हिंद महासागर का सुदूर प्रवेश मार्ग इंडोनेशिया के जल क्षेत्र से होकर जाता है। संकीर्ण मलक्का जल संधि, (सुमात्रा एवं मलेशिया के बीच स्थित) जो प्रशांत महासागर की हिंद महासागर से जोड़ती है, अंडमान-निकोबार से होकर गुजरती है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक, हिंद महासागर वाणिज्यिक एवं सांस्कृतिक सम्मिलन का मुख्य द्वार था, लेकिन अब इसने भू-राजनीतिक महत्व भी हासिल कर लिया है। हिंद महासागर में नेतृत्व की आकांक्षा हेतु, अंडमान-निकोबार द्वीप की रणनीतिक अवस्थिति विशेष भू-राजनीतिक महत्व की हो गई है।

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